वराह महा पुराण
112 - भगवान् न्की सेवामें परिहार्य बत्तीस अपराध
भगवान् वराह कहते हैं-भद्रे! आहारकी एक सुनिश्चित शास्त्रीय मर्यादा है। अतः मनुष्यको क्या खाना चाहिये और क्या नहीं खाना चाहिये, अब यह बताता हूँ, सुनो। माधवि! जो भोजनके लिये उद्यत पुरुष मुझे अर्पित करके भोजन करता है, उसने अशुभ कर्म ही क्यों न किये हों, फिर भी वह धर्मात्मा ही समझा जाने योग्य है। धर्मके जाननेवाले पुरुषको प्रतिदिन धान, यव आदि सब प्रकारके साधनमें सहायक (जीवनरक्षणीय) अन्नसे निर्मित आहारका ही सेवन करना चाहिये। अब जो साधनमें बाधक हैं, तुम्हें उन्हें बताता हूँ। जो मुझे अपवित्र वस्तुएँ भी निवेदन करके खाता है, वह धर्म एवं मुक्ति-परम्पराके विरुद्ध महान् अपराध करता है, चाहे वह महान् तेजस्वी ही क्यों न हो, यह मेरा पहला भागवत अपराध है। अपराधीका अन्न मुझे बिलकुल नहीं रुचता है। जो दूसरेका अन्न खाकर मेरी सेवा या उपासना करता है, यह दूसरा अपराध है। जो मनुष्य स्त्रीसङ्ग करके मेरा स्पर्श करता है, उसके द्वारा होनेवाला यह तृतीय कोटिका सेवापराध है। इससे धर्ममें बाधा पड़ती है। वसुंधरे! जो रजस्वला नारीको देखकर मेरी पूजा करता है, मैं इसे चौथा अपराध मानता हूँ। जो मृतकका स्पर्श करके अपने शरीरको शुद्ध नहीं करता और अपवित्रावस्थामें ही मेरी सपर्या में लग जाता है, यह पाँचवाँ अपराध है, जिसे मैं क्षमा नहीं करता। वसुंधरे! मृतकको देखकर बिना आचमन किये मेरा स्पर्श करना छठा अपराध है। पृथ्वि! यदि उपासक मेरी पूजाके बीचमें ही शौचके लिये चला जाय तो यह मेरी सेवाका सातवाँ अपराध है। वसुंधरे! जो नीले वस्त्रसे आवृत होकर मेरी सेवामें उपस्थित होता है, यह उसके द्वारा आचरित होनेवाला आठवाँ सेवा-अपराध है। जगत्को धारण करनेवाली पृथ्वि! जो मेरी पूजाके समय अनुचितअनर्गल बातें कहता है, यह मेरी सेवाका नवाँ अपराध है। वसुंधरे! जो शास्त्रविरुद्ध वस्तुका स्पर्श करके मुझे पानेके लिये प्रयत्नशील रहता है, उसका यह आचरण दसवाँ अपराध माना जाता है।
जो व्यक्ति क्रोधमें आकर मेरी उपासना करता है, यह मेरी सेवाका ग्यारहवाँ अपराध है, इससे मैं अत्यन्त अप्रसन्न होता हूँ। वसुंधरे! जो निषिद्ध कर्मोको पवित्र मानकर मुझे निवेदित करता है, वह बारहवाँ अपराध है। जो लाल वस्त्र या कौसुम्भ रंगके (वनकुसुमसे रँगे) वस्त्र पहनकर मेरी सेवा करता है, वह तेरहवाँ सेवा-अपराध है। धरे! जो अन्धकारमें मेरा स्पर्श करता है, उसे मैं चौदहवाँ सेवा-अपराध मानता हूँ। वसुंधरे! जो मनुष्य काले वस्त्र धारणकर मेरे कर्मोंका सम्पादन करता है, वह पंद्रहवाँ अपराध करता है। जगद्धात्रि! जो बिना धोती पहने हुए मेरी, उपचर्यामें संलग्न होता है, उसके द्वारा आचरित इस अपराधको मैं सोलहवाँ मानता हूँ। माधवि ! अज्ञानवश जो स्वयं पकाकर बिना मुझे अर्पण किये खा लेता है, यह सत्तरहवाँ अपराध है।
वसुंधरे! जो अभक्ष्य (मत्स्य-मांस) भक्षण करके मेरी शरणमें आता है, उसके इस आचरणको मैं अठारहवाँ सेवापराध मानता हूँ। वसुंधरे! जो जालपाद (बतख)-का मांस भक्षण करके मेरे पास आता है, उसका यह कर्म मेरी दृष्टिमें उन्नीसवाँ अपराध है। जो दीपकका स्पर्श करके बिना हाथ धोये ही मेरी उपासनामें संलग्न हो जाता है, जगद्धात्रि! उसका वह कर्म मेरी सेवाका बीसवाँ अपराध है। वरानने! जो श्मशानभूमिमें जाकर बिना शुद्ध हुए मेरी सेवामें उपस्थित हो जाता है, वह मेरी सेवाका इक्कीसवाँ अपराध है। वसुंधरे! बाईसवाँ अपराध वह है, जो पिण्याक (हींग)भक्षण कर मेरी उपासना में उपस्थित होता है।
देवि! जो सूअर आदिके मांसको प्राप्त करनेका यत्न करता है, उसके इस कार्यको मैं तेईसवाँ अपराध मानता हूँ। जो मनुष्य मदिरा पीकर मेरी सेवामें उपस्थित होता है, वसुंधरे! मेरी दृष्टि में यह चौबीसवाँ अपराध है। जो कुसुम्भ (करमी)-का शाक खाकर मेरे पास आता है, देवि! वह मेरी सेवाका पचीसवाँ अपराध है। पृथ्वि! जो दूसरेके वस्त्र पहनकर मेरी सेवामें उपस्थित होता है, उसके
उस कर्मको मैं छब्बीसवाँ अपराध मानता हूँ। वसुंधरे! सेवापराधोंमें सत्ताईसवाँ अपराध वह है, जो नया अन्न उत्पन्न होनेपर उसके द्वारा देवताओं और पितरोंका यजन न कर उसे स्वयं खा लेता है। देवि! जो व्यक्ति जूता पहनकर किसी जलाशय या बावलीपर चला जाता है, उसके इस कार्यको मैं अट्ठाईसवाँ अपराध मानता हूँ। गुणशालिनि! शरीरमें उबटन लगाकर जो बिना स्नान किये मेरे पास चला आता है, यह पश्चात् मेरे लोकको चला जाता है। परम धर्म अहिंसामें परायण रहते हुए सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करना चाहिये। स्वयं अमानी, पवित्र और दक्ष रहकर सदा मेरे भजनके मार्गपर ही चलता रहे। साधक पुरुष इन्द्रियोंको जीतकर सेवा एवं नामादि अपराधोंसे निरन्तर बचा रहे। वह उदार हो और धर्मपर आस्था रखे, अपनी स्त्रीसे ही संतुष्ट रहे। शास्त्रज्ञ और सूक्ष्म बुद्धिसम्पन्न होकर मेरे मार्गपर आरूढ़ रहे। भद्रे! मेरी कल्पनामें चारों वर्गों के लिये सन्मार्गमें रहनेकी यही व्यवस्था है।
वसुंधरे! जो स्त्री आचार्यमें श्रद्धा रखती है, देवताओंकी भक्ति करती है, अपने स्वामीके प्रति निष्ठा एवं प्रीति रखती है और संसारमें भी उत्तम व्यवहार करती है, वह यदि पतिसे पहले मेरे लोकमें पहुँचती है, तो वह अपने स्वामीकी प्रतीक्षा करती है। यदि पुरुष मेरा भक्त है और अपनी पत्नीको छोड़कर मेरे धाममें पहले पहुँचता है, वह भी अपनी उस भार्याकी प्रतीक्षा करता है। देवि! अब कर्मों में दूसरे उत्तम कर्मको तुम्हारे सामने व्यक्त करता हूँ।
सुमुखि! ऋषिलोग भी मेरी उपासनामें स्थित रहते हुए भी मेरा दर्शन पाने में असमर्थ हैं। ऐसी स्थितिमें मेरे कर्मपरायण अन्य मनुष्योंकी तो बात ही क्या? माधवि! जो अन्य देवताओंमें श्रद्धा रखते हैं, उनकी बुद्धि मारी गयी है। वे मूर्ख मेरी मायाके प्रभावसे मुग्ध हैं, उनके चित्तमें पाप भरा हुआ है। ऐसे व्यक्ति मुझे पानेके अधिकारी नहीं हैं। भगवति! मोक्षकी इच्छा रखनेवाले जिन पुरुषोंद्वारा मैं प्राप्य हूँ, उन परम शुद्ध भाववाले पुरुषोंका विवरण सुनाता हूँ। देवि! यह आख्यान धर्मसे ओत-प्रोत है। इसे तुम्हें सुना चुका। माधवि! दुष्ट व्यक्तिको इसका उपदेश नहीं करना चाहिये। जो अश्रद्धालु व्यक्ति इसका अधिकारी नहीं है, जिसने दीक्षा नहीं ली है एवं जो कभी मेरे पास आनेका प्रयत्न नहीं करता, उसे इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। माधवि! दुष्ट, मूर्ख और नास्तिक व्यक्ति इस उपदेशको सुननेके अधिकारी नहीं हैं। देवि! यह मेरा धर्म महान् एवं ओजस्वी है, इसका मैं वर्णन कर चुका । अब सम्पूर्ण प्राणियोंके हितके लिये तुम दूसरा कौनसा प्रसङ्ग पूछना चाहती हो, वह बताओ। (यह अध्याय 'कल्याण'-साधनाङ्कके पृष्ठ ५३८ पर 'वराहपुराण' के नामोल्लेखपूर्वक उद्धृत है।)