वराह महा पुराण
23-षष्ठी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें स्वामी कार्तिकेयके जन्मकी कथा
राजा प्रजापालने कहा-द्विजवर! मेरा एक प्रश्न यह भी है कि अहंकारसे कार्तिकेयकी उत्पत्ति कैसे हुई? महामते! आप मेरे संदेहको दूर करनेकी कृपा कीजिये।
मुनिवर महातपा बोले-राजन्! सम्पूर्ण तत्त्वोंमें जिन्हें प्रधान स्थान प्राप्त है, उन्हें परम पुरुष परमात्मा कहा जाता है। सबके आरम्भमें उन्हींसे अव्यक्ततत्त्वकी उत्पत्ति हुई। ये तत्त्व तीन प्रकारके हैं। परम पुरुष और अव्यक्तके योगसे महत्तत्त्वका प्रादुर्भाव हुआ। इसी महत्तत्त्वको अहंकार भी कहते हैं। इनमें जो पुंस्तत्त्व है, वह भगवान् विष्णु अथवा शिव नामसे प्रसिद्ध है। अव्यक्तप्रकृति भगवती उमादेवी या कमलनयना लक्ष्मी हैं। उन्हीं भगवान् शंकर और उमाके संयोगसे अहंकारकी उत्पत्ति हुई। वे ही सेनापति कार्तिकेय हैं। महामते राजन् ! मैं अब उन कार्तिकेयकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग कहता हूँ, तुम उसे सुनो।
सर्वप्रथम एकमात्र भगवान् नारायण ही विराजमान थे, फिर उनसे ब्रह्माजीकी उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् स्वायम्भुव मनु तथा मरीचि और सूर्य आदि प्रकट हुए। फिर इन देवताओं, दानवों, गन्धर्वो, मनुष्यों, पशुओं और पक्षियोंकी सृष्टि हुई। यही सम्पूर्ण प्राणियोंकी सृष्टि कही गयी है।
सष्टिका विस्तार हो जानेपर देवताओं और दानवोंमें एक-दूसरेको परास्त करनेकी इच्छासे सदा युद्ध होने लगा; क्योंकि उन दोनों दलोंमें अपार बल था और उनमें सदा वैरकी भावना बनी रहती थी। दैत्योंके सेनाध्यक्ष बड़े बलवान् थे, जिन्हें युद्ध में कोई हरा नहीं सकता था। उनके नाम इस प्रकार हैं-हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, महासुर विप्रचित्ति, विचित्र, भीमाक्ष और क्रौञ्च। इन सभी वीरोंके बलकी सीमा न थी। उस घोर संग्रामके अवसरपर देवसेनामें उपस्थित देवता दानवोंके तीक्ष्ण बाणोंसे प्रतिदिन हार रहे थे। उनकी पराजय देखकर बृहस्पतिजीने कहा-'देवताओ! तुम्हारी सेनामें कोई सेनाध्यक्ष नहीं है। केवल एक इन्द्रसे इस सेनाकी रक्षा हो सके-यह नितान्त असम्भव है। अत: तुमलोग अपने लिये किसी सेनाध्यक्षका अन्वेषण करो। अब इसमें देर करना ठीक नहीं है।'
बृहस्पतिजीके ऐसा कहनेपर देवता ब्रह्माजीके पास गये। उन्होंने व्याकुल होकर उनसे कहा'भगवन्! हमें आप कोई सेनाध्यक्ष देनेकी कृपा करें।' इसपर ब्रह्माजीने ध्यान लगाकर देखा'इन देवताओंके लिये मुझे क्या करना चाहिये?' इतने में उनका ध्यान भगवान् शंकरकी ओर गया और फिर सभी देवता, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध एवं चारण ब्रह्माजीको आगे करके कैलास पर्वतको चले। वहाँ पशुपति भगवान् शंकरका दर्शनकर अनेक प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा सभीने उनकी स्तुति आरम्भ कर दी।
देवता बोले-महेश्वर! हम समस्त देवता आपकी शरणमें आये हैं। भूतभावन! आप त्रिनेत्र, भगवान् शंकर, उमापति, विश्वपति, मरुत्पति और जगत्पति नामसे विख्यात हैं! आपको हमारा प्रणाम है। प्रभो! आप हमारी रक्षा करें। भगवन् !
आपके जटापुञ्जके अग्रभागपर बैठे हुए चन्द्रमाकी किरणोंके प्रकाशसे तीनों जगत् स्वच्छ हो रहे हैं! आप ही अच्युत, त्रिशूलपाणि और पुरुषोत्तम कहलाते हैं। दैत्योंद्वारा उत्पन्न भय हमारे ऊपर आ गया है। आप उससे हमारी रक्षा करनेकी कृपा कीजिये। श्रेष्ठ देवताओंमें भी परम श्रेष्ठ प्रभो! आदिदेव, पुरुषोत्तम, हर, भव, महेश, त्रिपुरान्तक, विभु, भगदेवताके नेत्र हरनेवाले, दैत्यरिपु, पुरातन और वृषभध्वज-इस प्रकार आपके अनन्त नाम हैं। भगवन्! हमारी रक्षामें आप ही सक्षम हैं। गिरिजापति प्रभो! पर्वतपत्नी मैनाके आप वात्सल्यभाजन हैं! देवेश्वर! अच्युत, गणेश, भूतेश, शिव, अक्षय, अयन और दैत्यवरान्तक आपकी संज्ञाएँ हैं। भगवन्! आप हमारी रक्षा करें। पृथ्वी आदि पाँच तत्त्वोंमें आप प्रतिष्ठित हैं। आपके प्रधान गुण भी पाँच हैं। विशेषता यह है कि आप आकाशमें तो केवल ध्वनिरूपसे लीन रहते हैं, अग्निमें शब्द एवं रूप-इन दो गुणोंसे, वायुमें तीन रूपोंसे, जलमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस-इन चार रूपोंसे और पृथ्वीमें गन्धसहित पाँच रूपोंसे विराजते हैं। भगवन्! अग्नि आपका स्वरूप है। वृक्ष, पत्थर और तिल आदिमें आप साररूपसे स्थित हैं। भगवन्! आप महान् शक्तिशाली पुरुष हैं। इस समय दैत्योंद्वारा हमें अत्यन्त दु:ख भोगना पड़ रहा है। अतः आप हमारी रक्षा करें। त्रिलोचन ! जिस समय यह सारा विश्व सृष्टिशून्य था तथा ये सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्र आदि भी नहीं थे, उस समय त्रिनेत्र! सभी प्रमाणोंसे परे, समस्त बाधाओंसे वर्जित केवल आपकी ही सत्ता विराजित थी। भगवन्! आप कपालकी माला पहनते हैं। द्वितीयाके चन्द्रमा आपके मस्तककी शोभा बढ़ाते हैं। श्मशानभूमिमें आप निवास करते हैं। भस्मसे आपकी अनुपम शोभा होती है। आप शेषनागका यज्ञोपवीत पहनते हैं। देवेश्वर! मृत्युञ्जय! आप अपनी तीव्र बुद्धिके सहारे हमारी रक्षा करें। भगवन्! आप पुरुष हैं और ये श्रीगिरिजा अर्द्धदेहरूपमें आपकी शक्ति हैं। आपमें ही यह जगत् स्थित है। आहवनीय आदि अग्नियोंने आपके तीनों नेत्रों में स्थान पाया है। समस्त सागर तथा पर्वतोंसे निकलकर समुद्रतक जानेवाली नदियाँ आपकी जटाएँ हैं। आप विशुद्ध ज्ञानघन हैं। जिनकी दृष्टि दूषित है, वे ही आपको भौतिकरूपमें देखते हैं। जगतके उत्पत्तिकर्ता भगवान् नारायण तथा चार मुखोंसे शोभा पानेवाले ब्रह्मा भी आप ही हैं। सत्त्व आदि तीनों गुणों, आहवनीय, आवसथ्य आदि तीनों अग्नियों तथा कृत-त्रेता आदि युगोंके भेदसे आप त्रिमूर्ति बन जाते हैं। प्रभो! ये प्रधान देवता आपकी सहायता चाहते हैं। ये आपको अपना तोषक एवं रक्षक कहते हैं। क्योंकि रुद्र ! विश्वका भरण-पोषण करना आपका स्वभाव है। अतः भस्मको भूषणरूपमें धारण करनेवाले प्रभो! आप हमारी रक्षा करें।
मुनिवर महातपा कहते हैं- राजन्! देवताओं के इस प्रकार स्तुति करनेपर पशुपति भगवान् शंकर स्थिर होकर बोले-'देवताओ! आपका क्या कार्य है? शीघ्र बतलाएँ।'
देवगण बोले-देवेश! दानवोंके वधके लिये आप हमें एक सेनापति प्रदान करनेकी कृपा कीजिये। ब्रह्माजीकी अध्यक्षतामें रहनेवाले हम सभी देवताओंका इस समय इसीमें कल्याण है।
भगवान् रुद्रने कहा-देवगण! आपलोग स्वस्थ एवं निश्चिन्त हो जायें। अभी थोड़ी देरमें मैं आपलोगोंको सेनापति देता हूँ।
राजन्! यों कहकर भगवान् रुद्रने देवताओंको जानेकी आज्ञा दे दी और पुत्रोत्पत्तिके निमित्त अपने विग्रहमें रहनेवाली शक्तिको प्रेरित किया। उनके द्वारा शक्तिके क्षुब्ध होते ही एक कुमार प्रकट हो गया। उसकी प्रभा ऐसी थी, मानो तपता हुआ सूर्य ही हो। वह अपनी जन्मजात शक्तिको इस प्रकार प्रकाशित कर रहा था, मानो वह शक्ति ज्ञानमय बनकर एकमात्र उसीके पास पुञ्जीभूत हो गयी है। राजेन्द्र! उस कुमारकी उत्पत्तिसे सम्बन्धित अनेक प्रकारकी कथाएँ हैं। बहुत-से मन्वन्तरों तथा कल्पोंमें देवताओंके सेनापति होनेके विविध प्रसङ्ग हैं। भगवान् शंकरके शरीरमें अहंकाररूपसे जिन
देवताओंकी प्रसिद्धि थी, वे सभी देवता प्रयोजनवश देवसेनापति बनकर शोभा पाने लगे। उस कुमारके उत्पन्न हो जानेपर स्वयं ब्रह्माजी देवताओंके साथ आये और उन देवाधिदेव भगवान् शंकरकी पूजा की। समस्त देवताओं, ऋषियों, सिद्धों और भगवान् शंकरने उस सेनापति होनेवाले बालकको पाल-पोसकर बड़ा किया। तब उस बालकने देवताओंसे कहा-'आपलोग मुझे दो सहायक तथा कुछ खिलौने दें।' उस समय भगवान् रुद्रने उस बालककी बात सुनकर यह वचन कहा'पुत्र! तुम्हें खेलनेके लिये कुक्कुट तथा सेवासहयोगके लिये शाख एवं विशाख नामवाले दो अनुचर देता हूँ। कुमार! तुम भूत, ग्रह एवं विनायकोंके नेता बनो और देवताओंकी सेनाके सेनापति हो जाओ।' राजन्! भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर सभी देवगण प्रसन्न हो अभिलषित वाक्योंका उच्चारण करके सेनाध्यक्ष भगवान् स्कन्दकी स्तुति करने लगे।
देवगण बोले-प्रभो! आप भगवान् शंकरके सुपुत्र हैं। आप हमारी सेनाकी अध्यक्षता स्वीकार करनेकी कृपा करें। आप षण्मुख, स्कन्द, विश्वेश, कुक्कुटध्वज, पावकि, शत्रुओंको कम्पित करनेवाले, कुमारेश, बालग्रहानुग, शत्रुओंको परास्त करनेवाले, क्रौञ्चविध्वंसक (क्रौञ्चनामक पर्वतको, जो आसाममें स्थित है, विदीर्ण करनेवाले), कृत्तिकानन्दन, शिवकुमार, भूतों तथा ग्रहोंके स्वामी, अग्निनन्दन तथा भूतभावन भगवान् शंकरकी संतान हैं। त्रिलोचन! आपको हमारा नमस्कार है।
राजन्! देवताओंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर रुद्रकुमार भगवान् स्कन्दकी आकृति तेजीसे बढ़ने लगी। फिर तो वे बारह आदित्योंके समान तेजस्वी एवं पराक्रमी हो गये और उनके तेजसे तीनों लोकोंमें ताप छा गया।
राजा प्रजापालने पूछा-गुरो! आपने स्कन्दको कृत्तिका-पुत्र कैसे कहा है? अथवा वे कुमार, पावकि और षण्मातनन्दन क्यों कहे जाते हैं? इसका कारण मुझे बतानेकी कृपा करें।
मुनिवर महातपा कहते हैं-राजन्! मन्वन्तरके प्रारम्भमें कार्तिकेयकी जिस प्रकार उत्पत्ति हई थी, वह प्रसङ्ग मैंने बताया है। देवतालोग तो भूत और भविष्यकी बातें भी जानते हैं। अतएव उनके द्वारा इन गुणद्योतक नामोंका उच्चारण हुआ है। अग्निके पुत्र होनेसे इनका नाम 'पावकि' हुआ है। यद्यपि इनकी माता गौरी हैं, किंतु जन्ममें कृत्तिकादि छ: माताओंने इन्हें दुग्ध-पान कराकर पाला था, अत: ये 'कार्तिकेय' कहलाये। महाराज! तुम्हारे प्रश्नका इस प्रकार समाधान हो गया।
आत्मविद्यारूपी अमृतका यह विषय अत्यन्त गुह्य है। भगवान् शंकरके अहंकारका यह मूर्तरूप है। सम्पूर्ण पापोंके प्रशमन करनेवाले स्वयं भगवान शंकर ही स्कन्दरूपमें प्रकट हुए थे।
पितामह ब्रह्माजीने इनके अभिषेकके समय इन्हें षष्ठी तिथि प्रदान की थी। अतः जो व्यक्ति इस तिथिमें संयमपूर्वक केवल फलके आहारपर रहकर इनकी पूजा करता है, उसे यदि पुत्र न हो तो पुत्रकी प्राप्ति अथवा निर्धन हो तो धनकी प्राप्ति हो जाती है। इतना ही नहीं, मनुष्य मनसे भी जिन-जिन वस्तुओंकी इच्छा करेगा, वह उसे सुलभ हो जायगी। जो पुरुष स्वामी कार्तिकेयके उपर्युक्त गुणनामपूर्ण स्तोत्रका पाठ करता है, उसके घरमें बच्चोंका सदा कल्याण होता है और वे नीरोग रहते हैं।