15-16-महातपाका उपाख्यान

पृथ्वीने पूछा-भगवन्! मणिसे जो प्रधान पुरुष निकले थे तथा जिन्हें भगवान् श्रीहरिने वर दिया था-'तुम सभी त्रेतायुगमें राजा बनोगे', उनकी उत्पत्ति कैसे हुई? उनके नाम क्या हुए तथा उन्होंने कौन-कौनसे काम किये? आप मुझे यह प्रसङ्ग बतानेकी कृपा करें।

भगवान् वराह कहते हैं-प्राणियोंको प्रश्रय देनेवाली पृथ्वी देवि! मणिसे प्रकट जो सुप्रभ नामका प्रधान पुरुष था, वह त्रेतायुगमें एक महान् उदार राजा हुआ। उसके प्रादुर्भावका प्रसङ्ग सुनो। प्रथम सत्ययुगमें महाबाहु नामसे एक प्रसिद्ध राजा हो चुके हैं। वे ही पुनः त्रेतायुगमें राजा श्रुतकीर्ति हुए। उस समय त्रिलोकीमें महान् पराक्रमियोंमें उनकी गणना थी। मणिसे उत्पन्न हुआ सुप्रभ उन्हींके घर पुत्ररूपसे उत्पन्न हुआ। उस समय प्रजापाल नामसे जगत्में उसकी ख्याति हुई। एक दिनकी बात है-राजा प्रजापाल शिकारके लिये किसी ऐसे सघन वनमें गया, जहाँ बहुतसे हिंस्र जन्तु निवास करते थे। वहाँ उसे एक सुन्दर आश्रम दिखायी पड़ा, जहाँ परम धार्मिक महातपा ऋषि निवास करते थे। वे निराहार रहकर सदा परब्रह्म परमात्माका ध्यान करते थे। तप करना ही उनका मुख्य काम था। वहाँ जाकर राजाको आश्रममें प्रवेश करनेकी इच्छा हुई, अत: वह आश्रमके भीतर गया। जंगली वृक्षोंसे उस आश्रमके प्रवेश-मार्गकी बड़ी आकर्षक शोभा हो रही थी। सघन लताएँ गृहके रूपमें परिणत होकर ऐसी चमक रही थीं, मानो चन्द्रमा चाँदनी बिखेरता हो। वहाँ भ्रमरोंको बिना प्रयास ही परितृप्ति प्राप्त होती थी। लाल कमलकी पंखुड़ियोंके समान कोमल नखवाली वराङ्गनाएँ वहाँ यत्र-तत्र सुन्दर राग आलाप रही थीं, मानो इन्द्रकी अप्सराएँ स्वर्गलोक छोड़कर पृथ्वीपर आ गयी हों। वहीं पासमें ही अनेक प्रकारके मत्त पक्षी आनन्दमें भरकर ची-ची-चूं-शब्द कर रहे थे तथा भौरे भी गूंज रहे थे। भाँति-भाँतिके प्रामाणिक (आकार-प्रकारवाले) कदम्ब, नीप, अर्जुन और साखू नामके वृक्ष शाखाओं तथा सामयिक सुन्दर फूलोंसे सम्पन्न होकर उस आश्रमकी शोभा बढ़ाते थे। आश्रमके ऊपर बैठे हुए पक्षियोंकी मधुर ध्वनिसे उसकी शोभा अनुपम हो रही थी। वहाँ रहकर सुचारु रूपसे काम करनेवाले सज्जन पुरुष धैर्यपूर्वक अपने कार्यमें तत्पर थे। प्रायः सर्वत्र यज्ञकुण्डोंसे यज्ञके धुएँ उठ रहे थे। हवन करनेसे आगकी प्रचण्ड लपटें निकल रही थीं तथा गृहस्थ ब्राह्मणोंद्वारा यज्ञ आरम्भ था। अत: ऐसा जान पड़ता था, मानो पापरूपी हाथीको शान्त करनेके विचारसे अत्यन्त तीखे दाँतवाले मतवाले सिंह ही यहाँ आ गये हों।

इस प्रकार सर्वत्र दृष्टि डालते हुए राजा प्रजापालने अनेक उपायोंका आश्रय लेकर उस उत्तम आश्रमके भीतर प्रवेश किया। वहाँ चले जानेपर सामने अत्यन्त तेजस्वी मनिवर महातपा दिखायी पड़े। उस समय पुण्यात्माओं एवं ब्रह्मवेत्ताओंमें शिरोमणि वे ऋषि कुशाके आसनपर बैठे थे। उनका तेज ऐसा था, मानो अनन्त सूर्योने एक रूप धारण कर लिया हो। महातपाका दर्शन पाकर प्रजापालको मृगकी बात ही भूल गयी। ऋषिके सत्सङ्गसे उसके विचार शुद्ध हो गये थे। धर्मके प्रति उसकी दृढ़ एवं अद्भुत आस्था हो गयी। ऐसे पवित्र अन्तःकरणवाले राजा प्रजापालको देखकर महातपामुनिने उसका आसन एवं पाद्य आदिसे आतिथ्य-सत्कार किया और उस नरेशने भी मुनिको प्रणाम किया। वसुधे! साथ ही मुनिसे उसने यह पवित्र प्रश्न किया-'भगवन्! दुःखरूपी संसार-सागरमें डूबते हुए मनुष्योंके मनमें यदि दुस्तर संसारके तरने (विजय पाने)-की इच्छा हो तो उन्हें जो कार्य करना उचित हो, वह आप मुझ शरणागतको बतानेकी कृपा करें।'

महातपाजी बोले-राजन्! संसाररूपी समुद्रमें डूबनेवाले मनुष्यों के लिये कर्तव्य यह है कि वे पूजा, होम, दान, ध्यान एवं अनेक यज्ञ आदि उपकरणरूपी दृढ़ नौकाका आश्रय लें। नाव बनाने में कीलोंकी आवश्यकता होती है। ये उपर्युक्त पूजा आदि, जिनसे मोक्ष मिलना निर्विवाद है, कीलोंका काम देती हैं। देवसमाजसे बड़ी रस्सियोंकी आवश्यकता पूरी हो जाती है। अत: अब तुम प्राण आदिके सहयोगसे त्रिलोकेश्वररूपी नौका तैयार कर लो। भगवान् नारायण ही त्रिलोकेश्वर हैं। उनकी कृपासे नरकमें नहीं जाना पड़ता। राजन्! जो बड़भागीजन उन देवेश्वरको भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हैं, उनकी चिन्ताएँ शान्त हो जाती हैं और वे उनके उस परम पदको पा लेते हैं, जो कभी नष्ट नहीं होता।

राजा प्रजापालने पूछा-भगवन्! आप सम्पूर्ण धर्मोको भलीभाँति जानते हैं। मोक्षकी इच्छा करनेवाले पुरुषको सनातन श्रीहरिकी विभूतियोंका किस प्रकार चिन्तन करना चाहिये? इसे बतानेकी कृपा करें।

मुनिवर महातपाने कहा-राजन्! तुम बड़े विज्ञ पुरुष हो। सम्पूर्ण योगियोंके स्वामी श्रीविष्णु स्त्रियों एवं पुरुषोंपर जिस प्रकार प्रसन्न होते हैं, उसे सुनो। पितरोंके सहित सभी देवता तथा ब्राह्मणके भीतर विचरनेवाले ब्रह्मा प्रभृति-ये सबके-सब श्रीविष्णुसे ही उत्पन्न हुए हैं-ऐसी वेदकी श्रुति प्रसिद्ध है। अग्नि, अश्विनीकुमार, गौरी, गजानन, शेषनाग, कार्तिकेय, आदित्यगण, दुर्गासहित चौंसठ मातृकाएँ, दस दिशाएँ, कुबेर, वायु, यम, रुद्र, चन्द्रमा और पितृगण-इन सबकी उत्पत्तिमें जगत्प्रभु श्रीहरिकी ही प्रधानता है। हिरण्यगर्भ श्रीहरिके श्रीविग्रहमें इनका स्थान बना रहता है और वहींसे निकलकर ये चारों ओर पृथक्-पृथक् परिलक्षित होते हैं, पर अहंता (मैं हूँ)-का अभिमान उनका साथ नहीं छोड़ता।