60-शान्ति-व्रत

अगस्त्यजी कहते हैं-राजन्! अब तुम्हें 'शान्तिव्रत'का उपदेश करता हूँ। इसके आचरणसे गृहस्थोंके घरमें सदा शान्ति-सन्मति बनी रहती है। सुव्रत! कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिके दिनसे आरम्भकर एक वर्षपर्यन्त व्रतीको अत्यन्त उष्ण भोजनका त्याग करना चाहिये तथा प्रदोषकालमें शेषशायी श्रीहरिकी सम्यक् प्रकारसे पूजा करनी चाहिये। 'ॐ अनन्ताय नमः', 'ॐ वासुकये नमः', 'ॐ तक्षकाय नमः', 'ॐ कर्कोटकाय नमः', 'ॐ पद्माय नमः', 'ॐ महापद्माय नमः', 'ॐ शङ्खपालाय नमः','ॐ कुटिलाय नम:'-इन मन्त्रोंके द्वारा भगवान् विष्णुके शय्यास्वरूप शेषनागके क्रमश: दोनों चरण, कटिभाग, उदर, छाती, कण्ठ,दोनों भुजाएँ, मुख एवं सिरकी विधिपूर्वक पृथक्-पृथक् पूजा करनी चाहिये। फिर भगवान् विष्णुको लक्ष्यकर सभी अङ्गोंको दूधसे भी स्नान कराये। तत्पश्चात् श्रद्धालु साधकको भगवान्के सामने तिलमिश्रित दूधसे हवन करना चाहिये।

इस प्रकार एक वर्ष पूराकर ब्राह्मणोंको भोजन कराये और सुवर्णमयी शेषनागकी प्रतिमा बनाकर ब्राह्मणको दान दे। राजन्! जो पुरुष इस प्रकार यह व्रत भक्तिपूर्वक करता है, उसे निश्चय ही शान्ति सुलभ हो जाती है, साथ ही उसे सोसे भी भय नहीं होता।