59-अविनव्रत

अगस्त्यजी कहते हैं-राजन् ! सुनो। अब मैं "विघ्नहर' नामक व्रतको बतलाता हूँ। इसके विधिपूर्वक आचरण करनेसे पुरुष विघ्नोंद्वारा पराभूतबाधित या तिरस्कृत नहीं होता। इसके प्रारम्भिक ग्रहणकी विधि इस प्रकार है। फाल्गुनमासकी चतुर्थीको दिनमें उपवास रहकर चार घड़ी रात बीतनेपर भोजन करे। प्रातःपारणामें तिल लेने चाहिये। उस दिन तिलसे ही हवन करे तथा तिल ही ब्राह्मणको दान भी दे। इसी प्रकार चार मासतक इसका अनुष्ठानकर पाँचवें महीने में (आषाढ़की) चतुर्थीको सुवर्णमयी गणेशकी प्रतिमाकी भलीभाँति पूजाकर खीर एवं तिलसे भरे हुए पाँच पात्रोंके साथ उसे ब्राह्मणको दे देनी चाहिये। इस प्रकार इस व्रतका अनुष्ठानकर मनुष्य सम्पूर्ण विघ्नोंसे छुटकारा पा जाता है। अपने अश्वमेध यज्ञमें विघ्न पड़नेपर राजा सगरने इसी व्रतका अनुष्ठानकर, अश्वको प्राप्तकर यज्ञ सम्पन्न किया था। त्रिपुरासुरसे युद्धके समय भगवान् रुद्रने भी इसी व्रतके प्रभावसे त्रिपुरासुरका वध किया था। मैंने भी समुद्रपानके समय यही व्रत किया था। परंतप! पूर्वसमयमें तप एवं ज्ञानकी इच्छावाले अन्य अनेक राजाओंने विघ्न दूर करनेके लिये इस व्रतका आचरण किया था। इस व्रतके दिन पुण्यात्मा पुरुष विघ्न समाप्त होनेके निमित्त 'ॐ शूराय नमः, ॐ धीराय नमः, ॐ गजाननाय नमः, ॐ लम्बोदराय नमः, ॐ एकदंष्ट्राय नम:'-इन मन्त्रोंका उच्चारण कर गणेशजीकी सम्यक् प्रकारसे पूजा करे और इन्हीं मन्त्रोंद्वारा हवन भी करे। केवल इसी व्रतके करनेसे मानव सभी विघ्नोंसे मुक्त हो जाता है। गणेशजीकी प्रतिमा दान करनेसे तो उसके जीवनकी सारी अभिलाषाएँ ही पूरी हो जाती हैं।