वराह महा पुराण
57-कान्तिव्रत
अगस्त्यजी कहते हैं-राजन्! अब कान्ति नामक व्रतको बताता हूँ। पहले चन्द्रमाने यह व्रत किया था, जिसके फलस्वरूप उन्हें पुनः कान्ति सुलभ हो गयी। प्राचीन कालकी बात है। दक्ष प्रजापतिके शापसे चन्द्रमाको राजयक्ष्मा नामक रोग हो गया। तब उन्होंने यह व्रत किया और वे फिर तत्क्षण कान्तिमान् बन गये। राजेन्द्र ! यह नक्तव्रत है। इसे कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी द्वितीया तिथिके दिन करना चाहिये। इसमें बलराम और श्रीकृष्णकी पूजा होती है। इस तिथिमें ये दोनों देवता दो कलावाले चन्द्रमामें विराजते हैं। अतः चन्द्रमाको विष्णुका उत्तम रूप माना जाता है। बुद्धिमान् पुरुष 'ॐ बलदेवाय नमः' कहकर उनके चरणोंकी तथा 'ॐ केशवाय नमः' से सिरकी अर्चना करे। सुव्रत! फिर आगे कहे जानेवाले मन्त्रको पढ़कर उन्हें अर्घ्य देना चाहिये। भगवन्! आप अमृतस्वरूप हैं, ब्रह्माने आपका सम्मान किया है, यज्ञलोकके आप अध्यक्ष हैं। परमात्मन्! इस समय आप चन्द्रमाके रूपमें पधारे हैं। अतः आपको नमस्कार है।* (* नमोऽस्त्वमृतरूपाय स वै विधिवराय च। यजलोकाधिपतये सोमाय परमात्मने । (५७।६))
व्रती ब्राह्मण रातमें घृतसे युक्त यवान्न भोजन करे। (यह भी चौमासेका व्रत है) फाल्गुनसे लेकर चार महीनेतक इस व्रतको करनेवाला पुरुष पवित्रतापूर्वक रहकर खीर भोजन करे। कार्तिकमासमें यवान्नके आहारपर रहे और अगहनी चावलसे बने हुए हव्यद्वारा हवन करे। आषाढ़ आदि चार महीनोंमें तिलका हवन करना चाहिये। इसी प्रकार तिलका भोजन भी करना चाहिये। फिर वर्ष पूरा हो जानेपर चन्द्रमाकी एक सोनेकी प्रतिमा बनवाकर उसे दो सफेद वस्त्रोंसे आच्छादित करे। उसपर उजले फूल चढ़ाकर श्वेत चन्दनसे अनुलेपनकर तथा भलीभाँतिसे पूजा करके ब्राह्मणको दे दे, अथवा वर्षभर व्रतकर चन्द्रमाकी चाँदीकी ही मूर्ति बनवाये और दो श्वेत वस्त्रोंसे आच्छादितकर उसकी श्वेत पुष्पों एवं श्वेत चन्दनसे पूजा करे। ऐसे ही ब्राह्मणकी भी पूजाकर उसे वह प्रतिमा दान कर दे। ब्राह्मणको प्रतिमा अर्पण करते समय व्रती मनही-मन मन्त्र पढ़े-'नारायण! आप चन्द्रमाके रूपमें पधारे हैं। आपको मेरा नमस्कार । भगवन् ! आपकी कृपासे मैं भी इस लोकमें कान्तिमान्, सर्वज्ञ एवं प्रियदर्शन बन जाऊँ।( कान्तिमानपि लोकेऽस्मिन् सर्वज्ञः प्रियदर्शनः । त्वत्प्रसादात्सोमरूपिन्नारायण नमोऽस्तु ते॥ ) राजन्! उक्त प्रतिमाको दानकर मनुष्य तत्क्षण कान्ति प्राप्त कर लेता है। बहुत पहले स्वयं चन्द्रमाने यह व्रत किया था। व्रत पूर्ण हो जानेपर स्वयं भगवान् श्रीहरि उनपर संतुष्ट हो गये और उनका यक्ष्मा रोग दूरकर उन्हें 'अमृता( अमृता मानदा पूषा तुष्टिः पुष्टीरतिधृतिः । शशिनी चन्द्रिका कान्तिोत्स्ना श्रीः प्रीतिरङ्गदा॥
पूर्णा पूर्णामृता कामदायिन्यः शशिनः कलाः ॥ (शारदातिलक २११२-१३) इस तन्त्रवचनानुसार 'अमृता', शुक्लपक्षकी द्वितीयाकी चन्द्रकला है।) नामकी कला प्रदान की। महाभाग चन्द्रमाने उस कलाको द्वितीयाके बाद सदा अपने में स्थान दिया। उन्हें यह कला तपके प्रभावसे ही उपलब्ध हुई है। इतना ही नहीं, वे सोम और द्विजराज भी कहलाने लगे। शुक्लपक्षकी द्वितीया तिथिके दिन सोमरस पीनेवाले दोनों अश्विनीकुमारोंका कीर्तन करना चाहिये। ये दोनों शुक्लपक्षकी द्वितीयाके चन्द्रमामें शेष और विष्णु नामसे विख्यात होकर सुशोभित होते हैं-इसमें कोई संशय नहीं। राजेन्द्र! भगवान् विष्णु परम पुरुष परमात्मा हैं। उनसे रिक्त कोई देवता नहीं है। वे ही अनेक नाम धारणकर सर्वत्र (सभी देवताओंके रूपमें) विराजित हैं।