14-गौरमुखके द्वारा दस अवतारोंका स्तवन तथा उनका ब्रह्ममें लीन होना

पृथ्वीने पूछा-भगवन्! मुनिवर गौरमुखने मार्कण्डेयजीके मुखसे श्राद्धसम्बन्धी ऐसी विधि सुनकर फिर क्या किया?

 भगवान् वराह बोले-वसुंधरे! मार्कण्डेयजीकी बुद्धि अपरिमित थी। उनके द्वारा इस प्रकार पितृकल्प सुनते ही मुनिवरकी कृपासे गौरमुखको सौ जन्मोंकी बातें याद आ गयीं।

पृथ्वीने पूछा-भगवन्! गौरमुख पूर्वजन्ममें कौन थे, उनका क्या नाम था, बातें याद आनेकी शक्ति उनमें कैसे आयी और उन महाभागने उन्हें जानकर फिर क्या किया?

भगवान् वराह कहते हैं-वसुंधरे! ये गौरमुख पूर्वके एक-दूसरे कल्पमें स्वयं भृगु मुनि थे। श्रीब्रह्माजीने अपने पुत्रोंको जो यह शाप दिया था कि पुत्रोंद्वारा ही उपदेश प्राप्त करके तुमलोग सद्गति प्राप्त करोगे। इसीलिये श्रीमार्कण्डेयजीने भी इन्हें ज्ञान प्रदान किया। मुनिवर मार्कण्डेयजी भी उन्हींके वंशमें उत्पन्न हुए थे। श्रेष्ठ अङ्गोंसे  शोभा पानेवाली पृथ्वी! इस प्रकार उपदिष्ट होनेपर उन्हें सम्पूर्ण जन्मोंकी बातें याद हो आयीं। फिर पूर्वजन्मकी बातको स्मरण करके उन्होंने जो कुछ किया है, वह संक्षेपमें कहता हूँ, सुनो। उस समय गौरमुख पूर्व-कथनानुसार पितरोंके लिये बारह वर्षोंतक श्राद्ध करते रहे। तत्पश्चात् श्रीहरिकी आराधनाके लिये वे उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे। तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध जो प्रभासतीर्थ है, वहीं जाकर गौरमुखने दैत्यदलन परमप्रभुकी स्तुति आरम्भ कर दी।

                                                            दशावतारस्तोत्र

गौरमुख बोले-जो शत्रुओंका दर्प दूर करनेवाले, ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, सूर्य, चन्द्रमा, अश्विनीकुमाररूपमें प्रतिष्ठित, युगमें स्थित, परमपुराण, आदिपुरुष, सदा विराजमान तथा देवाधिदेव भगवान् नारायण नामसे विख्यात हैं, उन मङ्गलमय श्रीहरिकी अब मैं स्तुति करता हूँ। प्राचीन समयमें जब वेद नष्ट हो चुके थे, उस अवसरपर इस विशाल वसुंधराका भरणपोषण करनेवाले जिन आदिपुरुषने पर्वतके समान विशाल मत्स्यका शरीर धारण किया था तथा जिनके पुच्छके अग्रभागसे चमचमाती हुई तेज-छटा विकीर्ण हो रही थी, उन शत्रुसूदन भगवान् श्रीहरिकी मैं स्तुति करता हूँ। समुद्र-मन्थनके  आश्रय दिया था, वे दैत्योंके संहार करनेवाले पुराण-पुरुष देवेश्वर भगवान् श्रीहरि मेरी सभी प्रकार रक्षा करें। जिन महापुरुषने महावराहका रूप धारणकर रसातलमें प्रवेश किया और वहाँसे पृथ्वीको ले आये तथा देवताओं एवं सिद्धोंने  जिनकी 'यज्ञपुरुष' संज्ञा दी है,वे असुरसंहर्ता, सनातन श्रीहरि मेरी रक्षा करें। जो प्रत्येक युगमें भयंकर नृसिंहरूपसे विराजते हैं, जिनका मुख अत्यन्त भयावह है, कान्ति सुवर्णके समान है तथा जिनका दैत्योंका दलन करना स्वाभाविक गुण है, वे योगिराज जगत्के परम आश्रय भगवान् श्रीहरि हमारी रक्षा करें। जिनका कोई माप नहीं है, फिर भी बलिका यज्ञ नष्ट करनेके लिये जिन योगात्माने योगके बलसे दण्ड और मृगचर्मसे सुशोभित वामन-रूपसे बढ़ते हुए त्रिलोकीतक नाप ली, वे परम प्रभु हमारी रक्षा करें। जिन्होंने परमपराक्रमी परशुरामजीका रूप धारण करके इक्कीस बार सम्पूर्ण भूमण्डलपर विजय प्राप्त की और उसे कश्यपजीको सौंप दिया तथा जो सज्जनोंके रक्षक एवं असुरोंके संहारक हैं, वे हिरण्यगर्भ भगवान् श्रीहरि हमारी रक्षा करें। हिरण्यगर्भ जिनकी संज्ञा है, सर्वसाधारण जन जिन्हें देख नहीं सकते तथा जो राम आदि रूपोंसे चार प्रकारके शरीर धारण कर चुके हैं एवं अनेक प्रकारके रूपोंसे राक्षसोंका विनाश करते हैं, वे आदिपुरुष भगवान् श्रीहरि हमारी रक्षा करें। चाणूर और कंस नामधारी दानव दर्पसे भर गये थे। उनके भयसे देवताओंके हृदयमें आतङ्क छा गया था। अतः उन्हें निर्भय करनेके लिये जो प्रत्येक युग एवं कल्पमें वसुदेवके पुत्र श्रीकृष्णरूपसे विराजते हैं, वे प्रभु हमारी रक्षा करें। जो सनातन, ब्रह्ममय एवं महान् पुरुष होकर भी वर्णकी व्यवस्था करनेके लिये प्रत्येक युगमें कल्किके नामसे विख्यात हैं, देवता, सिद्ध और दैत्योंकी आँखें जिनके रूपको देख नहीं सकती एवं जो विज्ञानमार्गका त्याग करके यम-नियम आदिके प्रवर्तक बुद्धरूपसे सुपूजित होते हैं और मत्स्य आदि अनेक रूपोंमें विचरते हैं, वे भगवान् श्रीहरि हमारी रक्षा करें। भगवन्! आप पुरुषोत्तम हैं तथा समस्त कारणोंके भी कारण हैं। आपको मेरा अनेकशः प्रणाम है। प्रभो! अब आप मुझे मुक्ति-पद प्रदान करनेकी कृपा कीजिये।*

(स्तोष्ये महेन्द्रं रिपुदर्पहं शिवं नारायणं ब्रह्मविदां वरिष्ठम्। आदित्यचन्द्राश्वियुगस्थमाद्यं पुरातनं दैत्यहरं सदा हरिम् ॥ चकार मात्स्यं वपुरात्मनो यः पुरातनं वेदविनाशकाले। महामहीभृद्वपुरग्रपुच्छच्छटाहवाचिः सुरशत्रुहाद्यः ॥ तथाब्धिमन्थानकृते गिरीन्द्रं दधार यः कौर्मवपुः पुराणम् । हितेच्छयाप्तः पुरुषः पुराणः प्रपातु मां दैत्यहरः सुरेशः ॥ महावराहः सततं पृथिव्यास्तलात्तलं प्राविशद् यो महात्मा। यज्ञाङ्गसंज्ञः सुरसिद्धसङ्घः स पातु मां दैत्यहरः पुराणः ।। नृसिंहरूपी च बभूव योऽसौ युगे युगे योगिवरोऽथ भीमः । करालवक्त्रः कनकानव, वराशयोऽस्मानसुरान्तकोऽव्यात् । बलेर्मखध्वंसकृदप्रमेयो योगात्मको योगवपुःस्वरूपः । स दण्डकाष्ठजिनलक्षणः क्षिति योऽसौ महान् क्रान्तवान् नः पुनातु ।। त्रि:सप्तकृत्वो जगतीं जिगाय कृत्वा ददौ कश्यपाय प्रचण्डः । स जामदग्न्योऽभिजनस्य गोप्ता हिरण्यगर्भोऽसुरहा प्रपातु ।। चतुष्प्रकारं च वपुर्य आद्यं हैरण्यगर्भप्रतिमानलक्ष्यम् । रामादिरूपैर्बहुरूपभेदं चकार सोऽस्मानसुरान्तकोऽव्यात्॥ चाणूरकंसासुरदर्पभीतेर्भीतामराणामभयाय वेदः । युगे युगे वासुदेवो बभूव कल्पे भवत्यद्भुतरूपकारी॥ युगे युगे कल्किनाम्ना महात्मा वर्णस्थितिं कर्तुमनेकरूप: । सनातनो ब्रह्ममयः पुरातनो गूढाशयोऽस्मानसुरान्तकोऽव्यात्।। न यस्य रूपं सुरसिद्धदैत्याः पश्यन्ति विज्ञानगतिं विहाय । अतो यमेनापि समर्चयन्ति मत्स्यादिरूपाणि चराणि सोऽव्यात्॥ नमो नमस्ते पुरुषोत्तमाय पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते । नमो नमः कारणकारणाय नयस्व मां मुक्तिपदं नमस्ते॥)

इस प्रकार महर्षि गौरमुखके द्वारा भक्तिभावसे संस्तुत एवं नमस्कृत होते-होते चक्र एवं गदाधारी श्रीहरि स्वयं उनके सामने प्रत्यक्षरूपसे प्रकट हो गये। उस समय गौरमुखने देखा कि प्रभुके विग्रहसे दिव्य विज्ञान भी प्रकट हो रहा है। उसेपाकर मुनिकी अन्तरात्मा पूर्ण शान्त हो गयी। गौरमुखके शरीरसे विज्ञानात्मा निकली और श्रीहरिको पाकर उनके मुक्तिसंज्ञक सनातन श्रीविग्रहमें सदाके लिये शान्त हो गयी।