31-चतुर्दशी तिथिके माहात्म्यके प्रसङ्गमें रुद्रकी उत्पत्तिका वर्णन

महातपा मुनि कहते हैं-राजन्! इसके अतिरिक्त सृष्टिके आरम्भमें रुद्रके उत्पन्न होनेकी एक कथा और है। अब वह प्रसङ्ग कहता हूँ, यत्नपूर्वक सुनो जब तपोरूप धर्ममय वृक्ष नष्टप्राय हो गया था, उस समय प्रचण्ड तेजस्वी ब्रह्माजी क्षमारूपी अस्त्र धारण किये प्रकट हुए। उन परम प्रतापी प्रभुके आनेका प्रयोजन था परम ज्ञान और तत्त्वको जानकर प्रजाओंकी रक्षा करना। सृष्टि करनेकी इच्छावाले उन महाप्रभुने चाहा–'प्रजाएँ उत्पन्न हों और इच्छानुसार जगत्की वृद्धि हो।' किंतु इसमें प्रतिबन्ध पड़ गया। अतः क्रोधसे उनका मन क्षुब्ध हो उठा। फिर वे समाधिस्थ हो गये। अब उनके सामने एक ऐसा श्रेष्ठ पुरुष प्रकट हुआ, जिसका अन्तःकरण अत्यन्त पवित्र था। उसके रजोगुण और तमोगुण सर्वथा नष्ट हो चुके थे। उसकी कीर्ति अचल थी। उस पुरुषमें वर देनेकी पूर्ण शक्ति थी एवं अपार बल था। उसके शरीरकी कान्ति काले और लाल रंगसे सम्पन्न थी तथा नेत्र पीले रंगके थे। वह उत्पन्न होते ही रोने लगा। तब ब्रह्माजीने कहा-'त्वं मा रुद'-तुम रोओ मत। इस कारण उस पुराणपुरुषका नाम रुद्र हो गया। पुन: ब्रह्माजी बोले-'तुम एक महान् पुरुष हो! तुममें सब कुछ करनेकी शक्ति है। तुम मेरी ऐसी सृष्टिका विस्तार करो, जिसका रूप तुम्हारे ही अनुरूप हो।'

ब्रह्माजीके इतना कहते ही वे तप करनेके विचारसे जलके भीतर चले गये। फिर उन देवेश्वर रुद्रके जलमें चले जानेपर ब्रह्माजीने दक्षप्रजापतिकी सृष्टि की। ब्रह्माजीके अन्य मानस पुत्रोंने भी प्रजाओंका सृजन किया। सृष्टि पर्याप्त रूपसे फैल गयी। फिर देवेश्वरकी अध्यक्षतामें दक्षप्रजापतिका ब्रह्मयज्ञ आरम्भ हो गया।

राजन् ! इतनेमें रुद्रदेव, जो तप करनेके लिये जलके भीतर गये थे, संसार और सुरगणकी सृष्टि करनेके विचारसे जलसे बाहर निकले। उन्होंने सुना-'यज्ञ हो रहा है और उसमें देवता, सिद्ध एवं यक्ष आये हुए हैं।' फिर तो उन्हें क्रोध हो आया। अतः सोचा और कहा-'अरे, तेजस्विनी अपनी कन्या तथा मेरा तिरस्कार करके मूर्खतावश इसने किस प्रकार जगत्की सृष्टि कर ली?

हा, हा-इसे ऐसा नहीं करना चाहिये' यों कहते-कहते रोषसे उनका शरीर चतुर्दिक उद्दीप्त हो उठा। साथ ही उनके मुँहसे ज्वालाएँ निकलने लगीं। वे ही अनेक भूत, पिशाच, वेताल एवं योगियोंके झुंड बनकर विचरने लगीं। जब समस्त आकाश, पृथ्वी, सारी दिशाएँ तथा लोक आदि उन भूतोंसे भर गये तो उन रुद्रने सर्वज्ञताके प्रभावसे चौबीस हाथ लम्बा एक धनुष बनाया। तेहरी बटी रस्सीसे उसकी प्रत्यञ्चा बनायी और क्रोधके कारण दो दिव्य तरकस तथा बाणोंको ले लिया और उससे उन्होंने पूषाके दाँत तोड़ डाले, भग नामक मुनिको आँखें निकाल लीं और क्रतु देवताके अण्डकोष काटकर गिरा दिये। बाणविद्ध होकर क्रतु देवता यज्ञवाट्से (यज्ञशालासे) भाग चले। वायुने उनका मार्ग रोक दिया। यज्ञ नष्ट-भ्रष्ट हो गया। देवता यज्ञके पशु-से बन गये। तब सबने भगवान् रुद्रकी शरण ली। ब्रह्माजीने वहाँ पहुँचकर रुद्रको गलेसे लगाया। वहाँ वे देवता भी उन्हें दिखायी पड़े, जिनका रुद्रने अपकार किया था और जो भक्तिके साथ उनकी शरणमें पहुंचे थे। बातें विदित हो जानेपर देवाधिदेव ब्रह्माजी रुद्रकी ओर देखते हुए बोले-'तात! अब क्रोध करना ठीक नहीं है; क्योंकि क्रतु-यज्ञदेवता तो यहाँसे भाग गये हैं।' ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर रुद्र क्रोधसे भर गये और कहने लगे-'देवेश्वर! आपने सर्वप्रथम मुझे बनाया है; किंतु ये लोग इस यज्ञमें मुझे भाग नहीं दे रहे हैं। इसीलिये मैंने इन्हें विकृत कर दिया तथा इनका ज्ञान हर लिया है।'

ब्रह्माजीने कहा-'देवताओ! तुमलोग तथा समस्त असुर ज्ञान प्राप्त करनेके लिये उच्च स्वरसे स्तोत्रोंको पढ़कर इन महाभाग शम्भुकी ऐसी आराधना करो, जिसके फलस्वरूप भगवान् रुद्र प्रसन्न हो जायें। इनकी प्रसन्नतामात्रसे सर्वज्ञता सुलभ हो जाती है। ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर वे देवता भगवान् रुद्रकी स्तुति करने लगे।

देवगण बोले-महात्मन्! आप देवताओंके अधिष्ठाता, तीन नेत्रवाले, जटा-मुकुटसे सुशोभित तथा महान् सर्पका यज्ञोपवीत पहनते हैं। आपके नेत्रोंका रंग कुछ पीला और लाल है। भूत और वेताल सदा आपकी सेवामें संलग्न रहते हैं। ऐसे आप प्रभुको हमारा नमस्कार है। भगके नेत्रको बींधनेवाले भगवन् ! आपके मुखसे भयंकर अट्टहास होता है। कपर्दी और स्थाणु आपके नाम हैं। पूषाके दाँत तोड़नेवाले भगवन्! आपको हमारा नमस्कार है। महाभूतोंके संरक्षक प्रभो! आपको हम नमस्कार करते हैं। प्रभो! भविष्यमें वृषभ या धर्म आपकी ध्वजाका चिह्न होगा और त्रिपुरका आप विनाश करेंगे। साथ ही आप अन्धकासुरका भी हनन करेंगे। भगवन्! आपका कैलासपर सुन्दर निवास-स्थान है। आप हाथीका चर्म वस्त्ररूपसे धारण करते हैं। आपके सिरका ऊपर उठा हुआ केश सबको भयभीत कर देता है अत: आपका 'भैरव' नाम है। प्रभो! आपको हमारा बारंबार नमस्कार है। देवेश्वर! आपके तीसरे नेत्रसे आगकी भयंकर ज्वाला निकलती रहती है। आपने चन्द्रमाको मुकुट बना रखा है। आगे आप कपाल धारण करनेका नियम पालन करेंगे। ऐसे आप सर्वसमर्थ प्रभुको हमारा नमस्कार है। प्रभो! आपके द्वारा 'दारुवन'का विध्वंस होगा। नीले कण्ठ एवं तीखे त्रिशूलसे शोभा पानेवाले भगवन्! आपने महान् सर्पको कङ्कण बना रखा है, ऐसे तिग्म त्रिशूली (तेज त्रिशूलवाले) आप देवेश्वरको नमस्कार है। यज्ञमूर्ते ! आप हाथमें प्रचण्ड दण्ड धारण करते हैं। आपके मुखमें वडवानलका निवास है। वेदान्तके द्वारा आपका रहस्य जाना जा सकता है। ऐसे आप प्रभुको बारंबार नमस्कार है। शम्भो! आपने दक्षके यज्ञका विध्वंस किया है। शिव! जगत् आपसे भय मानता है। भगवन्! आप विश्वके शासक हैं। विश्वके उत्पादक तथा कपर्दी नामके जटाजूटको धारण करनेवाले महादेव! आपको नमस्कार है।

इस प्रकार देवताओंद्वारा स्तुति किये जानेपर प्रचण्ड धनुषधारी सनातन शम्भु बोले-'सुरगणो! मैं देवताओंका अधिष्ठाता हूँ। मेरे लिये जो भी काम हो, वह बताओ।'

देवताओंने कहा-प्रभो! आप यदि प्रसन्न हैं तो हमें वेदों एवं शास्त्रोंका सम्यक् प्रकारसे ज्ञान यथाशीघ्र प्रदान करनेकी कृपा करें। साथ ही रहस्यसहित यज्ञोंकी विधि भी हमें ज्ञात हो जाय।

महादेवजी बोले-देवताओ! आप सबके-सब एक ही साथ पशुका रूप धारण कर लें और मैं सबका स्वामी बन जाता हूँ, तब आप सभी अज्ञानसे मुक्ति पा जायँगे। फिर देवताओंने भगवान् शम्भुसे कहा-'बहुत ठीक, ऐसा ही होगा। अब आप सर्वथा पशुपति हो गये।' उस समय ब्रह्माजीका अन्त:करण प्रसन्नतासे भर गया। अतः उन्होंने उन पशुपतिसे कहा-'देवेश! आपके लिये चतुर्दशी तिथि निश्चित है-इसमें कोई संशय नहीं। जो द्विज उस चतुर्दशी तिथिके दिन श्रद्धापूर्वक आपकी उपासना करें, गेहूँसे तैयार किये पक्वान्नद्वारा अन्य ब्राह्मणोंको भोजन करायें, उनपर आप परम संतुष्ट हों और उन्हें उत्तम स्थानका अधिकारी बना दें।'

इस प्रकार अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके कहनेपर भगवान् रुद्रने पूषाके दाँत तथा भगके नेत्र पूर्ववत् कर दिये। फिर सभीको यज्ञकी समाप्तिका फल भी प्रदान किया तथा देवताओंके अन्तःकरणमें परम विशुद्ध सम्पूर्ण ज्ञान भर दिया। इस प्रकार परब्रह्म परमात्माने पूर्वकालमें रुद्रको प्रकट किया था। इसी कार्यका सम्पादन करनेसे वे देवताओंके अधिष्ठाता कहलाते हैं।

जो मनुष्य प्रात:काल उठकर प्रतिदिन इस कथाका श्रवण करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर भगवान् रुद्रके लोकको प्राप्त करता है।