वराह महा पुराण
51-अगस्त्य-गीता
नासदीय सूक्त-व्याख्या
भगवान् वराह कहते हैं-वसुंधरे! दुर्वासा मुनिके कहे हुए इस उत्तम धरणीव्रतको सुनकर सत्यतपा उसी क्षण हिमालयके संनिकट एक ऐसे पवित्र स्थानपर चले गये, जहाँ पुष्पभद्रा नामकी नदी, चित्रशिला नामक प्रसिद्ध पहाड़ तथा भद्रवटसंज्ञक वटका वृक्ष था। उन मुनिने वहीं अपना सुन्दर आश्रम बना लिया। भविष्यमें सत्यतपाके द्वारा वहाँ एक बहुत बड़ी विचित्र लीला सम्पन्न होगी।
भगवती पृथ्वीने कहा-प्रभो! आप सनातन पुरुष हैं। तपोमय! इस व्रतको मैंने कई हजार कल्प पहले किया था। मैं तो उसे सर्वथा भूल ही गयी थी। परंतु आज आपकी कृपासे वह पुरानी बात मुझे याद आ गयी। परम प्रभो! जातिस्मरता प्राप्त होने-पूर्वजन्मोंकी बात स्मरण आ जानेके कारण मेरे मनको बड़ी शान्ति मिल रही है। भगवन्! मैं जानना चाहती हूँ कि अगस्त्य मुनि राजा भद्रावके भवनपर पुन: कब आये और उनकी आज्ञासे राजाने फिर क्या किया? वह सब आप मुझे बतानेकी कृपा करें।
भगवान् वराह बोले-राजा भद्राश्व सदा श्वेत अश्व (उजले घोड़े)-पर ही चढ़ते थे। जब अगस्त्य ऋषि दूसरी बार उनके यहाँ आये तो उन्होंने उन्हें उत्तम आसनपर बैठाया और पहलेसे भी बढ़कर उनकी पूजा की और पूछा'भगवन्! वह कौन-सा ऐसा कर्म है, जिसे करनेसे संसारसे मुक्ति मिल सकती है। अथवा देहधारी एवं बिना देहवाले सभी प्राणियोंके लिये कौन-सा कर्म वैध है, जिसका सम्पादन कर लेनेपर उनके सामने शोक नहीं आ सकता।'
अगस्त्यजी कहते हैं-राजन्! सावधानीसे सुनो। यह कथा दृष्ट एवं अदृष्ट-दोनों लोकोंसे सम्बद्ध है। यह बात उस समयकी है, जब कि दिन, रात, नक्षत्र, दिशाएँ, आकाश, देवता एवं सूर्य-इन सबका नितान्त अभाव था। उस क्षण पशुपाल नामक एक पुरुष शासन कर रहे थे। एक समयकी बात है-पशुओंकी रक्षा करते समय उनके मनमें पूर्वी समुद्र देखनेकी उत्कण्ठा जगी और वे तुरंत चल पड़े। उस महासागरके तटपर एक वन था और वहाँ बहुत-से सर्प निवास करते थे। वहाँ आठ वृक्ष थे और एक स्वच्छन्दगामिनी नदी थी। तिरछे एवं ऊपरकी ओर गमन करनेवाले अन्य प्रधान पाँच पुरुष भी थे। एक विशिष्ट पुरुष था, जिसके प्रसादसे तेजके कारण चमकनेवाली एक स्त्री शोभा पा रही थी। उस समय हजार सूर्यो-जैसी आकृतिवाले उस महान् पुरुषको उस स्त्रीने अपने वक्षःस्थलपर स्थान दे रखा था। उस पुरुषके अधरपर तीन रंगवाले तीन विकार विराजमान थे। वही पुरुष उसका संचालक था। उसकी गति कहीं रुकती न थी। उसे देखकर वह स्त्री मौन हो गयी। तब वह प्रबन्धक पुरुष भी उस वनमें चला गया। उसके वनमें प्रविष्ट होते ही क्रूर स्वभाववाले आठ सर्प राजाके पास पहुँचे और उन प्रभुके चारों ओर लिपट गये। सोके आक्रमणसे राजा चिन्तित होकर सोचने लगे कि इनका संहार कैसे हो?
इतनेमें उनके सामने तीन वर्णवाला एक दूसरा पुरुष प्रकट हो गया। उसने श्वेत, रक्त एवं पीत इन तीन रूपोंको धारण कर रखा था। उसने अपना नाम जानना चाहा और कहा-'मेरे लिये दूसरा स्थान चाहिये।' तब प्रधान पुरुषने पूछा'कहाँ जानेका विचार करते हो? साथ ही उस पुरुषका नाम 'महत्' रख दिया। अब उस पुरुषने उन जगन्नियन्ता प्रभुके साथ रहनेकी स्वीकृति भी प्राप्त कर ली। तब राजाने कहा-'तुम्हें जगत्की जानकारी रखना आवश्यक है।' इसपर उस स्त्रीने कहा-'इस जगत्में तो मैं ओतप्रोत हूँ।' तब जो दूसरा पुरुष प्रकट हुआ था, उसने कहा-'तुम डरो मत।' इसके बाद वह वीर पुरुष राजाके पास जाकर स्वयं स्थित हो गया। तदनन्तर दूसरे पाँच पुरुष आये और प्रधान राजाके चारों ओर खड़े हो गये। राजन् ! उन डाकुओंने शस्त्र उठाकर प्रधान राजाको मारनेकी तैयारी कर ली। फिर डर जानेके कारण एक दूसरेमें वे लीन हो गये। उनके लीन होनेपर भी राजाका भवन विशेषरूपसे सुशोभित होने लगा। राजन्! फिर पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश-इन पाँच महाभूतोंने अपना एक समूह बनाया। उस समय वायुका रूप शीतल एवं सुखदायी था। अन्य भी चारों उत्तम गुण एवं प्रकाशसे सम्पन्न थे। ये भी राजभवनमें आये। तब उन प्रधान पुरुष पशुपालके सूक्ष्म रूपको देखकर तीन वर्णवाले पुरुषने उनसे कहा-'महाराज! मेरे कोई पुत्र नहीं है।' उस समय पशुपालने पूछा'बतलाइये आपके लिये मैं क्या करूँ?' फिर तीन वर्णवाले पुरुषने उत्तर दिया-'हमलोग आपको बन्धनमें डालना चाहते थे। यद्यपि हमने प्रयत्न भी किया, किंतु असफल रहे। राजन्! ऐसी स्थितिमें अब हम आपके शरीरमें आश्रय पाना चाहते हैं। मुझपर आपकी पुत्र-भावना होनी चाहिये।'
राजन्! इस प्रकार तीन वर्णवाले पुरुषके कहनेपर राजा पशुपालने उससे फिर कहा-'मैं पुत्र ऐसा चाहता हूँ, जो दूसरोंका भी प्रबन्धक हो।' और उस तीन वर्णवाले पुरुषको अपना पुत्र मान लिया। पर उसमें उनकी आसक्ति न हुई।