वराह महा पुराण
96-त्रिशक्तिमाहात्म्यमें रौद्रीव्रत
भगवान् वराह कहते हैं-वसुंधरे! जो रौद्रीशक्ति मनमें तपस्याका निश्चयकर 'नीलगिरि पर गयी थीं और जिनका प्राकट्य रुद्रकी तमःशक्तिसे हुआ था, अब उनके व्रतकी बात सुनो। अखिल जगतकी रक्षाके निश्चयसे वे दीर्घकालतक तपस्याके साधनमें लगी रहीं और पञ्चाग्नि-सेवनका नियम बना लिया। इस प्रकार उन देवीके तपस्या करते हुए कुछ समय बीत जानेपर 'रुरु' नामक एक असुर उत्पन्न हुआ। जो महान् तेजस्वी था। उसे ब्रह्माजीका वर भी प्राप्त था। समुद्रके मध्यमें वनोंसे घिरी 'रत्नपुरी' उसकी राजधानी थी। सम्पूर्ण देवताओंको आतङ्कितकर वह दानवराज वहीं रहकर राज्य करता था। करोड़ों असुर उसके सहचर थे, जो एक-से-एक बढ़-चढ़कर थे। उस समय ऐश्वर्यसे युक्त वह 'रुरु' ऐसा जान पड़ता था, मानो दूसरा इन्द्र ही हो। बहुत समय व्यतीत हो जानेके पश्चात् उसके मनमें लोकपालोंपर विजय प्राप्त करनेकी इच्छा उत्पन्न हुई। देवताओंके साथ युद्ध करनेमें उसकी स्वाभाविक रुचि थी, अतः एक विशाल सेनाका संग्रहकर जब वह महान् असुर रुरु युद्ध करनेके विचारसे समुद्रसे बाहर निकला, तब उसका जल बहुत जोरोंसे ऊपर उछलने लगा और उसमें रहनेवाले नक्र, घड़ियाल तथा मत्स्य घबड़ा गये। वेलाचलके पार्श्ववर्ती सभी देश उस जलसे आप्लावित हो उठे। समुद्रका अगाध जल चारों ओर फैल गया और सहसा उसके भीतरसे अनेक असुर विचित्र कवच तथा आयुधसे सुसज्जित होकर बाहर निकल पड़े एवं युद्धके लिये आगे बढे। ऊँचे हाथियों तथा अश्व-रथ आदिपर सवार होकर वे असुर-सैनिक युद्धके लिये आगे बढ़े। उनके लाखों एवं करोड़ोंकी संख्या पदाति सैनिक भी युद्धके लिये निकल पड़े।
शोभने! रुरुकी सेनाके रथ सूर्यके रथके समान थे और उनपर यन्त्रयुक्त शस्त्र सुसज्ज थे। ऐसे असंख्य रथोंपर उसके अनुगामी दैत्य हस्तत्राणसे सुरक्षित होकर चल पड़े। इन असुर-सैनिकोंने देवताओंके सैनिकोंकी शक्ति कुण्ठित कर दी और वह अपनी चतुरङ्गिणी सेना लेकर इन्द्रकी नगरी अमरावतीपुरीके लिये चल पड़ा। वहाँ पहुँचकर दानवराजने देवताओंके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया और वह उनपर मुद्गरों, मुसलों, भयंकर वाणों और दण्ड आदि आयुधोंसे प्रहार करने लगा। इस युद्धमें इन्द्रसहित सभी देवता उस समय अधिक देरतक टिक न सके और वे -आहत हो मुँह पीछेकर भाग चले। उनका सारा उत्साह समाप्त हो गया तथा हृदय आतङ्कसे भर गया। अब वे भागते हुए उसी नीलगिरि पर्वतपर पहुँचे, जहाँ भगवती रौद्री तपस्यामें संलग्न होकर स्थित थीं। देवीने देवताओंको देखकर उच्च स्वरसे कहा-'भय मत करो।'
देवी बोलीं-देवतागण! आपलोग इस प्रकार भीत एवं व्याकुल क्यों हैं? यह मुझे तुरंत बतलाएँ।
देवताओंने कहा-'परमेश्वरि ! इधर देखिये ! यह 'रुरु' नामक महान् पराक्रमी दैत्यराज चला आ रहा है। इससे हम सभी देवता त्रस्त हो गये हैं, आप हमारी रक्षा कीजिये।' यह देखकर देवी अट्टहासके साथ हँस पड़ीं। देवीके हँसते ही उनके मुखसे बहुत-सी अन्य देवियाँ प्रकट हो गयीं, जिनसे मानो सारा विश्व भर गया। वे विकृत रूप एवं अस्त्र-शस्त्रसे सुसज्जित थीं और अपने हाथोंमें पाश, अङ्कश, त्रिशूल तथा धनुष धारण किये हुए थीं। वे सभी देवियाँ करोड़ोंकी संख्यामें थी तथा भगवती तामसीको चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयीं। वे सब दानवोंके साथ युद्ध करने लगी और तत्काल असुरोंके सभी सैनिकोंका क्षणभरमें सफाया कर दिया। देवता अब पुनः लड़ने लग गये थे। कालरात्रिकी सेना तथा देवताओंकी सेना अब नयी शक्तिसे सम्पन्न होकर दैत्योंसे लड़ने लगी और उन सभीने समस्त दानवोंके सैनिकोंको यमलोक भेज दिया। बस, अब उस महान् युद्धभूमिमें केवल महादैत्य 'रुरु' ही बच रहा था। वह बड़ा मायावी था। अब उसने 'रौरवी' नामक भयंकर मायाकी रचना की, जिससे सम्पूर्ण देवता मोहित होकर नींदमें सो गये। अन्तमें देवीने उस युद्ध-स्थलपर त्रिशूलसे दानवको मार डाला। शुभलोचने! देवीके द्वारा आहत हो जानेपर 'रुरु'-दैत्यके चर्म (धड़) और मुण्डअलग-अलग हो गये। दानवराज 'रुरु'के चर्म और मुण्ड जिस समय पृथक हुए. उसी क्षण देवीने उन्हें उठा लिया, अतः वे 'चामुण्डा' कहलाने लगीं। वे ही भगवती महारौद्री. परमेश्वरी. संहारिणी और 'कालरात्रि' कही जाती हैं। उनकी अनुचरी देवियाँ करोड़ोंकी संख्यामें बहुतसी हैं। युद्धके अन्तमें उन अनुगामिनी देवियोंने इन महान् ऐश्वर्यशालिनी देवीको सब ओरसे घेर लिया और वे भगवती रौद्रीसे कहने लगीं"हम भूखसे घबड़ा गयी हैं। कल्याणस्वरूपिणि देवि! आप हमें भोजन देनेकी कृपा कीजिये।'
इस प्रकार उन देवियोंके प्रार्थना करनेपर जब रौद्री देवीके ध्यानमें कोई बात न आयी, तब उन्होंने देवाधिदेव पशुपति भगवान् रुद्रका स्मरण किया। उनके ध्यान करते ही पिनाकपाणि परमात्मा रुद्र वहाँ प्रकट हो गये। वे बोले'देवि! कहो! तुम्हारा क्या कार्य है?'
देवीने कहा-देवेश! आप इन उपस्थित देवियोंके लिये भोजनकी कुछ सामग्री देनेकी कृपा करें; अन्यथा ये बलपूर्वक मुझे ही खा जायँगी।
रुद्रने कहा-देवेश्वरि! महाप्रभे! इनके खानेयोग्य वस्तु वह है-जो गर्भवती स्त्री दूसरी स्त्रीके पहने हुए वस्त्रको पहनकर अथवा विशेष करके दूसरे पुरुषका स्पर्शकर पाकका निर्माण करती है, वह इन देवियोंके लिये भोजनकी सामग्री है। अज्ञानी व्यक्तियोंद्वारा दिया हुआ बलिभाग भी ये देवियाँ ग्रहण करें और उसे पाकर सौ वर्षोंके लिये सर्वथा तृप्त हो जायें। अन्य कुछ देवियाँ प्रसव-गृहमें छिद्रका अन्वेषण करें। वहाँ लोग उनकी पूजा करेंगे। देवेशि ! उस स्थानपर उनका निवास होगा। गृह, क्षेत्र, तडागों, वापियों और उद्यानोंमें जाकर निरन्तर रोती हुई जो स्त्रियाँ मनमारे बैठी रहेंगी, उनके शरीरमें प्रवेशकर कुछ देवियाँ तृप्ति लाभ कर सकेंगी। फिर भगवान् शंकरने इधर जब रुरुको मरा हुआ देखा, तब वे देवीकी इस प्रकार स्तुति करने लगे।
भगवान् रुद्र बोले-देवि! आपकी जय हो। चामुण्डे ! भगवती भूतापहारिणि एवं सर्वगते परमेश्वरि! आपकी जय हो। देवि! आप त्रिलोचना, भीमरूपा, वेद्या, महामाया, महोदया, मनोजवा, जया, जृम्भा, भीमाक्षी, क्षुभिताशया, महामारी, विचित्राङ्गा, नृत्यप्रिया, विकराला, महाकाली, कालिका, पापहारिणी, पाशहस्ता, दण्डहस्ता, भयानका, चामुण्डा, ज्वलमानास्या, तीक्ष्णदंष्ट्रा, महाबला, शतयानस्थिता, प्रेतासनगता, भीषणा, सर्वभूतभयंकरी, कराला, विकराला, महाकाला, करालिनी, काली, कराली, विक्रान्ता और कालरात्रि-इन नामोंसे प्रसिद्ध हैं; आपके लिये मेरा बारंबार नमस्कार है। परमेष्ठी रुद्रने जब इस प्रकार देवीकी स्तुति की तब वे भगवती परम संतुष्ट हो गयीं। साथ ही उन्होंने कहा-'देवेश! जो आपके मनमें हो, वह वर माँग लें।'
रुद्र बोले-“वरानने! यदि आप प्रसन्न हैं तो इस स्तुतिके द्वारा जो व्यक्ति आपका स्तवन करें, देवि! आप उन्हें वर देनेकी कृपा करें। इस स्तुतिका नाम' 'त्रिप्रकार' होगा। जो भक्तिके साथ इसका पाठ करेगा, वह पत्र, पौत्र, पशु और समृद्धसे सम्पन्न हो जायगा। तीन शक्तियोंसे सम्बद्ध इस स्तुतिको जो श्रद्धा भक्तिके साथ सुने, उसके सम्पूर्ण पाप विलीन हो जायँ और वह व्यक्ति अविनाशी पदका अधिकारी हो जाय।"
ऐसा कहकर भगवान् रुद्र अन्तर्धान हो गये। देवता भी स्वर्गको पधारे। वसुंधरे! देवीकी तीन प्रकारकी उत्पत्ति युक्त 'त्रिशक्ति-माहात्म्य'का यह प्रसङ्ग बहुत श्रेष्ठ है। अपने राज्यसे च्युत राजा यदि पवित्रतापूर्वक इन्द्रियोंको वशमें करके अष्टमी, नवमी और चतुर्दशीके दिन उपवासकर इसका श्रवण करेगा तो उसे एक वर्षमें अपना निष्कण्टक राज्य पुनः प्राप्त हो जायगा। न्यायसिद्धान्तके द्वारा ज्ञात होनेवाली पृथ्वी देवि! यह मैंने तुमसे 'त्रिशक्ति-सिद्धान्त 'की बात बतलायी। इनमें सात्त्विकी एवं श्वेत वर्णवाली 'सृष्टि' देवीका सम्बन्ध ब्रह्मासे है। ऐसे ही वैष्णवी शक्तिका सम्बन्ध भगवान् विष्णुसे है। रौद्रीदेवी कृष्ण-वर्णसे युक्त एवं तम:सम्पन्न शिवकी शक्ति हैं। जो पुरुष स्वस्थचित्त होकर नवमी तिथिके दिन इसका श्रवण करेगा, उसे अतुल राज्यकी प्राप्ति होगी तथा वह सभी भयोंसे छूट जायगा। जिसके घरपर लिखा हुआ यह प्रसङ्ग रहता है, उसके घरमें भयंकर अग्निभय, सर्पभय, चोरभय और राज्य आदिसे उत्पन्न भय नहीं होते। जो विद्वान् पुरुष पुस्तकरूपमें इस प्रसङ्गको लिखकर भक्तिके साथ इसकी पूजा करेगा, उसके द्वारा चर और अचर तीनों लोक सुपूजित हो जायेंगे। उसके यहाँ बहुत-से पशु पुत्र, धन-धान्य एवं उत्तम स्त्रियाँ प्राप्त हो जायेंगी। यह स्तुति जिसके घरपर रहती है, उसके यहाँ प्रचुर रत्न, घोड़े, गौएँ, दास और दासियाँआदि सम्पत्तियाँ अवश्य प्राप्त हो जाती हैं।
भगवान् वराह कहते हैं- भूतधारिणि! यह रुद्रका माहात्म्य कहा गया है। मैंने पूर्णरूपसे तुम्हारे सामने इसका वर्णन कर दिया। चामुण्डाकी समग्र शक्तियोंकी संख्या नौ करोड़ है। वे पृथक्-पृथक् रूपसे स्थित हैं। इस प्रकार जो रुद्रसे सम्बन्ध रखनेवाली यह 'तामसी शक्ति चामुण्डा' कही गयी उसका तथा वैष्णवी शक्तिके सम्मिलित भेद अठारह करोड़ है। इन सभी शक्तियोंके अध्यक्ष सर्वत्र विचरण करनेवाले भगवान् परमात्मा रुद्र ही हैं। जितनी ये शक्तियाँ हैं, रुद्र भी उतने ही हैं। महाभाग! जो इन शक्तियोंकी आराधना करता है, उसपर भगवान् रुद्र संतुष्ट होते हैं और वे साधककी मन:कल्पित सारी कामनाएँ सिद्ध कर देते हैं।