58-सौभाग्य-व्रत

अगस्त्यजी कहते हैं-राजन्! अब उस सौभाग्य-व्रतको सुनो, जिसके आचरणसे स्त्री एवं पुरुषोंको शीघ्र सौभाग्यकी प्राप्ति होती हैभाग्यका उदय हो जाता है। फाल्गुनमासके शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको नक्तव्रतके रूपमें कर्ताको पवित्र एवं सत्यवादी होकर उपवास करना चाहिये। इस व्रतमें लक्ष्मीसहित भगवान् श्रीहरिकी अथवा उमासहित महाभाग शंकरकी पूजाका विधान है। जो लक्ष्मी हैं, वही गिरिजा हैं और जो श्रीहरि हैं, वे ही तीन नेत्रवाले हर भी हैं-सम्पूर्ण वेदशास्त्रों एवं पुराणोंमें यही बात सुस्पष्ट निर्दिष्ट है। किंतु जो ग्रन्थ इसके विपरीत यह कहता है कि 'विष्णुसे रुद्र भिन्न हैं, वह किसी अच्छे कविका प्रबन्ध हो सकता है, पर उसे 'शास्त्र' कदापि नहीं कहा जा सकता। अतः विष्णु रुद्रके ही स्वरूप हैं और लक्ष्मी गौरीकी ही अन्यतम प्रतिकृति हैं-यही कहना समुचित है। जो इन दोनोंमें भेद बतलाता है, वह निकृष्ट है।'

राजेन्द्र! फिर व्रती पुरुष यत्नपूर्वक लक्ष्मीसहित श्रीहरिकी भलीभाँति पूजा करे। उन परम प्रभुके पूजनके मन्त्र यों हैं-'ॐ गम्भीराय नमः, ॐ सुभगाय नमः, ॐ देवदेवाय नमः, ॐ त्रिनेत्राय नमः, ॐ वाचस्पतये नमः, ॐ रुद्राय नम:'-इन मन्त्रों के द्वारा क्रमशः उनके दोनों चरण, कटिभाग, उदर, मुख, सिर एवं सभी अङ्गोंकी पूजा करनी चाहिये। इस विधिके अनुसार पूजाकर मेधावी मनुष्य लक्ष्मीसहित विष्णुकी और गौरीसहित शंकरकी पुष्प-चन्दन आदि उपचारोंद्वारा पूजा करे। तदनन्तर मूर्तिके सामने मधु एवं घृतसे हवन करना चाहिये। महाराज! यदि सर्वोत्तम सौभाग्य पानेकी कामना हो तो तिल और घृतसे हवन कराये। इस दिन बिना नमक तथा घृतके शुद्ध गेहूँसे तैयार किया हुआ भोजन पृथ्वीपर ही बैठकर करना चाहिये। कष्णपक्षके लिये भी यही विधि बतायी जाती है। आषाढ़से लेकर आश्विनतकके चार महीनोंमें यह व्रत प्रतिपदा तिथिके दिन होता है और द्वितीयाको पारण करनेकी विधि है। इन महीनोंमें यह व्रत यावान्नसे करना चाहिये। राजन् ! इसके पश्चात् कार्तिकसे पूसतकतीन मासोंमें व्रती पुरुष पवित्रतापूर्वक संयमसे रहकर श्यामाक (साँवा)-का भोजनमें उपयोग करे। नरेश! फिर माघमासके शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिके दिन बुद्धिमान् पुरुष अपनी शक्तिके अनुसार पार्वती-शंकर तथा लक्ष्मी-नारायणकी सुवर्णमयी प्रतिमा बनवाकर किसी सत्पात्र एवं विद्वान् ब्राह्मणको अर्पण कर दे। जिसके पास अन्नका अभाव हो, वेदका जो पारगामी विद्वान् हो, जो सदा दूसरोंका उपकार करता हो, जिसके आचरण पवित्र हों तथा विशेष रूपसे विष्णुमें भक्ति रखता हो, ऐसे ब्राह्मणको वह प्रतिमा देनी चाहिये। साथ ही दानमें छः पात्र भी देनेकी विधि है। एकसे लेकर छः तक वे पात्र क्रमशः मधु, घृत, तिलका तैल, गुड़, लवण एवं गायके दूधसे पूर्ण हों। इन पात्रोंके दान करनेके प्रभावसे व्रत करनेवाला व्यक्ति स्त्री अथवा पुरुष-कोई भी हो, वह अन्य सात जन्मोंमें सुन्दर सद्भाग्यशाली और परम दर्शनीय हो जाता है।