वराह महा पुराण
33-पूर्णिमा तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें उसके स्वामी चन्द्रमाकी उत्पत्तिका वर्णन
महातपाजी कहते हैं-राजन्! यशस्वी अत्रि मुनि ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं। उन्हींके यहाँ पुत्ररूपसे चन्द्रमाका प्राकट्य हुआ था। दक्षप्रजापतिने उन्हें अपना जामाता बना लिया। दक्षकी जो सत्ताईस दाक्षायणी कन्याएँ कही गयी हैं, वे सभी परम माननीया कन्याएँ चन्द्रमाकी पत्नी हुई। उन कन्याओंमें रोहिणी सबसे श्रेष्ठ थीं। सुनते हैं, चन्द्रमा अकेली उस रोहिणीसे ही अधिक प्रेम करते थे, दूसरी अन्य कन्याओंसे नहीं। तब अन्य सभी कन्याएँ पिता दक्षके पास आयीं और उन्होंने चन्द्रमाके विषम व्यवहारका वृत्तान्त सुनाया। दक्ष भी चन्द्रमाके समीप आये और ऐसा न करनेके लिये बार-बार समझाया; किंतु चन्द्रमाने उनकी समतावाली बातपर विशेष ध्यान नहीं दिया। तब दक्षने चन्द्रमाको शाप दे दिया-'तुम (धीरे-धीरे क्षीण होकर) अस्त हो जाओ।'
इस प्रकार दक्षके कहनेपर उनके शापसे चन्द्रमाको क्षय (रोग) हो गया और अन्तमें वे अमावास्याको सर्वथा अस्त हो गये। उनके अभावमें देवता, मनुष्य, पशु वृक्ष और विशेषतः ओषधियाँ-प्रायः सब-के-सब नष्ट-से हो गये। जब ओषधियोंका अत्यन्त अभाव हो गया, तो मुख्य देवताओंकी आतुरता बढ़ गयी। वे कहने लगे-'चन्द्रमा वृक्षोंकी जड़में स्थित हो गया।"*(* यह वैदिक मान्यता है, चन्द्रमा अमावास्याको ओषधि, तृण एवं वीरुधोंमें वास करता है।) अब वे चिन्तातुर देवता भगवान् विष्णुकी शरण गये। श्रीहरिने उनसे पूछा-'आप बतलायें, एतदर्थ मैं क्या करूँ?' तब देवताओंने उनसे कहा 'भगवन्! दक्षने चन्द्रमाको शाप दे दिया है, जिससे वे तिरोहित हो गये हैं।'
उस समय उन प्रभुने देवताओंसे कहा'सुरगणो! तुमलोग गर्जनेवाले समुद्रमें चारों ओर ओषधियाँ डाल दो और बड़ी सावधानीसे उसका मन्थन आरम्भ कर दो।' देवताओंसे ऐसा कहकर स्वयं भगवान् श्रीहरिने फिर महाभाग शंकर एवं ब्रह्माजीको स्मरण किया, साथ ही रस्सीकी जगह प्रयुक्त होनेके लिये वासुकिनागको आज्ञा दी। फिर तो वे सभी एकत्र होकर समुद्रका मन्थन करने लगे। राजन्! जब समुद्र भलीभाँति मथा गया तो चन्द्रमा पुनः प्रकट हो गये। जिन परम पुरुष परमात्माका क्षेत्रज्ञ नाम है, उन्हें ही प्राणियोंका जीवात्मा चन्द्रमा समझना चाहिये। अब परोक्ष मूर्तिके अतिरिक्त वे सुन्दर सोमका स्वरूप धारण करके पृथक् रूपसे भी प्रकाशित होने लगे। सभी देवता, मानव, वृक्ष और ओषधियाँ इन्हीं सोलह कलावाले परम प्रभुका आश्रय पाकर जीवन धारण करने में समर्थ हैं। उस समय सोमको उन्हीं प्रभुका स्वरूप समझकर रुद्रने उनकी द्वितीया तिथिकी (अमृता) कलाको अपने मस्तकपर धारण कर लिया। जल उन्हीं (शिव-परमात्मा)-का स्वरूप है। इसीसे उन्हें विश्वमूर्ति कहा गया है। चन्द्रमापर प्रसन्न होकर ब्रह्माजीने इन्हें पूर्णमासी तिथि प्रदान की। राजन्! इस तिथिमें उपवास रहकर चन्द्रमाकी उपासना एवं ध्यान करना चाहिये। व्रतीको अन्नका आहार करना चाहिये। इस व्रतके फलस्वरूप चन्द्रमा उसे ज्ञान, कान्ति, पुष्टि, धन, धान्य और मोक्ष सुलभ कर देते हैं। [विशेष द्रष्टव्यअग्नि-नारदादि पुराणों, 'नारदसंहिता', 'रत्नमाला' एवं मुहूर्तचिन्ता-मणि आदि ज्योतिषग्रन्थोंमें
तिथीशा वह्निको गौरी गणेशोऽहिणुहो रविः। शिवो दुर्गान्तको विश्वे हरिः कामः शिवः शशी॥
आदिसे क्रमश: कहीं अग्नि, ब्रह्मा, पार्वती, गणेश, नाग, गुह, सूर्य, शिव, दुर्गा, यम, विश्वदेवता, विष्णु, काम, शिव और चन्द्रमाको प्रतिपदादि तिथियोंका स्वामी बतलाया गया है और कहीं ठीक यह वराहपुराणवाला ही क्रम है। पर इसमें सुन्दर कथाओंद्वारा ज्योतिषके रहस्यको स्पष्टकर विशेष सिद्धि-प्राप्तिके सरल साधन निर्दिष्ट हुए हैं। इससे पाठक-पाठिकाओंको अवश्य लाभ उठाना चाहिये।