वराह महा पुराण
9-राजा दुर्जयके चरित्र-वर्णनके प्रसङ्गमें मुनिवर गौरमुखके आश्रमकी शोभाका वर्णन
सत्ययुगकी बात है। सुप्रतीक नामसे प्रसिद्ध एक महान् पराक्रमी राजा थे। उनकी दो रानियाँ थीं। वे दोनों परम मनोरम रानियाँ किसी बातमें एक-दूसरीसे कम न थीं। उनमें एकका नाम विद्युत्प्रभा और दूसरीका कान्तिमती था। दो रानियोंके होते हुए भी उन शक्तिशाली नरेशको किसी संतानकी प्राप्ति न हुई। तब राजा सुप्रतीक पर्वतोंमें श्रेष्ठ चित्रकूट पर्वतपर गये। वहाँ जाकर उन्होंने सर्वथा निष्पाप अत्रिनन्दन दुर्वासाकी विधिपूर्वक आराधना की। वरप्राप्तिकी इच्छा रखनेवाले राजा सुप्रतीकके बहुत समयतक यत्नपूर्वक सेवा करनेपर वे ऋषि प्रसन्न हो गये। राजाको वर देनेके लिये उद्यत होकर वे मुनिवर कुछ कह ही रहे थे, तबतक ऐरावत हाथीपर चढ़े हुए देवराज इन्द्र वहाँ पहुँच गये। वे चारों ओर देवसेनासे घिरे हुए थे। वे वहाँ आकर चुपचाप खड़े हो गये। महर्षि दुर्वासा देवराज इन्द्रके प्रति स्नेह रखते थे; किंतु इन्द्रको अपने प्रति प्रीतिका प्रदर्शन न करते देखकर वे क्रुद्ध हो उठे और उन अत्रिनन्दनने देवराज इन्द्रको अत्यन्त कठोर शाप दे दिया-'अरे मूर्ख देवराज! तुमने मेरा जो अपमान किया है, इसके फलस्वरूप तुम्हें अपने राज्यसे च्युत हो दूसरे लोकमें जाकर निवास करना होगा।' देवेन्द्रसे इस प्रकार कहकर उन क्रुद्ध मुनिने राजा सुप्रतीकसे कहा-'राजन्! तुम्हें एक अत्यन्त बलवान् पुत्र प्राप्त होगा। वह इन्द्रके समान रूपवान्, श्रीसम्पन्न, महाप्रतापी, विद्याके प्रभाव और तत्त्वको भलीभाँति जाननेवाला होगा। उसके कर्म क्रूर होंगे। वह सदैव शस्त्रोंसे सन्नद्ध रहेगा और वह परम शक्तिशाली बालक राजा दुर्जयके नामसे प्रसिद्ध होगा।'
इस प्रकार वर देकर मुनिवर दुर्वासा अन्यत्र चले गये। राजा सुप्रतीक भी अपने राज्यको वापस लौट आये। धर्मज्ञ राजाने अपनी रानी विद्युत्प्रभाके उदरमें गर्भाधान किया। रानीके समय आनेपर प्रसव हुआ। उस महाबली पुत्रकी दुर्जय नामसे प्रसिद्धि हुई। उसके जन्मके अवसरपर दुर्वासा मुनि पधारे और उन्होंने स्वयं उस बालकके जातकर्म आदि संस्कार किये। साथ ही उन महर्षिने अपने तपोबलसे उस बालकके स्वभावको भी सौम्य बना दिया तथा उसको वेदशास्त्रोंका पारगामी विद्वान्, धर्मात्मा एवं परमपवित्र बना दिया।
राजा सुप्रतीककी जो दूसरी सौभाग्यवती पत्नी थी, जिसका नाम कान्तिमती था, उसके भी सुद्युम्न नामक एक पुत्र हुआ। वह भी वेद और वेदाङ्गका पूर्ण विद्वान् हुआ। भामिनि! महाराज सुप्रतीककी राजधानी वाराणसीमें थी। एक बार उनका पुत्र दुर्जय पासमें बैठा हुआ था। उस समय उसे परम योग्य देखकर तथा अपनी वृद्धावस्थापर दृष्टिपात करके राजा उसे ही राज्य सौंप देनेका विचार करने लगे। फिर भलीभाँति विचार
करके उन धर्मात्मा नरेशने अपना राज्य राजकुमार दुर्जयको सौंप दिया और वे स्वयं चित्रकूट नामक पर्वतपर चले गये।
भगवान विष्णु
भगवान वराहद्धार पृथ्वीका उद्धार
भगवान मत्सय
कूमांवतार
नृसिंहावतार
रुद्रावतार भगवान् शिव
महिषासुरमर्दिनी
युगलछवि
इधर राजा दुर्जय भी राज्यके प्रबन्धमें लग गया। यद्यपि उसका राज्य विशाल था; फिर भी वह हाथी, घोड़े एवं रथ आदिसे युक्त चतुरङ्गिणी सेना सजाकर राज्य बढ़ानेकी चिन्तामें पड़ गया। राजा दुर्जय परम मेधावी था। उसने सम्यक् प्रकारसे विचार करके हाथी, घोड़े एवं रथपर बैठकर युद्ध करनेवाले वीरों तथा पैदल सैनिकोंसे अपनी सेना तैयार की और सिद्ध पुरुषों एवं महात्माजनोंद्वारा सेवित उत्तर दिशाके लिये प्रस्थान कर दिया। राजा दुर्जयने क्रमशः इसी प्रकार सम्पूर्ण भारतपर विजय प्राप्त करके किम्पुरुष नामक वर्षको भी जीत लिया। तदनन्तर उसने परवर्ती हरिवर्षमें भी अपनी विजय-पताका फहरा दी। फिर रम्यक, रोमावृत, कुरु, भद्राश्व और इलावृत नामसे प्रसिद्ध वर्षोंपर भी उसका शासन स्थापित हो गया। यह सारा स्थान सुमेरुपर्वतका मध्यवर्ती भाग है।
इस प्रकार जब राजा दुर्जयने सम्पूर्ण जम्बूद्वीपपर अपना अधिकार जमा लिया, तब वह देवताओंके सहित इन्द्रको भी जीतनेके लिये आगे बढ़ा। सुमेरुपर्वतपर जाकर उसने वहाँ अनेक देवता, गन्धर्व, दानव, गुह्यक, किंनर और दैत्योंको भी परास्त किया। तबतक ब्रह्मापुत्र नारदजीने दुर्जयकी विजयके विषयमें देवराज इन्द्रको सूचना दे दी। देवराज उसी क्षण लोकपालोंको साथ लेकर उसका वध करनेके लिये चल पड़े। किंतु जल्दी ही राजा दुर्जयके शस्त्रोंके सामने उन्होंने घुटने टेक दिये। तदनन्तर देवराज इन्द्र सुमेरुपर्वतको छोड़कर मर्त्यलोकमें आ बसे और पूर्वदिशामें वे लोकपालोंके साथ रहने लगे। राजा दुर्जयके चरित्रका विस्तारपूर्वक वर्णन आगे किया जायगा। जब देवताओंने अपनी हार मान ली तो राजा
दुर्जय वापस लौटा और लौटते समय गन्धमादनपर्वतकी तलहटीमें उसने अपनी सेनाओंकी छावनी डाली। जब उसने छावनीकी सारी व्यवस्था कर ली, तब उसके पास दो तपस्वी आ पहुँचे। आते ही उन तपस्वियोंने दुर्जयसे कहा-'राजन्! तुमने सम्पूर्ण लोकपालोंका अधिकार छीन लिया है। अब उनके बिना लोकयात्रा चलनी सम्भव नहीं दीखती है, अतएव तुम ऐसी व्यवस्था करो, जिससे इस संसारको उत्तम सुखकी प्राप्ति हो।'
इस प्रकार तपस्वियोंके कहनेपर धर्मज्ञ राजा दुर्जयने उनसे कहा-'आप दोनों कौन हैं ?' उन शत्रुदमन तपस्वियोंने कहा-'हम दोनों असुर हैं। हमारे नाम विद्युत और सुविधुत हैं। महाराज दुर्जय! हम चाहते हैं कि अब तुम्हारे द्वारा सत्पुरुषोंके समाजमें सुसंस्कृत धर्म बना रहे; अतएव तुम हम दोनोंको लोकपालोंके स्थानपर नियुक्त कर दो। हम उनके सभी कार्य सम्पादन कर सकते हैं।' उनके ऐसा कहनेपर राजा दुर्जयने स्वर्गमें लोकपालोंके स्थानपर विद्युत और सुविद्युतकी तुरंत नियुक्ति कर दी। वे दोनों तपस्वी वहाँसे तत्काल अन्तर्धान हो गये।
एक बार राजा दुर्जय मन्दराचलपर्वतपर गया। वहाँ उसने कुबेरके अत्यन्त मनोरम वनको देखा। वह वन इतना सुन्दर था, मानो दूसरा नन्दनवन ही हो। राजा दुर्जय प्रसन्नतापूर्वक उस रमणीय विपिनमें घूमने लगा। इतनेमें एक चम्पकवृक्षके नीचे उसे दो सुन्दरी कन्याएँ दीख पड़ीं। देखनेमें उनका रूप अत्यन्त सुन्दर एवं अद्भुत था। उन कन्याओंको देखकर राजा दुर्जयका मन बड़े आश्चर्यमें पड़ गया। वह सोचने लगा"ये सुन्दर नेत्रोंवाली कन्याएँ कौन हैं?' यों विचार करते हुए राजा दुर्जयको एक क्षण भी नहीं बीता होगा कि उसने देखा कि उस वन में दो तपस्वी भी विराजमान हैं। उन्हें देखकर दुर्जयके मनमें अपार हर्ष उमड़ आया। उसने तुरंत हाथीसे उतरकर उन तपस्वियोंको प्रणाम किया। तपस्वियोंने राजा दुर्जयको बैठनेके लिये कुशाओंद्वारा निर्मित एक सुन्दर आसन दिया। राजा दुर्जय उसपर बैठ गया। उसके बैठ जानेपर तपस्वियोंने उससे पूछा-'तुम कौन हो, तुम्हारा कहाँसे आगमन हुआ है, किसके पुत्र हो और यहाँ किस लिये आये हो?' इसपर राजा दुर्जयने हँसकर उन तपस्वियोंको अपना परिचय देते हुए कहा-'महानुभावो! सुप्रतीक नामसे प्रसिद्ध एक राजा हैं। मैं उनका पुत्र दुर्जय हूँ और भूमण्डलके सभी राजाओंको जीतनेकी इच्छासे यहाँ आया हुआ हूँ। कभी-कभी आप कृपा कर मुझे स्मरण अवश्य करें। तपोधनो! आप दोनों कौन हैं? मुझपर कृपा कर यह बतला दें।'
दोनों तपस्वी बोले-"राजन्! हमलोग हेतृ और प्रहेतृ नामके स्वायम्भुव मनुके पुत्र हैं। हम देवताओंको जीतकर सर्वथा नष्ट कर देने के विचारसे सुमेरुपर्वतपर गये थे। उस समय हमारे पास बड़ी विशाल सेना थी, जिसमें हाथी, घोड़े एवं रथ भरे हुए थे। देवता भी सैकड़ों एवं हजारोंकी संख्यामें थे। उनके पास महान् सेना भी थी; किंतु असुरोंके प्रहारसे उनके सभी सैनिक अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे। यह स्थिति देखकर देवता-क्षीरसागरमें, जहाँ भगवान् श्रीहरि शयन करते हैं-पहुँचे और उनकी शरणमें गये। वहाँ देवगण भगवान्को प्रणाम कर अपनी आप-बीती बातें यों सुनाने लगे-'भगवन्!
आप हम सभी देवताओंके स्वामी हैं। पराक्रमी असुरोंने हमारी सारी सेनाको परास्त कर दिया है। भयके कारण हमारे नेत्र कातर हो रहे हैं। अत: आप हमारी रक्षा करनेकी कृपा करें। केशव! पहले भी आपने देवासुर-संग्राममें क्रूरकर्मा कालनेमि एवं सहस्रभुजसे हमारी रक्षा की है। देवेश्वर! इस समय भी हमारे सामने वैसी ही परिस्थिति आ गयी है। हेतृ और प्रहेतृ नामके दो दानव देवताओंके लिये प्रहेतृ नामके दो दानव देवताओंके लिये कण्टक बने हुए हैं। इनके सैनिकों तथा शस्त्रास्त्रोंकी संख्या असीम है। देवेश्वर! आपका सम्पूर्ण जगत्पर शासन है, अतः उन दोनों असुरोंको मारकर हम सभीकी रक्षा करनेकी कृपा करें।'
"इस प्रकार जब देवताओंने भगवान् नारायणसे प्रार्थना की, तब वे जगत्प्रभु श्रीहरि बोले-'उन असुरोंका संहार करनेके लिये मैं अवश्य आऊँगा।' भगवान् विष्णुके यह कहनेपर देवता मन-ही-मन भगवान् जनार्दनका स्मरण करते हुए सुमेरुपर्वतपर गये। वहाँ उनके चिन्तन करते ही सुदर्शनचक्र एवं गदा धारण किये हुए भगवान् नारायण हमलोगोंकी सेनाका भेदन करते हुए उसमें प्रविष्ट हो गये। उन सर्वलोकेश्वरने अपने योगैश्वर्यका आश्रय लेकर उसी क्षण अपने एकसे-दस, सौ, फिर हजार, लाख तथा करोड़ों रूप बना लिये। उन देवेश्वरके आते ही सेनामें जो भी महान् पराक्रमी वीर हमारे बलके सहारे लड़ रहे थे, वे अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। राजन्! अधिक क्या, उसी समय उनके प्राणपखेरू उड़ गये। इस प्रकार विश्वरूप धारण करनेवाले भगवान् नारायणने अपनी योगमायासे हमारी सम्पूर्ण चतुरङ्गिणी सेनाका-जो हाथी, घोड़े, रथ एवं पैदल वीरों एवं ध्वजाओंसे भरी हुई थी, संहार कर डाला। बस, केवल हम दो दानवोंको बचे देखकर वे सुदर्शनचक्रधारी श्रीहरि अन्तर्धान हो गये। शाङ्ग धनुष धारण करनेवाले भगवान् श्रीहरिका ऐसा अद्भुत कर्म देखकर हम दोनोंने भी उन प्रभुकी आराधना करनेके लिये उनकी शरण ग्रहण कर ली। राजन! राजा सुप्रतीक हमारे
मित्र थे और तुम उनके पुत्र हो। ये दोनों कन्याएँ हमारी पुत्री हैं। मुझ हेतृकी कन्याका नाम सुकेशी और इस प्रहेतृकी कन्याका नाम मिश्रकेशी है। इन्हें तुम अपनी अर्धाङ्गिनीके रूपमें स्वीकार करो।"
हेतुके इस प्रकार कहनेपर राजा दुर्जयने उन दोनों मङ्गलमयी कन्याओंके साथ विधिपूर्वक विवाह कर लिया। सहसा ऐसी दिव्य कन्याओंको प्राप्तकर दुर्जयके हर्षकी सीमा न रही। वह सैनिकोंके साथ अपनी राजधानीमें लौट आया। बहुत समयके बाद राजा दुर्जयके दो पुत्र हुए। सुकेशीसे जो बालक उत्पन्न हुआ, उसका नाम प्रभव पड़ा और मिश्रकेशीके पुत्रका नाम सुदर्शन रखा गया। राजा दुर्जय महान् वैभवशाली तो था ही, उसे परमश्रेष्ठ दो पुत्रोंकी प्राप्ति भी हो गयी। कुछ समयके पश्चात् वह राजा शिकार खेलनेके लिये जंगलमें गया। वहाँ जाकर उसने भयंकर जंगली जानवरोंको पकड़कर बाँधना शुरू कर दिया। इस प्रकार वनमें विचरण करते हुए राजा दुर्जयको जंगलमें कुटी बनाकर रहनेवाले एक
पुण्यात्मा मुनि दिखायी पड़े। वे महाभाग मुनि तपस्या कर रहे थे। उनका नाम गौरमुख था। वे ऋषियोंके परिवारोंकी रक्षा तथा पापियोंके उद्धार-कार्यमें लगे रहते थे। उनके आश्रममें विशिष्ट गुणोंसे युक्त एक पवित्र सरोवर था। वहाँ एक ऐसा उत्तम वृक्ष भी था, जिसकी सुगन्धसे सारे वनका वायुमण्डल सुगन्धित हो उठता था। वे मुनि अपने आश्रममें स्थित होकर ऐसे जान पड़ते थे, मानो कोई मेघ उत्तम विमानपर आरूढ़ होकर आकाशसे पृथ्वीपर उतर आया हो। मुनिवर गौरमुखके देदीप्यमान मुखसे छिटकता हुआ प्रकाश आकाशको जगमगा देता था। वे पवित्र वस्त्रोंसे सुशोभित थे। उनके शिष्योंकी मण्डली उच्चस्वरसे सामवेदका गान कर रही थी। उनके आश्रममें मुनि-कन्याएँ तथा मुनिपत्नियाँ भी अत्यन्त सात्त्विक वेष धारण किये हुए थीं। सुन्दर पुष्पोंसे लदे हुए अगणित वृक्ष उस आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे। इस प्रकार उस आश्रममें मुनिवर गौरमुखकी यज्ञशाला अद्भुत शोभाको प्राप्त हो रही थी।