वराह महा पुराण
115 - मुक्तिके साधन
भगवान् वराह कहते हैं-वसुंधरे! अब जिस कर्मके प्रभावसे प्राणीको पुनः गर्भमें नहीं जाना पड़ता, उसे बताता हूँ, तुम सुनो! यह सम्पूर्ण शास्त्रों एवं धर्मोंका निचोड़ है। जो बड़ासे-बड़ा कार्य करके भी अपनी प्रशंसा नहीं करता और जो सदा शुद्ध अन्तःकरणसे शास्त्रीय सत्कर्मोका अनुष्ठान करता रहता है, वह उन सत्-कर्मोके प्रभावसे भी पुनः जन्म नहीं पाता। जो मेरा सामर्थ्यशाली भक्त होकर सबपर कृपा करता है तथा कार्य और अकार्यके विषयमें जिसे पूर्ण ज्ञान है एवं जिसकी सम्पूर्ण धर्मों में श्रद्धा है, वह पुनः गर्भमें नहीं आता। जो सर्दी-गरमी, वातवर्षा और भूख-प्यासको सहता है, जो गरीब होनेपर भी लोभ, मोह एवं आलस्यसे दूर रहता है, कभी झूठ नहीं बोलता, किसीकी निन्दा नहीं करता, जो अपनी ही स्त्रीसे संतुष्ट रहता है, दूसरेकी स्त्रियोंसे दूर रहता है तथा जो सत्यवादी, पवित्र आत्मा एवं निरन्तर भगवान्का प्रिय भक्त है, वह मेरे लोकको प्राप्त होता है। जो संविभाग (बाँट)-कर खाता है, जो ब्राह्मणोंका भक्त है और जो सबसे मधुर वाणी बोलता है, वह कुत्सित योनियोंमें न जाकर मेरे लोकका अधिकारी होता है।
वसुंधरे! अब मैं तुम्हें एक दूसरा उपाय बतलाता हूँ, सुनो! जिसके प्रभावसे मेरी निरंतर उपासना करनेवाला पुरुष विकृत योनियों में नहीं जाता। जो कभी किसी जीवकी हिंसा नहीं करता, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें लगा रहता है और जो मन, कर्म, वचनसे पवित्र है, वह विकृत योनियोंमें नहीं पड़ता। जिसके मनमें सदा सर्वत्र समता है, जो मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझता है, जो बाल्यकालमें भी शान्तस्वभावसे रहनेवाला, इन्द्रियविजयी और सदा शुभ कार्यमें रत रहता है, उसे नीच योनि नहीं प्राप्त होती। जो दूसरे द्वारा किये अपकारोंपर कभी किंचिन्मात्र भी ध्यान नहीं देता, जिसे सदा कर्तव्य-कर्म ही स्मृत रहते हैं और जो सब कुछ यथार्थ बोलता है, वह नीच योनियोंमें नहीं पड़ता। जो व्यर्थ बातोंसे सदा दूर रहता है, जिसकी तत्त्वज्ञानमें अटल निष्ठा है, जो सदा अपनी वृत्तिमें तत्पर रहकर परोक्षमें भी कभी किसीकी निन्दा नहीं करता, उसे हीन योनियों में नहीं जाना पड़ता। भद्रे! जो ऋतुकालमें ही संतान-प्राप्तिकी इच्छासे अपनी स्त्रीसे सहवास करता और सदा मेरी उपासनामें लगा रहता है, वह साधक हीन योनिमें नहीं जाता।
वसुंधरे! अब एक दूसरी बात बताता हूँ, तुम उसे सुनो। जो सदा संयत रहनेवाले पुरुषोंका धर्म है और जिसको मनु, अङ्गिरा, शुक्राचार्य, गौतम मुनि, चन्द्रमा, रुद्र, शङ्ख-लिखित, कश्यप, धर्मदेव, अग्निदेव, पवनदेव, यमराज, इन्द्र, वरुण, कुबेर, शाण्डिल्यमुनि, पुलस्त्य, आदित्य, पितृगण और स्वयम्भू ब्रह्मा आदि वेद-धर्म-द्रष्टाओंने पृथक्पृथक् रूपसे देखा और वर्णन किया है, उस धर्मक पालनमें जो मनुष्य निश्चितरूपसे तत्पर रहकर अपने-आपमें परमात्माको देखता है, वह विकृत योनिमें न जाकर मेरे लोकमें जानेका अधिकारी है। जो अपने धर्मका पालन करता है तथा अपनी बुद्धिके अनुसार ठीक बोलता है, दूसरेकी निन्दासे दूर रहता है, सम्पूर्ण धर्मों में जिसकी निश्चित बुद्धि रहती है, जो दूसरोंके धर्मोकी निन्दा नहीं करता तथा जो अपने धार्मिक मार्गपर अटल रहता है, ऐसे उत्तम गुणोंसे युक्त एवं मेरे कर्मोका सम्पादन करनेवाला पुरुष विकृत योनिमें न जाकर मेरे लोकको ही प्राप्त होता है। जिनकी इन्द्रियाँ वशमें हैं, जिन्होंने क्रोधपर पूरा नियन्त्रण कर लिया है, जो लोभ और मोहसे सदा दूर रहते हैं, जो विश्वके उपकारमें तत्पर हैं, जो देवता, अतिथि तथा गुरुमें श्रद्धा रखते हैं, जो कभी किसीकी हिंसा नहीं करते, मद्य-मांसका कभी सेवन नहीं करते, जो अनुचित भाव-बन्धन करनेकी चेष्टा नहीं करते, जो ब्राह्मणको 'कपिला' धेनुका दान करते हैं ऐसे धर्मसे युक्त पुरुष गर्भमें नहीं पड़ते; वे मेरे लोकको ही प्राप्त होते हैं। जो अपने सभी पुत्रोंके प्रति समता रखता है, क्रोधमें भरे हुए ब्राह्मणको देखकर भी उसे प्रसन्न करनेकी ही चेष्टा करता है, जो भक्तिपूर्वक कपिलागौका स्पर्श करता है, जो कुमारी कन्याके प्रति कभी अपवित्र भाव नहीं करता, जो कभी अग्निका लङ्घन नहीं करता, जो जलमें शौच नहीं करता एवं गुरुमें श्रद्धा-बुद्धि रखता है, जो उनकी तथा ईश्वरकी कभी निन्दा नहीं करता, इस प्रकारका धर्ममें तत्पर पुरुष निश्चय ही मुझे प्राप्त कर लेता है और वह पुरुष माताके गर्भमें न जाकर मेरे ही लोकको प्राप्त होता है।
116 - कोकामुखतीर्थ (वराहक्षेत्र*) *इसका उल्लेख आगे १४०वें अध्यायमें भी है। नंदलाल देके अनुसार यह स्थान नाथपुरके पास तम्बर, अरुणा । और सुनकोशी नदियोंके त्रिवेणी सङ्गमद्वारा निर्मित है। )-का माहात्म्य
भगवान् वराह कहते हैं-वसुंधरे! अब मैं तुम्हें गोपनीयोंमें भी एक परम गोपनीय रहस्य बतलाता हूँ, जिसके प्रभावसे पशु-योनिमें गये हुए प्राणी भी पापसे मुक्त हो जाते हैं, इसे तुम ध्यानसे सुनो। जो मानव अष्टमी और चतुर्दशी तिथिमें स्त्रीसङ्ग नहीं करता तथा दुसरेके अन्नको खाकर उसकी निन्दा नहीं करता, वह मेरे लोकको प्राप्त होता है। बाल्यकालमें भी जो सदा मेरे व्रतका पालन करता है, जो जिस-किसी प्रकारसे भी सदा संतुष्ट रहता है तथा जो माता-पिताकी पूजा करता है, वह मेरे लोकमें जाता है। जो परिश्रम से भी प्राप्त सामग्रीको बाँटकर खाता-पीता है, जो गुणी, दाता तथा संयतभोक्ता है तथा जो सभी कर्तव्य-कार्यों में स्वत: लगा रहता है एवं अपने मनको सदा वशमें किये रहता है, वह मेरे लोकको प्राप्त होता है। जो कुत्सित कर्म नहीं करता, जो ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करता है, समर्थ होकर भी जो सम्पूर्ण प्राणियोंपर क्षमा-दया करता है, वह मेरे लोकको प्राप्त होता है। जो नि:स्पृह रहकर दूसरोंकी सम्पत्तिके प्रति कभी लोभ नहीं करता, ऐसा पुरुष मेरे लोकमें जाता है। वरारोहे! एक गोपनीय विषय जो देवताओंके लिये भी दुष्प्राप्य एवं दुर्जेय है, उसे अब मैं तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो। जरायुज, अण्डज, उद्भिज्ज और स्वेदज-इन चार प्रकारके प्राणियोंकी जो हिंसा नहीं करता, जो पवित्रात्मा एवं दयाशील है और जो 'कोकामुख' नामक तीर्थमें अपने प्राणोंका परित्याग करता है, वह मुझे परम प्रिय है। मेरी कृपादृष्टि से वह कभी वियुक्त नहीं होता।
'पृथ्वी बोली-माधव! मैं आपकी शिष्या, दासी और आपमें अटल श्रद्धा रखनेवाली हूँ, आपमें भक्ति रखनेके बलपर आपसे पूछती हूँ कि वाराणसी, चक्रतीर्थ, नैमिषारण्य, अट्टहासतीर्थ, भद्रकर्णहृद, द्विरण्ड, मुकुट, मण्डलेश्वर, केदारक्षेत्र, देवदारुवन, जालेश्वर, दुर्ग, गोकर्ण, कुब्जामेश्वर, एकलिङ्ग-ऐसे प्रसिद्ध एवं पवित्र तीर्थस्थानोंको छोड़कर आप 'कोकामुख' क्षेत्रकी ही इतनी प्रशंसा क्यों करते हैं?
भगवान् वराह बोले-भीरु ! तुम्हारा कहना ठीक है, बात ऐसी ही है, 'कोकामुख' मुझे अत्यन्त ही प्रिय है। अब 'कोकामुख'-क्षेत्र जिन कारणोंसे अधिक प्रसिद्ध है, वह मैं तुम्हें बताता हूँ। तुमसे जिन क्षेत्रोंका वर्णन किया है, वे सभी भगवान् रुद्रसे सम्बन्ध रखनेवाले 'पाशुपततीर्थ' हैं, जिन्हें 'पाशुपत-क्षेत्र' कहते हैं, किंतु यह 'कोकामुख-क्षेत्र' मुझ श्रीहरिका है । वरानने! इसी विषयमें मैं तुम्हें एक परम प्रसिद्ध उपाख्यान बताता हूँ, इसमें 'कोकामुख' क्षेत्रकी प्रसिद्धिका हेतु संनिहित है।
एक बार इस 'कोकामुख'-क्षेत्रमें मांसके लोभमें एक व्याध घूम रहा था। वहीं एक अल्प जलवाले सरोवरमें एक मत्स्य भी रहता था। उसको देखकर व्याधने तुरंत ही बंसी (कटिया)से उसे बाहर खींच लिया, तथापि वह बलवान् मत्स्य उसके हाथसे तुरंत निकल गया। इतने में एक बाजकी दृष्टि, जो आकाशमें चक्कर लगा रहा था, उस मत्स्यपर पड़ी और वह उसको पकड़नेके लिये नीचे उतरा और फिर उसे पकड़कर तेजीसे उड़ चला। परंतु वह भी उसके बोझको न संभाल सका और उस मछलीके साथ ही इसी 'कोकामुख'-क्षेत्रमें गिर पड़ा। किंतु आश्चर्य! वह गिरते ही इस तीर्थके प्रभावसे रूप, गुण एवं वयसे युक्त एक कुलीन राजपुत्रके रूपमें परिणत हो गया! कुछ समय बाद उसी व्याधकी स्त्री भी मांस लिये हुए वहाँ जा पहुँची। इतनेमें ही मांसके लिये लालायित रहनेवाली एक मादा चील भी उसके हाथसे मांस छीननेके लिये आयी, जो मांस छीननेके लिये बार-बार झपाटा मारने लगी। उसी क्षण बलपूर्वक मांस लेनेकी इच्छा रखनेवाली उस मादा चीलपर व्याधने बाण मारा, जिससे वह मेरे इस 'कोकामुख-क्षेत्र' में गिर पड़ी और उसके प्राण निकल गये।
तदनन्तर उस चीलने चन्द्रपुर नामक नगरमें सुन्दरी राजपुत्रीके रूपमें जन्म ग्रहण किया। उसका यश बड़ी तेजीसे चारों ओर फैलने लगा। वह कन्या धीरे-धीरे बढ़ती गयी और शनै:-शनैः रूप, गुण, अवस्था एवं सभी (चौसठ) कलाओंके ज्ञानसे सम्पन्न हो गयी, परंतु वह पुरुषोंकी सदा निन्दा करती। उसे रूपवान्, गुणवान्, शूर-वीर तथा सौम्य स्वभावके पुरुषोंकी चर्चा भी अच्छी न लगती थी और वह उनकी भी निन्दा किया करती थी। युवती होनेपर उसका 'आनन्दपुर' नगरके एक शकजातिके पुरुषके साथ विवाह हुआ। विवाहके बाद दोनों पति-पत्नी गार्हस्थ्यधर्मका पालन करते हुए साथ रहने लगे। फिर वे परस्पर प्रेमके बन्धनमें इस प्रकार बँध गये कि एक मुहूर्त भी कोई किसीको छोड़ना न चाहता था। अब वही कन्या अत्यन्त नम्र होकर अपने स्वामीकी सब प्रकार सेवा करने लगी। एक दिन मध्याह्नके समय राजकुमारके सिरमें तीव्र वेदना उत्पन्न हुई। अनेक कुशल वैद्य चिकित्सामें लगे; किंतु उसकी शिरोव्यथा दूर न हो सकी। अन्य मन्त्र-यन्त्र भी विफल हुए। इस प्रकार पर्याप्त समय बीत जानेके बाद एक दिन उस राजकुमारीने अपने स्वामीसे यह जिज्ञासा की-'प्रभो! आपके सिरमें जो यह वेदना है, यह क्या और कैसे है? यदि मुझपर आपका तनिक भी स्नेह हो तो आप मुझे इसे तत्त्वतः बतानेकी कृपा कीजिये। अनेक कुशल वैद्य आपका उपचार कर रहे हैं, पर उन्हें वेदना दूर करनेमें सफलता नहीं मिलती है। इसपर राजकुमारने कहा-'भद्रे! क्या तुम यह भूल गयी कि यह मनुष्य-शरीर व्याधियोंका ही मन्दिर है? यह मनुष्य-शरीर रोग और दुःखोंसे ही भरा है, संसाररूपी सागरमें पड़े हुए मुझसे तुम्हें बार-बार ऐसा प्रश्न करना उचित नहीं है।' राजकुमारके ऐसा कहनेपर उस राजकन्याके मनमें उत्सुकता अब और बढ़ गयी। कुछ दिन बाद पुनः उस राजपुत्रीने अत्यन्त आग्रहपूर्वक उस प्रश्नको राजकुमारसे पूछा। इसपर शक-नरेशने अपनी भार्यासे कहा-'भद्रे! तुम इस मानुषी भावका त्याग करो और अपने पूर्वजन्मकी बातें स्मरण करो। अथवा यदि तुम्हें पूर्वजन्मकी बातें जाननी हों तो कल्याणि! तुम चलकर मेरे माता-पिताको प्रसन्न करो। तुम उनकी पूजा करो; क्योंकि उन्होंने मुझे अपने उदरमें धारण किया था। उनका सम्मान करके और उनकी आज्ञा लेनेके पश्चात् मैं 'कोकामुख क्षेत्रमें अनिन्दिते! अपने पूर्वजन्मोंका ज्ञान देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। सारा वृत्तान्त मैं तुम्हें वहीं बताऊँगा।' तदनन्तर वह राजकुमारी अपने सास और श्वशुरके सामने गयी और उनके चरणोंको पकड़कर बोली-'मुझे आप दोनोंसे कुछ निवेदन करना है। मैं इस विषयमें आपलोगोंसे अनुमति प्राप्त करना चाहती हूँ। फिर उसने कहा कि 'हम दोनों स्त्रीपुरुष आपकी आज्ञासे पवित्र 'कोकामुख' नामक क्षेत्रमें जाना चाहते हैं। आपलोग ही हमारे गुरु हैं। इस कार्यकी गरिमाको देखकर आप हमलोगोंको रोकें नहीं। आजतक मैंने कभी कुछ भी आपलोगोंसे नहीं माँगा है। यह प्रथम अवसर है कि हम आपके सामने याचना करने आये हैं। अतः आपलोग मेरी इस याचनाको पूर्ण करनेकी कृपा करें। समस्या यह है कि आपके ये कुमार निरन्तर सिरकी वेदनासे पीड़ित रहते हैं और दोपहरके समयमें तो ये मृतकके तुल्य हो जाते हैं। कोई भी उपचार सफल नहीं हो रहा है। ये सब सुख-भोगोंको छोड़कर सदा पीड़ासे दु:खी रहते हैं। इनका यह दुःख 'कोकामुख'क्षेत्रमें गये बिना दूर होनेका नहीं है।' होता है। मेरे प्राण तुम्हींमें सदा बसे रहते हैं। तुम 'कोकामुख' क्षेत्र मत जाओ।' पिताके इस प्रकार कहनेपर राजकुमारने उनके चरण पकड़ लिये और नम्रतापूर्वक कहने लगा'पिताजी! राज, कोष, सवारी अथवा सेनासे मेरा क्या प्रयोजन? मैं तो अभी उस 'कोकामुख'क्षेत्रमें ही जाना चाहता हूँ। मैं सिरकी वेदनासे नितान्त पीड़ित हूँ। यदि मैं जीवित रहा, तब राज्य, सेना और कोष भी मेरे ही होंगे, इसमें कोई संशय नहीं, पर इस पीड़ासे मुक्ति तो मुझे वहाँ जानेसे ही मिलेगी।
उस समय शकजातियों के अध्यक्ष उन नरेशने पुत्रवधूकी बात सुनकर अपने हाथसे पुत्र एवं पुत्रवधूके सिरको सहलाकर कहा-'पुत्र! 'कोकामुख क्षेत्रमें जानेकी बात तुमलोगोंके मनमें कैसे आयी? हाथी, घोड़े, सवारियाँ, अप्सराओंकी तुलना करनेवाली स्त्रियाँ, कोष और रत्नभंडार तथा सात अङ्गोंसहित हमारी यह सम्पूर्ण राज्यसम्पत्ति आदि सभी तुम्हारे अधीन हैं। तुम इन सबको ले लो। सारी सम्पत्तियोंका उत्तराधिकारी पुत्र ही अन्तमें शक-नरेशने पुत्रकी बातपर विचार करके उसे जानेकी आज्ञा दे दी। जब राजकुमारने 'कोकामुख'की यात्रा आरम्भ की तो उसके साथ बहुत-से व्यापारीवर्ग और नागरिक स्त्री-पुरुष भी चल पड़े। बहुत समयके बाद वे सभी इस 'कोकामुख क्षेत्रमें पहुंचे। वहाँ पहुँचकर राजकुमारीने अपने स्वामीसे ये वचन कहे-'स्वामिन्! आपसे मैंने जो पहले प्रश्न किया था, उस समय आपने मुझे 'कोकामुख-क्षेत्र में पहुँचकर बतलानेका आश्वासन दिया था, अतः अब बतानेकी कृपा कीजिये।' इसपर राजकुमारने अपनी भार्यासे स्नेहपूर्वक कहा-'प्रिये ! अब रात्रि हो गयी है। इस समय तुम सुखपूर्वक सो जाओ। वह सब मैं प्रात:काल बताऊँगा।' प्रात:काल वे दोनों स्नान करके रेशमी वस्त्र धारण करके बैठे। राजकुमारने सर्वप्रथम सिर झुकाकर भगवान् विष्णुको प्रणाम किया। तत्पश्चात् वह अपनी पत्नीको पकड़कर, पूर्व-उत्तर-भागमें (अपने मत्स्य-देहकी पड़ी) अस्थियोंको दिखाकर कहने लगा-'प्रिये! ये मेरे पूर्व शरीरकी हड्डियाँ हैं। पूर्वजन्ममें मैं मत्स्य था। एक बार जब मैं इस 'कोकामुख' क्षेत्रके जलमें विचर रहा था कि एक व्याधने बंसीसे मुझे पकड़ लिया। उस समय मैं अपनी शक्ति लगाकर उसके हाथसे तो निकल गया; पर एक चील मुझे लेकर फिर उड़ गयी और नखोंसे मेरे शरीरको क्षत-विक्षत कर दिया। इतने में उससे छूटकर मैं गिर गया। उसीके किये हुए प्रहारके कारण अब भी मेरे सिरमें वेदना बनी रहती है। इस प्रसङ्गको केवल मैं ही जानता हूँ। मेरे बिना इस रहस्यको कोई दूसरा नहीं जानता। भद्रे ! तुमने जो बात पूछी थी, मैंने उसका रहस्य बतला दिया। सुन्दरि! तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम्हारा मन जहाँ लगे, वहाँ जा सकती हो।'
वसुंधरे! अब राजकुमारी भी करुण-स्वरमें अपने पतिसे कहने लगी-'भद्र ! इसी कारण मैं भी अपनी गुप्त बात आपको नहीं बतला सकी थी। पूर्वजन्ममें मैं जैसी जो कुछ थी, अब वह आपसे बतलाती हूँ, आप सुनें। मैं पूर्वजन्ममें आकाशमें विचरनेवाली एक चील थी। भूख और प्याससे मुझे महान् कष्ट हो रहा था। खानेके योग्य पदार्थका अन्वेषण करती हुई मैं एक पेड़पर बैठी थी, इतनेमें मुझे एक व्याध दिखायी दिया। वह वनके बहुत-से पशुओंको मारकर उनके मांसोंको लेकर उसी मार्गसे गुजर रहा था। वह भी भूखसे व्याकुल था, अतः मांस-भारको अपनी पत्नी के पास रखकर उसे पकानेके विचारसे लकड़ी ढूँढ़ने निकला। काष्ठोंको एकत्रकर वह आग जलाने ही जा रहा था कि मैंने झपटकर अपने वज्रमय कठोर नखोंसे उस मांसपिण्डको उठा लिया। पर वह मांस-भार मेरे लिये दुर्वह था, अतः उसे दूर न ले जाकर वहीं समीप ही बैठी रही। इधर वह व्याध शिकारकी खोजमें लगा ही था। अब उसकी दृष्टि मांस खाती हुई मुझ चीलपर पड़ी। फिर तो उसने धनुष उठाया और मुझपर बाणका संधान कर मार गिराया। मैं वहाँसे लुढ़ककर चक्कर काटती हुई प्राणहीन और निश्चेष्ट होकर पृथ्वीपर गिरी और मेरी जीवनलीला समाप्त हो गयी। किंतु इस 'कोकामुख' क्षेत्रकी महिमासे मेरे मनमें कोई कामना न रहनेपर भी मेरा जन्म राजाके घर हुआ। इस प्रकार मुझे आपकी स्त्री होनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ। मेरे पूर्वजन्मकी ही ये हड्डियाँ हैं। अब इनका थोड़ा-सा भाग ही अवशेष है।' इस 'कोकामुख' तीर्थकी ही यह महिमा है जिसके फलस्वरूप तिर्यक् (तिरछी चलने या उड़नेवाली) योनिके जीवका भी उत्तम कुलमें जन्म हो जाता है। राजकुमारने भी साधु साधु कहकर उसका बड़ा सम्मान किया। साथ ही उसे उस क्षेत्रमें होनेवाले कुछ धार्मिक कर्मोंका भी निर्देश किया और उन्हें राजकुमारीने सम्पन्न किया। अन्य लोगोंने भी जिन्हें जो प्रिय जान पड़ा, उस धर्मका आचरण किया। उस समय उस दम्पतिने प्रसन्नतासे आदरपूर्वक ब्राह्मणोंको यथोचित द्रव्य-अन्न और रत्र भी दिये। वसुंधरे! उस समय अन्य भी जितने लोग वहाँ आये थे, उन सबने भी अपनी सामर्थ्यके अनुसार स्वयं व्रतका पालन करते हुए भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको धन दिया। इस प्रकार वे लोग कुछ दिनोंतक वहीं रुके रहे और इसके फलस्वरूप वे श्वेतद्वीपको प्राप्त हुए। उस पुण्यमय धाममें पहुँचनेपर सभी पुरुष शुक्ल वस्त्र एवं दिव्य भूषणोंसे अलंकृत होकर सुशोभित-प्रकाशित होने लगे। वहाँ रहनेवाली स्त्रियाँ भी दिव्य वस्त्र एवं अलौकिक आभूषणोंसे आभूषित होकर रूप, तेज एवं सत्त्वसे युक्त होकर प्रकाशित होने लगीं।
देवि! यह मैंने तुमसे 'कोकामुख'क्षेत्रकी महिमा बतलायी, जहाँ मत्स्य और चील आदि कामनामुक्त जीवोंने भी उत्तम गति प्राप्त की थी, जिसे चान्द्रायणनत करने, जलमें शयन करने तथा भगवद्धर्मोंका आचरण करनेवाले भी बड़ी कठिनतासे प्राप्त कर पाते हैं। फिर वहाँ राजकुमार और राजकुमारी-इन दोनों व्यक्तियोंने बहुतसे उत्तम
धान्य और रत्न दान किये। अन्य श्रद्धालु व्यक्तियोंने भी धर्माचरणकर प्रारब्धके अनुसार वाञ्छनीय मृत्यु प्राप्त की और उन्हें श्वेतद्वीप सुलभ हो गया। वह राजकुमार भी मनुष्यलोकके सभी श्रेष्ठ भोगोंको भोगकर सबसे उत्तम मेरे लोकको प्राप्त हुआ। सुमध्यमे! वहाँकी सभी सुवासिनी स्त्रियाँ भी मायाके प्रभावसे मुक्त हो गयीं। सबपर धर्म तथा मेरी भक्तिभावनाकी गहरी छाप पड़ी थी।
मेरी कृपासे वे सब श्वेतद्वीप पहुँचीं। यह प्रसङ्ग धर्म, कीर्ति, शक्ति और महान् यशका उन्नायक है। यह सभी तपस्याओंमें महान् तप, आख्यानोंमें उत्तम आख्यान, कृतियोंमें सर्वोत्तम कृति तथा धर्मों में सर्वोत्कृष्ट धर्म है, जिसका वर्णन मैंने तुमसे किया। भद्रे! जो क्रोधी, मूर्ख, कृपण, अभक्त, अश्रद्धालु तथा शठ व्यक्ति हैं, उन्हें यह प्रसङ्ग नहीं सुनाना चाहिये, जो दीक्षित तथा सदसद्विचारशील हैं, यह प्रसङ्ग उन्हें ही सुनाना चाहिये। जो शास्त्र-पारगामी पुरुष मृत्युकाल उपस्थित होनेपर मनको सावधान करके इस प्रसङ्गको मनमें धारण करता है, वह जन्ममरणके बन्धनसे छूट जाता है। जो इस विधिके अनुसार 'कोकामुख क्षेत्रमें जाकर संयमपूर्वक जीवन व्यतीत करता है, वह भी उस परम सिद्धिको पाता है, जिसे पूर्वकालमें चील और मत्स्यने प्राप्त किया था।