वराह महा पुराण
8-भगवान्का मत्स्यावतार तथा उनकी देवताओंद्वारा स्तुति
पृथ्वीने पूछा-प्रभो! सत्ययुगके आरम्भमें विश्वात्मा भगवान् नारायणने कौन-सी लीला की? वह सब मैं भलीभाँति सुनना चाहता हूँ।
भगवान् वराह कहते हैं-पृथ्वि! सृष्टिके पूर्वकालमें एकमात्र नारायण ही थे। उनके अतिरिक्त दूसरा कुछ भी नहीं था। एकाकी होनेसे उनका रमण-आनन्द-विलास नहीं हो रहा था। वे प्रभु समस्त कर्मोके सम्पादनमें स्वतन्त्र हैं। जब उनको दूसरेकी इच्छा हुई, तो उनसे अभावसंज्ञक ज्ञानमय संकल्पकी उत्पत्ति हुई। क्षणभरमें ही उनका वह सृष्टिरचनाका संकल्प सूर्यके समान उद्भासित हो उठा। उसके फिर दो भाग हुए, जिनमें पहली ब्रह्मवादियोंद्वारा चिन्तनीय ब्रह्मविद्या थी, जो उमा नामसे प्रसिद्ध हुईं। ये ही मनुष्योंमें सदा श्रद्धाके रूपमें निवास करती हैं। दूसरी ॐकारद्वारा वाच्य एकाक्षरी विद्या प्रकटित हुईं। तदनन्तर उसीने इस भूलोककी रचना की। भूलोककी रचना करनेके पश्चात् उसने भुवर्लोक एवं स्वर्लोकका निर्माण किया। तत्पश्चात् क्रमश: महर्लोक तथा जनलोककी सृष्टि करके वह प्रणवात्मिका विद्या अपने द्वारा रचित इस सृष्टिमें अन्तर्हित हो गयी और धागेमें पिरोये हुए मणियोंके समान वह सबमें ओतप्रोत हो गयी। इस प्रकार प्रणवसे जगत्की रचना तो हो गयी, किंतु यह नितान्त शून्य ही रहा। भगवान्की यह जो शिवमूर्ति है, वे स्वयं श्रीहरि ही हैं। इन लोकोंको शून्य देखकर उन परम प्रभुने एक परमोत्तम श्रीविग्रहमें अभिव्यक्त होनका इच्छा की और अपने मनोधाममें क्षोभ उत्पन्न करके अपने अभिलषित आकारमें अभिव्यक्त हो गये। इस प्रकार ब्रह्माण्डका आकार व्यक्त हुआ। फिर वह ब्रह्माण्ड दो भागोंमें विभक्त हुआ; इसमें जो नीचेका भाग था, वह भूलोक बना, ऊपरका खण्ड भुवर्लोक हुआ, जो मध्यवर्ती लोकोंके अन्तरालमें सूर्यके समान प्रकाशमान हो गया। पूर्वकल्पके समान महासिन्धुमें कमलकोशका उसी भाँति प्रादुर्भाव हो गया और देवाधिदेव नारायणने प्रजापति ब्रह्माके रूपमें प्रकटित होकर अकारसे लेकर हकारपर्यन्त समस्त स्वर एवं व्यञ्जन वर्णोंकी सृष्टि कर दी।
इस प्रकार अमूर्त सृष्टिकी रचना हो जानेपर श्रीभगवान्ने चारों वेदोंका गान प्रारम्भ किया। इस प्रकार लोकोंकी सृष्टि करनेके पश्चात् अपरिमेय शक्तिशाली प्रभुके मनमें जगत्के धारण-पोषणकी चिन्ता हुई और चिन्तन करते ही उनके नेत्रोंसे महान् तेज निकला। उनके दक्षिण नेत्रसे निकला हुआ तेज अग्निके समान उष्ण और वाम नेत्रसे प्रादुर्भूत तेज हिमके समान शीतल था। भगवान् श्रीहरिने उनको सूर्य और चन्द्रमाके रूपमें प्रतिष्ठित कर दिया। फिर उन विराट् पुरुषसे जगत्का प्राणरूप वायु प्रकट हुआ। ये ही वायुदेवता आज भी हम सबके हृदयमें प्राणरूपसे व्याप्त हैं। तत्पश्चात् उसी वायुसे अग्निका प्रादुर्भाव हुआ। अग्निसे जलतत्त्व उत्पन्न हुआ। जो वह अग्नितत्त्व उत्पन्न हुआ, वही परब्रह्म परमात्माका तेज है और वही मूर्त सृष्टिका परम कारण बना। विराट् पुरुषने इसी तेजसम्पन्न अपनी भुजाओंसे क्षत्रिय जातिकी, जाँघोंसे वैश्य जातिकी और पैरोंसे शूद्रजातिकी रचना की। फिर उन परमेश्वरने यक्षों और राक्षसोंका सृजन किया। तदनन्तर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र प्रभृति मानवोंसे भूर्लोकको तथा आकाशमें विचरण करनेवाले प्राणियोंसे भुवर्लोकको भर दिया। अपने पुण्योंके फलस्वरूप स्वर्गका अर्जन करनेवाले भूत-प्राणियोंसे स्वर्लोकको एवं सनकादि ऋषिमुनियोंसे महर्लोकको परिपूरित कर दिया।
विराट् परमात्माकी हिरण्यगर्भके रूपमें उपासना करनेवालोंसे उन्होंने जनलोकको भर दिया और तपोनिष्ठ देवताओंसे तपोलोकको पूर्ण कर दिया। सत्यलोकको उन देवताओंसे परिपूर्ण किया, जो मरणधर्मा नहीं थे।
इस प्रकार भूतभावन भगवान् श्रीहरिने सष्टिकी रचना सम्पन्न कर दी। परमेश्वरके संकल्पसे इस जगत्की रचना होनेके कारण ही सृष्टिको कल्प कहा जाता है। फिर भगवान् नारायण रात्रिकल्पके आनेपर निद्रामग्न हो गये। उनके सो जानेपर ये तीनों लोक भी प्रलयको प्राप्त हो गये। जब रात्रि समाप्त हो गयी, तब कमलनयन भगवान् श्रीहरि जाग उठे और उन्होंने पुनः चारों वेदों तथा उनकी स्वरूपभूता मातृकाओंका चिन्तन किया, किंतु योगनिद्राजनित अज्ञानसे मोहित हुए देवदेवेश्वर श्रीहरिको लोकमर्यादाओंको स्थिर करनेके लिये वेद उपलब्ध नहीं हुए। उन्होंने देखा-उनके ही आत्मस्वरूप वेद जलमें डूबे हुए हैं। अब उन्हें वेदोंके उद्धारकी चिन्ता हुई; अतएव तत्काल मत्स्यके रूपमें अवतरित होकर
सागरकी विशाल जलराशिको क्षुब्ध करते हुए उसमें प्रविष्ट हो गये। मत्स्यमूर्ति श्रीहरि महासिन्धुके अगाध जलसमूहमें प्रवेश करते ही महान् पर्वताकार रूपमें प्रकाशित हो उठे। इस प्रकार उन देवश्रेष्ठके मत्स्यावतार ग्रहण करनेपर देवता उत्तम स्तोत्रोंसे उनकी स्तुति करने लगे-'मत्स्यरूप धारण करनेवाले भगवान् नारायण! वेदोंके अतिरिक्त अन्य शास्त्रोंके पारगामी पुरुषोंके लिये भी आप अगम्य हैं, यह सारा विश्व आपका ही अङ्ग है। आप अत्यन्त मधुर स्वरमें
वेदोंका गान करते हैं, विद्या और अविद्या दोनों आपके रूप हैं, आपको हमारा बारंबार नमस्कार है। आपके अनेक रूप हैं, चन्द्र और सूर्य आपके सुन्दर नेत्र हैं। प्रलयकालीन समुद्र जब सम्पूर्ण विश्वको आप्लावित कर लेता है, उस समय भी आप स्थित रहते हैं। विष्णो! आपको प्रणाम है। हमलोग आपकी शरणमें आये हैं, आप इस मत्स्य-शरीरका त्याग कर हमारी रक्षा करनेकी कृपा करें। अनन्त रूप धारण करनेवाले प्रभो! सारा संसार आपसे ही व्याप्त है। आपके अतिरिक्त इस जगत्में कुछ है ही नहीं और न इस जगत्के अतिरिक्त आप अव्यक्तमूर्तिकी कोई दूसरी मूर्ति ही है। इसीलिये हमलोग आपकी शरणमें आये हैं। पुण्डरीकाक्ष! यह आकाश आप पुराणपुरुषका आत्मा है, चन्द्रमा आपके मन और अग्नि मुख हैं। देवाधिदेव शम्भो! यह सारा जगत् आपसे ही प्रकाशित है। यद्यपि हमलोग आपकी भक्तिसे रहित हैं, तो भी आप हमें क्षमा करनेकी कृपा करें। देवेश्वर! आप सम्पूर्ण जगत्के आश्रय हैं, आप सनातन पुरुषके मधुरभाषी सुन्दर स्वरयुक्त दिव्य रूपसे इस पर्वताकार विग्रहका कोई मेल ही नहीं है। अच्युत! आपके सूर्यसे भी अधिक तीव्र तेजसे हमलोग संतप्त हो रहे हैं, अतएव आप अपने इस रूपका संवरण कर लीजिये। भगवन्! हमलोग आपकी शरणमें आये हैं; क्योंकि आपको इस रूपसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करते देखकर हमारा मन भयभीत हो उठा है। आज आपको पूर्वरूपमें न पाकर आपसे हीन हुए हमलोगोंको ऐसा प्रतीत हो रहा है, जैसे हमारे शरीरोंमें आत्मा ही न रह गया हो।' देवताओंके इस प्रकार स्तुति करनेपर मत्स्यरूपी भगवान् नारायणने जलमें निमग्न हुए उपनिषदों और शास्त्रोंसहित वेदोंका उद्धार कर दिया। इसके पश्चात् उन्होंने अपने नारायण-रूपमें स्थित होकर देवताओंको सान्त्वना प्रदान की। भगवान् नारायण जबतक सगुण-साकार रूपमें स्थित रहते हैं, तभीतक इस संसारकी सत्ता रहती है। उनके अपने निर्गुणनिराकार रूपमें स्थित हो जानेपर संसारका प्रलय हो जाता है और उनमें इच्छारूप विक्रिया उत्पन्न होनेपर जगत्की सृष्टि पुनः प्रारम्भ हो जाती है।