49-पद्मनाभ-द्वादशीव्रत

दुर्वासाजी कहते हैं-मुने! पूर्वकथित द्वादशीव्रतकी भाँति आश्विनमासके शुक्लपक्षमें यह व्रत भी है। उस तिथिमें पद्मनाभ भगवान्की अर्चना करनेकी विधि है। 'ॐ पद्मनाभाय नमः', 'ॐ पद्मयोनये नमः', 'ॐ सर्वदेवाय नमः', 'ॐ पुष्कराक्षाय नमः', 'ॐ अव्ययाय नमः', 'ॐ प्रभवाय नमः'-इन मन्त्रोंको पढ़कर क्रमश: भगवान पद्मनाभके दोनों चरणों, कटिभाग, उदर, हृदय, हाथ एवं सिरकी पूजा करनी चाहिये। फिर 'सुदर्शनाय नमः' एवं 'कौमोदक्यै नमः' आदि कहकर भगवान्के आयुधोंकी पूजा करनी चाहिये। इसमें भी पूर्ववत् सामने कलश रखना चाहिये, उसपर भगवान् पद्मनाभकी सुवर्णमयी प्रतिमा स्थापित करे, चन्दन-पुष्प आदिसे उसके अङ्गोंकी पूजा करनी चाहिये। रात बीत जानेपर प्रात:काल फिर वह प्रतिमा ब्राह्मणको दे दे। महामते ! इस प्रकार व्रत करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह बताता हूँ, सुनो। सत्ययुगकी बात है-भद्राश्व नामसे विख्यात एक शक्तिशाली राजा थे, जिनके नामपर 'भद्राश्ववर्ष' प्रसिद्ध हुआ है। एक बार कभी अगस्त्य मुनि उनके घर आये और कहने लगे-'राजन्! मैं सात रातोंतक तुम्हारे घरपर निवास करना चाहता हूँ।' राजा भद्राश्वने सिर झुकाकर मुनिको प्रणाम किया और कहा-'मुनिवर! आप अवश्य निवास करें।' राजा भद्राश्वकी सुन्दरी रानीका नाम कान्तिमती था। उसका तेज ऐसा था मानो बारहों सूर्य एक साथ प्रकाश फैला रहे हों। इसी प्रकार राजाकी पाँच सौ सुन्दरियाँ भी थीं; जिनका व्रत संयमित था। सुन्दर स्वभाववाली वे सौतें दासीकी भाँति प्रतिदिन कार्यमें संलग्न रहती थीं। कान्तिमतीको ही राजाकी पटरानी होनेका सौभाग्य प्राप्त था। एक बार उस (रूप और तेजसे सम्पन्न कल्याणी कान्तिमती)-पर अगस्त्य मुनिकी दृष्टि पड़ी। साथ ही उसके भयसे कार्यमें तत्पर रहनेवाली उन सुन्दरी सौतोंको भी उन्होंने देखा। राजा भद्राश्व तो रानी कान्तिमतीके प्रसन्न मुखको प्रतिक्षण देखता ही रहता था। ऐसी परम सुन्दरी रानीको देखनेके कुछ समय बाद अगस्त्यजी आनन्दमें विह्वल होकर बोले-'राजन्! आप धन्य हैं, धन्य हैं।' इसी प्रकार दूसरे दिन रानीको देखकर अगस्त्य मुनिने कहा-'अरे! यह तो सारा विश्व वञ्चित रह गया।' फिर तीसरे दिन उस रानीको देखकर यों कहने लगे-'अहो! ये मूर्ख गोविन्द भगवान्को भी नहीं जानते, जिन्होंने केवल एक दिनकी प्रसन्नतासे इस राजाको सब कुछ प्रदान किया था।' चौथे दिन अगस्त्य मुनिने अपने दोनों हाथोंको ऊपर उठाकर फिर कहा'जगत्प्रभो! आपको साधुवाद-धन्यवाद है, स्त्रियाँ धन्य हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य! तुम्हें पुनःपुनः धन्यवाद है। भद्राश्व! तुम्हें धन्यवाद है। हे अगस्त्य! तुम भी धन्य हो। प्रह्लाद एवं महाव्रती ध्रुव! तुम सभी धन्य हो।' इस प्रकार उच्च स्वरसे कहकर अगस्त्य मुनि राजा भद्राश्वके सामने नाचने लगे। फिर तो ऐसे कार्यमें संलग्न अगस्त्य मुनिको देखकर रानीसहित उस नरेशने मुनिसे पूछा-'ब्रह्मन्! आपके इस हर्षका क्या कारण है? आप क्यों इस प्रकार नृत्य कर रहे हैं।'

मुनिवर अगस्त्यने कहा-राजन्! बड़े आश्चर्यकी बात है। तुम कितने अज्ञानी हो; साथ ही तुम्हारा अनुगमन करनेवाले ये मन्त्री, पुरोहित और अन्य अनुजीवी भी मूर्ख ही हैं, जो मेरी बात समझ नहीं पाते। इस प्रकार अगस्त्य मुनिके कहनेपर राजा भद्राश्वने हाथ जोड़कर कहा-'ब्रह्मन्! आपके मुखसे उच्चरित पहेलीको हम नहीं समझ पा रहे हैं। अतः महाभाग! यदि आप अनुग्रह करना चाहते हों तो मुझे बतानेकी कृपा करें।'

अगस्त्यजी बोले-राजन्! पूर्वजन्ममें यह रानी किसी नगरमें हरिदत्त नामक एक वैश्यके घरमें दासीका काम करती थी। उस समय भी तुम्हीं इसके पति थे। हरिदत्तके ही यहाँ तुम भी सेवावृत्तिसे एक कर्मचारीका काम करते थे। एक समयकी बात है, आश्विनमासके शुक्लपक्षकी द्वादशीका व्रत नियमपूर्वक करनेके लिये वह वैश्य तत्पर हुआ। स्वयं भगवान् विष्णुके मन्दिरमें जाकर पुष्प एवं धूप आदिसे उन प्रभुकी पूजा की। तुम दोनों-स्त्री एवं पुरुष उस वैश्यकी सुरक्षाके लिये साथ थे। पूजनोपरान्त वह वैश्य तो अपने घर लौट आया। महामते! दीपक बुझ न जायँ, इसलिये तुम दोनोंको वहीं रहनेकी आज्ञा दे दी। उस वैश्यके चले जानेपर तुमलोग दीपकोंको भलीभाँति जलाकर वहीं बैठे रहे। राजन् ! तुमलोग पूरी एक रात-जबतक सबेरा न हुआ, तबतक वहाँसे नहीं हटे। कुछ दिनोंके बाद -आयु समाप्त हो जानेके कारण तुम दोनों स्त्रीपुरुषोंकी मृत्यु हो गयी। उस पुण्यके प्रभावसे राजा प्रियव्रतके घर तुम्हारा जन्म हुआ और तुम्हारी यह पत्नी, जो उस जन्ममें वैश्यके यहाँ दासीका काम करती थी, अब रानी हुई है। वह दीपक दूसरेका था। भगवान् विष्णुके मन्दिरमें केवल उसे प्रज्वलित रखनेका काम तुम्हारा था। यह उसीका ऐसा फल है। फिर जो अपने द्रव्यसे श्रीहरिके सामने दीपक प्रज्वलित करे, उसका जो पुण्य है, उसकी संख्या तो की ही नहीं जा सकती। इसीसे मैंने कहा-'राजन्! आप धन्य हैं।' आप धन्य हैं!' सत्ययुगमें पूरे वर्षतक, त्रेतायुगमें आधे वर्षतक तथा द्वापरयुगमें तीन महीनोंतक भक्तिपूर्वक श्रीहरिकी पूजा करनेसे विद्वान् पुरुष जो फल प्राप्त करते हैं, कलियुगमें उतना फल केवल 'नमो नारायणाय' कहकर प्राप्त किया जा सकता है। इसमें कोई संशय नहीं। इसीलिये मेरे मुखसे निकल गया, 'यह सारा जगत् वञ्चित हो गया है। मैंने केवल भक्तिकी बात कही है। भगवान् विष्णुके सम्मुख दूसरेके जलाये दीपकको प्रचलित कर देनेमात्रसे ऐसा फल प्राप्त हुआ है। अब जो मैंने मूर्ख होनेकी बात कही, इसका अभिप्राय इतना ही है कि भगवान्के मन्दिरमें दीप-दान करनेके महत्त्वको ये लोग नहीं जानते। मैंने ब्राह्मणों और राजाओंको धन्यवाद इसलिये दिया है कि जो अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा भक्तिके साथ उक्त विधिसे श्रीहरिकी उपासना करते हैं, वे धन्यवादके पात्र होते हैं। मुझे उन प्रभुके अतिरिक्त इस जगत्में अन्य कुछ भी नहीं दीखता, अतः मैंने अपनेको भी धन्य कहा। इस स्त्रीको तथा तुम्हें धन्य बतानेका कारण यह है कि यह एक वैश्यके घर सेविका थी और तुम भी सेवाका ही कार्य करते थे। स्वामीके चले जानेपर तुमलोगोंने भगवान्के मन्दिरमें दीपकको प्रज्वलित रखा। अतः यह स्त्री और इससे बढ़कर तुम धन्यवादके पात्र हो। प्रह्लादके शरीरमें आसुर भावनाके बीज थे, फिर भी परमपुरुष परमात्माको छोड़कर उनकी दृष्टि में अन्य कोई सत्ता न थी, अतः मैंने उन्हें धन्य कहा है। ध्रुवका जन्म राजाके घरमें हुआ था। बचपनमें ही वे वनमें चले गये और वहाँ भगवान् विष्णुकी आराधनाकर सर्वोत्कृष्ट सुन्दर स्थान प्राप्त किया। महाराज! इसलिये मैंने ध्रुवको भी साधु कहा है।  अगस्त्यजीसे राजा भद्राश्वने संक्षेपरूपसे उपदेश देनेकी प्रार्थना की थी; अतः मुनिने कहा'राजन्। अब कार्तिककी पूर्णिमाका पर्व आ गया है। मैं पुष्करक्षेत्र जा रहा हूँ'-यों कहकर वे चल पड़े। पुष्कर जाते समय ही वे राजा भद्रावके महलपर रुके थे और उन मुनिवरने राजाको वहीं द्वादशीव्रत करनेका उपदेश दिया था। चलते समय मुनि राजाको पुत्र-प्राप्तिका आशीर्वाद दे गये। राजा भद्राश्वने भी भगवान् पद्मनाभकी द्वादशीका व्रत किया। फलतः वे पुत्र-पौत्र और उत्तम-सेउत्तम भोगोंसे सम्पन्न होकर अन्तमें भगवान् पद्मनाभके धामको प्राप्त हुए।