वराह महा पुराण
32-अमावास्या तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें पितरोंकी उत्पत्तिका कथन
महातपाजी कहते हैं-राजन्! अब मैं पितरोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग कहता हूँ, तुम उसे सुनो। पूर्व समयकी बात है-प्रजापति ब्रह्माजी अनेक प्रकारकी प्रजाओंका सृजन करनेके विचारसे मनको एकाग्र करके बैठ गये। फिर उनके मनसे तन्मात्राएँ*(*पञ्चज्ञानेन्द्रियों के विषय शब्द-स्पर्शादि ही तन्मात्राएँ हैं। (इनका प्रयोग संस्कृतमें क्लीब एवं पुंलिङ्गमें दृष्ट है।)) बाहर निकलीं। उन्होंने उन सबको प्रधानता दी और 'इनको किन रूपोंसे सुशोभित करें'–यों विचारने लगे। कारण, वे सभी ब्रह्माजीके शरीरमें पहलेसे ही थी और वहींसे पुनः ये धूम्रवर्णवाली तन्मात्राएँ प्रकट हुई थीं। फिर वे चमककर देवताओंसे कहने लगीं-'हम सोमरस पीना चाहती हैं। साथ ही उनके मनमें ऊपरके लोकमें जानेकी इच्छा हुई। उन सबोंने सोचा-'हम आकाशमें आसन जमाकर वहीं तपस्या करें।' ऊपर जानेके लिये वे मुख उठाकर तिरछे मार्गका अवलम्बन करना ही चाहती थीं, इतने में उन्हें देखकर ब्रह्माजीने कहा-'समस्त गृहाश्रमियोंका कल्याण करनेके लिये आपलोग पितर होकर रहें।' ये जो ऊपर मुख करके जाना चाहते हैं, इनका नाम 'नान्दीमुख' होगा। इस प्रकार कहकर ब्रह्माजीने उनके मार्गका भी निरूपण कर दिया। राजन्! उस समय ब्रह्माजीने उन पितरोंके लिये मार्ग सूर्यका दक्षिणायनकाल बता दिया। इस प्रकार प्रजाकी सृष्टि कर वे जब मौन हो गये, तब पितरोंने उनसे कहा-'भगवन्! हमें जीविका देनेकी कृपा कीजिये, जिससे सुख प्राप्त कर सकें।'
ब्रह्माजी बोले-तुम्हारे लिये अमावास्याकी तिथि ही दिन हो। उस तिथिमें मनुष्य जल,तिल और कुशसे तुम्हारा तर्पण करेंगे। इससे तुम परम तृप्त हो जाओगे। इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। उस अमावास्या तिथिमें तिल देनेका विधान है। पितरोंके प्रति श्रद्धा रखनेवाला जो पुरुष तुम्हारी उपासना करेगा, उसपर अत्यन्त संतुष्ट होकर यथाशीघ्र वर देना तुम्हारा परम कर्तव्य है।