वराह महा पुराण
52-53-अगस्त्य-गीतामें पशुपालका चरित्र
अगस्त्यजी कहते हैं-राजन्! इस प्रकार पशुपालसंज्ञक परम प्रभुने एक पुरुषका सृजन किया और उसे शासनकी आज्ञा दे दी। स्वतन्त्र होनेके कारण वह पुरुष राजा बन गया। उस पुत्रमें तीन रंग थे। उसने अहंकार नामक पुत्र उत्पन्न किया। उस पुत्रसे अवबोधस्वरूपिणी एक कन्या उत्पन्न हुई। उस कन्याने ज्ञान प्रदान करनेकी योग्यतावाले एक सुन्दर पुत्रको जन्म दिया। उस पुत्रके पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें सभी रूपोंका समावेश था और वे विषयोंको भोगनेकी रुचि रखते थे, जो इन्द्रिय कहलाये। अब सबने रहनेका एक सुन्दर भवन बना लिया। उनका वह मन्दिर ऐसा था, जिसमें नौ दरवाजे हुए और चारों ओर जानेवाला एक स्तम्भ हुआ। जलसे सम्पन्न हजारों नदियाँ उसे सुशोभित कर रही थीं। राजा पशुपाल साकार रूप धारणकर अब पुरुषके रूपमें विराजने लगे। वेद और छन्द उन्हें स्मरण हो आये। फिर उन वेदोंमें प्रतिपादित नियम एवं यज्ञ-इन सबकी उन्होंने व्यवस्था की।
राजन्! किसी समयकी बात है-राजा पशुपालके मनमें आनन्दके अभावका अनुभव हुआ। अब उन्होंने संसारकी सृष्टि करनेकी इच्छा की और योगमायाका आश्रय लेकर एक ऐसा पुत्र प्रकट किया, जिसके चार मुख, चार भुजाएँ, चार वेद और चार पथ हुए। महामते! समुद्र, वन और तृणसे लेकर हाथीप्रभृति पशुतकमें उनका प्रवेश है।
अगस्त्यजी कहते हैं-राजन्! प्रस्तुत कथा प्रायः मेरे, तुम्हारे तथा अखिल जन्तुओंके शरीरमें समान रूपसे चरितार्थ होती है। पशुपालसे*(* यहाँ पशुपाल परब्रह्म परमात्मा तथा चार मुखवाले ब्रह्मा हैं।) जिसकी उत्पत्ति हुई, उसके चार चरण और चार मुख थे। उन्हींको इस कथाका उपदेष्टा एवं प्रवर्तक कहा गया है। सत्यस्वरूप स्वर ही उसका पुत्र है। उसने जो कुछ कहा है, वह धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-इन चारोंका साधन है। पुरुषोंका इन चारोंसे सम्बन्ध है। भक्तिपूर्वक उपासना करनेवालेको ये सुलभ हो जाते हैं। इनमें जो प्रथम धर्म है, उसका दूसरा रूप वृषभका है। उसके चार सींग हैं। उसीका अर्थ और काम भी अनुसरण करते हैं। चौथी मुक्ति है। जो भक्तिके साथ उसका आदर करता है, उसे वह परब्रह्म परमात्मा सुलभ हो जाता है। इस ब्रह्मका ही सनातन अंश मनुष्योंमें व्यक्त रूपसे विराजमान है। अतः मनुष्य प्रथम अवस्थामें ब्रह्मचारीके रूपमें रहे। दूसरी अवस्थामें धर्मका आश्रय लेकर सेवक-वर्गका भरण-पोषण करना चाहिये। तीसरी अवस्था वानप्रस्थ बतायी गयी है। इस अवस्थामें भी उसका अन्त:करण धर्मयुक्त होना आवश्यक है।
इसके पश्चात् उस परब्रह्मने-'अहमस्मि' केवल मैं ही हूँ-यों कहा। फिर वह एक दूसरे ही
चार, एक एवं दो प्रकारके रूपसे विराजने लगा। भिन्न प्रकारके उत्पन्न होनेके कारण उसकी भुजाएँ भी उसीका अनुसरण करने लगीं। सर्वप्रथम चार मुखवाले ब्रह्माने देखा कि कुछ प्रजाएँ नित्य और कुछ अनित्य हैं। राजन्! तब ब्रह्माके मनमें विचार उठा कि मैं कैसे पिताजीसे मिलूँ। क्योंकि मेरे पिताजी एक महान् पुरुष हैं। उनमें जो गुण हैं, वे उनकी इन संतानोंमें किसीमें भी दृष्टिगोचर नहीं होते हैं। स्वरकी दृष्टिके प्रकरणमें एक ऐसी श्रुति है कि जो पिताके पुत्रका पुत्र है, उसे अपने पितामहके नामका संरक्षक होना चाहिये। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं है। कहीं भी ऐसा अवसर मिलना आवश्यक है, जहाँ पिताका भाव दीख पड़े।
अब मुझे क्या करना चाहिये-ब्रह्माजी यह सोच ही रहे थे कि परमपिता परमात्माके मनमें रोष आ गया। अब ब्रह्माने स्वर मथना आरम्भ किया, जिससे स्वरका सिर प्रकट हो गया। उसकी आकृति नारियलके फलके समान थी। ब्रह्माजीके प्रयाससे वह स्वर फिर विभक्त हो गया। अब वे प्राण, अपान, उदान, समान एवं व्यान रूपसे सामने आ गये। अब ब्रह्माने उन्हें ठहरनेका स्थान बता दिया। - इस प्रकार अथक परिश्रम करनेके पश्चात् जब समर्थ ब्रह्माने पुनः प्राणि-शरीरपर दृष्टि डाली तो उन्हें शरीरके भीतर अपने पिता परब्रह्म परमात्माकी झाँकी दृष्टिगोचर हुई। सम्पूर्ण प्राणियोंमें त्रसरेणुके समान सूक्ष्म रूप धारण कर वे सर्वत्र विराजमान थे। वे ही सर्वोपरि विराजमान एवं सर्वव्यापक हैं। सम्पूर्ण जगत्की सृष्टिसे सम्बन्ध रखनेवाला यह इतिहास अपना प्रथम स्थान रखता है। जो इसे तत्त्वसे जानता है, उसे उत्तम कर्म करनेकी योग्यता प्राप्त हो जाती है।