वराह महा पुराण
20-तृतीया तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें हिमालयकी पुत्रीरूपमें गौरीकी उत्पत्तिका वर्णन और भगवान् शंकरके साथ उनके विवाहकी कथा ।
मुनिवर महातपा कहते हैं-राजन्! जब भगवान् रुद्र कैलासपर निवास करने लगे तो कुछ समय बाद अपने पिता दक्षसे प्राणपति महादेवके साथ वैरका प्रसङ्ग गौरीको स्मरण हो आया। अब सहसा उनके मनमें रोषका भाव उत्पन्न हो गया। वे सोचने लगीं-'मेरे पिता दक्षने इन देवाधिदेवको यज्ञ में भाग न देकर कितना बड़ा अपराध किया था, जिसके फलस्वरूप मेरे पिताका यज्ञके निमित्त बनाया हुआ नगर तथा उनके यज्ञका भी विध्वंस करना पड़ा। अतएव शिवके अपराधी पितासे उत्पन्न शरीरका मुझे त्याग कर देना चाहिये और तपस्याद्वारा इन महेश्वरकी आराधना दूसरा जन्म ग्रहण कर इनकी अर्धाङ्गिनी बनकर मुझे इन्हें प्राप्त करना चाहिये। पिता दक्षमें तो बान्धवोचित प्रेमका लेश भी नहीं रह गया है। अतएव अब उनके घर मेरा जाना भी नहीं हो सकता।'
इस प्रकार भलीभाँति विचार करके परम सुन्दरी गौरी तप करनेके उद्देश्यसे गिरिराज हिमालयपर चली गयीं। दीर्घकालतक तपस्या करके उन्होंने अपने शरीरको सुखा डाला। फिर योगाग्निके द्वारा अपने शरीरको दग्धकर वे पर्वतराज हिमालयकी पुत्रीके रूपमें प्रकट हुईं और उमा तथा महाकाली आदि उनके नाम हुए। हिमवान्के घरमें परम सुन्दररूपसे सुशोभित होकर वे अवतीर्ण हुई कि फिर 'भगवान् रुद्र ही मुझे पतिरूपसे प्राप्त हों।' इस संकल्पसे त्रिलोचन भगवान् शंकरका स्मरण करते हुए उन्होंने पुनः कठोर तपस्या आरम्भ कर दी। इस प्रकार जब गिरिराज हिमालयपर दीर्घकालतक तपद्वारा उन्होंने आराधना की तब ब्राह्मणका वेष धारण करके भगवान् शिव वहाँ पधारे। उस समय उनका वृद्ध शरीर था और सभी अङ्ग शिथिल हो रहे थे। साथ ही वे पग-पगपर गिरते-पड़ते चल रहे थे। बड़ी कठिनाईसे वे पार्वतीके पास पहुँचकर बोले'भद्रे ! मैं अत्यन्त भूखा ब्राह्मण हूँ, मुझे कुछ खाने योग्य पदार्थ दो।'
उनके इस प्रकार कहनेपर परम कल्याणमयी शैलेन्द्रनन्दिनी उमाने उन ब्राह्मणसे कहा-'विप्रवर! मैं आपको भोजनार्थ फल आदि पदार्थ दे रही हैं। आप यथाशीघ्र स्नानकर इच्छानुसार उन्हें ग्रहण करें।' उनके यों कहनेपर वे ब्राह्मणदेवता पासमें ही बहती हुई गङ्गाके जलमें स्नान करनेके लिये उतरे। उन ब्राह्मण-वेषधारी शिवने स्नान करते समय ही स्वयं मायास्वरूप एक भयंकर मकरका रूप धारण कर उन ब्राह्मणका (अपना) पैर पकड़ लिया। फिर पार्वतीको यह सब लीला दिखाते हुए कहने लगे–'दौड़ो-दौड़ो, मैं भारी विपत्तिमें पड़ गया हूँ। इस मकरसे तुम मेरे प्राणोंकी रक्षा करो और जबतक इसके द्वारा मैं नष्ट-भ्रष्ट नहीं कर दिया जाता, तभीतक तुम मुझे बचा लो।'
ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर पार्वतीने सोचा'गिरिराज हिमालय तो मेरे पिता हैं। उनका मैं पितृभावसे स्पर्श करती हूँ और भगवान् शंकरका पति-भावसे! पर मैं तपस्विनी कैसे इन ब्राह्मणदेवताको स्पर्श करूँ? परंतु इस समय जलमें ग्राहद्वारा पकड़े जानेपर भी यदि मैं इन्हें बाहर नहीं खींचती तो नि:संदेह मुझे ब्रह्महत्याका दोष लगेगा। दूसरी बात यह है कि अन्य धर्मजनित त्रुटियों या प्रत्यवायोंका प्रायश्चित्तद्वारा शोधन भी सम्भव है; किंतु इस ब्रह्महत्यादोषका तो शोधक कोई प्रायश्चित्त भी नहीं दीखता।' इस प्रकार मन-ही-मन कह वे तुरंत दौड़कर वहाँ पहुँच गयीं और हाथसे पकड़कर ब्राह्मणको जलसे बाहर खींचने लगीं। इतनेमें वे देखती क्या हैं कि जिन भूतभावन शंकरकी आराधनाके लिये वे तपस्या कर रही थीं, स्वयं वे शंकर ही उनके हाथमें आ गये हैं। इस प्रकार उन्हें देखकर वे लज्जित हो गयीं और पूर्वसमयका त्याग उन्हें स्मरण हो आया। अत्यन्त लज्जाके कारण उन परम सुन्दरी उमाके मुखसे भगवान् शंकरके प्रति कोई वचन नहीं निकल रहा था। वे बिल्कुल मौन हो गयीं। इसपर भगवान् रुद्र मुसकराते हुए कहने लगे-'भद्रे! तुम मेरा हाथ पकड़ चुकी हो, फिर मेरा त्याग करना तुम्हारे लिये उपयुक्त नहीं है। कल्याणि! तुम यदि मेरा पाणिग्रहण निष्फल कर दोगी तो मुझे अब अपने भोजनके लिये ब्रह्मपुत्री सरस्वतीसे कहना पड़ेगा।'
'यह उपहासकी परम्परा आगे न बढ़े'-ऐसा सोचकर कुछ लज्जित-सी हुई पार्वती कहने लगीं-'देवाधिदेव! महेश्वर! आप तीनों लोकोंके स्वामी हैं। आपको पानेके लिये मेरा यह प्रयत्न है। पूर्वजन्ममें भी आप ही मेरे पतिदेव थे। इस जन्ममें भी आप ही मेरे पति होंगे, कोई दूसरा नहीं। किंतु अभी मेरे संरक्षक पिता पर्वतराज हिमालय हैं, अब मैं उनके पास जाती हैं। उन्हें जताकर आप विधिपूर्वक मेरा पाणिग्रहण करें।'
इस प्रकार कहकर परम सुन्दरी भगवती उमा अपने पिता हिमालयके पास गयीं और हाथ जोड़कर उनसे कहा-'पिताजी! मुझे अनेक लक्षणोंसे प्रतीत होता है कि पूर्वजन्ममें भगवान् रुद्र ही मेरे पति रहे हैं। उन्होंने ही दक्षके यज्ञका विध्वंस किया था। वे ही संसारके संरक्षक रुद्र ब्राह्मणका वेष धारण कर तपोवनमें मेरे पास आये और मुझसे भोजनकी याचना की। 'आप स्नान कर आइये'-मेरी इस प्रेरणापर वे वृद्ध ब्राह्मणका वेष बनाये हुए गङ्गामें गये। फिर वहाँ मकरद्वारा ग्रस्त हो जानेपर उन्होंने मुझे सहायताके लिये पुकारा। परंतु पिताजी! मुझे ब्रह्महत्या न लग जाय, इस भयसे मैंने अपने हाथसे उन्हें पकड़ लिया। मेरे पकड़ते ही वे अपने वास्तविक रूपमें प्रकट हो गये और कहने लगे-'देवि! यह तो पाणिग्रहण है। तपोधने! इसमें तुम्हें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये।' उनके ऐसा कहनेपर उनसे स्वीकृति लेकर मैं आपसे पूछने आयी हूँ। अत: इस अवसरपर मेरा जो कर्तव्य हो, उसे आप शीघ्र बतानेकी कृपा कीजिये।' पार्वतीकी ऐसी बात सुनकर हिमालय बड़े प्रसन्न हए और अपनी पुत्रीसे कहने लगे'सुमुखि! मैं आज संसारमें अत्यन्त धन्य हूँ, जो स्वयं भगवान् शंकर मेरे जामाता होनेवाले हैं। तुम्हारे द्वारा मैं सचमुच संततिवान् बन गया। पुत्रि! तुमने मुझको देवताओंका सिरमौर बना दिया है। पर क्षणभर रुकना। मेरे आनेतक थोड़ी प्रतीक्षा करना।' इस प्रकार कहकर पर्वतराज हिमालय सम्पूर्ण देवताओंके पितामह ब्रह्माजीके पास गये। वहाँ उनका दर्शनकर गिरिराजने नम्रतापूर्वक कहा'भगवन् ! उमा मेरी पुत्री है। आज मैं उसे भगवान् रुद्रको देना चाहता हूँ।' इसपर श्रीब्रह्माजीने भी उन्हें 'दे दो' कहकर अनुमति दे दी। ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर पर्वतराज हिमालय अपने घरपर गये और तुरंत ही तुम्बुरु, नारद, हाहा और हूहूको बुलाया। फिर किन्नरों, असुरों और राक्षसोंको भी सूचना दी। अनेक पर्वत, नदियाँ, वृक्ष, ओषधिवर्ग तथा छोटे-बड़े अन्य पाषाण भी मूर्ति धारणकर भगवान् शंकरके साथ होनेवाले पार्वतीके विवाहको देखनेके लिये वहाँ आये। उस विवाहमें पृथ्वी ही वेदी बनी और सातों समुद्र ही कलश। सूर्य एवं चन्द्रमा उस शुभ अवसरपर दीपकका कार्य कर रहे थे तथा नदियाँ जल ढोने-परसनेका काम कर रही थीं। जब इस प्रकार सारी व्यवस्था हो गयी, तब गिरिराज हिमालयने मन्दराचलको भगवान् शंकरके पास भेजा। भगवान् शंकरकी स्वीकृतिसे मन्दराचल तत्काल वापस आ गये। फिर तो भगवान् शंकरने विधिपूर्वक उमाका पाणिग्रहण किया। उस विवाहके उत्सवपर पर्वत और नारद-ये दोनों गान कर रहे थे। सिद्धोंने नाचनेका काम पूरा किया था। वनस्पतियाँ अनेक प्रकारके पुष्पोंकी वर्षा कर रही थीं तथा सुन्दर रूपवती अप्सराएँ उच्च स्वरसे गा-गाकर नृत्य करने में संलग्न थीं। उस विवाह-महोत्सवमें लोकपितामह चतुर्मुख ब्रह्माजी स्वयं ब्रह्माके स्थानपर विराजमान थे। उन्होंने प्रसन्न कहा-'पुत्रि! संसारमें तुम-जैसी पत्नी और शंकर-सरीखे पति सबको सुलभ हों।' भगवान् शंकर और भगवती उमा-दोनों एक साथ बैठे थे। उनसे इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी अपने धामको लौट आये।
भगवान् वराह कहते हैं-पृथ्वि! रुद्रका प्राकट्य, गौरीका जन्म तथा विवाह-यह सारा प्रसङ्ग राजा प्रजापालके पूछनेपर परम तपस्वी महातपा ऋषिने उन्हें जैसे सुनाया था, वह सम्पूर्ण वृत्तान्त मैंने तुम्हें बता दिया। देवी गौरीके जन्म,विवाहादि-सभी कार्य तृतीया तिथिको ही सम्पन्न हुए थे, अतएव तृतीया उनकी तिथि मानी जाती है। उस तिथिको नमक खाना सर्वथा निषिद्ध है। जो स्त्री उस दिन उपवास करती है, उसे अचल सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। दुर्भाग्यग्रस्त स्त्री या पुरुष तृतीया तिथिको लवणके परित्यागपूर्वक इस प्रसङ्गका श्रवण करे तो उसको सौभाग्य, धन-सम्पत्ति और मनोवाञ्छित पदार्थों की प्राप्ति होती है, उसे जगत्में उत्तम स्वास्थ्य, कान्ति और पुष्टिका भी लाभ होता है।