22-सर्पोकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग और पञ्चमी तिथिकी महिमा

पृथ्वीने पूछा-मेरा उद्धार करनेवाले भगवन्! आपके श्रीविग्रहका स्पर्श पाकर महान् विक्रमशाली सर्प कैसे मूर्तिमान् बन गये तथा उन्हें आपने क्यों बनाया?

भगवान् वराह बोले-वसुंधरे! गणपतिके जन्मका वृत्तान्त सुननेके पश्चात् राजा प्रजापालने यही प्रसङ्ग बड़ी मीठी वाणीमें उत्तमव्रती महातपासे पूछा था।

राजा प्रजापालने पूछा-भगवन्! कश्यपजीके वंशसे सम्बन्धित नाग तो बड़े ही दुष्ट प्रकृतिके थे। फिर उन्हें विशाल शरीर धारण करनेका अवसर कैसे मिल गया? यह प्रसङ्ग आप मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।

मुनिवर महातपाजी कहते हैं-राजन्! मरीचि ब्रह्माजीके प्रथम मानस पुत्र थे। उनके पुत्र कश्यपजी हुए। मन्द मुसकानवाली दक्षकी पुत्री कद्रू उनकी भार्या हुई। उससे कश्यपजीके अनन्त, वासुकि, महाबली कम्बल, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शङ्क, कुलिक और पापराजिल आदि नामोंसे विख्यात अनेक पुत्र हए। राजेन्द्र! ये प्रधान सर्प कश्यपजीके पुत्र हैं। बादमें इन सोकी संतानोंसे यह सारा संसार ही भर गया। वे बड़े कटिल और नीच कर्ममें रत थे। उनके मुँहमें अत्यन्त तीखा विष भरा था। वे मनुष्योंको अपनी दृष्टिमात्रसे या काटकर भी भस्म कर सकते थे। राजन्! उनका दंश शब्दकी ही तरह तीव्रगामी था। उससे भी मनुष्योंकी मृत्यु हो जाती। इस प्रकार प्रजाका प्रतिदिन दारुण संहार होने लगा। यों अपना भीषण संहार देखकर प्रजावर्ग एकत्र होकर सबको शरण देनेमें समर्थ परम प्रभु भगवान् ब्रह्माजीकी शरणमें गये। राजन्! इसी उद्देश्यको सामने रखकर प्रजाओंने कमलपर प्रकट होनेवाले ब्रह्माजीसे कहा-'भगवन्! आपमें असीम शक्ति है। इन तीखे दाँतोंवाले सोसे आप हमारी रक्षा करें। इनकी दृष्टि पड़ते ही मनुष्य तथा पशुसमूह भस्म हो जाते हैं-यह प्रतिदिनकी बात हो गयी है। भगवन्! इन सर्पोद्वारा आपकी सृष्टिका संहार हो रहा है। महामते! आप इसकी जानकारी प्राप्तकर ऐसा प्रयत्न करें कि यह दुःखद परिस्थिति शीघ्र दूर हो जाय।' .

ब्रह्माजी बोले-प्रजापालो! तुम भयसे घबड़ा गये हो। मैं तुम्हारी रक्षा अवश्य करूँगा। पर अब तुम सभी अपने-अपने स्थानपर चलो।

अव्यक्तमूर्ति ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर वे प्रजाएँ वापस आ गयीं। उस समय ब्रह्माजीके मनमें असीम क्रोध उत्पन्न हो गया। उन्होंने वासुकि प्रभृति प्रमुख सर्पोको बुलाया और उन्हें शाप दे दिया।

ब्रह्माजीने कहा-नागो! तुम मेरे द्वारा उत्पन्न किये हुए मनुष्योंकी मृत्युके कारण बन गये हो। अतः आगे स्वायम्भुव मन्वन्तरमें तुम्हारा अपनी ही माताके शापद्वारा घोर संहार होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।

जब ब्रह्माजीने इस प्रकार उन श्रेष्ठ सोसे कहा तब सोके शरीरमें भयसे कँपकँपी मच गयी। वे उन प्रभुके पैरोंपर गिर पड़े और ये वचन कहे। बोले-भगवन्! आपने ही तो कुटिल जातिमें हमारा जन्म दिया है। विष उगलना, दुष्टता करना, किसी वस्तुको देखकर उसे नष्ट कर देना-यह हमारा अमिट स्वभाव आपके द्वारा ही निर्मित है। अब आप ही उसे शान्त करनेकी कृपा करें।

ब्रह्माजीने कहा-मैं मानता हूँ, तुम्हें मैंने उत्पन्न किया है और तुममें कुटिलता भी भर दी है, पर इसका अभिप्राय यह नहीं है कि तुम निर्दय होकर नित्य मनुष्योंको खाया करो।

सर्पो ने कहा-भगवन्! आप हमें अलगअलग रहनेके लिये कोई सुनिनाग श्चित स्थानकी कर दीजिये और हमारे द्वारा डॅसे जानेकी स्थिति एवं नियम भी बता दें।

राजन्! नागोंकी यह बात सुनकर ब्रह्माजीने कहा-सर्पो! तुमलोग मनुष्योंके साथ भी रह सको-इसके लिये मैं स्थानका निर्णय कर देता हूँ। तुम सबलोग मनको एकानकर मेरी आज्ञा सुनो-'सुतल, वितल और पाताल-ये तीन लोक कहे गये हैं। तुम्हें रहनेकी इच्छा हो तो वहीं निवास करो। वहाँ मेरी आज्ञा तथा व्यवस्थासे अनेक प्रकारके भोग तुम्हें भोगनेके लिये प्राप्त होंगे। रातके सातवें पहरतक तुम्हें वहाँ रहना है। फिर वैवस्वत मन्वन्तरके आरम्भमें कश्यपजीके यहाँ तुम्हारा जन्म होगा। देवतालोग तुम्हारे बन्धुबान्धव होंगे। बुद्धिमान गरुडसे तम्हारा भाईपनेका सम्बन्ध होगा। उस समय कारणवश तुम्हारी सारी संतान (जनमेजयके यज्ञमें) अग्निके द्वारा जलकर स्वाहा हो जायगी। इसमें निश्चय ही तुम्हारा कोई दोष न होगा। जो सर्प अत्यन्त दुष्ट और उच्छृङ्खल होंगे, उन्हींकी उस शापसे जीवनलीला समाप्तव्यवस्था  होगी। जो ऐसे न होंगे, वे जीवित रहेंगे। हाँ, अपकार करनेपर या जिनका काल ही आ गया हो, उन मनुष्योंको समयानुसार निगलने या काटनेके लिये तुम स्वतन्त्र हो। गरुडसम्बन्धी मन्त्र, औषध और बद्ध गारुडमण्डलद्वारा दाँत कुण्ठित करनेकी कलाएँ जिन्हें ज्ञात होंगी, उनसे निश्चय ही तुम्हें डरकर रहना चाहिये, अन्यथा तुम लोगोंका विनाश निश्चित है।'

ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर वे सम्पूर्ण सर्प पृथ्वीके नीचे पाताललोकमें चले गये। इस प्रकार ब्रह्माजीसे शाप एवं वरदान पाकर वे पातालमें आनन्दपूर्वक निवास करने लगे। ये सारी बातें उन नाग महानुभावोंके साथ पञ्चमी तिथिके दिन ही घटित हुई थीं। अतः यह तिथि धन्य, प्रिय, पवित्र और सम्पूर्ण पापोंका संहारक सिद्ध हो गयी। इस तिथिमें जो खट्टे पदार्थके भोजनका परित्याग करेगा और दूधसे नागोंको स्नान करायेगा, सर्प उसके मित्र बन जायेंगे।