42-जामदग्न्य-द्वादशीव्रत

दुर्वासाजी कहते हैं-इसी प्रकार मनुष्य (परशुराम-द्वादशीका व्रती साधक) वैशाखमासके शुक्लपक्षमें पूर्वोक्त नियमानुसार संकल्पकर विधिके साथ मृत्तिका लगाकर स्नान करे और फिर देवालयमें जाय। व्रती पुरुषको भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीहरिके अवतार परशुरामकी-'ॐ जामदग्न्याय नमः' से चरण, 'ॐ सर्वधारिणे नमः'से उदर, 'ॐ मधुसूदनाय नमः'से कटिप्रदेश, 'ॐ श्रीवत्सधारिणे नमः'से जङ्घा, 'ॐ क्षत्रान्तकाय नमः'से भुजाओं, 'ॐ शितिकण्ठाय नमः'से केहुनी, 'ॐ पाञ्चजन्याय नमः 'से शङ्ख, 'ॐ सुदर्शनाय नमः 'से चक्र तथा 'ॐ ब्रह्माण्डधारिणे नमः'से शिरोदेशकी पूजा करे। इसके बाद पहलेकी ही तरह सामने एक कलश स्थापित करे। उसके ऊपर भगवान् परशुरामकी मूर्ति स्थापितकर पूर्वोक्त नियमानुसार दो वस्त्रोंसे उसे आच्छादित करे। कलशपर बाँसके बने पात्रमें परशुरामजीकी आकृतिवाली सुवर्णकी प्रतिमा स्थापित करे। प्रतिमाके दाहिने हाथमें फरसा धारण कराये, फिर उसकी पुष्प, चन्दन एवं अर्घ्य आदि उपचारोंसे पूजा करे। भगवान्के सामने श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पूरी रात जागरण करे। प्रात:काल सूर्योदय होनेपर स्वच्छ वेलामें वह प्रतिमा ब्राह्मणको दे दे। इस प्रकार नियमपूर्वक व्रत करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो। प्राचीन समयकी बात है-वीरसेन नामके एक पराक्रमी तथा भाग्यशाली राजा थे, जो पुत्रप्राप्तिके लिये तीव्र तपस्या कर रहे थे। महर्षि याज्ञवल्क्य का आश्रम वहाँसे निकट ही था, अत: एक दिन वे उन्हें देखने आये। उन तेजस्वी ऋषिको पास आते देखकर राजा वीरसेन हाथ जोड़कर खड़े हो गये और उनका विधिवत् स्वागत किया। तत्पश्चात् याज्ञवल्क्यमुनिने पूछा'धर्मज्ञ राजन्! तुम्हारे तप करनेका क्या प्रयोजन है? तुम कौन-सा कार्य करना चाहते हो?'

राजा वीरसेनने कहा-महर्षे ! मैं पुत्रहीन हूँ। मुझे कोई संतान नहीं है। द्विजवर! इस कारण तपस्याद्वारा अपने शरीरको मैं सुखाना चाहता हूँ। याज्ञवल्क्यजी बोले-राजन्! तपस्यामें बड़ा क्लेश उठाना पड़ता है, अत: तुम यह विचार छोड़ दो। मैं तुम्हें अत्यन्त सरल उपाय बताता हूँ। उसे करनेसे तुम्हें अवश्य पुत्र प्राप्त हो जायगा। फिर उन्होंने उस यशस्वी राजाको इस वैशाख मासके शुक्लपक्षमें होनेवाला यही परशुरामद्वादशीव्रत बतलाया। पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाले राजा वीरसेनने भी पूर्ण विधिके साथ यह व्रत सम्पन्न किया। फलस्वरूप उन्हें राजा नल-जैसा परम धार्मिक पुत्र प्राप्त हुआ, जिन 'पुण्यश्लोक' राजाकी कीर्ति अबतक संसारमें गायी जाती है। यह तो इस व्रतके फलका प्रासङ्गिक उल्लेखमात्र हुआ, वस्तुतः जो यह व्रत करता है, उसे सुपुत्र तथा जीवनभर विद्या, श्री और कान्ति सब सुलभ हो जाती है और परलोकमें उसे जो सुख होता है, वह कहता हूँ, सुनो। इस व्रतको करनेवाले व्यक्ति एक कल्पतक, अप्सराओंके साथ आनन्द करते हुए ब्रह्माजीके लोकमें रहते हैं। फिर जब पुनः सृष्टि आरम्भ होती है तब वे चक्रवर्ती राजा होते हैं और तीस हजार वर्षोंकी उन्हें लम्बी आयु प्राप्त होती है।