वराह महा पुराण
28-एकादशी तिथिके माहात्म्यके प्रसङ्गमें कुबेरकी उत्पत्ति-कथा
मुनिवर महातपा कहते हैं-राजन्! अब एक दूसरी कथा कहता हूँ। इसमें धनके स्वामी कुबेरकी उत्पत्तिका वर्णन है। यह प्रसङ्ग पापका नाश करनेवाला है। पहले कुबेरजी वायुके रूपमें अमूर्त ही थे। पश्चात् वे मूर्तिमान् बनकर उपस्थित हुए। परब्रह्म परमात्माका जो शरीर है, उसीके अन्तर्गत वह वायु विराजता था। आवश्यकताके अनुसार वह क्षेत्रदेवता बनकर बाहर निकला। उसकी उत्पत्तिकी कथा मैं तुम्हें संक्षेपमें बता चुका हूँ। महाभाग ! तुम बड़े पवित्रात्मा पुरुष हो, अत: वही प्रसङ्ग पुनः कुछ विस्तारसे कहता हूँ, सुनो।
एक समयकी बात है-ब्रह्माजीके मनमें सृष्टि रचनेकी इच्छा हुई। तब उनके मुखसे वायु निकला। वह बड़े वेगसे स्थूल बनकर बह चला और उससे धूलकी प्रचण्ड वर्षा होने लगी। फिर ब्रह्माजीने उसे रोका और साथ ही कहा'वायो! तुम शरीर धारण करो और शान्त हो जाओ।' उनके ऐसा कहनेपर वायु मूर्तिमान् बनकर कुबेरके रूपमें उनके सामने उपस्थित हुए। तब ब्रह्माजीने कहा-'सम्पूर्ण देवताओंके पास जो धन है, वह केवल फलमात्र है। उन
सबकी रक्षाका भार तुम्हारे ऊपर है। इस रक्षाकार्यके कारण जगत्में 'धनपति' नामसे तुम्हारी प्रसिद्धि होगी।' फिर अत्यन्त संतुष्ट होकर ब्रह्माजीने उन्हें एकादशीका अधिष्ठाता बना दिया। राजन्! उस तिथिके अवसरपर जो व्यक्ति बिना अग्निमें पकाये स्वयं पके हुए फल आदिके आहारपर रहकर नियमके साथ व्रत करता रहता है, उसपर कुबेर अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और वे उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं।
धनाध्यक्ष कुबेरके मूर्तिमान् बननेकी यह कथा सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाली है। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक इसका श्रवण अथवा पठन करता है, उसके सारे मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। अन्तमें वह स्वर्गलोकको प्राप्त करता है।