37-मत्स्यद्वादशीव्रतका विधान तथा फल-कथन

सत्यतपाने कहा-भगवन्! आप ब्रह्मज्ञानियोंके शिरोमणि हैं। आपने जो दो शरीरोंकी बात कही है, यह शरीरभेद कैसे है? आप यह मुझे बतलानेकी कृपा कीजिये।

दुर्वासाजी बोले-दो ही नहीं, किंतु शरीरके तीन भेद हैं-ऐसा कहना चाहिये। प्राणियोंको ये शरीर इसलिये मिलते हैं कि उनको पाकर वह पूर्वकृत भोग भोगे। तुम्हारी पूर्वकी अवस्था भले ही पापपूर्ण थी, क्योंकि उस समय तुममें ज्ञानका नितान्त अभाव था। पर वही तुम अब उत्तम व्रतका पालन करनेके कारण दूसरी अवस्थामें आ गये हो-ऐसा समझना चाहिये। ब्रह्मवेत्ता 'विद्वानोंने बताया है कि एक तीसरा भी शरीर है, जिसे इन्द्रियाँ अपना विषय नहीं बना सकती तथा जो धर्म और अधर्मको भोगनेके लिये मिलता है। इस प्रकार इसके तीन भेद हैं। धर्म एवं अधर्मके भोग तथा सांसारिक पदार्थोके भोगका साधन होनेसे भी शरीरके तीन भेद सिद्ध होते हैं। पूर्व समयमें तुम्हारे द्वारा जो प्राणियोंका वध हुआ करता था, उससे वैसे तुम्हारे संस्कार भी बन गये थे। इसीलिये तुम्हें पापमय शरीरवाला कहा जाता था। लोग तुमको पापी कहते थे। किंतु अब निरन्तर तप और दया करनेके कारण तुम्हारी प्रवृत्ति परम पवित्र बन गयी है। इस समय तुम्हें यह धर्ममय दूसरा शरीर सुलभ हो गया है। इस शरीरसे वेदों और पुराणोंकी जानकारी प्राप्त करनेके तुम पूर्ण अधिकारी हो-इसमें कोई संशय नहीं। जैसे जबतक बालककी अवस्था आठ वर्षतककी रहती है, तबतक उसकी मानसिक वृत्तिमें कुछ और ही भाव भरे रहते हैं। वही जब आठ वर्षकी सीमा पार कर जाता है, तो उसकी चेष्टा दूसरी ही बन जाती है। अतः ब्रह्मका विवेचन करनेवाले महापुरुषोंने बताया है कि इसी प्रकार एक ही शरीर अवस्थाओंके भेदसे तीन भेदवाला कहा गया है। भेद केवल नाममें है-जैसे मिट्टी और घड़ा। इन वर्गों के क्रमसे कर्मकाण्डके भी चार भेद बतलाये गये हैं।'

सत्यतपाने कहा-मुनिवरजी! आपने जिन परब्रह्म परमात्माकी बात कही है, उनके रूपको तो महात्मा एवं योगी पुरुष भी जानने में असमर्थ हैं। क्योंकि उन प्रभुमें नाम, गोत्र और आकारका अभाव है। जब उन परब्रह्म परमात्माकी कोई संज्ञा ही नहीं है तो वे जाने भी कैसे जा सकते हैं। गुरो! आप उनकी कोई ऐसी संज्ञा बतानेकी कृपा कीजिये, जिससे मैं उन्हें जान सकूँ। जिनका नाम वेदों एवं शास्त्रोंमें पढ़ा जाता है, क्या वे ही तो ये परब्रह्म परमात्मा नहीं हैं। उन्हें तो वेदों में पुरुष, पुण्डरीकाक्ष तथा स्वयं भगवान् नारायण एवं श्रीहरि कहा गया है। मुनिवर! उन्हें पानेके साधन अनेक प्रकारके यज्ञ तथा उचित प्रचुर दान हैं। वे भगवान् इन उपर्युक्त साधनों तथा श्रद्धा, भक्ति एवं तप द्वारा प्राप्त होते हैं। अथवा भगवन् ! प्रचुर सम्पत्तिसे तथा बहुत-से अन्य श्रेष्ठ सत्कर्मों के प्रभावसे वेदके पारगामी विद्वान् तथा पुण्यात्मा पुरुष उन्हें पा सकते हैं। पर मैं एक निर्धन व्यक्ति उन्हें पा सकूँ-आप वैसा उपाय मुझे बतानेकी कृपा कीजिये। विप्रवर! धनके अभावमें दान देना सम्भव नहीं है। धन रहते हुए भी यदि परिवारमें अधिक आसक्ति है, तो उसके मनमें दान करनेकी रुचि नहीं होती। मेरा अनुमान है कि उससे तो भगवान् नारायण सर्वथा दूर ही रहते हैं। क्योंकि वे सनातन श्रीहरि अत्यन्त प्रयासद्वारा ही प्राप्त हो सकते हैं। इसलिये दयापूर्वक आप मुझे कोई ऐसा सुगम साधन बतानेकी कृपा कीजिये, जिससे सर्वसाधारण व्यक्ति भी उन्हें सुगमतासे प्राप्त कर सके।

दुर्वासाजी बोले-साधो! मैं तुम्हें एक अत्यन्त गोपनीय व्रत बताता हूँ। भगवान् नारायण ही इसके प्रवर्तक हैं। पूर्व समयमें जब पृथ्वी पातालमें डूबी या धंसी जा रही थी तो उसने इस व्रतको किया था। उस समय जलके बहुत बढ़ जानेसे पृथ्वीका पार्थिव अंश प्रायः जलद्वारा नष्ट कर दिया गया था। इस प्रकार जब सर्वत्र जल-ही-जल रह गया तो पृथ्वी रसातलमें चली गयी। वहाँ जाकर प्राणीवर्गको धारण करनेवाले पृथ्वी-देवीने, जो सर्वव्यापी परम प्रभु भगवान् नारायण हैं उनकी व्रत एवं उपवासद्वारा आराधना की थी। उसने अनेक प्रकारके नियमोंका पालन करते हुए यह व्रत किया था। बहुत समयतक व्रत करनेपर जिनकी ध्वजापर गरुडका चित्र अङ्कित है, वे भगवान् श्रीहरि उसपर प्रसन्न हो गये। तब उन सनातन प्रभुकी कृपाके फलस्वरूप यह पृथ्वी पातालसे ऊपर लायी गयी और समतलरूपमें सुशोभित हुई।

सत्यतपाने पूछा-मुनिवर ! पृथ्वीने जो व्रतउपवास किये थे, वे कौन-से व्रत तथा कितने नियम थे? यह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।

दुर्वासाजी कहते हैं-जब मार्गशीर्ष मासकी दशमी तिथि आ जाय, तब बुद्धिमान् पुरुष नियमपूर्वक रहकर भगवान् श्रीहरिकी पूजा करे। उस समय विधिपूर्वक हवनका कार्य भी सम्पन्न करना चाहिये तथा पवित्र वस्त्र धारण करना चाहिये। प्रसन्न मनसे रहकर व्रती पुरुष भलीभाँति सिद्ध किया हुआ यव आदि हविष्यान्न भोजन करे। फिर कम-से-कम पाँच पग दूर जाकर अपने पैर धोये। पुनः प्रात:काल उठकर शौचके बाद आठ अंगुलकी लम्बी दतुअनसे मुखको शुद्ध करना चाहिये। दन्तधावनका काष्ठ किसी दूधवाले वृक्षका होना आवश्यक है। इसके बाद विधिपूर्वक आचमन करना चाहिये। शरीरके नौ द्वार हैं, उन सभी द्वारोंको स्पर्श कर फिर भगवान् जनार्दनका ध्यान करे। ध्यानका प्रकार यह है-'भगवान् श्रीहरि सर्वत्र विराजमान हैं। उनकी भुजाओंमें शङ्ख, चक्र, गदा एवं पद्म सुशोभित हो रहे हैं। वे पीताम्बर धारण किये हैं तथा उनके मुँहपर मंद मुसकान विराजित है। वे सभी शुभ लक्षणोंसे सुशोभित हैं।' इस प्रकार उनका ध्यान कर पुनः भगवान् जनार्दनको स्मरण करते हुए हाथमें जल ले और उन प्रभुके लिये एक अञ्जलि अर्घ्य दे। महामुने! अर्घ्य देते समय निम्नलिखित मन्त्र पढ़ना चाहिये'-( एकादश्यां निराहारः स्थित्वा चैवापरेऽहनि । भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥)

'कमलके समान नेत्रसे शोभा पानेवाले भगवान् अच्युत! आज एकादशी तिथि है। अत: मैं निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करूँगा। आप ही मेरे शरण हैं।'

इस प्रकार कहकर दिनमें नियमपूर्वक उपवास करे। रात्रिके समय देवाधिदेव भगवान् नारायणके समीप बैठकर 'ॐ नमो नारायणाय' इस मन्त्रका जप करे। प्रायः एक सहस्र जप कर व्रतीको सो जाना चाहिये। फिर प्रात:काल होनेपर व्रती पुरुष समद्रतक जानेवाली नदी अथवा दूसरी भी किसी नदी या तालाबपर जाकर अथवा घरपर संयमपूर्वक रहकर हाथमें पवित्र मिट्टी लेकर यह मन्त्र पढ़े-'देवि! समस्त प्राणियोंका धारण और पोषण सदा तुमपर ही अवलम्बित है। सुव्रते! यदि यह सत्य है तो इसके फलस्वरूप मेरे सम्पूर्ण पापोंको तुम दूर करनेकी कृपा करो। कश्यपतनये! पूरे ब्रह्माण्डके भीतर रहनेवाले जितने तीर्थ हैं, वे सभी तुमसे स्पृष्ट हैं। उन सबको तुमने ही अपनी पीठपर स्थान दिया है। भगवती पृथ्वि! इसी भावसे भरकर मैं तुमसे यह मृत्तिका ले आज अपने ऊपर धारण करता हूँ।( धारणं पोषणं त्वत्तो भूतानां देवि सर्वदा। तेन सत्येन मे पापं यावन्मोचय सुव्रते ।ब्रह्माण्डोदरतीर्थानित्वयास्पृष्टानि काश्यपि॥)

तेनेमां मृत्तिकां त्वत्तो गृहा स्थास्येऽद्य मेदिनि।)

फिर जलके देवता वरुणसे प्रार्थना करे'महाभाग वरुण! आपमें सभी रस सदा स्थान पाये हुए हैं। उनसे इस मृत्तिकाको गीला करके मुझे यथाशीघ्र पवित्र करनेकी कृपा करें।( त्वयि सर्वे रसा नित्याः स्थिता वरुण सर्वदा ॥ तैरियं मृत्तिका प्लाव्य पूतां कुरु च मां चिरम्॥)

राजाने कहा-क्षर एवं अक्षर-अखिल जगत् जिनका रूप है, जो क्षीरसागरमें शयन करते हैं, देहधारियों के लिये परम पद, इन्द्रियोंके अविषय, विश्वकी रक्षा करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा जलमय आकृति बनाये हुए हैं, उन भक्तोंकी याचना पूर्ण करनेवाले प्रभुकी मैं स्तुति करता हूँ। देवताओं एवं दानवोंके निरन्तर प्रार्थना करनेपर सृष्टि करनेके विचारसे आपने इस जगत्की रचना की है। भगवन्! आप सदा एक कूटस्थ रूपसे आसीन रहकर इच्छामात्रसे संसारको सृष्टि करते हैं। प्रभो!

देशकी पूजा करे। 'तीनों लोकोंपर विजय पानेवाले प्रभुको नमस्कार' कहकर उनकी दोनों भुजाओंका तथा 'सर्वात्मा श्रीहरिको नमस्कार' कहकर उनके सिरका पूजन करे। 'रथका चक्र धारण करनेवाले भगवान्को नमस्कार' कहकर चक्रकी पूजा करे तथा 'कल्याणकारी प्रभुको प्रणाम' कहकर शङ्ककी पूजा करे। 'गम्भीरस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार' कहकर उनकी गदाका तथा शान्तिस्वरूप भगवान्को प्रणाम है'-यह कहकर पद्मकी पूजा करनी चाहिये।

भगवान् नारायण सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी हैं। उक्त प्रकारसे उनकी अर्चना करनेके उपरान्त ज्ञानी पुरुष फिर उनके सामने जलपूर्ण चार कलश स्थापित करे। उन कलशोंको मालाओंसे अलंकृतकर उनपर तिलसे भरे पात्र रखे। इन चार कलशोंको चार समुद्र मानकर उनके मध्यभागमें एक मङ्गलमय पीठ या चौकी स्थापित करनी चाहिये, जिसके मध्यमें वस्त्र बिछा हो। फिर एक सोने, चाँदी, ताँबा अथवा लकड़ीके पात्रमें या कुछ न मिल सके तो पलाशके पत्तेमें ही जल रखकर उसपर सभी अवयवोंसे अङ्कित तथा आभूषणोंसे अलंकृत भगवान् जनार्दनकी मत्स्याकार सुवर्ण-प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये। फिर उस भगवत्प्रतिमाकी अनेक प्रकारके गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, वस्त्र एवं नैवेद्य आदिके द्वारा विधिपूर्वक षोडशोपचारसे पूजा करनी चाहिये। पूजाके उपरान्त यों प्रार्थना करनी चाहिये-'भगवन्! जिस प्रकार पातालमें प्रविष्ट हुए वेदोंका आपने उद्धार किया था, केशव! आप वैसे ही मेरा भी उद्धार करनेकी कृपा कीजिये।'

इस प्रकार पूजा सम्पन्न हो जानेके पश्चात् प्रार्थना करके रातमें भगवत्प्रतिमाके सामने जागरण करना चाहिये। पुनः प्रात:काल होनेपर उपर्युक्त स्थापित किये हुए चारों कलशोंको चार ब्राह्मणोंको अर्पण कर दे। पूर्वका कलश ऋग्वेदके ज्ञाता ब्राह्मणको दे। दक्षिणका कलश सामवेदी ब्राह्मणको देना चाहिये। यजुर्वेदके ज्ञाता ब्राह्मणको पश्चिमका कलश देना चाहिये। उत्तरका कलश अपनी इच्छाके अनुसार जिस किसी ब्राह्मणको दे सकते हैं, ऐसी विधि है। कलश वितरण करनेके पश्चात् इस प्रकार प्रार्थना करे-'पूर्वकी ओरसे मेरी ऋग्वेद, दक्षिणकी ओरसे सामवेद, पश्चिमकी ओरसे यजुर्वेद तथा उत्तरकी ओरसे अथर्ववेद रक्षा करें। व्रतके अन्तमें भगवान् मत्स्यकी सुवर्णनिर्मित प्रतिमा आचार्यको समर्पण करनेकी विधि है। जो पुरुष इस विधिके अनुसार वस्त्र, गन्ध, पुष्प, धूप आदि उपचारोंसे भगवान्की भलीभाँति पूजा करता है, जिसके मुखसे भगवन्नामरूपी मन्त्र उच्चरित होते रहते हैं, जिसे उन मन्त्रोंका गुणानुपूर्वी अभिप्राय भी अवगत होता रहता है तथा जिसने दानका विधान भी सम्पन्न कर दिया है, उसे करोड़गुना अधिक फल मिलता है। साथ ही जिसने गुरुको अर्पण तो कर दिया, परंतु आसक्ति एवं मोहके वश हो जानेसे उसके मनमें अश्रद्धा उत्पन्न हो गयी तो ऐसे व्रती पुरुषके फलमें न्यूनता भी आती है। विद्वान् लोग कहते हैं कि विधिका प्रकार बतानेवाला आप्तपुरुष ही गुरुके पदका अधिकारी है।'

इस प्रकार द्वादशीके दिन विधिसहित दान करके पुनः भगवान् विष्णुका पूजन करना चाहिये। अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उन्हें उत्तम दक्षिणा दे। भोज्य पदार्थ उत्तम अन्नसे निर्मित होना चाहिये। इसके बाद मनुष्य स्वयं भोजन करे-ऐसा विधान है। फिर संयतेन्द्रिय एवं मौन हो बच्चोंको साथ लेकर भोजन करे। इस व्रतको सर्वप्रथम पृथ्वीने किया था। जो मनुष्य उक्त विधानसे यह व्रत करता है, परम बुद्धिमान् सत्यतपा! उसका पवित्र फल बताता हूँ, सुनो। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महाभाग! यदि मुझे अनेक हजार मुख मिल जायँ तथा ब्रह्माकी आयु-जैसी लंबी आयु सुलभ हो जाय तो सम्भव है कि इस धर्मका फल किसी प्रकार बतला सकूँ। ब्रह्मन्! फिर भी कुछ परिचय प्राप्त हो जाय-इस उद्देश्यसे कहता हूँ, सुनो-मुने! तैंतालीस लाख, बीस हजार वर्षोंकी एक चतुर्युगी होती है। ऐसे एकहत्तर युगोंका एक मन्वन्तर होता है। चौदह मन्वन्तरोंका ब्रह्माका एक दिन और इतनी ही संख्याकी रात होती है। इस प्रकार तीस दिनोंका एक मास और बारह महीनोंका उनका एक वर्ष कहा गया है। ऐसे सौ वर्षोंकी ब्रह्माकी आयु मानी गयी है-इसमें कोई संशयकी बात नहीं। जो पुरुष उक्त विधानके अनुसार इस द्वादशी व्रतको करता है, वह ब्रह्माजीके लोकमें पहुँच जाता है और वह वहाँ तबतक रहता है, जबतक ब्रह्माकी आयु समाप्त नहीं हो जाती। जब ब्रह्मा अपने शरीरका संवरण करने लगते हैं तो उसी क्षण उनके विग्रहमें वह भी समा जाता है। पुनः ब्राह्मी-सृष्टि आरम्भ होनेपर वह एक महान् दिव्य पुरुष होता है। तपस्वी अथवा राजाका पद उसे प्राप्त होता है। सकाम अथवा निष्काम किसी भी भावसे जो इस व्रतका अनुष्ठान करता है, उसके इस लोकमें किये गये कठिन-से-कठिन जितने पाप हैं, वे सभी उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं। इस लोकमें जो दरिद्र है अथवा अपने राज्यसे च्युत हो गया है, वह विधानके साथ इस व्रतके करनेसे अवश्य ही राजा बन सकता है। यदि कोई सौभाग्यवती स्त्री है और उसे संतान नहीं होती हो तो वह इस कथित विधानसे यह व्रत करे। फलस्वरूप वह स्त्री परम धार्मिक पुत्र प्राप्त कर सकती है। यदि दूसरेका सम्मान करनेवाले किसी व्यक्तिका अगम्या स्त्रीके साथ सम्बन्ध हो गया हो तो वह उक्त विधिके अनुसार प्रायश्चित्तरूपमें यह व्रत करे तो वह भी उस पापसे मुक्त हो सकता है। जिसने बहुत वर्षोंसे ब्रह्म-सम्बन्धी क्रियाका त्याग कर दिया है, वह यदि एक बार भी भक्तिपूर्वक इस व्रतका अनुष्ठान करे तो वह वैदिकसंस्कारसे सम्पन्न हो सकता है। महामुने! इसके विषयमें अब अधिक कहनेसे क्या प्रयोजन! इसकी तुलना करनेवाला अन्य कोई भी व्रत नहीं है। ब्रह्मन्! अप्राप्य वस्तुको प्राप्य बनानेकी जिसमें सामर्थ्य है, वैसी इस मत्स्य-द्वादशीव्रतको निरन्तर करे। जिस समय पृथ्वी पातालमें जलमग्न थी, उस समय उक्त विधानके अनुसार स्वयं उसने इस व्रतका अनुष्ठान किया था। तात! इस विषयमें और कुछ विचार करना अनावश्यक है। जिसने दीक्षा नहीं ली है और जो नास्तिक है, उसे यह विधान बताना अवाञ्छनीय है। जो देवता अथवा ब्राह्मणसे द्वेष करता है, उसको इसे कभी नहीं सुनाना चाहिये। पापोंको तुरंत प्रशमन करनेवाला यह व्रत गुरुमें श्रद्धा रखनेवाले व्यक्तिको बताना चाहिये। जो मनुष्य यह व्रत करता है, वह इस जन्ममें धन, धान्य और सौभाग्य प्राप्त करता है। उसे अनेक प्रकारकी श्रेष्ठ स्त्रियाँ प्राप्त होती हैं। यह उत्तम प्रसङ्ग द्वादशीकल्प कहलाता है। जो इसे भक्तिपूर्वक सुनाता है अथवा स्वयं पढ़ता-सुनता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूट जाता है।