2- विभिन्न सर्गोंका वर्णन तथा देवर्षि नारदको वेदमाता सावित्रीका अद्भुत कन्याके रूपमे दर्शन होनेसे आश्चर्यकी प्राप्ति

 सूतजी कहते हैं-सभी जीवधारियोंके शरीरोंमें आत्मारूपसे स्थित भगवान् श्रीहरि पृथ्वीकी भक्तिसे परम संतुष्ट हो गये। उन्होंने वराह-रूप धारण करके पृथ्वीको अपनी योगमायाका दर्शन कराया और फिर उसी रूपमें स्थित रहकर बोले-'सुश्रोणि! तुम्हारा प्रश्न यद्यपि बहुत कठिन है एवं यह पुरातन इतिहासका विषय है, तथापि मैं सभी शास्त्रोंसे सम्मत इस विषयका प्रतिपादन करता हूँ। पृथ्वीदेवि! साधारणत: सभी पुराणोंमें यह प्रसङ्ग आया है।'

भगवान् वराहने कहा-सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित-जहाँ ये पाँच लक्षण विद्यमान हों, उसे पुराण समझना चाहिये। वरानने! पुराणोंमें सर्ग अर्थात् सृष्टिका स्थान प्रथम है। अतः मैं पहले उसीका वर्णन करता हूँ। इसके आरम्भसे ही देवताओं और राजाओंके चरित्रका ज्ञान होता है। परमात्मा सनातन हैं। उनका कभी किसी कालमें नाश नहीं होता। वे परमात्मा सृष्टिकी इच्छासे चार भागोंमें विभक्त हुए, ऐसा वेदज्ञ पुरुष जानते हैं। सृष्टिके आदिकालमें सर्वप्रथम परमात्मासे अहंतत्त्व, फिर आकाश आदि पञ्च महाभूत उत्पन्न हुए। उसके पश्चात् महत्तत्त्व प्रकट हुआ और फिर अणुरूपा प्रकृति और इसके बाद समष्टि बुद्धिका प्रादुर्भाव हुआ। सत्त्व, रज और तम-इन तीन गुणोंसे युक्त होकर वह बुद्धि पृथक्-पृथक् तीन प्रकारके भेदोंमें विभक्त हो गयी। इस गुणत्रयमेंसे तमोगुणका संयोग प्राप्त करके महद्ब्रह्मका प्रादुर्भाव हुआ, इसको सभी तत्त्वज्ञ प्रधान अर्थात् प्रकृति कहते हैं। इस प्रकृतिसे भी क्षेत्रज्ञ अधिक महिमायुक्त है। उस परब्रह्मसे सत्त्वादि गुण, गुणोंसे आकाश आदि तन्मात्राएँ और फिर इन्द्रियोंका समुदाय बना। इस प्रकार जगत्की सृष्टि व्यवस्थित हुई। भद्रे! पाँच महाभूतोंसे स्वयं मैंने स्थूल शरीरका निर्माण किया। देवि! पहले केवल शून्य था। फिर उसमें शब्दकी उत्पत्ति हुई। शब्दसे आकाश हुआ। आकाशसे वायु, वायुसे तेज एवं तेजसे जलकी उत्पत्ति हुई। इसके बाद प्राणियोंको अपने ऊपर धारण करनेके लिये तुम्हारी-(पृथ्वीकी) रचना हुई।

पृथ्वी और जलका संयोग होनेपर बुबुदाकार कलल बना और वही अण्डेके आकारमें परिणत हो गया। उसके बढ़ जानेपर मेरा जलमय रूप दृष्टिगोचर हुआ। मेरे इस रूपको स्वयं मैंने ही बनाया था। इस प्रकार नार अर्थात् जलकी सृष्टि करके मैं उसीमें निवास करने लगा। इसीसे मेरा नाम 'नारायण' हुआ। वर्तमान कल्पके समान ही मैं प्रत्येक कल्पमें जलमें शयन करता हूँ और मेरे सोते समय सदैव मेरी नाभिसे इसी प्रकार कमल उत्पन्न होता है, जैसा कि आज तुम देख रही हो। देवि! ऐसी स्थितिमें मेरे नाभिकमलपर चतुर्मुख ब्रह्मा उत्पन्न हुए। तब मैंने उनसे कहा'महामते! तुम प्रजाकी रचना करो।' ऐसा कहकर मैं अन्तर्धान हो गया और ब्रह्मा भी सृष्टिरचनाके चिन्तनमें लग गये। वसुन्धरे! इस प्रकार चिन्तन करते हुए ब्रह्माको जब कोई मार्ग नहीं सूझ पड़ा, तो फिर उन अव्यक्तजन्माके मनमें क्रोध उत्पन्न हुआ। उनके इस क्रोधके परिणामस्वरूप एक बालकका प्रादुर्भाव हुआ। जब उस बालकने रोना प्रारम्भ किया, तब अव्यक्तरूप ब्रह्माने उसे रोनेसे  मना किया। इसपर उस बालकने कहा-'मेरा नाम तो बता दीजिये।' तब ब्रह्माने रोनेके कारण उसका नाम 'रुद्र' रख दिया। शुभे! उस बालकसे भी ब्रह्माने कहा-'लोकोंकी रचना करो।' परंतु इस कार्य में अपनेको असमर्थ जानकर उस बालकने जलमें निमग्न होकर तप करनेका निश्चय किया। उस रुद्र नामक बालकके तपस्याके लिये जलमें निमग्न हो जानेपर ब्रह्माने फिर दूसरे प्रजापतिको उत्पन्न किया। दाहिने अंगूठेसे उन्होंने प्रजापतिकी तथा बायें अंगूठेसे प्रजापतिके लिये पत्नीकी सृष्टि की। प्रजापतिने उस स्त्रीसे स्वायम्भुव मनुको उत्पन्न किया। इस प्रकार पूर्वकालमें ब्रह्माने स्वायम्भुव मनुके द्वारा प्रजाओंकी वृद्धि की।

पृथ्वी बोली-देवेश्वर! प्रथम सृष्टिका और विस्तारसे वर्णन करनेकी कृपा करें तथा नारायण ब्रह्मारूपसे कैसे विख्यात हुए? मुझे यह सब भी बतलानेकी कृपा करें।

वराह भगवान् कहते हैं-देवि पृथ्वि! नारायणने ब्रह्मारूपसे जिस प्रकार प्रजाओंकी सृष्टि की, उसे मैं विस्तृत रूपसे कहता हूँ, सुनो। शुभे! पिछले कल्पका अन्त हो जानेपर रात्रि व्याप्त हो गयी। भगवान् श्रीहरि उस समय सो गये। प्राणोंका नितान्त अभाव हो गया। फिर जगनेपर उनको यह जगत् शून्य दिखायी पड़ा। भगवान् नारायण दूसरोंके लिये अचिन्त्य हैं। वे पूर्वजोंके भी पूर्वज, ब्रह्मस्वरूप, अनादि और सबके स्रष्टा हैं। ब्रह्माका रूप धारण करनेवाले वे परम प्रभु जगत्की उत्पत्ति और प्रलयकर्ता हैं। उन नारायणके विषयमें यह श्लोक कहा जाता है

आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः ।

अयनं तस्य ताः पूर्वं ततो नारायणः स्मृतः॥

पुरुषोत्तम नरसे उत्पन्न होनेके कारण जलको 'नार' कहा जाता है, क्योंकि जल भी नार अर्थात् पुरुषोत्तम परमात्मासे उत्पन्न हुआ है। सृष्टिके पूर्व वह नार ही भगवान् हरिका अयन-निवास रहा, अतएव उनकी नारायण संज्ञा हो गयी। फिर पूर्व-कल्पोंकी भाँति उन श्रीहरिके मनमें सृष्टिरचनाका संकल्प उदित हुआ। तब उनसे बुद्धिशून्य तमोमयी सृष्टि उत्पन्न हुई। पहले उन परमात्मासे तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामित्र-यह पाँच पर्वोवाली अविद्या उत्पन्न हुई। उनके फिर चिन्तन करनेपर तमोगुणप्रधान चेतनारहित जड़ (वृक्ष, गुल्म, लता, तृण और पर्वत)-रूप पाँच प्रकारकी सृष्टि उत्पन्न हुई। सष्टि-रचनाके रहस्यको जाननेवाले विद्वान् इसे मुख्य सर्ग कहते हैं। फिर उन परम पुरुषके चिन्तन करनेपर दूसरी पहलेकी अपेक्षा उत्कृष्ट सृष्टि-रचनाका कार्य आरम्भ हो गया।

यह सृष्टि वायुके समान वक्र गतिसे या तिरछी चलनेवाली हुई, जिसके फलस्वरूप इसका नाम तिर्यक्स्रोत पड़ गया। इस सर्गके प्राणियोंकी पशु आदिके नामसे प्रसिद्धि हुई। इस सर्गको भी अपनी सृष्टि-रचनाके प्रयोजनमें असमर्थ जानकर ब्रह्माद्वारा पुनः चिन्तन किये जानेपर एक और दूसरा सर्ग उत्पन्न हुआ। यह ऊर्ध्वस्रोत नामक तीसरा धर्मपरायण सात्त्विक सर्ग हुआ, जो देवताओंके रूपमें ऊर्ध्व स्वर्गादि लोकोंमें रहने लगा। ये सभी देवता ऊर्ध्वगामी एवं स्त्री-पुरुषसंयोगके फलस्वरूप गर्भसे उत्पन्न हुए थे। इस प्रकार इन मुख्य सृष्टियोंकी रचना कर लेनेपर भी जब ब्रह्माने पुनः विचार किया, तो उनको ये भी परम पुरुषार्थ (मोक्ष)-के साधनमें असमर्थ दीखे। तब फिर उन्होंने सृष्टिरचनाका चिन्तन करना प्रारम्भ किया और पृथ्वी आदि नीचेके लोकोंमें रहनेवाले अक्स्रिोत सर्गकी रचना की। इस अर्वाक्स्रोतवाली सृष्टि में उन्होंने जिनको बनाया, वे मनुष्य कहलाये और वे परम पुरुषार्थके साधनके योग्य थे। इनमें जो सत्त्वगुणविशिष्ट थे,

वे प्रकाशयुक्त हुए। रज एवं तमोगुणकी जिनमें अधिकता थी, वे कर्मोंका बारंबार अनुष्ठान करनेवाले एवं दु:खयुक्त हुए। सुभगे! इस प्रकार मैंने इन छ: सर्गोका तुमसे वर्णन किया। इनमें पहला महत्तत्त्वसम्बन्धी सर्ग, दूसरा तन्मात्राओंसे सम्बन्धित भूतसर्ग और तीसरा वैकारिक सर्ग है, जो इन्द्रियोंसे सम्बन्ध रखता है। इस प्रकार समष्टि बुद्धिके संयोगसे (प्रकृतिसे) उत्पन्न होनेके कारण यह प्राकृत सर्ग कहलाया। चौथा मुख्य सर्ग है। पर्वत-वृक्ष आदि स्थावर पदार्थ ही इस मुख्य सर्गके अन्तर्गत हैं। वक्र गतिवाले पशु-पक्षी  तिर्यक्स्रोतमें उत्पन्न होनेसे तिर्यग्योनि या तैर्यक स्रोतके प्राणी कहे जाते हैं। । विधाताकी सभी सृष्टियोंमें उच्च स्थान रखनेवाली छठी सृष्टि देवताओंकी है। मानव उनकी सातवीं सृष्टि में आता है। सत्त्वगुण और तमोगुणमिश्रित आठवाँ अनुग्रहसर्ग माना गया है; क्योंकि इसमें प्रजाओंपर अनुग्रह करनेके लिये ऋषियोंकी उत्पत्ति होती है। इनमें बादके पाँच वैकृत सर्ग और पहलेके तीन प्राकृत सर्गके नामसे जाने जाते हैं। नवाँ कौमार सर्ग प्राकृतवैकृतमिश्रित है। प्रजापतिके ये नौ सर्ग कहे गये हैं। संसारकी सृष्टि में मूल कारण ये ही हैं। इस प्रकार मैंने इन सर्गोंका वर्णन किया। अब तुम दूसरा कौन-सा प्रसङ्ग सुनना चाहती हो?

पृथ्वी बोली-भगवन् ! अव्यक्तजन्मा ब्रह्माद्वारा रचित यह नवधा सृष्टि किस प्रकार विस्तारको प्राप्त हुई? अच्युत! आप मुझे यह बतानेकी कृपा करें।

भगवान् वराह कहते हैं-सर्वप्रथम ब्रह्माद्वारा रुद्र आदि देवताओंकी सृष्टि हुई। इसके बाद सनकादि कुमारों तथा मरीचि-प्रभृति मुनियोंकी रचना हुई। मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलह, क्रतु, महान् तेजस्वी पुलस्त्य, प्रचेता, भृगु, नारद एवं महातपस्वी वसिष्ठ-ये दस ब्रह्माजीके मानस पुत्र हुए। उन परमेष्ठीने सनकादिको निवृत्तिसंज्ञक धर्ममें तथा नारदजीके अतिरिक्त मरीचि आदि सभी ऋषियोंको प्रवृत्तिसंज्ञक धर्ममें नियुक्त कर दिया। ये जो आदि प्रजापति हैं, इनका ब्रह्माके दाहिने अंगूठेसे प्राकट्य हुआ है (इसी कारण ये दक्ष कहलाते हैं) और इन्हींके वंशके अन्तर्गत यह सारा चराचर जगत् है। देवता, दानव, गन्धर्व, सरीसृप तथा पक्षिगण-ये सभी दक्षकी कन्याओंसे उत्पन्न हुए हैं। इन सबमें धर्मकी विशेषता थी।

ब्रह्माके जो रुद्र नामक पुत्र हैं, उनका प्रादुर्भाव क्रोधसे हुआ था। जिस समय ब्रह्माकी भौंहें रोषके कारण तन गयी थी, तब उनके ललाटसे इनका प्रादुर्भाव हुआ। उस समय इनका शरीर अर्धनारीश्वरके रूपमें था। 'तुम स्वयं अपनेको अनेक भागोंमें बाँटो'-इनसे यों कहकर ब्रह्मा अन्तर्धान हो गये। यह आज्ञा पाकर उन महाभागने स्त्री और पुरुष-इन दो भागोंमें अपनेको विभाजित कर दिया। फिर अपने पुरुष-रूपको उन्होंने ग्यारह भागोंमें विभक्त किया। तभीसे ब्रह्मासे प्रकट होनेवाले इन ग्यारह रुद्रोंकी प्रसिद्धि हुई। अनघे! तुम्हारी जानकारीके लिये मैंने इस रुद्र-सृष्टिका वर्णन कर दिया। अब मैं संक्षेपसे युगमाहात्म्यका वर्णन करता हूँ। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलि-ये चार युग हैं। इन चारों युगोंमें परम पराक्रमी तथा प्रचुर दक्षिणा देनेवाले जो राजा हो चुके हैं एवं जिन देवताओं और दानवोंने ख्याति प्राप्त की है तथा जिन धर्म-कर्मोंका उन्होंने अनुष्ठान किया है। वह मुझसे सुनो। पूर्वकालकी बात है, प्रथम कल्पमें स्वायम्भुव मनु हुए। उनके दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके लोकोत्तर कर्म मनुष्योंके लिये असम्भव ही थे। धर्ममें श्रद्धा रखनेवाले वे महाभाग प्रियव्रत और उत्तानपाद नामसे विख्यात हुए। प्रियव्रतमें तपोबल था और वे महान् यज्ञशाली थे। उन्होंने पुष्कल (अधिक) दक्षिणावाले अनेक महायज्ञोंद्वारा भगवान् श्रीहरिका यजन किया था। उन्होंने सातों द्वीपोंमें अपने भरत आदि पुत्रोंको अभिषिक्त कर दिया था और स्वयं वे महातपस्वी राजा वरदायिनी विशाला*( * महाभारत वनपर्व ९०। २४ । २५ तथा भागवत-माहात्म्यके अनुसार विशालापुरी बदरिकाश्रम ही है।)

नगरी-बदरिकाश्रममें जाकर तपस्या करने लगे थे। महाराज प्रियव्रत चक्रवर्ती नरेश थे। धर्मका अनुष्ठान करना उनका स्वाभाविक गुण था। अतएव उनके तपस्यामें लीन होनेपर उनसे मिलनेकी इच्छासे वहाँ स्वयं नारदजी पधारे। नारदमुनिका आगमन आकाश-मार्गसे हुआ था। उनका तेज सूर्यके समान छिटक रहा था। उन्हें देखकर महाराज प्रियव्रतको बड़ा हर्ष हुआ और उन्होंने आसन, पाद्य एवं नैवेद्यसे नारदजीका भलीभाँति सत्कार किया। तत्पश्चात् उन दोनोंमें परस्पर वार्ता प्रारम्भ हो गयी। अन्तमें वार्तालापकी समाप्तिके समय राजा प्रियव्रतने ब्रह्मवादी नारदजीसे पूछा।

राजा प्रियव्रत बोले-नारदजी! आप महान् पुरुष हैं। इस सत्ययुगमें आपने कोई अद्भुत घटना देखी या सुनी हो, तो उसे बतानेकी कृपा करें।

नारदजीने कहा-महाराज! अवश्य ही मैंने एक आश्चर्यजनक बात देखी है, वह सुनो। कल मैं श्वेतद्वीप गया था, मुझे वहाँपर एक सरोवर दिखलायी पड़ा। उस सरोवरमें बहुत-से कमल खिले हुए थे। उसके तटपर विशाल नेत्रोंवाली एक कन्या खड़ी थी। उस कन्याको देखकर मैं अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गया। उसकी वाणी भी मधुर थी। मैंने उससे पूछा-'भद्रे ! तुम कौन हो, इस स्थानपर कैसे निवास करती हो और यहाँ तुम्हारा क्या काम है?' मेरे इस प्रकार पूछनेपर उस कुमारीने एकटक नेत्रोंसे मुझे देखा, पर न जाने क्या सोचकर वह चुप ही रही। उसके देखते ही मेरा सारा ज्ञान पता नहीं, कहाँ चला गया? राजन्! सम्पूर्ण वेद, समस्त शास्त्र, योगशास्त्र और वेदोंके शिक्षादि अङ्गोंकी मेरी सारी स्मृतियाँ उस किशोरीने मुझपर दृष्टिपात करके ही अपहृत कर लीं। तब मैं शोक और चिन्तासे ग्रस्त होकर महान् विस्मयमें पड़ गया। राजन्! ऐसी स्थितिमें मैंने उस कुमारीकी शरण ग्रहण की। इतनेमें ही मुझे उस कुमारीके शरीरमें एक दिव्य पुरुष दृष्टिगोचर हुआ। फिर उस पुरुषके भी हृदयमें दूसरे और उस दूसरे पुरुषके हृदयमें तीसरेका दर्शन हुआ, जिसके नेत्र लाल थे और वह बारह सूर्योके समान तेजस्वी था। इस प्रकार उन तीनों पुरुषोंको मैंने वहाँ देखा, जो उस कन्याके शरीरमें स्थित थे। सुव्रत! फिर क्षणभरके बाद देखा, तो वहाँ केवल वह कन्या ही रह गयी थी एवं अन्य तीनों पुरुष अदृश्य हो गये थे। तत्पश्चात् मैंने उस दिव्य किशोरीसे पूछा-भद्रे ! मेरा सम्पूर्ण वेदज्ञान कैसे नष्ट हो गया? इसका कारण बताओ।

कुमारी बोली-'मैं समस्त वेदोंकी माता हूँ। मेरा नाम सावित्री है। तुम मुझे नहीं जानते। इसीके फलस्वरूप मैंने तुमसे वेदोंको अपहृत कर लिया है।' तपरूपी धनका संचय करनेवाले राजन्! उस कुमारीके इस प्रकार कहनेपर मैंने विस्मय-विमुग्ध होकर पूछा-'शोभने! ये पुरुष कौन थे, मुझे यह बतानेकी कृपा करो।'

कुमारी बोली-मेरे शरीरमें विराजमान इन पुरुषोंकी जो तुम्हें झाँकी मिली है, इनमेंसे जिसके सभी अङ्ग परम सुन्दर हैं, इसका नाम ऋग्वेद है। यह स्वयं भगवान् नारायणका स्वरूप है। यह अग्निमय है। इसके सस्वर पाठ करनेसे समस्त पाप तुरंत भस्म हो जाते हैं। इसके हृदयमें यह जो दूसरा पुरुष तुम्हें दृष्टिगोचर हुआ है, जिसकी उसीसे उत्पत्ति हुई है, वह यजुर्वेदके रूपमें स्थित महाशक्तिशाली ब्रह्मा हैं। फिर उसके वक्षःस्थलमें भी प्रविष्ट, जो यह परम पवित्र और उज्ज्वल पुरुष दीख रहा है, इसका नाम सामवेद है। यह भगवान् शंकरका स्वरूप माना गया है। स्मरण करनेपर सूर्यके समान सम्पूर्ण पापोंको यह तत्काल नष्ट कर देता है। ब्रह्मन् ! तुमको दृष्टिगोचर हुए ये दिव्य पुरुष तीनों वेद ही हैं। नारद! तुम ब्रह्मपुत्रोंके शिरोमणि और सर्वज्ञानसम्पन्न हो! यह सारा प्रसङ्ग मैंने तुम्हें संक्षेपसे बता दिया। अब तुम पुनः सभी वेदों और शास्त्रोंको तथा अपनी सर्वज्ञताको पुनः प्राप्त करो। इस वेदसरोवरमें तुम स्नान करो। इसमें स्नान करनेसे तुम्हें अपने पूर्वजन्मकी स्मृति हो जायगी।

राजन्! यह कहकर वह कन्या अन्तर्धान हो गयी। तब मैंने उस सरोवरमें स्नान किया और तदनन्तर आपसे मिलनेकी इच्छासे यहाँ चला आया।