कूर्म महा पुराण
पूर्वार्थ - 1 अध्याय
(बदरिकाश्रममें निवास करनेवाले ऋषि) नारायण, नरोंमें उत्तम श्रीनर तथा उनकी लीला प्रकट करनेवालीभगवती सरस्वतीको नमस्कार कर जय (पुराण एवंइतिहास आदि सद्ग्रन्थों)-का पाठ करना चाहिये।कूर्मरूप धारण करनेवाले अप्रमेय भगवान् विष्णुकोनमस्कार कर मैं उस पुराण (कूर्मपुराण)-को कहूँगा, जो समस्त विश्वके मूल कारण भगवान् विष्णुके द्वाराकहा गया था ॥१॥
नैमिषारण्यवासी महर्षियोंने (बारह वर्षतक चलनेवाले)सत्र (यज्ञ)-के पूर्ण हो जानेपर सर्वथा निष्पाप रोमहर्षणसूतजीसे पवित्र पुराण-संहिताके विषयमें प्रश्न किया-महाबुद्धिमान् सूतजी महाराज! आपने इतिहास औरपुराणोंके ज्ञानके लिये ब्रह्मज्ञानियोंमें परम श्रेष्ठ भगवान्वेदव्यासजीकी भलीभाँति उपासना की है। चूंकिआपके वचनसे द्वैपायन भगवान् वेदव्यासजीके समस्तरोम हर्षित हो गये थे, इसलिये आप 'रोमहर्षण' कहलाते हैं॥२-४॥
प्राचीन कालमें स्वयं समर्थ होते हुए भी भगवान्वेदव्यासजीने आपसे ही कहा था कि आप मुनियोंकोपुराण-संहिता सुनायें। (सूतजी महाराज!) आप अपनेअंशसे उत्पन्न साक्षात् पुरुषोत्तम नारायण हैं। स्वयम्भूब्रह्माजीके महान् यज्ञमें सोमरस प्रस्तुत करनेके दिनपुराण-संहिताका वाचन करनेके लिये ही आपका आविर्भावहुआ था। आप पुराणोंके अर्थको ठीक-ठीक जाननेवालेहैं। इसीलिये हम आपसे श्रेष्ठ कूर्मपुराणके विषयमें पूछरहे हैं। आप हमें वह (कूर्मपुराण) बतलायें ॥५-७॥
मुनियोंके वचन सुनकर पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजीनेदेवी सत्यवतीके पुत्र अपने गुरु (भगवान् वेदव्यास)-को मन-ही-मन प्रणाम कर (इस प्रकार) कहा-॥८॥
रोमहर्षण सूतजी बोले-समस्त विश्वके मूल कारण, कूर्मरूप धारण करनेवाले भगवान् नारायण विष्णुकोनमस्कार करके कूर्मपुराणकी उस दिव्य कथाको कहताहूँ, जो समस्त पापोंको नष्ट करनेवाली है और जिसेसुनकर महान्-से-महान् पाप करनेवाला पापी व्यक्तिभी परम गतिको प्राप्त कर लेता है। कूर्मपुराणकी इसपुण्यकथाको नास्तिक व्यक्तिको कभी भी नहीं सुनानाचाहिये। जो अत्यन्त श्रद्धालु हैं, शान्त हैं, धर्मात्मा हैं-ऐसे द्विजातियोंको साक्षात् नारायण भगवान् विष्णुके द्वाराकही गयी इस कूर्मपुराणकी कथाको विशेष रूपसेकहना चाहिये ॥९-११॥
सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रलय), वंश, वंशानुचरिततथा मन्वन्तर-ये पुराणोंके पाँच लक्षण हैं ॥ १२ ॥
अठारह महापुराणोंमें प्रथम पुराण ब्रह्मपुराण है | द्वितीय पद्मपुराण है। इसी प्रकार क्रमशः विष्णु, शिव, भागवत, भविष्य, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, ब्रह्मवैवर्त, लिङ्ग, वराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य और गरुडपुराणहैं। भगवान् वायुके द्वारा कहा गया अठारहवाँ पुराणब्रह्माण्डपुराणके नामसे कहा जाता है ॥१३-१५॥
(सूतजीने पुनः कहा-) ब्राह्मणो! अठारह पुराणोंकानाम सुनकर (अब आप लोग) मुनियोंद्वारा कहे गयेअन्य उपपुराणोंका नाम भी संक्षेपमें सुनें-॥१६॥(इन उपपुराणोंमें) पहला उपपुराण सनत्कुमारकेद्वारा कहा गया सनत्कुमार उपपुराण है। तदनन्तर दूसरानरसिंहपुराण है। स्कन्दकुमारके द्वारा कथित तीसरापुराण स्कन्दपुराण कहा गया है॥१७॥
चौथे पुराणका नाम शिवधर्म है जो साक्षात् भगवान्नन्दीश्वर (शिव)-के द्वारा कहा गया है। महर्षि दुर्वासाकेद्वारा कहा गया आश्चर्यपुराण पाँचवाँ है और छठा पुराणदेवर्षि नारदके द्वारा कहा गया नारदपुराण है। इसी प्रकार (सातवाँ) कपिल, (आठवाँ) मानव और शुक्राचार्यद्वाराप्रोक्त उशना नामक (नवाँ) पुराण है। (दसवाँ)ब्रह्माण्ड, (ग्यारहवाँ) वरुण तथा (बारहवाँ पुराण)कालिकापुराणके नामसे कहा गया है। (तेरहवाँ)माहेश्वरपुराण, (चौदहवाँ) साम्बपुराण तथा सभी प्रकारकेअर्थोंसे युक्त (पंद्रहवाँ) सौरपुराण है। (सोलहवाँ)पराशरपुराण महर्षि पराशरके द्वारा कहा गया है। (सत्रहवाँ) मारीचपुराण है और (अठारहवाँ पुराण)भार्गवपुराणके नामसे कहा गया है॥ १८-२० ॥
यह कूर्मपुराण पंद्रहवाँ महापुराण है, जो पुराणोंमेंश्रेष्ठ है। संहिताओंके भेदसे यह पवित्र पुराण चार भागों (चार संहिताओं)-में विभक्त है। ब्राह्मी, भागवती, सौरीतथा वैष्णवी नामक इस कूर्मपुराणकी चार पवित्रसंहिताएँ धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-इस प्रकारचतुर्विध पुरुषार्थको देनेवाली कही गयी हैं ॥ २१-२२ ।।
यह ब्राह्मी संहिता है, जो चारों वेदोंद्वारा अनुमोदितहै। इसकी श्लोक-संख्या छः हजार है। हे मुनीश्वरो!इसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका अशेष माहात्म्यवर्णित है और (इसके श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पठन-पाठनएवं श्रवण आदिसे) परमेश्वर ब्रह्मका ज्ञान होता है।इसमें सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचरितऔर दिव्य एवं पुण्य प्रासंगिक कथाएँ भी कही गयीहैं। यह पुराणसंहिता शान्त-चित्त एवं धर्मात्मा ब्राह्मणादिकोंकेद्वारा धारण करने योग्य है। (सूतजी कहते हैं-) मैंउसी पुराणसंहिताका प्रवचन करूँगा, जिसे प्राचीनसमयमें वेदव्यासजीने कहा था ॥ २३-२६॥
प्राचीन कालमें अमृतकी प्राप्तिके लिये देवताओंनेदितिके पुत्र दैत्यों और दानवोंके साथ मन्दर नामकपर्वतको मथानी बनाकर क्षीरसागरको मथा। उसक्षीरसागरके मन्थन किये जाते समय देवताओंकेकल्याणकी कामनासे जनार्दन भगवान् विष्णुने कूर्मरूपधारण करके उस मन्दराचलको ऊपर उठायेरखा ॥ २७-२८॥
कूर्म (कच्छप)-रूप धारण किये हुए सर्वद्रष्टाअविनाशी भगवान् विष्णुको देखकर देवताओं तथानारदादि महर्षियोंने उन देवकी स्तुति की ॥ २९ ॥
उसी समय नारायण भगवान् विष्णुकी प्रिया देवीश्रीलक्ष्मीका आविर्भाव हुआ। उन्हें पुरुषोत्तम भगवान्विष्णुने ही ग्रहण किया। लक्ष्मीके तेजसे मोहित हुएइन्द्रसहित नारद आदि महर्षियोंने अव्यक्त भगवान्विष्णुसे यह वचन कहा- ॥ ३०-३१ ।।
हे भगवन् ! हे देवदेवेश! हे नारायण! हे जगन्मय!हम पूछनेवालोंको आप ठीक-ठीक बतलायें किविशाल नेत्रोंवाली यह देवी कौन है? ॥३२॥
उस समय उन देवताओं तथा महर्षियोंका वहवाक्य सुनकर दानवोंका मर्दन करनेवाले भगवान् विष्णुदेवी लक्ष्मीकी ओर देखकर नारद आदि परम पवित्रमहर्षियोंसे बोले- ॥ ३३ ॥
यह मेरी स्वरूपभूता ब्रह्मरूपिणी परम शक्ति है, यही माया है, यही अनन्ता है और यही मेरी वह प्रियाहै जिसने इस सम्पूर्ण जगत्को मोहित कर रखा है। हेश्रेष्ठ द्विजो! इसीके द्वारा मैं देवताओं, असुरों एवं मनुष्योंसेयुक्त सम्पूर्ण विश्वको मोहित करता हूँ, संहार करता हूँऔर पुनः सृष्टि करता हूँ। (ज्ञानीजन जगत्की) उत्पत्तिएवं प्रलयको तथा प्राणियोंके जन्म एवं मोक्षको ठीक-ठीक समझकर और आत्मतत्त्वका दर्शनकर इस महा-मायाके बन्धनसे पार उतरते हैं। द्विजो! मेरी सब प्रकारकीशक्ति यही है, इसीके अंशोंका आश्रय ग्रहणकर ब्रह्मातथा शिव आदि देवता शक्तिमान् हुए हैं ॥ ३४-३७॥
यही वह सत्त्व-रज तथा तम–तीनों गुणोंसे युक्तत्रिगुणात्मिका प्रकृति है और यही सारे संसारको उत्पन्नकरनेवाली है। प्राचीन कालमें श्रीकल्पमें यह पद्मवासिनीकेरूपमें मुझसे ही आविर्भूत हुई थी। ये चार भुजावालीहैं, ये हाथोंमें शंख, चक्र तथा कमल धारण कियेरहती हैं, सभी मङ्गलमय गुणोंसे युक्त हैं, करोड़ों सूर्योंकेसमान इनकी आभा है, ये सभी प्राणियोंको मोहितकरनेवाली हैं। देवता, पितर, मनुष्य, वसुगण तथापृथ्वीपर रहनेवाले जितने भी अन्य देहधारी प्राणी हैं,वे सभी अर्थात् कोई भी ऐसा नहीं है जो इस मायाकोपार करने में समर्थ हो। ३८-४०॥
भगवान् वासुदेवके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपरमुनियोंने भगवान् विष्णुसे कहा-हे पुण्डरीकाक्ष! उसदेवनिर्मित दुर्जय मायाको पार करनेवाला तीनों कालोंमेंयदि कोई हुआ हो तो उसे आप बतलायें ॥४१॥
तदनन्तर मुनियोंद्वारा पूजित भगवान् हृषीकेशनेउन मुनियोंसे कहा-इन्द्रद्युम्न नामका द्विजातियोंमें श्रेष्ठ एकब्राह्मण था, ऐसा सुना गया है। पूर्वजन्ममें वह शंकर आदिदेवताओंसे भी अजेय राजा था। मैंने कूर्म-अवतार धारणकिया है' यह जानकर तथा स्वयं मेरे मुखसे दिव्य पुराण-संहिताको सुनकर वह (राजा इन्द्रद्युम्न) मुनीश्वरोंसहितब्रह्मा, शिव एवं अपनी-अपनी शक्तियोंके साथ अन्यसभी देवताओंको मेरी ही शक्तिमें प्रतिष्ठित समझकरमुझे देखनेके लिये मेरी शरणमें आया ॥ ४२-४४॥
इसके बाद मैंने कहा-(इन्द्रद्युम्न!) तुम ब्राह्मणकीयोनिमें उत्पन्न होओगे, तुम्हारा 'इन्द्रद्युम्न' यह नामप्रसिद्ध होगा और तुम अपने पूर्वजन्मका स्मरण करोगे।हे अनघ! मैं तुम्हें सभी प्राणियों तथा देवताओंके लियेभी अज्ञात एवं जो अत्यन्त गूढरूपसे कहने योग्य है, उस ज्ञानको प्रदान करूँगा। उस मेरे ज्ञानको प्राप्तकर तुमअन्त समयमें मुझमें ही प्रविष्ट हो जाओगे और अपनेही अंशसे दूसरे रूपमें तुम पृथ्वीपर शान्तिपूर्वक रहो।वैवस्वत मन्वन्तरके व्यतीत हो जानेपर तुम (अभीष्ट)कार्यके लिये मुझमें ही प्रविष्ट हो जाओगे॥ ४५-४७॥
(भगवान्ने पुनः कहा-) मुनिश्रेष्ठो! मुझे प्रणामकरवह राजा अपनी नगरीमें गया और पृथ्वीका पालन-पोषण करने लगा। यथासमय मृत्यु होनेपर वह मेरेस्थान-श्वेतद्वीपको प्राप्त हुआ और वहाँ मेरे साथयोगियोंके लिये भी अलभ्य दिव्य वैष्णव भोगोंकोभोगकर पुन: मेरी ही आज्ञासे ब्राह्मण-कुलमें उत्पन्नहुआ॥ ४८-४९॥
जिसमें अविनश्वर गूढ़ स्वरूपवाली विद्या एवंअविद्या-ये दोनों प्रतिष्ठित हैं तथा जिसे ज्ञानीजनपरब्रह्मके नामसे जानते हैं, उस वासुदेव नामवालेमुझे जानकर इन्द्रद्युम्नने व्रत, उपवास, नियम, होमतथा ब्राह्मणोंकी संतुष्टि आदि उपायोंद्वारा सभीप्राणियोंके एकमात्र आश्रय परमेश्वरकी आराधनाकी॥५०-५१॥
वह उन्हींकी मङ्गलकामना करते हुए उन्हींकोनमस्कार करता था, उनमें ही उसकी अनन्य निष्ठाथी तथा वह उन्हींके आश्रित होकर योगियोंके हृदयप्रदेशमेंविराजमान रहनेवाले महादेवकी आराधना करने लगा।उसके इसी प्रकार आराधना करते हुए एक दिन वैष्णवीशक्तिने भगवान् विष्णुसे प्रादुर्भूत दिव्य स्वरूप उसेदिखलाया। भगवान् विष्णुकी प्रिया देवी विष्णुप्रियाकादर्शनकर उसने सिर झुकाकर विनीतभावसे उन्हें प्रणामकिया और विविध स्तुतियोंके द्वारा उनकी स्तुतिकरहाथ जोड़कर कहा-॥५२-५४॥
इन्द्रद्युम्नने कहा-वैष्णव चिह्नोंवाली, मङ्गलमयीतथा विशाल नेत्रोंवाली हे देवि! आप कौन हैं? आपकाजो यथार्थ स्वरूप हो उसे इस समय मुझे बतलायें ॥५५॥
इन्द्रद्युम्नके वचन सुनकर अत्यन्त सुप्रसन्ना सुमङ्गलावह देवी विष्णुका स्मरणकर उस प्रिय ब्राह्मणसे हँसतीहुई बोली- ॥५६॥
मैं उन विष्णुकी प्रकृतिस्वरूपा परा माया हूँ। मुझअद्वितीय नारायणस्वरूपा नारायणीको मुनि तथा इन्द्रआदि देवता भी नहीं देख पाते हैं। सूक्ष्म विचार करनेपरमुझमें और नारायणमें कोई भेद नहीं दीखता। मैं उनकी प्रकृति रूपा हूँ, वे विष्णु पर ब्रह्म हैं, परमेश्वर हैं। समस्तभूत (प्राणियों)-के आश्रयभूत उन परमेश्वर की जोज्ञानयोग अथवा कर्मयोग द्वारा यहाँ आराधना करते हैं ऐसे भक्तों पर मेरा कोई वश नहीं चलता। अतः तुम कर्मयोग का आश्रय लेते हुए ज्ञान के द्वारा उन आदि और अन्त से रहित अनन्त भगवान् विष्णु की आराधना करो। इससे तुम मोक्ष प्राप्त करोगे॥५७-६०॥
ऐसा कहे जाने पर अत्यन्त बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठ उस इन्द्रद्युम्न ने देवी को विनयपूर्वक प्रणाम किया और हाथ जोड़कर पुनः कहा-हे परमेश्वरी देवि! शाश्वत, अखण्ड तथा अच्युत सबके स्वामी उन भगवान्को किस प्रकार जाना जा सकता है, यह मुझे बतलायें ॥६१-६२॥
ब्राह्मण (इन्द्रद्युम्न)-के द्वारा इस प्रकार कहे जानेपरकमलमें निवास करनेवाली देवीने उस मुनिसे कहा-'साक्षात्नारायण ही तुम्हें (वह) ज्ञान प्रदान करेंगे। तदनन्तर प्रणामकर रहे उस मुनि (इन्द्रद्युम्न)-को अपने दोनों हाथोंसे भली-भाँति स्पर्श कर ( वे देवी) परात्पर विष्णुका स्मरणकरती हुई वहीं अन्तर्धान हो गयीं ॥६३-६४ ॥
इन्द्रद्युम्न भी शरणागतके दुःखोंको सर्वथा दूर करदेनेवाले हृषीकेश भगवान् नारायणका दर्शन करनेकेलिये दीर्घकालीन समाधिमें निरत होकर आराधना करनेलगा। तत्पश्चात् बहुत समय बीत जानेपर पीताम्बरधारी, जगन्मूर्ति महायोगी भगवान् नारायण उसके सामने स्वयंप्रकट हो गये। अविनाशी परमात्मा भगवान् विष्णुकोआया हुआ देखकर घुटनोंके बल पृथ्वीपर स्थित होकरवह गरुडध्वजदेवकी स्तुति करने लगा ॥ ६५-६७॥
इन्द्रद्युम्नने कहा-हे यज्ञोंके स्वामी! अच्युत! गोविन्द!माधव! अनन्त ! केशव! कृष्ण! विष्णु! तथा हृषीकेश!आप विश्वात्माको नमस्कार है। पुराण-पुरुष! विश्वमूर्ति हेहरि! आप सृष्टि, स्थिति तथा प्रलयके मूल कारण हैं, आप अनन्त शक्तिसम्पन्न हैं, आपको नमस्कार है। आपनिर्गुण-स्वरूप हैं, निष्कल एवं विमलात्मा हैं, आपकोनमस्कार है। हे विश्वरूप पुरुष! आपको नमस्कार है।विश्वकी योनि, वासुदेव भगवान् विष्णुको नमस्कार है।आप आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित ज्ञानद्वारा जानने योग्यहैं, आपको नमस्कार है। निर्विकार तथा प्रपञ्चरहितआपको नमस्कार है। भेद-अभेदसे रहित आनन्द-स्वरूपआपको नमस्कार है। (संसारसागरसे) पार उतारनेवाले, शान्तस्वरूप आपको नमस्कार है। शुद्धात्मा आपको नमस्कारहै। आप अनन्तमूर्तिवाले हैं, अमूर्त हैं, आपको बार-बारनमस्कार है। आप परमार्थरूप हैं, आपको नमस्कार है।आप मायासे अतीत हैं, आपको नमस्कार है। ईशोंके भीईश! आपको नमस्कार है। परमात्मा परब्रह्मरूप आपकोनमस्कार है। अत्यन्त सूक्ष्मरूप आपको नमस्कार है।देवोंके भी देव महादेव! आपको नमस्कार है। विशुद्धस्वरूपशिव! आपको नमस्कार है। परमेष्ठीस्वरूप आपको नमस्कारहै॥६८-७५॥
आपने ही सम्पूर्ण सृष्टिकी रचना की है। आप ही परमगति हैं। हे पुरुषोत्तम! आप ही सभी भूत-प्राणियोंके पिता हैंऔर आप ही सबकी माता हैं। आप अविनाशी हैं, परम धामहैं, चित्स्वरूप हैं, व्योम हैं, निष्कल हैं, सबके आधार हैं,अव्यक्त हैं, अनन्त हैं और तमसे सर्वथा रहित नित्य प्रकाशस्वरूपहैं। (ज्ञानीजन) केवल ज्ञानरूपी दीपककेद्वारा जिस परमात्माकादर्शन करते हैं, मैं आपके उस रूपकी शरण ग्रहण करता हूँ,वह विष्णुका परमपद है॥७६-७८॥
इस प्रकार स्तुति करते हुए इन्द्रद्युम्रका सभीप्राणियोंके आत्मरूप भूतभावन भगवान् विष्णुने अपने ।दोनों हाथोंसे किञ्चित् मुसकराते हुए स्पर्श किया ॥७९॥
भगवान् विष्णुके द्वारा स्पर्श करते ही मुनिश्रेष्ठ (इन्द्रद्युम्न)-को उन भगवान्की कृपासे परम तत्त्वका ।यथार्थ ज्ञान प्राप्त हो गया। इसके बाद अत्यन्त प्रसन्नमनसे इन्द्रद्युम्नने प्रफुल्लित कमलके समान नेत्रवाले, पीताम्बरधारी अच्युत भगवान् जनार्दनको प्रणाम करकहा-॥८०-८१ ॥
हे पुरुषोत्तम! आपकी कृपासे मुझे परमानन्दकीप्राप्ति करानेवाला एकमात्र ब्रह्मसम्बन्धी संदेहरहित ज्ञानप्राप्त हो गया है। हे भगवन्! हे वासुदेव! हे वेधा!आपको नमस्कार है। हे योगेश! हे जगन्मय! मैं क्याकरूँ, उसे आप मुझे बतलायें ॥८२-८३॥
इन्द्रद्युम्नके वचन सुनकर माधव भगवान् नारायणनेसमस्त संसारके कल्याणकी कामनासे मुसकराते हुए यहवचन कहा-॥८४॥
श्रीभगवान् बोले-वर्ण एवं आश्रमधर्मका पालनकरनेवाले व्यक्तियोंको चाहिये कि वे ज्ञान एवं भक्तियोगकेद्वारा भगवान् महेश्वरकी पूजा करें, अन्य साधनसे नहीं।मोक्षार्थीको चाहिये कि उस परम तत्त्व, विभूति एवंकार्यकारणरूपको ठीक-ठीक जानकर साथ ही मेरीप्रवृत्तिको समझकर ईश्वरकी उपासना करे। सभी प्रकारकीआसक्तियोंका सर्वथा परित्याग कर, इस संसारको माया-रूप जानकर अपनेमें अद्वैतकी भावना करे* । (ऐसा करनेसेइन्द्रद्युम्न! तुम) परमेश्वरका दर्शन करोगे॥ ८५-८७॥
ब्रह्मन् इन्द्रद्युम्न ! तीन प्रकारकी भावनाएँ कही गयीहैं, उन्हें मैं बताता हूँ, तुम सुनो-उन तीनोंमेंसे पहलीभावना है मद्विषया अर्थात् मेरे सगुण स्वरूपकी भावना ।दूसरी है व्यक्तसंश्रया अर्थात् भगवान्का जो विराट्स्वरूप है, उसका आश्रय ग्रहण कर उपासनाकी भावनाऔर तीसरी जो भावना है उसे ब्राह्मी अर्थात् ब्रह्मज्ञानविषयकभावना जानना चाहिये, यह तीसरी भावना गुणातीतहै (गुणातीतरूपमें ब्रह्मकी उपासना ही ब्राह्मी भावनाहै।) विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि इन तीनोंमेंसे किसीभी भावनाका आश्रय ग्रहण कर उपासना करे॥८८॥
जो असमर्थ व्यक्ति है उसे चाहिये कि वह प्रथमभावना अर्थात् वैष्णवी भावनाका अवलम्बन ग्रहणकरे-ऐसा वेदका मत है। इसलिये (इन्द्रद्युम्न! तुम)समस्त प्रयत्नोंके द्वारा सम्पूर्ण संसारके स्वामी भगवान्विष्णुकी आराधना करो, उनमें ही निष्ठा रखो औरउन्हींका आश्रय ग्रहण कर उन्हींके शरणागत हो जाओ, इससे तुम मोक्ष प्राप्त करोगे॥८९-९० ॥
इन्द्रद्युम्न बोले-हे जनार्दन! वह परात्पर तत्त्व क्याहै, विभूति क्या है? कार्य क्या है और कारण क्या है? आप कौन हैं ? और आपकी प्रवृत्ति क्या है ? ॥ ९१ ॥
श्रीभगवान् बोले-वह परसे परतर तत्त्व एकमात्रअखण्ड परम ब्रह्म ही है। वह नित्य आनन्दस्वरूप है, स्वयं प्रकाशमान है, अविनाशी है और तम (अन्धकार)-से सर्वथा परे है। उस परमात्माका जो नित्य रहनेवालाऐश्वर्य है, वही विभूति नामसे कहा जाता है। यह संसारही (परमात्माका) कार्यरूप है और अविनाशी विशुद्धअव्यक्त तत्त्व ही (इस संसारका) कारणरूप है। मैं हीसमस्त प्राणियोंमें रहनेवाला अन्तर्यामी ईश्वर हूँ। सृष्टि, पालन और संहार ही मेरी प्रवृत्ति कही जाती है। हेद्विज! इन सभी बातोंको यथार्थरूपसे जानकर तुमकर्मयोगके द्वारा श्रद्धाभावसे (उस) सनातन (ईश्वर)-की भलीभाँति अर्चना करो॥ ९२-९५॥
इन्द्रद्युम्नने कहा-(भगवन्!) वर्णों तथा आश्रमोंकेवे कौनसे पालनीय नियम हैं, जिनसे (उस) परतत्त्वकीआराधना की जाती है और वह दिव्य ज्ञान कैसा है जोतीन भावनाओंसे युक्त है ? (परमात्माने) पूर्वकालमें इस (संसार)-की सृष्टि कैसे की और फिर कैसे इसकासंहार होता है, लोकमें कितनी सृष्टियाँ हैं, कितने वंशहैं, कितने मन्वन्तर हैं। उनके कितने प्रमाण हैं औरपवित्र व्रत तथा तीर्थ कौन-से हैं। सूर्य आदि ग्रहोंकीस्थिति कैसी है, पृथ्वीकी लंबाई-चौड़ाई कितनी है, कितने द्वीप, समुद्र, पर्वत हैं और कितने नद हैं औरकितनी नदियाँ हैं, हे पुण्डरीकाक्ष! इस समय यह सबमुझे यथार्थरूपसे बताइये ॥९६-९८॥
श्रीकूर्मने कहा-हे श्रेष्ठ मुनियो! उस इन्द्रद्युम्नके
द्वारा मुझसे इस प्रकार कहे जानेपर भक्तोंपर अनुकम्पाकरनेकी कामनासे मैंने वे सभी बातें विस्तारसे ठीक-ठीक उसे बतला दी॥ ९९॥
इस प्रकार उस ब्राह्मण इन्द्रद्युम्नने जो-जो भी मुझसेपूछा था, वह सब विस्तारसे बतलाकर और उसपर कृपाकरके मैं वहीं अन्तर्धान हो गया । १०० ॥
उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने भी मेरे द्वारा बताये गये विधानसेअत्यन्त पवित्र भावनासे समाहित-चित्त होकर परमतत्त्वकी उपासना की। उसने अपने स्त्री-पुत्र आदिकामोह छोड़ दिया, सुख-दु:ख आदि द्वन्द्वोंसे रहित होगया, किसी भी वस्तुका संग्रह करना सर्वथा त्याग करअपरिग्रही हो गया और सभी कर्मोंका परित्याग करउसने परम वैराग्यका आश्रय ग्रहण किया। अपनीआत्मामें ही परमात्माका दर्शन करके और अपनीआत्मामें ही सम्पूर्ण विश्वका अनुभव कर अक्षर-तत्त्व-सम्बन्धी अन्तिम ब्राह्मी भावनाको प्राप्त किया, जिसकेकारण उसे उस दुर्लभ परम योगकी प्राप्ति हुई। इसयोगसे ही उस अद्वितीय तत्त्वका साक्षात्कार होता हैजिसकी अभिलाषा निद्रात्यागी, श्वासजयी, मोक्षार्थीपुरुष भी करते हैं॥१०१-१०४॥
इसके बाद किसी दिन वह ब्राह्मण श्रेष्ठ योगीन्द्रइन्द्रद्युम्न भगवान् सूर्यके निर्देशसे अव्यय ब्रह्मका दर्शनकरनेके लिये अपनी योग-सिद्धिके प्रभावसे प्रादुर्भूतसूर्यके समान प्रकाशमान श्रेष्ठ विमानमें चढ़कर आकाशमार्गसेमानसरोवरके उत्तरमें स्थित पर्वतपर गया। उस योगिराजइन्द्रद्युम्नको आकाशमार्गमें जाते हुए देखकर देवों, गन्धर्षों तथा अप्सराओंका समूह भी उसके पीछे-पीछेगया और अन्य सिद्ध तथा ब्रह्मर्षियोंने भी उसकाअनुसरण किया॥१०५-१०६॥
तदनन्तर वहाँ जाकर इन्द्रद्युम्नने देवताओंद्वारा वन्दिततथा योगियोंद्वारा सेवित पर्वतके उस स्थानपर प्रवेशकिया, जहाँ परम पुरुष परमात्मा प्रतिष्ठित रहते हैं। दसहजार सूर्योंके प्रकाशके समान प्रकाशित उस श्रेष्ठ स्थानपरपहुँचकर (इन्द्रद्युम्नने) देवताओंके लिये भी दुष्प्राप्य (उस स्थानके) अन्तर्गृहमें प्रवेश किया॥१०७-१०८॥
(वहाँ पहुँचकर उसने) सभी प्राणियोंके परमशरणदाता, आदि-अन्तसे रहित, देवाधिदेव पितामहब्रह्मदेवका ध्यान किया। इसके बाद उसके ध्यान करतेही वहाँ परमात्माका प्रकाश प्रादुर्भूत हुआ।॥१०९-११०॥
उस प्रकाशपुञ्जके मध्यमें महान् तेजकी राशिके रूपमेंब्रह्मविद्वेषियोंके लिये अगम्य, परमपदस्वरूप पूर्व पुरुषकादर्शन किया, जो चार मुखवाले थे, जिनके सभी अङ्गशुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थे और प्रकाशकी किरणोंसेसुशोभित थे॥१११॥
समीपमें आये प्रणाम करते हुए योगी इन्द्रद्युम्नकोदेखकर वह विश्वात्मा ब्रह्मदेव स्वयं भी उसकेसमीपमें गये और उसको अपने हृदयसे लगाया।ब्रह्मदेवके द्वारा आलिङ्गन करते ही उस ब्राह्मणश्रेष्ठइन्द्रद्युम्नके शरीरसे एक महान् प्रकाश निकला, जोआदित्य-मण्डलमें प्रविष्ट हो गया। वह पवित्र निर्मलपद (आदित्य-मण्डल) ऋक्-यजुः एवं साम नामवालाहै। जिस स्थानमें हव्य (देवताओंको प्राप्त होनेवालाहवनीय द्रव्य) तथा कव्य (पितरोंको प्राप्त करायाजानेवाला श्राद्धीय पदार्थ)-का उपभोग करनेवालेभगवान् हिरण्यगर्भ निवास करते हैं। वह (स्थान)वेदान्तमें प्रतिपादित योगी जनोंका आद्य प्रवेश-द्वारहै, ब्रह्मतेजसे सम्पन्न है, श्रीयुक्त है और वहमनीषियोंकी निष्ठा भी है। ११२-११४ ॥
भगवान् ब्रह्माके देखते ही देखते वह मुनि इन्द्रद्युम्नतेजसे सम्पन्न हो गया और उसने सर्वत्र व्याप्त, परमकल्याणकारी, अत्यन्त शान्त स्वात्मस्वरूप, अक्षर, व्योम उस परमेश्वर-सम्बन्धी तेजको देखा। वह विष्णुकापरम पद है। केवल आनन्दरूप, अचल वह ब्रह्मकास्थान परमेश्वररूप है। सभी प्राणियोंको अपनी ही आत्मासमझनेवाला वह योगी इन्द्रद्युम्न परम ऐश्वर्यमें प्रतिष्ठितहो गया और उसने 'मोक्ष' पदसे कहे जानेवाले उसअव्यय परमात्मधामको प्राप्त कर लिया ॥ ११५-११७॥
इसलिये सभी प्रयत्नोंसे वर्ण एवं आश्रमके नियमोंकापालन करते हुए अन्तिम भावका आश्रय ग्रहण करविद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि वह लक्ष्मीरूप मायासेपार उतरे ॥ ११८॥
सूतजी बोले-हरिके द्वारा इस प्रकार कहनेपरइन्द्रसहित नारद आदि सभी महर्षियोंने गरुडध्वजभगवान् विष्णुसे पूछा- ॥ ११९ ।।
ऋषियोंने कहा-हे देवाधिदेव! हे हृषीकेश! हेनाथ! हे अमलरूप नारायण! जो आपने पूर्वकालमेंब्राह्मण इन्द्रद्युम्नसे धर्मादि-सम्बन्धी ज्ञान कहा था, वहसब आप हमें बतलायें। हे जगन्मूर्ति! ये आपके सखाइन्द्र भी सुननेके लिये इच्छुक हैं॥१२०-१२१ ।।
इसके बाद (सूतजीने कहा-) रसातलमें स्थितकूर्मरूपी जनार्दन भगवान् विष्णुदेवने नारदादि महर्षियोंकेद्वारा (इस प्रकार) पूछे जानेपर जिस श्रेष्ठ सम्पूर्णकूर्मपुराणको देवराज इन्द्रके समीप सुनाया था, मैं उसेआप लोगोंको सुनाता हूँ॥१२२-१२३ ॥
हे ब्राह्मणो! (इस कूर्म) पुराणका सुनना मनुष्योंकेलिये यशकी प्राप्ति करानेवाला, दीर्घ आयु प्रदानकरानेवाला, पुण्य प्रदान करानेवाला, कृतकृत्य करानेवालातथा मोक्ष प्रदान करानेवाला है। इस पुराणके वाचनकरनेकी तो और भी विशेष महिमा है। इसके मात्र एकअध्यायके सुननेसे ही सभी प्रकारके पापोंसे (व्यक्ति)मुक्त हो जाता है। अधिक क्या कहा जाय, केवल एकउपाख्यानके श्रवणमात्रसे ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होतीहै। इस श्रेष्ठ कूर्मपुराणको कूर्मरूपधारी देवाधिदेव स्वयंभगवान् विष्णुने कहा है, द्विजातियोंको इसपर अवश्यश्रद्धा रखनी चाहिये ॥ १२४-१२६ ।।
Summary of chapter 1 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
In the sacred forest of Naimishāraṇya, during a grand long-term Yajña, the holy Mahārshis approach Sūta Lomaharshaṇa, the venerable disciple of Maharshi Vedavyāsa, seeking the divine nectar of the Kūrma Purāṇa. Sūta bows to his Guru Maharshi Vedavyāsa and recounts how Bhagavān Vishṇu, assuming the glorious Kūrmāvatāra during the churning of the Kshīrasāgara to support Mount Mandara, revealed this divine Purāṇa. As Goddess Lakshmī manifested from the churning ocean, Purushottama Vishṇu embraced Her and revealed Her true nature to Sage Nārada and the Devas as the supreme unmanifest Māyā, non-different from Parabrahma, who binds worldly beings while freeing sincere seekers. Bhagavān Vishṇu then narrated the holy history of King Indradyumna, a devout monarch who worshipped Shambhu and Vishṇu, received spiritual direction from the divine Kalā of Goddess Lakshmī, and performed rigorous Tapas. Through intense single-minded devotion, Indradyumna witnessed the magnificent form of Bhagavān Vishṇu, received instruction in three-fold spiritual contemplation, traveled via the solar path to the realm of Brahmā, and ultimately achieved complete Moksha and eternal union with the Supreme.