कूर्म महा पुराण
2 अध्याय
श्रीकूर्मने कहा-समस्त ऋषिगणो! संसारकेकल्याणके लिये आप लोगोंने जो कुछ मुझसे पूछा हैऔर इन्द्रद्युम्नके प्रति मैंने जो कुछ कहा है, वह सब मैंबतला रहा हूँ, आप लोग सुनें ॥१॥
इस (कूर्म) पुराणमें भूत, वर्तमान एवं भविष्यकालमेंहुए वृत्तान्तोंको विस्तारसे बतलाया गया है। यह पुराणमनुष्योंको पुण्य प्रदान करनेवाला और मोक्षधर्मकावर्णन करनेवाला है॥२॥
मैं ही नारायण देवरूपसे पूर्वकालमें विद्यमान था।मेरे अतिरिक्त और कोई दूसरा न था॥३॥
मैं प्रगाढ़ योगनिद्राका आश्रय लेकर शेष-शय्या में पड़ा था। मुनिश्रेष्ठो! रात्रिके बीत जानेपर जागकर मैं पुन: सृष्टिविषयक चिन्तन करने लगा। उसी समय अकस्मात् मुझे प्रसन्नता प्राप्त हुई॥४॥
तदुपरान्त समस्त संसारके पितामह चतुर्मुख ब्रह्मा का आविर्भाव हुआ। इसी बीच किसी कारणसे अकस्मात् उस समय क्रोध उत्पन्न हुआ। हे मुनिश्रेष्ठो! (उस समय) क्रोधात्मज अपने तेजके द्वारा मानो त्रैलोक्यका संहार करनेके लिये हाथमें त्रिशूल धारण किये, तीन नेत्रोंवाले सूर्यके समान प्रकाशमान महेश्वर रुद्रदेव वहाँ उत्पन्न हुए॥५-६॥
तदनन्तर कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली, सुन्दर रूप एवं प्रसन्न मुखवाली तथा सभी प्राणियोंको मोहित करनेवाली देवी लक्ष्मी उत्पन्न हुईं। पवित्र मुस्कानवाली, अत्यन्त प्रसन्न, मङ्गलमयी, अपनी महिमामें प्रतिष्ठित, दिव्य कान्तिसे सुसम्पन्न, दिव्य माल्य आदिसे सुशोभित, अविनाशिनी महामाया मूलप्रकृतिरूपा वे नारायणी अपने तेजसे इस (संसार)-को आपूरित करती हुई मेरे समीपमें आकर बैठ गयीं। उन्हें देखकर संसारके स्वामी भगवान् ब्रह्मा मुझसे कहने लगे-हे माधव! सम्पूर्ण प्राणियोंको मोहित करनेके लिये इन सुरूपिणी (देवी)को नियुक्त करो, जिससे यह मेरी सृष्टि और भी अधिक बढ़ने लगे॥७-१०॥
ब्रह्माके द्वारा ऐसा कहे जानेपर मैंने मुसकराते हुए देवी लक्ष्मीसे कहा-हे देवि! मेरे आदेशसे तुम देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंसे युक्त सम्पूर्ण विश्व को (अपनी मायासे) मोहित कर संसारमें प्रवृत्त करो। (किंतु) जो ज्ञानयोगमें निरत हैं, जितेन्द्रिय हैं, ब्रह्मनिष्ठ हैं, ब्रह्मवादी हैं, क्रोधशून्य हैं तथा सत्यपरायण हैं-ऐसे लोगोंको दूरसे ही छोड़ देना ॥ ११-१२॥
ध्यान करनेवाले, ममतारहित, शान्त, धार्मिक, वेदमें पारंगत, जप-परायण और तपस्वी विप्रोंको दूरसे ही छोड़ देना। वेद एवं वेदान्तके विशेष ज्ञानसे जिनके सम्पूर्ण संशय सर्वथा दूर हो गये हैं ऐसे तथा बड़े-बड़े यज्ञोंमें परायण द्विजोंको दूरसे ही छोड़ देना। जो जप, होम, यज्ञ एवं स्वाध्यायके द्वारा देवाधिदेव महेश्वरका यजन करते हैं, उनका प्रयत्नपूर्वक दूरसे ही परित्याग कर देना ।। १३-१५॥
जो भक्तियोगमें लगे हुए हैं, जिन्होंने अपना चित्त भगवान्को अर्पण कर दिया है और जो प्राणायाम (धारणा, ध्यान तथा समाधि) आदिमें निरत हैं, ऐसे अमलात्माओं का दूरसे ही त्याग कर देना। जिनका मन प्रणवोपासनामें आसक्त है, जो रुद्र (मन्त्रों)-का जप करनेवाले हैं और जो अथर्वशिरस्के अध्येता हैं, उन धर्मज्ञ व्यक्तियोंको छोड़ देना। और अधिक क्या कहा जाय, जो अपने धर्मका पालन करनेवाले हैं, ईश्वर की आराधना में सतत रत हैं, (हे देवि!) उन्हें मेरे आदेश से कदापि मोहित न करना ॥ १६-१८॥
इस प्रकार मेरे द्वारा प्रेरित हरिप्रिया महामायाने जैसी मेरी आज्ञा थी, उसी प्रकार किया, इसलिये (उन) लक्ष्मीकी आराधना करनी चाहिये। भगवत्पत्नी (देवी महालक्ष्मी) पूजा किये जानेपर विपुल ऐश्वर्य, पुष्टि, मेधा, यश एवं बल प्रदान करती हैं, इसलिये लक्ष्मी की भलीभाँति पूजा करनी चाहिये ॥१९-२०॥
तदनन्तर लोकपितामह भगवान्ने मेरी आज्ञा से पूर्वकी भाँति ही समस्त चराचर भूत-प्राणियोंकी सृष्टि की। योगविद्याके प्रभावसे ब्रह्माजीने मरीचि, भृगु, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ को उत्पन्न किया ॥ २१-२२॥
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ब्रह्माके मरीचि आदि ये नौ 'ब्रह्माण'- संज्ञक पुत्र साधक हैं, ब्रह्मवादी हैं। पितामह विभु देव (ब्रह्मा)-ने मुखसे ब्राह्मणों तथा भुजा से क्षत्रियोंकी सृष्टि की। दोनों जंघाओंसे वैश्योंको तथा पैरसे शूद्रोंको उत्पन्न किया। ब्रह्माने यज्ञकी निष्पत्ति एवं सभी वेदों की रक्षा के लिये शूद्रके अतिरिक्त (अन्य सभी वर्णोंकी) सृष्टि की, क्योंकि उनसे यज्ञका निर्वाह होता है॥ २३-२५॥
ऋक्, यजुः, साम तथा अथर्ववेद ब्रह्माके सहज स्वरूप हैं और यह नित्य अव्यय शक्ति हैं। स्वयम्भू ब्रह्माजीने प्रारम्भमें आदि और अन्तसे रहित वेदमयी दिव्य वागरूपी शक्तिको उत्पन्न किया, जिसके द्वारा सभी व्यवहार होते हैं। पृथ्वीपर इन (वेदों)-से भिन्न जो कोई भी शास्त्र हैं उनमें धीर पुरुषका मन नहीं लगता क्योंकि ऐसे वेदातिरिक्त ग्रन्थोंके अध्ययन से मनुष्य पाखंडी हो जाता है ॥ २६-२८॥
वेदार्थ-ज्ञानमें श्रेष्ठ मुनियोंने प्राचीन समयमें जो कार्य (करने योग्य) बतलाया है, उसीको परम धर्म समझना चाहिये, (वह धर्म वेदातिरिक्त) अन्य शास्त्रोंमें प्रतिपादित नहीं है। वैदिक सिद्धान्तोंके विपरीत बातोंका प्रतिपादन करनेवाली जो स्मृतियाँ (धर्मशास्त्र) हैं और जो कोई भी कुदर्शन (नास्तिक दर्शन) हैं, पारलौकिक दृष्टि से वे सभी निष्फल हैं, इसीलिये वे तामसी कहे गये हैं ।। २९-३०॥
पूर्व कल्पमें जो प्रजा उत्पन्न हुई थी, वह सभी बाधाओंसे रहित थी। सभी लोग निर्मल अन्त:करणवाले थे और सर्वदा अपनी-अपनी धर्म-मर्यादामें स्थिर रहते थे। हे श्रेष्ठ मुनियो! कुछ समय बाद कालकी गति के प्रभावसे उन (लोगों)-में राग, द्वेष (लोभ, मोह तथा क्रोध) आदि उत्पन्न हो गये और स्वधर्ममें बाधा डालनेवाला अधर्म भी उत्पन्न हो गया॥३१-३२॥
(इस कारण) उस समय उनमें (जो पहले सात्त्विक) सहज सिद्धि थी, वह धीरे-धीरे कम होने लगी और रजोगुणमूलक जो अन्य सिद्धियाँ थीं, वे ही उन्हें प्राप्त हुईं। उन सभी (रजोगुणमूलक सिद्धियों)-के भी कालयोग से क्षीण हो जानेपर वे वार्तोपाय अर्थात् कृषि, पशुपालन एवं वाणिज्यरूपी जीविकाके उपाय और कर्मसाध्य (परिश्रमसाध्य) हस्तसिद्धि अर्थात् शिल्पशास्त्र (हाथों के माध्यमसे किये जानेवाले शिल्प, मूर्ति-कला आदि) के उपाय करने लगे। तब विभु ब्रह्माजीने उन लोगोंके लिये कर्म एवं आजीविकाकी व्यवस्था की॥३३-३४॥
हे ब्राह्मणो! ब्रह्मासे उत्पन्न साक्षात् प्रजापति स्वरूप धर्मदर्शी स्वायम्भुव मनुने पूर्वकालमें धर्मोंका उपदेश किया (जो मनुस्मृतिके नामसे प्रसिद्ध हुई)। तदनन्तर उनके मुखसे उसे सुनकर भृगु आदि महर्षियोंने धर्मों का वर्णन किया ॥ ३५॥
श्रेष्ठ ब्राह्मणो! यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना, दान लेना, अध्ययन और अध्यापन-ये ब्राह्मणोंके छः कर्म हैं। दान, अध्ययन और यज्ञ-ये तीन क्षत्रिय और वैश्य के (सामान्य) धर्म हैं, दण्ड-विधान और युद्ध क्षत्रियका तथा कृषिकर्म वैश्यका प्रशस्त कर्म है। द्विजातियोंकी सेवा करना शूद्रों के लिये एकमात्र धर्मका साधन है। धर्मानुसार पाकयज्ञ तथा शिल्पविद्या उनकी आजीविका है॥३६-३८॥
तदनन्तर वर्णों की व्यवस्था स्थिर हो जाने पर (उन्होंने) ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास (इन चार)आश्रमों की स्थापना की ॥३९॥
हे मुनिश्रेष्ठो! अग्नियों (गार्हपत्य, आहवनीय तथा दक्षिणाग्नि)-की उपासना, अतिथि-सेवा, यज्ञ, दान एवं देवताओं की पूजा-यह संक्षेप में गृहस्थ का धर्म है। हवन, कन्द-मूल-फलका सेवन, स्वाध्याय तथा तप, न्यायपूर्वक (सम्पत्तिका) विभाजन-यह वानप्रस्थोंका धर्म है। भिक्षावृत्तिसे प्राप्त पदार्थों का सेवन, मौनव्रत, तप, सम्यक्-ध्यान, सम्यक्-ज्ञान तथा वैराग्य-यह संन्यासियोंका धर्म है। भिक्षा माँगना, गुरुकी सेवा करना, स्वाध्याय, संध्याकर्म
तथा अग्निकार्य-यह ब्रह्मचारियों का धर्म है॥ ४०-४३॥
श्रेष्ठ ब्राह्मणो! कमलसे प्रादुर्भूत ब्रह्माजीने ब्रह्मचर्य को ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ तथा संन्यासीका साधारण धर्म कहा है अर्थात् ब्रह्मचर्य तीनों आश्रमियोंका सामान्य धर्म है। ऋतुकाल (स्त्री के रजस्वलाकी चार रात्रियोंको छोड़कर)- में, विशेष पर्वो को छोड़कर अपनी पत्नी में गमन करना गृहस्थ के लिये 'ब्रह्मचर्य' ही कहा गया है, अन्य रात्रियों में नहीं। प्रथम गर्भ धारण करने तक उसे बिना किसी प्रमादके इस नियम का पालन करना चाहिये। हे विप्रेन्द्रो! ऐसा न करनेवाला (गृहस्थ) भ्रूणघाती होता है ॥ ४४-४६ ॥
यथाशक्ति प्रतिदिन वेद का स्वाध्याय, श्राद्ध, अतिथि सेवा तथा देवताओं की पूजा-यह गृहस्थ का श्रेष्ठ धर्म है। किसी दूसरे देश में जाने पर अथवा पत्नी के मर जाने पर भी गृहस्थ को चाहिये कि वह प्रात:काल और सायंकाल विधिपूर्वक विवाहाग्नि (गार्हपत्याग्नि)-को प्रज्वलित करता रहे ॥ ४७-४८॥
गृहस्थ-आश्रमको तीनों आश्रमों (ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ तथा संन्यास)-का बीज कहा जाता है, क्योंकि तीनों आश्रमोंके लोग गृहस्थाश्रमीपर ही निर्भर रहते हैं, इसलिये गृहस्थाश्रमी सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। वेदों का अभिमत है कि केवल गृहस्थाश्रममें ही अन्य तीनों आश्रमों का (समावेश) होता है, इसलिये एकमात्र गार्हस्थ्यको ही धर्मका साधन जानना चाहिये ॥४९-५०॥
धर्मसे रहित जो अर्थ एवं काम नामक (पुरुषार्थ)हैं, उनका परित्याग करना चाहिये। साथ ही सभी प्रकारसे जो लोकविरुद्ध हो उस धर्मका भी आचरण नहीं करना चाहिये॥५१॥
धर्म से अर्थ की प्राप्ति होती है, धर्म से ही काम की भी सिद्धि होती है और धर्म (-के आचरण)-से ही मोक्ष प्राप्त होता है, इसलिये धर्म का ही आश्रय लेना चाहिये ॥५२॥
धर्म, अर्थ और कामरूपी त्रिवर्ग (क्रमशः) सत्त्व, रज और तमरूपी त्रिगुण से युक्त है, इसलिये धर्म का आश्रय ग्रहण करना चाहिये। सात्त्विक गुणों का आश्रय लेनेवाले ऊर्ध्व लोक को प्राप्त करते हैं, राजसी व्यक्ति मध्य लोकमें रहते हैं तथा तमोगुण के कार्य में स्थित तामसी व्यक्ति अधोगति को प्राप्त होते हैं। जिस व्यक्ति में धर्म से समन्वित अर्थ और काम प्रतिष्ठित रहते हैं, वह इस लोक में सुखों का उपभोग कर मृत्यु के उपरान्त मोक्ष प्राप्त करने में समर्थ होता है॥५३-५५॥
धर्म से (धर्माचरण से) मोक्ष की प्राप्ति होती है और अर्थ से काम की सिद्धि होती है। इस प्रकार चार प्रकार के पुरुषार्थों में साधन और साध्य का वर्णन दिखाया गया। जो मानव धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष के इस प्रकार बताये गये माहात्म्य को जानता है और तदनुसार आचरण करता है, वह मोक्ष (प्राप्त) करने में समर्थ होता है। इसलिये (धर्मविरुद्ध) अर्थ एवं काम (-रूपी पुरुषार्थ)-का सर्वथा परित्याग कर धर्म का ही आश्रय ग्रहण करना चाहिये। धर्म से ही सब कुछ सिद्ध हो जाता है-ऐसा ब्रह्मवादियों का कहना है॥५६-५८॥
धर्म के द्वारा ही स्थावर-जंगमात्मक सारा विश्व धारण किया जाता है। हे द्विजोत्तमो! यह (धर्मशक्ति) ब्रह्माजी की वह ब्राह्मी शक्ति है जो आदि और अन्त से रहित है। कर्म एवं ज्ञान-दोनों के द्वारा ही धर्म की प्राप्ति होती है, इसमें कोई संदेह नहीं। इसलिये ज्ञानके साथ ही कर्मयोग का भी आचरण ग्रहण करना चाहिये॥५९-६०॥
प्रवृत्त एवं निवृत्त-इस प्रकार से वैदिक कर्म दो प्रकार का होता है। निवृत्त कर्म ज्ञानपूर्वक एवं प्रवृत्त कर्म इससे भिन्न प्रकार का होता है। निवृत्त कर्म का सेवन करनेवाला उस परमपद (मोक्ष)-को प्राप्त करता है। अतः निवृत्तकर्म (निवृत्तिमार्ग)-का ही सेवन करना चाहिये, इससे अन्यथा करने पर पुन: संसारमें आना पड़ता है।६१-६२॥
क्षमा, दम (इन्द्रियनिग्रह), दया, दान, अलोभ, त्याग, आर्जव (मन-वाणी आदि की सरलता), अनसूया, तीर्थानुसरण अर्थात् गुरु एवं शास्त्र का अनुगमन या तीर्थसेवन, सत्य, संतोष, आस्तिकता (वेदादि शास्त्रों में श्रद्धा), श्रद्धा, जितेन्द्रियत्व, देवताओंका अर्चन, विशेष रूपसे ब्राह्मणोंकी पूजा, अहिंसा, मधुर भाषण, अपिशुनता तथा पाप से राहित्य-स्वायम्भुव मनुने चारों वर्गों के लिये ये सामान्य धर्म कहे हैं। ६३-६५ ॥
अपने ब्राह्मण-धर्म का यथावत् पालन करनेवाले क्रिया-निष्ठ ब्राह्मणों के लिये प्राजापत्य स्थान (प्राजापत्य लोक)तथा संग्राम में पलायन न करनेवाले क्षत्रियों के लिये केन्द्र-स्थान (इन्द्रलोक) सुनिश्चित है। इसी प्रकार स्वधर्म का पालन करनेवाले वैश्यों के लिये मारुत-स्थान (वायुलोक) और परिचर्यारूप स्वधर्मका पालन करनेवाले शूद्र जातिवालों के लिये गन्धर्वलोक सुनिश्चित है॥६६-६७॥
ऊर्ध्वरेता अट्ठासी हजार (शौनक आदि) ऋषियों का जो स्थान है, वही स्थान गुरु के अन्तेवासी ब्रह्मचारियों को प्राप्त होता है। सप्तर्षियों का जो स्थान है, वही स्थान वनमें रहनेवाले वानप्रस्थियों को प्राप्त होता है और स्वयम्भू ब्रह्मा ने गृहस्थों के लिये प्राजापत्य स्थान (प्राजापत्य लोक) की प्राप्ति बतलायी है॥६८-६९॥
समाहित-चित्त यतात्मा ऊर्ध्वरेता संन्यासियों को हिरण्यगर्भ नामक वह स्थान प्राप्त होता है, जहाँसे पुनः लौटना नहीं पड़ता। योगियोंको अविनाशी वह व्योमसंज्ञक श्रेष्ठ अमरस्थान प्राप्त होता है जो आनन्दस्वरूप और ऐश्वर धाम है, वही पराकाष्ठा (अन्तिम) और परम गति है ॥७०-७१॥
ऋषियों ने कहा-देवताओं के शत्रुओं का विनाश करनेवाले, हिरण्याक्ष का वध करनेवाले हे भगवन्! (आपने) चार आश्रम बताये (किंतु) योगियोंके लिये एक ही आश्रम बतलाया ॥ ७२॥
श्री कूम ने कहा-सभी कर्मों का परित्याग कर एकमात्र अचल समाधि में निरन्तर स्थिर रहनेवाला जो निश्चल योगी है, वही संन्यासी होता है, अत: (चार ही आश्रम होते हैं) पाँचवाँ कोई आश्रम नहीं होता। वेदमें बतलाया गया है कि सभी आश्रम दो प्रकारके होते हैं। ब्रह्मचारीके दो भेद हैं-उपकुर्वाण और नैष्ठिक ब्रह्मतत्पर ॥ ७३-७४ ॥
जो ब्रह्मचारी विधिवत् वेदों का अध्ययन कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है, उसे उपकुर्वाणक ब्रह्मचारी समझना चाहिये और जो यावज्जीवन गुरु के पास रहकर ब्रह्मविद्या का अभ्यास करता है, वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहलाता है। ७५ ॥
(इसी प्रकार) गृहस्थाश्रमी भी दो प्रकारका होता है-(१) उदासीन और (२) साधक। जो कुटुम्ब के भरण-पोषणमें लगा रहता है, वह गृहस्थ साधक कहलाता है और जो देवऋण, पितृऋण एवं ऋषिऋण-इन तीन ऋणोंसे उऋण होकर स्त्री, धन आदि का परित्याग कर देता है तथा एकाकी विचरण करता है, वह मोक्ष-प्राप्तिकी इच्छावाला गृहस्थ उदासीन कहलाता है॥ ७६-७७॥
जो वन में अनुष्ठान करता है, देवताओं की पूजा करता है, हवन करता है और स्वाध्यायमें निरत रहता है, वह वनमें रहनेवाला 'तापस' नामक वानप्रस्थ कहलाता है और जो अत्यन्त तपसे अपने शरीरको कृश कर लेता है तथा निरन्तर ध्यानपरायण रहता है, वह वानप्रस्थ-आश्रम में रहनेवाला सांन्यासिक वानप्रस्थी कहलाता है॥७८-७९॥
नित्य योगाभ्यास में रत रहनेवाला, मोक्षमार्ग में आरूढ़ होने की इच्छावाला, जितेन्द्रिय तथा ज्ञानप्राप्तिके लिये प्रयत्नशील संन्यासीको 'पारमेष्ठिक' संन्यासी कहा जाता है और जो केवल आत्मामें ही रमण करनेवाला है, नित्य-तृप्त महामुनि है, सम्यक्-दर्शन-सम्पन्न है वह संन्यासी 'योगी' कहलाता है॥८०-८१॥
पारमेष्ठिक (संन्यासी)-के तीन भेद होते हैं-(१) कोई ज्ञान संन्यासी होते हैं, (२) कोई वेदसंन्यासी होते हैं और (३) कोई कर्मसंन्यासी होते हैं। (इसी प्रकार) योगी भी तीन प्रकार का समझना चाहिये-पहला भौतिक, दूसरा सांख्य और तीसरे प्रकार का योगी अत्याश्रमी कहा गया है, जो श्रेष्ठ योग में ही नित्य स्थित रहता है। पहले भौतिक योगी में प्रथम भावना, (दूसरे) सांख्ययोगीमें अक्षर-भावना और तीसरे अत्याश्रमी नामक योगी में जो अन्तिम भावना रहती है, वह पारमेश्वरी भावना कहलाती है॥ ८२-८४॥
इसीलिये (हे ऋषियो!) सभी वेदशास्त्रोंमें चार ही आश्रम निश्चित किये गये हैं, ऐसा जानना चाहिये। पाँचवाँ कोई आश्रम नहीं है।। ८५ ॥
इस प्रकार (चार) वर्ण तथा (चार) आश्रमोंकी सृष्टि करके देवाधिदेव निरञ्जन विश्वात्मा (ब्रह्माजी)-ने दक्ष आदि (प्रजापतियों)-से कहा-'अनेक प्रकारकी सृष्टि करो'। हे मुनिश्रेष्ठो! ब्रह्माजीके कहनेपर उनके दक्ष आदि (मानस) पुत्रोंने देवताओं एवं मनुष्योंके साथ ही अन्य भी सभी प्रजाओं (प्राणियों)-की सृष्टि की ॥ ८६-८७ ॥
इस प्रकार ये भगवान् ब्रह्मा सृष्टिके कार्य में नियत हैं। मैं इस (सृष्टि)-का पालन-पोषण करता हूँ और शूलधारी भगवान् शंकर इसका संहार करेंगे॥८८ ॥
परात्पर परमात्माकी रज, सत्त्व एवं तमोगुण के योगसे (क्रमशः) ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर नामक तीन मूर्तियाँ कही गयी हैं। ये तीनों विग्रह परस्पर एक-दूसरे में अनुरक्त तथा एक-दूसरे के उपजीवी (आश्रित) हैं। ये तीनों परमेश्वर हैं और लीलावश एक-दूसरे को प्रणाम करते रहते हैं। ८९-९०॥
हे ब्राह्मणो! रुद्रमें ब्राह्मी, माहेश्वरी तथा अक्षर (वैष्णवी) नामक तीन प्रकारकी भावनाएँ सर्वदा विद्यमान रहती हैं। मुझमें प्रथम अक्षरभावना निरन्तर प्रवाहित होती रहती है। भगवान् ब्रह्माजीकी द्वितीय अक्षरभावना कही गयी है॥९१-९२॥
पारमार्थिक दृष्टिसे मुझमें और महादेवमें कोई भिन्नता नहीं है। वही अन्तर्यामी ईश्वर अपनी इच्छा से अपनेको विभाजित कर (मेरे तथा महादेवके रूपमें) स्थित है। देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंके साथ ही सम्पूर्ण त्रैलोक्यकी सृष्टि करनेके लिये (इसी परम) पुरुषने अपने परात्पर अव्यक्त स्वरूपद्वारा ब्रह्मत्व को स्वीकार किया अर्थात् वे ही अव्यक्त परमात्मा सृष्टि करनेके लिये ब्रह्माके रूपमें व्यक्त हुए।९३-९४॥
अतः ब्रह्मा, महादेव एवं परात्पर विश्वेश्वर भगवान् विष्णु (ये तीनों ही) पृथक्-पृथक् कार्यकी दृष्टि से एक ही प्रभुकी तीन मूर्तियाँ कही गयी हैं। इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नोंसे विशेषतः (ये तीनों ही) वन्दनीय हैं, पूजनीय हैं। मोक्ष नामसे कहे जानेवाले उस अविनाशी स्थानको यदि शीघ्र ही प्राप्त करनेकी इच्छा हो तो वर्णाश्रम-धर्मके नियमोंका अत्यन्त प्रीतिपूर्वक पालन करते हुए प्रतिज्ञापूर्वक बड़े श्रद्धाभावसे जीवनपर्यन्त इन (त्रिदेवों)-का पूजन करना चाहिये ॥९५-९७॥
हे ब्राह्मणो! विधिपूर्वक इस प्रकार चारों आश्रमों का वर्णन किया गया। (इनमें) वैष्णव, ब्राह्म तथा हर (शैव) नामक तीन आश्रम (सम्प्रदाय) होते हैं। उन (शैव, वैष्णव तथा ब्राह्म आश्रमों)-का लिङ्ग (चिह्न)धारण कर उस (देवता)-के भक्तजनोंके प्रति प्रेम रखते हुए ब्रह्मविद्यापरायण व्यक्तिको चाहिये कि वह इन देवों का निरन्तर ध्यान करे, पूजन करे॥९८-९९॥
शिवके सभी भक्तोंके लिये (चिह्न-रूपमें) शिवलिङ्ग धारण करना श्रेष्ठ है। शैवोंको चाहिये कि वे श्वेत भस्म से ललाटमें त्रिपुण्ड्र धारण करें। जो परम पद (-स्वरूप) भगवान् नारायणके शरणागत (भक्त) हो उसे ललाटपर (कस्तूरी आदिके) सुगन्धित जलसे त्रिशूल (-की आकृति)-का तिलक सर्वदा धारण करना चाहिये। जो संसारके बीज परमेष्ठी ब्रह्मा के भक्त हैं, उन्हें ललाट पर सर्वदा तिलक धारण करना चाहिये ॥१००-१०२॥
ऊपर-नीचे भावपूर्वक त्रिपुण्ड्रके धारण करनेसे अनादि (होते हुए भी) जो प्राणियोंका आदि है, कालात्मा है उसका धारण करना हो जाता है। त्रिशूल (चिह्न)-के धारण करनेसे जो वह त्रिगुणात्मक प्रधान ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवस्वरूप है निश्चयरूपसे उसका धारण हो जाता है। तिलक लगानेसे जो आदित्यमण्डल का प्रकाशमान ब्रह्मतेजोमय ऐश्वरयुक्त स्थान है उसका धारण हो जाता है॥१०३-१०५॥
इसलिये (शैव, वैष्णव तथा ब्राह्म) तीनों प्रकार के भक्तोंको विधिपूर्वक मङ्गलमय तथा दीर्घ आयु प्रदान करनेवाले त्रिशूलके चिह्न तथा तिलकको धारण करना चाहिये ॥१०६॥
वर्ण तथा आश्रमके विधि-विधानको जाननेवाले शान्त, दान्त, जितेन्द्रिय तथा क्रोधजयीको यज्ञ, अग्नि में हवन, जप तथा दान करना चाहिये। इस प्रकार यावज्जीवन समाहित-मन होकर देवोंकी आराधना करनी चाहिये। ऐसा करनेसे उसे शीघ्र ही अचल स्थान की प्राप्ति होती है॥१०७-१०८॥
Summary of chapter 2 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Kūrma recounts how prior to creation, Purushottama Nārāyaṇa rested upon Śesha in the primeval ocean and brought forth Brahmā Hiranyagarbha and Rudra. At the command of Nārāyaṇa, Goddess Lakshmī was instructed to bind worldly beings through Her enchanting Māyā while sparing truthful ascetics, silent meditators, performers of Yajñas, and sincere worshippers of Mahādeva. Brahmā then generated the nine Mānasa-putras—Bhṛgu, Angiras, Pulastya, Pulaha, Kratu, Daksha, Atri, Vashishṭha, and Marīchi—alongside the four Varṇas from his face, arms, thighs, and feet for the performance of cosmic rites. The eternal Veda was revealed to establish cosmic righteousness through the six prescribed duties of Brāhmaṇas, defense by Kshatriyas, commerce by Vaishyas, and service by Śūdras. The four Āshramas—Brahmacharya, Gṛhastha, Vānaprastha, and Saṁnyāsa—were instituted with Gṛhasthāshrama serving as the essential bedrock of all spiritual order. Bhagavān emphasizes that Dharma generates Artha, Kāma, and Moksha, revealing that Brahmā, Vishṇu, and Śiva are functional forms of the singular Supreme Entity who must be reverently worshipped through prescribed duties, holy Tilaka, and sacred Marks.