42 अध्याय

सूतजी बोले-हे द्विजश्रेष्ठो! ध्रुवके ऊपर एक करोड़ योजन विस्तारवाला महर्लोक है। वहाँ कल्प के अधिकारीगण निवास करते हैं। इसी प्रकार महर्लोक से ऊपर दो करोड़ योजनवाला जनलोक है। वहाँ ब्रह्मा के (मानस) पुत्र सनन्दन आदि रहते हैं। जनलोकसे ऊपर तपो लोक तीन करोड़ योजनका है। वहाँ दाहरहित* वैराज नामक देवता रहते हैं। प्राजापत्यलोक अर्थात् तपोलोकके ऊपर छ: करोड़ योजनका सत्यलोक है। वहाँ अपुनर्मारक (जन्म-मरणसे रहित जन) रहते हैं। वह ब्रह्मलोक कहा गया है। यहाँ परम योगामृतका पान

कर विश्वतोमुख विश्वात्मा लोकगुरु ब्रह्मा योगियोंके साथ नित्य निवास करते हैं॥१-५॥

शान्त स्वभाववाले यतिगण, नैष्ठिक ब्रह्मचारी, योगी, तपस्वी, सिद्ध तथा परमेष्ठीका जप करनेवाले यहाँ प्रवेश करते हैं। परमपदको प्राप्त करनेवाले योगियोंका वह एकमात्र द्वार है। वहाँ पहुँचकर (लोग) शोक नहीं करते। वही

(यहाँ निवास करनेवाला) विष्णु है, शंकर है॥६-७॥

करोड़ों सूर्य के समान उन (ब्रह्मा)-का वह पुर अत्यन्त दुर्गम है। अग्निशिखाकी मालाओंसे समन्वित उस पुरका मैं वर्णन नहीं कर सकता। ब्रह्माके उस पुर में नारायण का भी भवन है। वहाँ मायामय परम मायावान् श्रीमान् हरि शयन करते हैं। पुनरागमनसे रहित वह विष्णुलोक कहा गया है। जो जनार्दनके शरणागत हैं, वे महात्मा वहाँ जाते हैं। उस ब्रह्म-सदनसे ऊपर

ज्योतिर्मय, अग्निसे व्याप्त कल्याणकारी पुर है। वहाँ सैकड़ों-हजारों योगियों, भूतों तथा रुद्रोंसे परिवृत, मनीषियोंके द्वारा ध्यान किये जाते हुए वे भगवान् भव महादेव देवी पार्वतीके साथ निवास करते हैं॥८-१२॥

वहाँ वे ही जाते हैं जो संयमी ब्राह्मण हैं, ब्रह्मचारी हैं, महादेवपरायण हैं, शान्त, तपस्वी और ब्रह्मवादी हैं, ममत्वरहित, अहंकारशून्य तथा काम-क्रोधसे रहित हैं। ब्रह्मज्ञानसम्पन्न ये (व्यक्ति इस लोकका) दर्शन करते हैं। उस लोकको रुद्रलोक कहा गया है॥१३-१४॥

हे द्विजो! पृथ्वीके ये सात महालोक कहे गये हैं। (पृथ्वीके) अधोभागमें महातल आदि (सात) पाताल हैं। महातल नामक पाताल सभी रत्नोंसे सुशोभित और अनेक प्रकारके महलों और शुभ्र देवमन्दिरोंसे सम्पन्न है। वह (महातल) अनन्त (नाग), धीमान् मुचुकुन्द एवं पाताल-स्वर्गवासी राजा बलिसे युक्त है। हे विप्रो! रसातल शैलमय है, तलातल शर्करामय है। सुतल पीत वर्णका कहा गया है। नितल विद्रुम (मूंगे)-के समान वर्णवाला, वितल श्वेत वर्णका और तल कृष्ण वर्णका कहा गया है॥१५-१८॥

हे मुनिश्रेष्ठो! शुभ रसातल गरुड, वासुकि (नाग) तथा अन्य (महात्माओं)-से सेवित कहा गया है। सभी शोभाओं से युक्त तलातल विरोचन, हिरण्याक्ष तथा तक्षक आदिके द्वारा सेवित कहा गया है। सुतल वैनतेय आदि पक्षी, कालनेमि प्रभृति दूसरे श्रेष्ठ असुरों से समाकीर्ण है। तारक, अग्निमुख आदि यवन और महान् अन्तक आदि नागों तथा असुर प्रह्लादसे नितल नामक पाताल सेवित है। वितल नामक प्रसिद्ध पाताल कम्बल नामक नागराज, महाजम्भ और वीर हयग्रीवसे सेवित है। तल नामक पाताल शंकुकर्णसे युक्त तथा प्रधान नमुचि आदि दैत्यों और अन्य विविध प्रकारके नागों से सुशोभित है॥१९-२४॥

उन (पातालों)-के नीचे माया आदि नरक कहे गये हैं, उनमें पापी लोग यातना पाते हैं। उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। पाताललोकके नीचे शेष नामवाली वैष्णवी मूर्ति विद्यमान है। जिसे कालाग्नि रुद्र, योगात्मा, नारसिंह, माधव, अनन्त, देव और नागरूपी जनार्दन भी कहा जाता है। यह सब उन्हींके आधार पर (टिका) है और वे कालाग्निके आश्रित हैं। उनमें प्रविष्ट होकर और उनके मुखसे प्रकट हुई विष की ज्वालारूप होकर महायोगी काल स्वयं अन्तमें जगत्का संहार करते हैं ॥ २५-२८॥