कूर्म महा पुराण
12 अध्याय
सूतजी बोले-महर्षि भृगुको 'ख्याति' नामक पत्नी से नारायणकी पत्नी लक्ष्मी उत्पन्न हुई तथा धाता एवं विधाता नामक दो देवता भी उनसे उत्पन्न हुए, जो मेरु के जामाता हुए। महात्मा मेरुकी आयति तथा नियति नामकी दो कन्याएँ थीं, वे क्रमश: धाता तथा विधाता की पत्नियाँ थीं, उनसे दो पुत्र उत्पन्न हुए-प्राण और मृकण्डु। मृकण्डुसे मार्कण्डेय हुए तथा प्राणके कान्तिमान् वेदशिरा नामके पुत्र हुए॥१-३॥
महर्षि मरीचिके भी सम्भूति (नामक पत्नी)-ने सभी (शुभ) लक्षणोंसे सम्पन्न पौर्णमास नामक पुत्र और चार कन्याओंको उत्पन्न किया। सबसे बड़ी (कन्याका नाम) तुष्टि तथा अन्य तीन कन्याओंका नाम वृष्टि, कृष्टि और अपचिति था। पौर्णमासके विरजा तथा पर्वत नामके दो पुत्र थे॥४-५॥
प्रजापति पुलहकी पत्नी क्षमाने कर्दम, वरीयान् और उनसे छोटे सहिष्णु नामक श्रेष्ठ मुनिको जन्म दिया जो तपके कारण पाप-रहित थे। उसी प्रकार अत्रिकी पत्नी अनसूयाने चन्द्रमा, दुर्वासा और योगी दत्तात्रेय नामक पुण्यात्मा पुत्रोंको उत्पन्न किया। महर्षि अङ्गिरा को स्मृति नामक पत्नीने सिनीवाली, कुहू, राका तथा अनुमति (नामवाली) शुभलक्षणसम्पन्न (चार) पुत्रियोंको जन्म दिया। प्रभु भगवान् पुलस्त्यने (अपनी पत्नी) प्रीति से दत्तात्रि (नामक पुत्र)-को उत्पन्न किया। स्वायम्भुव मन्वन्तर के (अपने) पूर्वजन्ममें वे ही अगस्त्य नाम से प्रसिद्ध थे। (पुलस्त्यको प्रीतिसे) वेदबाहु (नामक एक अन्य पुत्र) और 'सन्नति' इस नामसे प्रसिद्ध (एक) कन्या थी॥६-१०॥
महर्षि क्रतुकी पत्नी संततिने साठ हजार पुत्रों को जन्म दिया। वे सभी ऊर्ध्वरेता बालखिल्य इस नाम से प्रसिद्ध हुए। महर्षि वसिष्ठने ऊर्जा नामक पत्नीसे सात पुत्रों और कमलके समान नेत्रवाली तथा सभी प्रकार की शोभाओं से सम्पन्न एक कन्याको जन्म दिया ॥ ११-१२॥
रज, ऊह, ऊर्ध्वबाहु, सवन, अनघ, सुतपा और शुक्र-(नामवाले) ये (वसिष्ठके) सात महान् ओजस्वी पुत्र थे। द्विजो! ब्रह्माका रुद्रस्वरूप जो वह वह्नि नामक पुत्र था, उससे स्वाहाने महातेजस्वी तीन उदार पुत्रों को प्राप्त किया। वे तीनों पावक, पवमान तथा शुचि (नामवाले) अग्नि थे। मन्थनद्वारा उत्पन्न अग्नि को पवमान और विद्युत्से सम्बद्ध अग्निको पावक कहा जाता है। जो यह सूर्य चमकता है वही शुचि अग्नि कहलाता है। उन (तीनों अग्नियों)-की पैंतालीस संतानें हुईं। (इस प्रकार) पावक, पवमान तथा शुचि (नामक तीन अग्नियाँ) और इन तीनोंके पिता (रुद्रात्मक अग्नि) एवं (उन तीनों अग्नियोंके पैंतालीस पुत्र) ये सभी मिलाकर उनचास अग्नियाँ कही गयी हैं। ये सभी (उनचास) तपस्वी कहे गये हैं, सभी यज्ञभाग के अधिकारी हैं, रुद्रात्मक कहलाते हैं और सभी मस्तक पर त्रिपुण्ड्रके चिह्न से अङ्कित रहते हैं ॥ १३-१८॥
ब्रह्मा के अग्निष्वात्त तथा बर्हिषद् नामक दो पुत्र कहे गये हैं जो पितर हैं। उनमें अयज्वा (यज्ञ न करनेवाले) तथा यज्वा (यज्ञ करनेवाले)-के रूपमें दो प्रकारकी व्यवस्था है। मुनिश्रेष्ठो! स्वधाने उनके द्वारा मेना और वैतरणी नामक दो पुत्रियोंको प्राप्त किया। वे दोनों ही ब्रह्मवादिनी और योगिनी थीं। मेनाने मैनाक और उसके अनुज क्रौञ्च (नामक पर्वत)-को जन्म दिया। हिमालयसे समस्त लोकोंको पवित्र करने में अद्वितीय गङ्गा उत्पन्न हुई। (हिमालयने) अपनी योगाग्नि के बलसे (उन) देवी महेश्वरीको पुत्री-रूपमें प्राप्त किया, जिन देवीके उत्तम माहात्म्यको भलीभाँति पहले बता दिया गया है। १९-२२॥
मैंने प्रजापति दक्षकी कन्याओंकी संतान-परम्परा का आप लोगोंसे वर्णन किया। अब आप (स्वायम्भुव) मनुकी सृष्टिका वर्णन सुनें ॥ २३ ॥
Summary of chapter 12 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
The Ṛshis inquire about the true identity of Devī, whereupon Bhagavān Kūrma reveals the sublime esoteric wisdom once declared by Brahmā atop Mount Meru. Devī is revealed as the Supreme Knowledge, the imperishable Parā-Shakti, non-different from Parameshvara, managing the universe through Her fourfold Shaktis: Shānti, Vidyā, Pratishṭhā, and Nivṛtti. When Himavān and Menā performed severe penances, Devī manifested before them in Her cosmic Vishvarūpa form possessing radiant splendor, multiple arms, cosmic weapons, and divine ornaments. Overwhelmed by fear and reverence, Himavān offered a sacred hymn containing the One Thousand and Eight Names of Goddess Parvatī, extolling Her as Mahāmāyā, Śivā, Brāhmī, Vaishṇavī, Gautamī, Gāyatrī, and the ultimate source of all Vedas and worlds. Devī then revealed the sacred paths of Jñāna-yoga, Karma-yoga, and Bhakti-yoga, commanding adherence to Vedic Varṇāshrama Dharma while sternly warning against non-Vedic unrighteous paths. She promised that whoever recites Her thousand names or hears this glory with pure devotion will be cleansed of all sins and achieve ultimate liberation in Śiva-sāyujya.