कूर्म महा पुराण
36 अध्याय
मार्कण्डेयने कहा-(युधिष्ठिर!) गङ्गा और यमुनाके संगमपर माघ महीनेमें साठ हजार साठ सौ तीर्थ जाते हैं। सौ हजार गौओंका भलीभाँति दान करनेका जो फल होता है, वही फल प्रयागमें माघमासमें तीन दिन स्नान करनेका होता है। गङ्गा और यमुनाके संगमपर जो करीषाग्निका* सेवन करता है, वह अहीनाङ्ग (हीन अङ्गसे रहित) अर्थात् सम्पूर्ण अवयवोंसे सम्पन्न, रोगरहित तथा पाँचों इन्द्रियोंसे युक्त होता है॥१-३॥
मान देनेवाले (युधिष्ठिर)! उस मनुष्यके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने हजार वर्षांतक वह स्वर्गलोकमें पूजित होता है। तदनन्तर स्वर्गसे भ्रष्ट होनेपर वह जम्बूद्वीपका स्वामी होता है और विपुल भोगोंका उपभोग करनेके अनन्तर वह पुनः इस तीर्थ (प्रयाग) को प्राप्त करता है॥ ४-५॥
(गङ्गा-यमुनाके) लोक-प्रसिद्ध संगमपर जो जलमें प्रवेश करता है, वह जिस प्रकार राहुसे ग्रस्त चन्द्रमा मुक्त हो जाता है, वैसे ही सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। वह चन्द्रलोकमें जाता है और साठ हजार साठ सौ वर्षोंतक चन्द्रमाके साथ आनन्दोपभोग करता है। हे राजेन्द्र! तदुपरान्त मुनियों एवं गन्धर्वोसे सेवित वह स्वर्गलोकसे इन्द्रलोकमें जाता है और वहाँसे भ्रष्ट होनेपर इस लोकमें आकर धनवानोंके कुलमें जन्म लेता है। जो मनुष्य (यहाँ प्रयागमें) पैर ऊपर और सिर नीचे करके लोहेकी धाराका पान (तपस्या-विशेष) करता है, वह सौ हजार वर्षांतक स्वर्गलोकमें पूजित होता है॥६-९॥
राजेन्द्र ! वहाँसे भ्रष्ट होनेपर वह मनुष्य अग्निहोत्री होता है और विपुल भोगोंका उपभोग करके पुनः इस (प्रयाग) तीर्थका सेवन करता है। जो अपना शरीर काटता है अथवा पक्षियोंको देता है, ऐसे पक्षियों द्वारा खाये गये (मांसवाले) उस पुरुषको भी जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो- ॥१०-११॥
वह सौ हजार वर्षांतक चन्द्रलोकमें पूजित होता है, तदनन्तर वहाँसे च्युत होनेपर धार्मिक, गुणवान्, रूपसम्पन्न, विद्वान् और सुन्दर तथा प्रिय वचन बोलनेवाला राजा होता है एवं विपुल भोगोंको भोगकर पुन: इस तीर्थ का सेवन करता है। प्रयागके दक्षिणमें यमुनाके उत्तरी तटपर ऋणप्रमोचन नामका एक श्रेष्ठ तीर्थ कहा गया है। वहाँ स्नान कर एकरात्रिपर्यन्त निवास करनेवाला पुरुष ऋणों से मुक्त हो जाता है, सूर्यलोक प्राप्त करता है तथा सदा के लिये ऋणमुक्त हो जाता है॥ १२-१५॥
Summary of chapter 35 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Sūta concludes the exposition on Vārāṇasī by describing the cosmic dance of Mahādeva in the Ānandavana of Kāśī. Goddess Parvatī eternally resides beside Śiva, showering divine motherly grace upon all pilgrims. The chapter asserts that listening to or reciting this Vārāṇasī Māhātmya bestows the merit of visiting all sacred Tīrthas on Earth and grants unbreakable devotion to the Lotus Feet of Mahādeva.