कूर्म महा पुराण
16 अध्याय
व्यासजीने कहा-किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करनी चाहिये और कभी भी झूठ नहीं बोलना चाहिये। अहितकर और अप्रिय वचन नहीं बोलना चाहिये और कभी भी चोरी नहीं करनी चाहिये। दूसरेके तृण, शाक, मिट्टी अथवा जलका भी अपहरण करनेवाला प्राणी नरक प्राप्त करता है। राजा', शूद्र तथा पतित व्यक्ति से दान नहीं लेना चाहिये। अशक्त होनेपर भी दूसरेसे
याचना नहीं करनी चाहिये। विद्वान् व्यक्तिको निन्दितों (पापमें रत)-का परित्याग करना चाहिये ॥ १-३॥
नित्य याचना करनेवाला नहीं होना चाहिये और एक ही व्यक्तिसे दुबारा नहीं माँगना चाहिये। याचना करनेवाला दुर्बुद्धि व्यक्ति (दाताके) प्राणोंका ही हरण करता है। विशेषरूपसे श्रेष्ठ ब्राह्मणको देवसम्बन्धी द्रव्यका अपहरण नहीं करना चाहिये। आपत्ति पड़नेपर भी ब्राह्मणके धनका कभी भी अपहरण न करे ॥ ४-५ ॥
विषको विष नहीं कहा जाता बल्कि ब्राह्मणका धन ही विष-रूप है। इसी प्रकार देवसम्बन्धी स्वत्वका भी प्रयत्नपूर्वक सदा त्याग करना चाहिये। प्रजापति मनुने पुष्प, शाक, जल, लकड़ी, मूल, फल तथा तृण- इन सभी पदार्थोंको (इनके स्वामीद्वारा) बिना दिये ग्रहण कर लेनेको अस्तेय कहा है (अर्थात् पुष्प, शाक आदि यदि दूसरेके हैं तब भी अत्यावश्यक होनेपर धर्मार्थ
या प्राणरक्षार्थ इनका प्रयोजनानुसार ग्रहण करनेपर चोरीका दोष नहीं लगता)॥६-७॥
द्विजो! देवपूजाके लिये अन्य स्वामीका पुष्प ग्रहण किया जा सकता है। परंतु केवल एक ही
स्थानसे बिना आज्ञाके प्रतिदिन पुष्प नहीं ग्रहण करना चाहिये। विप्रो! विद्वान् व्यक्ति केवल धर्मकार्यके लिये तृण, काष्ठ, फल, पुष्प प्रकट-रूपसे ग्रहण कर सकता है, अन्य प्रकारसे ग्रहण करनेपर वह पतित हो जाता है॥८-९॥
ब्राह्मणो! धर्म जाननेवालोंने यह मर्यादा स्थिर की है कि केवल भूखसे पीड़ित व्यक्ति रास्तेमें स्थित तिल, मूंग तथा यव आदि पदार्थोंको एक मुट्ठी मात्र ग्रहण कर सकता है। दूसरे जो भूखसे पीड़ित नहीं हैं, ऐसा नहीं कर सकते॥१०॥
पाप करके धर्मके बहाने किसी व्रतका अनुष्ठान नहीं करना चाहिये। व्रतके द्वारा पापको छिपाकर जो स्त्री और शूद्रोंका प्रवञ्चन करता है, वह विप्र इहलोक तथा परलोकमें ब्रह्मवादियोंद्वारा निन्दित होता है। छलके द्वारा किया गया व्रत राक्षसोंको प्राप्त होता है ॥ ११-१२॥
यदि (यज्ञोपवीतादि) लिङ्गका अनधिकारी व्यक्ति इन लिङ्गों (चिह्नों-लक्षणों)-को धारणकर वेष बनाकर जीविकाका निर्वाह करता है तो वह इन लिङ्गोंके वास्तविक अधिकारी पुरुषोंके पापोंका भागी होता है और तिर्यक् (पक्षी आदि) योनिको प्राप्त करता है। लोकमें धर्मक विनाशक वैडालव्रती' (ढोंगी) पापी लोग शीघ्र ही पापयोनिमें जाते हैं। उनके दुष्कर्मका यही फल है। पाखंडी (वेदशास्त्राननुमत-व्रत लिङ्गधारी), निषिद्ध कर्म करनेवाले, वाममार्गी, पाञ्चरात्र और पाशुपत व्रतवालोंका वाणीमात्रसे भी सत्कार नहीं करना चाहिये ॥ १३-१५॥
वेदकी निन्दामें परायण, देवताओंकी निन्दामें निरत और ब्राह्मणोंकी निन्दा करने में संलग्न मनुष्योंका मनसे भी चिन्तन नहीं करना चाहिये। इनका यज्ञ कराना, इनके साथ विवाह आदि (योनि)-का सम्बन्ध, सहवास तथा बात करनेसे प्राणी पतित हो जाता है, अतः प्रयत्नपूर्वक इनका परित्याग करना चाहिये। देवताके द्रोहसे गुरुका द्रोह करोड़ों गुना अधिक दोषपूर्ण होता है। उस गुरुद्रोहसे भी शास्त्रीय ज्ञानकी निन्दा करना और नास्तिकताका भाव करोड़ गुना अधिक दोषपूर्ण है॥ १६-१८॥
गायसे, देवताओंसे, ब्राह्मणोंसे, कृषिसे तथा राजाकी सेवासे जीविका-निर्वाह करनेवाले व्यक्तियोंका कुल दोषपूर्ण हो जाता है; क्योंकि ये वृत्तियाँ धर्मकी दृष्टिसे हीन वृत्तियाँ हैं। कुविवाह, (नित्य अथवा धार्मिक) क्रियाओंका लोप, वेदोंके अध्ययन न करने और ब्राह्मणोंके अनादर करनेसे कुल दोषपूर्ण हो जाता है॥१९-२० ॥
झूठ बोलने, परदाराभिगमन, अभक्ष्य-भक्षण और वेदविरुद्ध धर्मोंका आचरण करनेसे कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। अश्रोत्रिय, शूद्र तथा विहित आचारसे रहित (द्विज)-को दान देनेसे दाताका कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है॥ २१-२२॥
अधार्मिकों तथा पाखंडीजनोंसे युक्त और अत्यधिक रोगसे आक्रान्त ग्राममें तथा शूद्रके राज्यमें निवास नहीं करना चाहिये। द्विजको चाहिये कि वह हिमालय एवं विन्ध्यपर्वतके मध्यके देश और पूर्व तथा पश्चिम दिशाके समुद्रके तटवर्ती शुभ प्रदेशको छोड़कर अन्यत्र निवास नहीं करे। अथवा जहाँ स्वाभाविकरूपसे नित्य कृष्ण (कृष्णसार मृग-जातिविशेषके मृग) मृग विचरण करते हों और जहाँ वेदशास्त्र-प्रसिद्ध पुण्यजलवाली नदियाँ प्रवाहित होती हों, द्विजको वहाँ निवास करना चाहिये॥ २३-२५॥
श्रेष्ठ द्विजको नदीके किनारेसे आधे कोसतक की भूमिका परित्यागकर अन्य किसी पवित्र स्थानपर नहीं रहना चाहिये और न अन्त्यजोंके ग्रामके समीपमें रहना चाहिये। पतित, चण्डाल, पुक्कस, मूर्ख, अभिमानी (धन आदिके मदसे गर्वित), अन्त्यज (म्लेच्छ, रजक आदि) और अन्त्यावसायीके साथ नहीं रहना चाहिये । (इनके साथ) एक शय्यापर और एक आसनपर बैठना, एक पंक्तिमें बैठकर भोजन करना, बरतनों और पके हुए भोजनका मेल (मिश्रण, परस्पर आदान-प्रदान), यज्ञ करना, अध्यापन, विवाहादिका सम्बन्ध, साथमें भोजन करना और दसवाँ साथमें अध्ययन करना तथा साथमें यज्ञ कराना-ये ग्यारह 'सांकर्य' नामवाले दोष बतलाये गये हैं। इन सांकर्य-दोषयुक्त व्यक्तियोंके समीपमें भी रहनेसे मनुष्यमें पापका संक्रमण हो जाता है। अतः सभी प्रकारके प्रयत्नोंसे सांकर्य (दोष)-का परित्याग करना चाहिये ।। २६-३०॥
एक पंक्तिमें बैठे रहनेपर भी जो एक-दूसरे का स्पर्श नहीं करते हों और बीचमें भस्मके द्वारा रेखारूप मर्यादा खींचे हों, उनमें सांकर्य-दोष नहीं होता। अग्नि, भस्म, जलके छिड़काव, द्वार, स्तम्भ तथा मार्ग-इन छ:के द्वारा पंक्तिका खंडन हो जाता है। अकारण शत्रुता, विवाद तथा चुगुलखोरी नहीं करनी चाहिये। दूसरे के खेतमें चरती हुई गायको किसीको बतलाना नहीं चाहिये। सूतक (अशौच)-युक्त व्यक्तिसे बात न और किसीके भी मर्मका स्पर्श* न करे॥३१-३३॥
विद्वान् व्यक्ति दूसरोंको सूर्यमण्डल, इन्द्रधनुष, चिताग्नि तथा चन्द्रमा (चन्द्रमण्डल) न बतलाये, न दिखलाये। बहुत लोगोंके साथ और बन्धु-बान्धवोंके साथ विरोध नहीं करना चाहिये। स्वयंके प्रति जैसा आचरण प्रतिकूल हो, वैसा आचरण दूसरोंके प्रति न करे॥ ३४-३५॥
पक्षकी तिथिको न कहे, न नक्षत्रोंका निर्देश करे। श्रेष्ठ द्विज रजस्वला स्त्रीसे बात न करे और न ही अपवित्र व्यक्तिसे बात करे। देवता, गुरु तथा ब्राह्मणोंको दी जा रही वस्तुका निषेध न करे। अपनी प्रशंसा न करे और दूसरेकी निन्दाका त्याग करे। वेदनिन्दा तथा देवनिन्दाका प्रयत्नपूर्वक (सर्वथा) परित्याग करे॥ ३६-३७॥
मुनीश्वरो! जो द्विज देवताओं, ऋषियों, ब्राह्मणों अथवा वेदोंकी निन्दा करता है, उसके लिये इस लोकमें कोई प्रायश्चित्त शास्त्रोंमें दिखलायी नहीं देता। गुरु, देवता, वेद, उपबृंहण (इतिहास-पुराण)-की निन्दा करनेवाला व्यक्ति सैकड़ों, करोड़ों वर्षों से भी अधिक समयतक रौरव नरकमें कष्ट भोगता है। (देवता, शास्त्र आदिकी) निन्दा होनेपर (यदि उत्तर देनेका सामर्थ्य न हो तो) चुपचाप रहना चाहिये, उत्तरमें (दुराग्रहीसे) कुछ भी नहीं बोलना चाहिये। अथवा उस समय कान बंदकर अन्यत्र चला जाय और उन निन्दकोंकी ओर देखे भी नहीं॥३८-४०॥
विद्वान् व्यक्तिको दूसरोंके रहस्योंको जाननेका प्रयास नहीं करना चाहिये और (जाननेपर) उन्हें छिपाना चाहिये। अपने आत्मीय जनोंके साथ कभी भी विवाद नहीं करना चाहिये॥४१॥
हे द्विजोत्तमो! पापियोंके पापकी चर्चा न करे, न अपाप (पापरहित)-पर पापी होनेका आरोप लगाये, क्योंकि ऐसा करनेसे वह उसी (पापी)-के समान दोषयुक्त होकर तथा मिथ्याभिभाषणरूप दोषसे युक्त* होकर दो दोषोंका भागी हो जाता है। मिथ्या दोषारोपणयुक्त व्यक्तियोंके रोनेसे जो अश्रुविन्दु गिरते हैं, वे मिथ्या दोषारोपण करनेवाले व्यक्तिके पुत्रों तथा पशुओंका नाश कर देते हैं। ब्रह्महत्या, सुरापान, चोरी और गुरुपत्नीगमन-
इन महापापोंकी शुद्धि वृद्धजनोंद्वारा देखी गयी है (अर्थात् बतायी गयी है), किंतु मिथ्या दोषारोपण करनेवालेकी कोई शुद्धि नहीं है अर्थात् इनकी शुद्धिका कोई उपाय नहीं है। ४२-४४ ।।
बिना किसी प्रयोजनके उगते हुए सूर्य और चन्द्रमाको नहीं देखना चाहिये। (ऐसे ही अकारण)
अस्त होते हुए, जलमें प्रतिबिम्बित, आकाशके मध्य स्थित, ग्रहणयुक्त, वस्त्राच्छादित अथवा दर्पण आदि में प्रतिबिम्बित सूर्य-चन्द्रमाको नहीं देखना चाहिये॥ ४५ ॥
नग्न स्त्री अथवा पुरुषको कभी भी न देखे। मल- मूत्र विसर्जित कर रहे तथा मैथुनासक्त व्यक्तिको न देखे। बुद्धिमान् व्यक्तिको अपवित्रताकी स्थितिमें सूर्य- चन्द्रमा आदि ग्रहोंको नहीं देखना चाहिये। पतित, विकलाङ्ग, चाण्डाल एवं उच्छिष्ट (मुखवाले) व्यक्तियोंको नहीं देखना चाहिये। उच्छिष्ट दशामें अथवा मुख ढककर दूसरेसे बात नहीं करनी चाहिये। शवका स्पर्श किये हुए व्यक्तिको (जबतक स्नानादिसे शुद्ध नहीं हो जाता है तबतक), क्रुद्ध गुरुके मुखको, तेल या जलमें पड़नेवाली छायाको, भोजन करते समय पत्नीको, खुले हुए अङ्गोंवाली स्त्रीको, पागल एवं मतवाले व्यक्तिको नहीं देखना चाहिये। पत्नीके साथ भोजन नहीं करना
चाहिये और उसे भोजन करते हुए, छींकते हुए, जम्हाई लेते हुए तथा आसनपर आरामसे बैठे रहनेकी अवस्थामें नहीं देखना चाहिये। जलमें अपना रूप तथा (नदी आदिके) किनारे और गर्त (गहरा गड्डा)-को नहीं देखना चाहिये। मूत्रको लाँघना नहीं चाहिये और न कभी उसपर बैठना चाहिये॥ ४६-५०॥
शूद्रको दृष्टार्थोपदेश (लौकिक विषयका उपदेश) नहीं देना चाहिये। साथ ही कृशर अर्थात् तिल, चावल आदिसे मिश्रित पदार्थ, खीर, दही, जूठी वस्तु, मधु, घृत, कृष्णमृगचर्म तथा हवनकी सामग्री नहीं देनी चाहिये। विद्वान् व्यक्ति इसे (शूद्रको) व्रत एवं धर्म- सम्बन्धी उपदेश न दे। क्रोधके वशीभूत नहीं होना चाहिये और राग-द्वेषको छोड़ देना चाहिये। लोभ, दम्भ, असूया (गुणमें दोषदर्शन), ज्ञानकी निन्दा, ईर्ष्या, मद, शोक तथा मोहको प्रयत्नपूर्वक छोड़ देना चाहिये। किसीको भी पीड़ा न पहुँचाये। पुत्र और शिष्यको योग्य बनानेके पवित्रभावसे ताड़न करे। कभी हीन व्यक्तियों और तीक्ष्ण (उद्धत) बुद्धिवाले व्यक्तियोंका
आश्रय ग्रहण न करे। विद्वान्को अपना अपमान नहीं करना चाहिये अर्थात् हीनभाव नहीं अपनाना चाहिये। प्रयत्नपूर्वक दीनताका परित्याग करना चाहिये। विशिष्ट जनोंका निरादर नहीं करना चाहिये और अपनेको (क्रोधावेशसे) शाप नहीं देना चाहिये ॥५१-५५॥
नखोंसे भूमिपर नहीं लिखना (कुरेदना) चाहिये। गौको पकड़ना नहीं चाहिये। किसी नदीके समीप दूसरी नदियों तथा किसी पर्वतपर दूसरे पर्वतोंकी चर्चा (प्रशंसा) नहीं करनी चाहिये। भोजन अथवा निवासके समय सहयात्रीको छोड़ना नहीं चाहिये (अर्थात् साथमें रहनेवालेको छोड़कर न एकाकी भोजन करना चाहिये न एकाकीके लिये निवासकी व्यवस्था करनी चाहिये)।
जलमें नग्न होकर स्नान नहीं करना चाहिये और पैरसे आगका उल्लंघन नहीं करना चाहिये। सिरपर लगानेसे बचे हुए तेलका शरीरपर लेपन नहीं करना चाहिये। सर्प एवं शस्त्रसे खेल नहीं करना चाहिये। अपनी इन्द्रियों एवं गुप्तस्थानोंके रोमोंका स्पर्श (जब चाहे तव) नहीं करना चाहिये। अशिष्ट व्यक्तिके साथ कहीं नहीं जाना चाहिये ॥५६-५८॥
कभी भी हाथ,पैर, वाणी और नेत्र-सम्बन्धी चंचलताका आश्रय न ले। इसी प्रकार लिंग तथा उदर और कान- सम्बन्धी चंचलता नहीं करनी चाहिये। अंग एवं नखकी आवाज न करे। अंजलिसे (जल) न पिये। कभी भी हाथ अथवा पैरसे जलको न पीटे ॥५९-६० ॥
ईंटों और फलके द्वारा फलोंको नहीं तोड़ना चाहिये। म्लेच्छ भाषाकी शिक्षा न ले, पैरसे आसनको न खींचे। (नखोंद्वारा) काटने, छेदने, फोड़ने तथा लिखने-सम्बन्धी क्रियाएँ नहीं करनी चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्तिको अकस्मात् बिना प्रयोजनके शरीर या (अङ्गोंका) मर्दन (मरोड़नेकी क्रिया) नहीं करना चाहिये। (कोई पदार्थ) गोदमें रखकर नहीं खाना चाहिये। व्यर्थकी कोई चेष्टा नहीं करनी चाहिये। नृत्य, गायन तथा वादन (जब चाहे तब) नहीं करना चाहिये। दोनों हाथोंसे अपना सिर नहीं खुजलाना चाहिये। लौकिक तथा बाह्य (विदेशी) भाषाकी स्तुतियोंसे देवताओंको संतुष्ट (करनेका प्रयास) नहीं करना चाहिये । पाशोंसे (जूआ) न खेले, न दौड़े, जलमें मल-मूत्रका विसर्जन न करे। जूठे मुख नहीं रहना चाहिये और कभी भी नग्न होकर स्नान नहीं करना चाहिये॥६१-६५॥
(नग्न अवस्थामें) न कहीं जाय, न पढ़े और न अपने सिरका स्पर्श करे। दाँतोंके द्वारा नख या रोमोंको नहीं काटना चाहिये। सोये हुए व्यक्तिको जगाना नहीं चाहिये। उगते हुए सूर्यके धूपका सेवन नहीं करना चाहिये। चिताके धुएँसे दूर रहना चाहिये। शून्य गृहमें अकेले नहीं सोना चाहिये। स्वयं अपने जूतोंको नहीं ढोना चाहिये। अकारण नहीं थूकना चाहिये। तैरकर
नदीको पार नहीं करना चाहिये। कभी भी पैरद्वारा पैरको नहीं धोना चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्तिको अग्निसे पैर नहीं सेंकना चाहिये। काँसेके पात्रमें पैर नहीं धोना चाहिये। देवताकी ओर, ब्राह्मणोंकी ओर एवं गौ, वायु, अग्नि, गुरु, विप्र, सूर्य तथा चन्द्रमाकी ओर पैर नहीं फैलाना
चाहिये। कभी भी अपवित्र अवस्थामें सोना, दूरकी यात्रा, स्वाध्याय, स्नान, सवारीपर बैठना और घरसे बाहर नहीं निकलना चाहिये॥६६-७० ॥
दोनों संध्या-समयों तथा मध्याह्नकालमें शयन, अध्ययन, स्नान, उबटन लगाना, भोजन तथा गमन का नित्य त्याग करना चाहिये। ब्राह्मणको चाहिये कि वह जूठे मुँह-हाथसे गौ, ब्राह्मण, अग्नि, आसन तथा देव- प्रतिमाका स्पर्श न करे। इसी प्रकार पैरसे भी इनका स्पर्श न करे। अपवित्रताकी स्थितिमें अग्निकी परिचर्या न करे, देवताओं तथा ऋषियों (-के नाम आदि)-
का कीर्तन न करे। गहरे जलमें स्नान न करे और बिना कारण (मल-मूत्रादिका वेग) न रोके। बायें हाथसे उठाकर अथवा मुखसे (पशुके समान) जल नहीं पीना चाहिये। बिना आचमन किये उत्तर न दे और जलमें वीर्यका त्याग नहीं करना चाहिये। अपवित्र वस्तुसे लिप्त किसी वस्तु, रक्त (खून), विष तथा वेगवाली नदीका उल्लंघन नहीं करना चाहिये। जलमें मैथुन नहीं करना चाहिये। अश्वत्थ वृक्षको नहीं काटना चाहिये। जलमें थूकना नहीं चाहिये।७१–७५ ॥
हड्डी, भस्म, कपाल, केश (बाल), कण्टक, भूसी, अंगार और शुष्क गोबरपर कभी भी बैठना नहीं चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्तिको अग्निका लंघन नहीं करना चाहिये। अग्निको कभी भी (शय्या, आसन आदिके) नीचे न रखे, न ही पैरकी ओर रखे और न मुखसे ही फूंके। कभी भी कुएँके अंदर न उतरे और न ही अपवित्र अवस्थामें उसे देखे। अग्निमें अग्निको नहीं फेंकना चाहिये और पानीसे इसे बुझाना नहीं चाहिये। मित्रके मरण तथा उसके दुःखको, (अपने दुःखको) स्वयं दूसरोंको न सुनाये। जो विक्रय-योग्य न हो तथा जो पदार्थ छलद्वारा प्राप्त हो उसे विक्रय नहीं करना चाहिये॥७६-७९॥
विद्वान्को चाहिये कि वह अग्निको मुखके निःश्वाससे प्रज्वलित न करे। अपवित्रताकी स्थितिमें पवित्र तीर्थमें, जलवाले स्थानमें नहीं जाना चाहिये और (ग्राम आदिके) सीमा-समाप्तिकी भूमिको नहीं जोतना चाहिये। ८० ॥
पहले की गयी प्रतिज्ञा या नियमको कभी भी तोड़ना नहीं चाहिये। पशु सर्प एवं पक्षियोंको परस्पर लड़ानेके लिये उत्तेजित नहीं करना चाहिये॥८१॥
जल, वायु तथा धूप आदिके द्वारा किसी दूसरे को बाधा नहीं पहुँचानी चाहिये। अपने कार्योंको करवाकर शिल्पियोंको बादमें ठगना नहीं चाहिये। भिक्षाके लिये सायंकाल और प्रातः (दूसरोंके) घरके दरवाजोंको खटखटाना नहीं चाहिये। दूसरोंके द्वारा प्रयुक्त माला', गन्ध और भार्याके साथ भोजन, विग्रहपूर्वक विवाद एवं कुत्सित दरवाजेसे प्रवेश-इनका त्याग करना चाहिये॥८२-८३॥
बुद्धिमान् ब्राह्मणको खाते हुए खड़ा नहीं होना चाहिये और न ही हँसते हुए बोलना चाहिये। अपने हाथोंद्वारा अपनी अग्निका स्पर्श नहीं करना चाहिये और देरतक जलमें नहीं रहना चाहिये। अग्निको न पंखेकी हवासे प्रज्वलित करना चाहिये, न सूप (-की हवा)- से और न हाथसे (हिलाकर)। मुखसे (फॅकनीद्वारा) अग्निको प्रज्वलित नहीं करना चाहिये, क्योंकि मुख से ही अग्नि उत्पन्न हुआ है। ८४-८५ ॥
दूसरेकी स्त्रीसे बात नहीं करनी चाहिये और द्विज (ब्राह्मण)-को चाहिये कि जो यज्ञ करने योग्य नहीं है उसका यज्ञ न कराये। विप्रको अकेले सभामें नहीं जाना चाहिये और समूहका त्याग करना चाहिये। बायेंसे देव- मन्दिरमें प्रवेश नहीं करना चाहिये। अर्थात् देवमन्दिर को
अपने दाहिने करके प्रवेश करना चाहिये। वस्त्रद्वारा पंखा नहीं झलना चाहिये और देवमन्दिरमें सोना नहीं चाहिये। मार्गमें अकेले नहीं चलना चाहिये और न अधार्मिक व्यक्तियोंके साथ ही कहीं जाना चाहिये। इसी प्रकार व्याधिग्रस्त, शूद्र और पतितोंके साथ भी मार्गमें नहीं जाना चाहिये। जूता और जल आदिके बिना मार्गमें नहीं चलना चाहिये। न रात्रिमें, न शत्रुके साथ और न बिना कमण्डलुके चलना चाहिये। अग्नि, गौ, ब्राह्मण आदिके बीचमेंसे होते हुए नहीं निकलना चाहिये ॥ ८६-८९॥
द्विज (मानवमात्र)-को चाहिये कि वह कभी भी बछड़ेको दूध पिलाती हुई गाय तथा गायको बाँधनेवाली रस्सी अथवा उसकी पूँछका उल्लंघन न करे। योगियों, सिद्धों, व्रतपरायणों तथा संन्यासियोंकी निन्दा न करे।९० ॥
बुद्धिमान् व्यक्तिको देवमन्दिर, देवताओं, यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणों तथा गायकी परछाईंको इच्छापूर्वक लाँघना नहीं चाहिये। पतित आदिसे तथा रोगियोंसे अपनी परछाईंका उल्लंघन नहीं होने देना चाहिये। अंगार, भस्म तथा केश आदिपर कभी भी बैठना नहीं चाहिये। झाडूकी धूल, स्नानके वस्त्र तथा (स्नानसे बचे) घड़ेके जलके छींटेसे बचना चाहिये (उसे अपने ऊपर नहीं पड़ने देना चाहिये)। द्विज (मानवमात्र)-को चाहिये कि वह अभक्षणीय पदार्थको खाये नहीं और न ही अपेय पदार्थको पीये ॥ ९१-९३॥
Summary of chapter 65 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Following the conclusion of Ishvaragītā, Maharshi Vedavyāsa initiates the Vyāsagītā at the request of the Mahārshis, expounding Sanātana Varṇāshrama Dharma as originally revealed by Svāyambhuva Manu. Vyāsa details the sacred Upanayana ceremony for Brāhmaṇas, Kshatriyas, and Vaishyas, specifying the appropriate age, girdles, staff, and sacred thread. He outlines the strict vows of a Brahmachārin, emphasizing daily Sandhyāvandana, Agnihotra, reverence towards Gurus and parents, and the cultivation of mental purity through righteous living.