29 अध्याय

व्यासजीने कहा-इस प्रकार अपने आश्रम में स्थित नियतात्मा यतियों के लिये भिक्षा अथवा फल-मूलद्वारा जीवन-निर्वाह करना कहा गया है। एक समय ही भिक्षा करनी चाहिये। उसके विस्तारमें आसक्त नहीं होना चाहिये; क्योंकि भिक्षामें आसक्ति रखनेवाला संन्यासी विषयोंमें भी आसक्त हो जाता है॥ १-२॥

सात घरोंसे भिक्षा माँगनी चाहिये। (उतने घरोंमें) न मिलनेपर पुन: भिक्षा माँगनी चाहिये। पात्रको धोकर उसमें भिक्षा ग्रहण करनी चाहिये और भिक्षाके बाद पुनः उसे जलसे धोना चाहिये। अथवा (सम्भव हो तो) बिना लोभके जीवन-निर्वाहमात्र करनेवाले यतिको प्रतिदिन नवीन पात्र लाकर उसमें भिक्षा ग्रहण करनी चाहिये और भिक्षा ग्रहण करनेके बाद उसका परित्याग कर देना चाहिये। गृहस्थका घर धूएंसे रहित हो जानेपर, मूसलका शब्द बंद हो जानेपर, आगके न रहनेपर, सभी लोगोंके भोजन कर चुकनेपर, कसोरे एवं पत्रादिका ढेर लग जानेपर यतिको (गृहस्थ के घर) नित्य भिक्षा माँगनी चाहिये ॥३-५॥

अन्तिम भाग, एक बार 'भिक्षा' ऐसा शब्द उच्चारण कर भिक्षा माँगनेवाले संन्यासीको नीचे मुख किये हुए उतने समय तक प्रतीक्षा करनी चाहिये, जितनी देरमें गाय दुही जाती है। (भिक्षा प्राप्त होनेपर) पवित्रतापूर्वक मौन होकर भिक्षा ग्रहण करनी चाहिये। हाथ-पाँव धोकर यथाविधि आचमन कर सूर्यकी ओर अन्न दिखलाकर पूर्व अथवा उत्तरकी ओर मुख करके भोजन करना चाहिये। (प्राणाय स्वाहा इत्यादि) पाँच प्राणाहुति देकर समाहित होकर

आठ ग्रास ग्रहण करे। तदनन्तर आचमन कर परमेश्वर देव ब्रह्मका ध्यान करे। प्रजापति मनुने संन्यासीके लिये लौकी, लकड़ी, मिट्टी तथा बाँसके बने चार प्रकार के पात्र बताये हैं। यतिको रात्रिके प्रथम भाग, मध्यरात्रि, संध्या-काल तथा दिनमें नित्य विशेष रूप से ईश्वरका चिन्तन करना चाहिये॥६-१०॥

(संन्यासीको) हृदयकमलरूपी घरमें विश्व नामक संसारके उत्पादक, सभी भूतोंके आत्मरूप, तमोगुण से परे रहनेवाले, सभीके आश्रय, प्राणियोंको आनन्द देनेवाले, ज्योतिःस्वरूप, अविनाशी, प्रधान एवं पुरुष से अतीत, आकाशरूप, अग्नि एवं शिवरूप, वस्तुमात्र के अस्तित्वके अधिष्ठाता, ब्रह्मरूपी ईश्वर, अनादि, अद्वैत, आनन्दादि गुणोंके निधान, महान्, पुरुष, परम ब्रह्म, सत्य, शाश्वत, सित (शुक्ल), तदितर (कृष्ण) एवं अरुणवर्णवाले अर्थात् सत्त्व, रज, तमोरूप त्रिगुणात्मक, विश्वरूपी महेश्वरका ध्यान करना चाहिये। ओंकार का उच्चारणकर आत्माको प्रणवके परम तात्पर्यरूप परमात्मा में प्रतिष्ठितकर आकाशके मध्यमें स्थित रहनेवाले ईशानदेव का (हृदयरूपी) आकाशमें ध्यान करना चाहिये॥११-१५॥

सभी भावोंके कारणरूप, आनन्दके एकमात्र आश्रयस्वरूप पुराण-पुरुष शम्भुका ध्यान करनेसे बन्धन से मुक्ति हो जाती है। अथवा संसारके सम्मोहनालयरूप मूलप्रकृतिरूपी गुहामें परम व्योमरूप सभी भूतों के एकमात्र कारण, सभी प्राणियोंके जीवनरूप और संसार के विलय-स्थान, ब्रह्मानन्द-स्वरूप तथा मुमुक्षु लोग जिनका सूक्ष्मरूपसे दर्शन करते हैं, उनका (परम व्योम विराट् ब्रह्मका) ध्यानकर उनके मध्यमें स्थित शुद्ध ज्ञानस्वरूप

अनन्त, सत्य एवं ईशानरूप ब्रह्मका चिन्तन करते हुए संयत होकर स्थित रहना चाहिये ॥१६-१९॥

यतियोंका यह गुह्यसे भी गुह्यतम ज्ञान महेश ने बतलाया है। जो इसका अनुष्ठान करता है, वह ऐश्वरयोगको प्राप्त करता है॥ २०॥

अतएव नित्य ध्यानमें निरत और आत्मविद्यापरायण होते हुए ब्रह्मज्ञानका अभ्यास करते रहना चाहिये। इसके कारण बन्धनसे मुक्ति होती है। अपनी आत्माको सबसे भिन्न (शाश्वत-नित्य) समझकर उसकी अद्वितीय, अजर, आनन्दरूप, श्रेष्ठ ज्ञानरूपताका पुनः-पुनः ध्यान

करना चाहिये। जिनसे चर-अचर समस्त प्रपञ्च की उत्पत्ति होती है, जिन्हें प्राप्तकर जन्म-मरणके बन्धन से मुक्ति हो जाती है और इसी कारण जो ईश्वर हैं, देव हैं, सर्वोत्कृष्ट हैं, सबके अधिष्ठाता हैं, वे ही महेश्वर हैं। जिनके अन्तर्गत शाश्वत, शिव, अव्यय, गगन विद्यमान है, जगन्नियन्ता परमात्मा जिनके अंश हैं, वे ही देव महेश्वर हैं (इनका पुन:-पुनः ध्यान यति को करना चाहिये)। भिक्षुओं (संन्यासियों)-के जो व्रत और उपव्रत हैं, उनमेंसे एक-एकका अतिक्रमण करने पर प्रायश्चित्तका विधान किया गया है॥२१-२५॥

कामवश स्त्रीप्रसंग करनेपर समाहित होकर प्राणायाम कर पवित्रतापूर्वक प्रायश्चित्तके लिये सांतपन नामक व्रत करना चाहिये। तदनन्तर संयतमानस होकर नियम से कृच्छ्र (चान्द्रायण)-व्रत करे। पुनः अपने आश्रम में आकर आलस्यका परित्याग कर भिक्षुको आश्रमोचित आचरण करना चाहिये॥ २६-२७॥

विद्वानोंका यह कहना है कि धर्मयुक्त असत्य से व्रतभङ्ग नहीं होता, तथापि ऐसा नहीं करना चाहिये। क्योंकि इसमें आसक्ति रखना दारुण कर्म है। धर्माभिलाषी यतिको चाहिये कि वह असत्यभाषण करनेपर एक रात्रि उपवास तथा सौ प्राणायाम करे। अत्यन्त संकट में होने पर भी भिक्षुको किसी अन्य प्रयोजनसे भी चोरी नहीं करनी चाहिये। चोरीसे बढ़कर दूसरा कोई अधर्म नहीं है, यही सबसे बड़ी हिंसा भी है, क्योंकि इससे आत्मज्ञान विनष्ट हो जाता है, ऐसा स्मृतियों का सिद्धान्त है॥ २८-३०॥

यह जो द्रविण-धन नामकी वस्तु है, यह बाहरी प्राण ही है, इसलिये जो जिसके धनका अपहरण करता है, वह उसके प्राणोंका ही हरण करता है॥३१॥

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निश्चित ही धन हरण करनेवाला दुष्टात्मा आचार से भ्रष्ट और व्रतसे च्युत हो जाता है। श्रुतिका विधान है कि यदि कोई अपने व्रतसे च्युत व्यक्ति अपने पुनः व्रतभङ्गपर पश्चात्ताप करे तो शास्त्रानुकूल विधिसे आलस्य- रहित होकर एक वर्षतक चान्द्रायणव्रत करे॥३२-३३ ॥

यदि भिक्षुसे अकस्मात् हिंसा हो जाय तो उसे पश्चात्तापपूर्वक कृच्छ्रव्रत, अतिकृच्छ्रव्रत अथवा चान्द्रायण-व्रत (हिंसाके स्वरूपके अनुसार) करना चाहिये। इन्द्रियकी दुर्बलताके कारण यदि स्त्रीको देखकर यति स्खलित हो जाय तो उसे सोलह प्राणायाम करना चाहिये। दिनमें स्खलन होनेपर तीन रातका उपवास और सौ प्राणायाम करना चाहिये॥३४-३५ ॥

एकका ही अन्न भक्षण करने, मधु ग्रहण करने, नवश्राद्ध-सम्बन्धी अन्न तथा प्रत्यक्ष लवण खानेपर प्राजापत्यव्रतको (पापकी) शुद्धिका उपाय बतलाया गया है। निरन्तर ध्याननिष्ठ पुरुषके सभी पातक नष्ट हो जाते हैं, इसलिये महेश्वरका ज्ञान प्राप्तकर उनके ध्यानमें परायण रहना चाहिये। जो ब्रह्म परम ज्योतिरूप, सभीका अधिष्ठान, अक्षर अद्वितीय है तथा जो सभीके भीतर स्थित है, परम ब्रह्म है, उसे महेश्वर जानना चाहिये। ये ही महेश्वर देव, महादेव एवं अद्वितीय परम शिव हैं। ये ही अविनाशी, अद्वैत हैं और ये ही आदित्यके भीतर प्रतिष्ठित परम (तत्त्व) हैं। आत्मयोग नामसे प्रसिद्ध, स्वप्रकाश, नित्य-ज्ञान नामसे भी विख्यात, परम तत्त्वरूप अपने धाम में सर्वाधिक पूजनीय-रूपसे ये महेश्वर प्रतिष्ठित हैं, इसीलिये महादेव कहे जाते हैं॥३६-४०॥

जो महादेवसे भिन्न किसी दूसरे देवको नहीं जानता और इन्हींको अपनी आत्मा मानता है, वह परम पद को प्राप्त होता है। जो अपनी आत्माको परमेश्वरसे भिन्न मानते हैं, वे उस देवका दर्शन नहीं करते हैं, उनका परिश्रम व्यर्थ होता है॥४१-४२॥

परम ब्रह्म एक ही हैं, इन्हें ही अव्यय तत्त्वके रूपमें जानना चाहिये। ये अव्यय तत्त्व ब्रह्म ही देव हैं, महादेव हैं, इन्हें जान लेनेपर बन्धन नहीं होता। इसलिये यतिको संयतमन होकर (इन्हें प्राप्त करने के लिये) प्रयत्न करना चाहिये। ज्ञानयोगमें रत रहना चाहिये, शान्त रहना चाहिये और महादेवके परायण रहना चाहिये॥४३-४४॥

हे विप्रो! यह आप लोगोंको संन्यासियोंके कल्याणकारी आश्रम (संन्यासाश्रम)-के विषयमें बतलाया। पूर्वकालमें पितामह विभुने मुनियोंसे इसे कहा था। ब्रह्माजीद्वारा कहे गये यतिधर्मविषयक इस कल्याणकारी उत्तम ज्ञानको पुत्र, शिष्य तथा योगियोंके अतिरिक्त अन्य किसीको नहीं देना चाहिये॥ ४५-४६ ॥

इस प्रकार संन्यासियोंके नियमोंके इस विधान को बतलाया गया। यह पशुपति (शंकर)-को संतुष्ट करने का एकमात्र उपाय है। जो अव्यग्रभावसे एकाग्रतापूर्वक इसका नित्य आचरण करते हैं, उनका पुनः जन्म अथवा मरण

कुछ भी नहीं होता अर्थात् वे मुक्त हो जाते हैं॥४७॥