कूर्म महा पुराण
50 अध्याय
सूतजी बोले-इस वर्तमान मन्वन्तरके प्रारम्भिक प्रथम द्वापरमें महान् विभु स्वायम्भुव मनुको व्यास माना गया है। प्रभु ब्रह्माकी आज्ञासे उन्होंने वेदका अनेक प्रकारसे विभाजन किया। दूसरे द्वापरमें प्रजापति वेदव्यास हुए। तीसरेमें शुक्राचार्य व्यास हुए और चौथेमें बृहस्पति (व्यास) हुए। पाँचवेंमें सूर्य व्यास हुए और छठेमें मृत्युको व्यास कहा गया है। इसी प्रकार सातवेंमें इन्द्र और आठवेंमें वसिष्ठ (व्यास) माने गये हैं। नवेंमें सारस्वत तथा दसवेंमें त्रिधामा (व्यास) माने गये हैं। ग्यारहवेंमें त्रिवृष तदनन्तर (बारहवेंमें) शततेजा, तेरहवेंमें धर्म और चौदहवेंमें तरक्षु (व्यास) कहे गये हैं॥१-५॥
पंद्रहवेंमें त्र्यारुणि, सोलहवेंमें धनंजय, सत्रहवें में कृतंजय और अठारहवेंमें ऋतंजयको व्यास कहा गया है। तदनन्तर (उन्नीसवेंमें) भरद्वाज व्यास हुए। उससे आगे (बीसवेंमें) गौतम हुए। राजश्रवा इक्कीसवें (द्वापर) में और फिर (बाईसवेंमें) श्रेष्ठ शुष्मायण व्यास हुए। तेईसवेंमें तृणबिन्दु और उसके बाद (चौबीसवेंमें) वाल्मीकिको व्यास कहा गया है। पच्चीसवेंमें शक्ति और छब्बीसवेंमें पराशर ही व्यास हुए॥६-८॥
हे द्विजो! सत्ताईसवेंमें महामुनि जातुकर्ण व्यास हुए और फिर इस अट्ठाईसवें द्वापर युगमें पराशरके पुत्र कृष्णद्वैपायन व्यास हुए। वे ही सभी वेदों और पुराणों के प्रदर्शक हैं। पराशरके पुत्र महायोगी कृष्णद्वैपायन हरि ने पार्वतीके साथ त्रिलोचन शंकरकी आराधना करके उनका दर्शन किया और उन्हींके अनुग्रहसे उन प्रभु व्यासने वेदोंका विभाग किया। तदनन्तर उन महामुनि ने वेदके पारंगत चार शिष्योंको ग्रहण किया। (ये चार शिष्य) जैमिनि, सुमन्तु, वैशम्पायन और चौथे पैल हैं। मुझे अपना पाँचवाँ शिष्य बनाया ॥ ९–१२ ॥
उन महामुनिने ऋग्वेदके श्रोता पैलको ऋग्वेद और यजुर्वेदके प्रवक्ता वैशम्पायनको यजुर्वेद ग्रहण कराया। इसी तरह उन्होंने सामवेदके श्रोता जैमिनिको सामवेद तथा अथर्ववेदके श्रोता ऋषिश्रेष्ठ सुमन्तुको अथर्ववेद का ग्रहण कराया। ऐसे ही इतिहास तथा पुराणोंके प्रवचन में मुझे श्रीकृष्णद्वैपायनने नियुक्त किया ॥ १३-१४ ॥
(प्रारम्भमें) यजुर्वेद एक ही था। उसका चार भाग हुआ। उसीसे चातुर्होत्रकी उत्पत्ति हुई और उससे (श्रीव्यासने) यज्ञ किया। द्विजोत्तमो! (उस यज्ञमें) यजुर्वेदके मन्त्रीद्वारा अध्वर्युसे सम्बद्ध कर्म, ऋक्-मन्त्रों से होता का कर्म, साममन्त्रों से उद्गाताका कर्म और अथर्वमन्त्रोंके द्वारा ब्रह्माका कर्म सम्पन्न हुआ। तदनन्तर उन प्रभुने ऋचाओंको अलग कर ऋग्वेदका प्रणयन किया। इसी प्रकार यजुर्मन्त्रोंके समूहको यजुर्वेद* और साममन्त्रोंके समूहको सामवेदसंहिता बनायी। पहले उन्होंने ऋग्वेदको इक्कीस भागों (शाखाओं)-में और यजुर्वेदको सौ शाखाओंमें विभक्त किया॥१५-१८॥
इसी प्रकार उन्होंने सामवेदको हजार शाखाओं में विभक्त किया तथा अथर्ववेदको नौ भागों (शाखाओं) में बाँटा ॥ १९॥
प्रभु व्यासने पुराणसंहिताके अठारह भेद किये। पूर्वकालमें सभी दोषोंको दूर करनेवाला पुरातन वही चतुष्पाद प्रणवरूप एक वेद ब्रह्मासे आविर्भूत हुआ। सनातन भगवान् वासुदेव वेदोंद्वारा जानने योग्य हैं। वेदोंद्वारा उन्हीं परम (पुरुष)-का गान किया जाता है। जो इन्हें (परम पुरुषको) जानता है, वही वेद को जाननेवाला है। ये ही परात्पर ब्रह्म, ज्योतिरूप और श्रेष्ठ आनन्द हैं। वेदवाक्योंद्वारा प्रतिपादित तत्त्व वासुदेव ही परमपद हैं। वेदपरायण मुनि वेदोंद्वारा जानने योग्य इन्हीं (वासुदेवरूप) वेदको जानते हैं ॥ २०-२३ ॥
जो परम अवेद्यको जानते हैं तथा वेदनिष्ठ, सदेश्वर, वेदमूर्ति, महेश्वर हैं, वे भगवान् वेदोंद्वारा ज्ञात होने योग्य हैं। वे ही भगवान् वेद हैं, वे ही (वेदसे) जानने योग्य हैं और उन्हींका आश्रय ग्रहण करनेसे मुक्ति मिलती है। पराशरके पुत्र महामुनि वेदव्यास (ही) इस अविनाशी, जानने योग्य, प्रणवस्वरूप अव्यय वेद और अवेद अर्थात् ज्ञात न हो सकने योग्य (परमतत्त्व)-को भी जानते हैं ॥ २४-२५॥
Summary of chapter 48 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Sūta glorifies Bhāratavarsha in detail, describing its major rivers and holy mountain ranges. Living in Bhāratavarsha is declared a rare spiritual privilege gained through past virtuous deeds, as it offers the direct doorway to Svarga and Moksha.