कूर्म महा पुराण
42 अध्याय
सूतजीने कहा-जप्येश्वरके समीपमें ही पञ्चनद नामका एक दूसरा श्रेष्ठ तीर्थ है, जो पवित्र तथा सभी पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ तीन रात्रिपर्यन्त उपवासकर महेश्वरकी पूजा करनेसे मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है तथा विशुद्ध आत्मावाला होकर रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। अमित तेजस्वी शंकर का एक दूसरा श्रेष्ठ तीर्थ है जो महाभैरव नामसे कहा गया है, वह महापातकोंका नाश करनेवाला है। वितस्ता नामक श्रेष्ठ नदी तीर्थों में परम तीर्थ है, वह सभी पापोंको हरनेवाली, पवित्र और साक्षात् पार्वती रूप ही है॥ १-४॥
अमित तेजस्वी शम्भुका पञ्चतप नामका एक तीर्थ है, जहाँ देवोंके आदिदेव (विष्णु)-ने चक्र-प्राप्ति के लिये शंकरकी पूजा की थी। वहाँ (पञ्चनद तीर्थमें) किया गया पिण्डदान आदि कर्म परलोकमें अनन्त फल प्रदान करनेवाला होता है। वहाँ संकल्पपूर्वक नियम से निवास करते हुए यथासमय प्राण-त्याग करनेवाला ब्रह्मलोकमें महिमा प्राप्त करता है॥५-६॥
कायावरोहण नामक महादेवका एक शुभ स्थान (तीर्थ) है, जहाँ मुनियोंने माहेश्वर धर्मोंका प्रवर्तन किया था। वहाँ किया गया श्राद्ध दान, तप, होम तथा उपवास अक्षय (फल प्रदान करनेवाला) होता है। वहाँ जो प्राण परित्याग करता है, वह रुद्रलोक में जाता है। एक दूसरा श्रेष्ठ तीर्थ है, जो कन्यातीर्थ इस नामसे विख्यात है। वहाँ जाकर प्राणोंका परित्याग करनेसे शाश्वत लोकोंकी प्राप्ति होती है। जमदग्नि के पुत्र अक्लिष्टकर्मा परशुरामका भी एक शुभ तीर्थ है। उस तीर्थ-श्रेष्ठमें स्नान करनेसे हजार गोदानका फल प्राप्त होता है। महाकाल इस नामसे विख्यात तीर्थ तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। वहाँ जाकर प्राणोंका परित्याग करनेसे गाणपत्य-पद प्राप्त होता है। श्रेष्ठ नकुलीश्वर तीर्थ गुह्यस्थानोंमें भी अत्यन्त गुह्य है। वहाँ श्रीमान् भगवान् नकुलीश्वर विराजमान रहते हैं॥७-१२॥
हिमालयके रमणीय शिखरपर स्थित अत्यन्त सुन्दर गङ्गाद्वारमें शिष्योंसे घिरे हुए महादेव देवी के साथ नित्य निवास करते हैं। वहाँ स्नानकर वृषध्वज महादेवकी पूजा करनेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है और मृत्युके बाद परम ज्ञान प्राप्त होता है॥ १३-१४॥
देवाधिदेव (शंकर)-का एक दूसरा शुभ तथा पवित्रतम स्थान है जो भीमेश्वर इस नामसे विख्यात है। वहाँ जानेसे व्यक्ति पापसे मुक्त हो जाता है। इसी प्रकार चण्डवेगा नदीका उद्गम-स्थान भी पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नान करने तथा जलका पान करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है॥१५-१६॥
इन सभी तीर्थों में भी श्रेष्ठ तथा दिव्य वाराणसी नामकी पुरी हजारों कोटिगुना अधिक फलप्रदा है। पूर्वमें मैंने आप लोगोंसे उसके माहात्म्यका वर्णन किया था। योगीको भी (वाराणसीके अतिरिक्त) अन्यत्र एक जन्ममें मुक्ति नहीं मिलती ॥ १७-१८॥
मनुष्योंके पापोंको हरनेवाले ये प्रधान-प्रधान देश (तीर्थ) बतलाये गये हैं। यहाँ जाकर सैकड़ों जन्मोंमें किये पापोंका प्रक्षालन करना चाहिये। जो अपने धर्मोंका परित्यागकर तीर्थों का सेवन करता है, उसके लिये तीर्थ न इस लोकमें फलदायी होते हैं न परलोकमें ॥१९-२०॥
प्रायश्चित्ती, पत्नीसे रहित विधुर पुरुष तथा जिनके द्वारा पाप हो गया है ऐसे गृहस्थ एवं इसी प्रकार के जो अन्य लोग हैं, उन्हें (पश्चात्तापपूर्वक यथाशास्त्र) तीर्थोंका सेवन करना चाहिये। प्रयत्नपूर्वक अग्नि* अथवा पत्नीके साथ तीर्थों में जाना चाहिये। ऐसा करने से मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त होकर यथोक्त गति (उत्तम गति) प्राप्त करता है। अथवा तीनों ऋणोंसे मुक्त होनेके बाद पुत्रोंके लिये जीविका-सम्बन्धी वृत्ति की व्यवस्थाकर और अपनी पत्नीको उन्हें सौंपकर तीर्थ का सेवन करना चाहिये ॥ २१-२३॥
प्रायश्चित्तके प्रसंगवश तीर्थों के माहात्म्यका वर्णन किया गया। इसे पढ़नेवाला अथवा सुननेवाला भी सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है॥ २४ ॥
Summary of chapter 91 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Maharshi Vyāsa extols the supreme majesty of sacred Tīrthas, focusing on Prayāgarāja, the king of all pilgrimage sites at the holy Saṅgama of Gangā, Yamunā, and Sarasvatī. He describes how bathing at Prayāga during the month of Māgha, worshipping Veṇī Mādhava, and offering Śrāddha at Akshaya Vaṭa destroys all sins and grants immediate salvation.