8 अध्याय

ईश्वर बोले-श्रेष्ठ ब्राह्मणो! मैं दूसरे गुह्यतम ज्ञानको बताता हूँ, जिससे यह प्राणी घोर संसार-सागर को पार कर लेता है॥१॥

मैं ब्रह्ममय, शान्त, शाश्वत, निर्मल, अव्यय, एकाकी, अद्वितीय परमेश्वर तथा भगवान् कहलाता हूँ। महद्ब्रह्म मेरी योनिरूप है, मैं उसमें मूल माया नामक गर्भ धारण करता हूँ और उससे यह संसार उत्पन्न हुआ है। (उसीसे) प्रधान, पुरुष, आत्मा, महत्तत्त्व, भूतादि

(तामस अहंकार), तन्मात्राएँ, पञ्चमहाभूत तथा इन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं॥२-४॥

तदनन्तर करोड़ों सूर्यके समान प्रकाशमान हिरण्मय अण्ड उत्पन्न हुआ। उस अण्डमें मेरी शक्तिसे उपबृंहित महाब्रह्मा उत्पन्न हुए। अन्य भी जो बहुतसे प्राणी हैं, वे सभी मेरे ही स्वरूप हैं। मेरी मायासे मोहित होने के कारण वे पितामह-स्वरूपको नहीं देख पाते। सभी योनियोंमें जो मूर्तियाँ उत्पन्न होती हैं, उनकी योनि परा माया है और मुझे ही पितृस्वरूप विद्वान् लोग जानते हैं। इस प्रकार जो मुझे ही बीजरूप पितृस्वरूप प्रभु जानता है, वह सभी लोकोंमें धीर होता है और मोहको प्राप्त नहीं होता ।।५-८॥

मैं ही सभी विद्याओंका स्वामी, प्राणियोंका परम ईश्वर, ओङ्कारमूर्ति, प्रजापति भगवान् ब्रह्मा हूँ। जो पुरुष विनष्ट होनेवाले सभी (चराचर)भूतोंमें परमेश्वर को नाशरहित और समभावसे देखता है, वही यथार्थ देखता है। जो पुरुष सबमें समभावसे स्थित परमेश्वर को

समानरूपसे देखता है, वह स्वयंद्वारा स्वयंको नष्ट नहीं करता; इस कारण वह परम गति प्राप्त करता है। सात सूक्ष्म तत्त्वों एवं छः अङ्गोंवाले महेश्वरको जानकर प्रधान तथा विनियोगको जाननेवाला परम ब्रह्मको प्राप्त करता है॥९-१२॥

सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादि ज्ञान, स्वतन्त्रता, नित्य अलुप्त-शक्ति तथा अनन्तशक्ति-ये विभु महेश्वरके छ: अङ्ग कहे गये हैं। पाँच तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध), मन और आत्मा-ये सात सूक्ष्म तत्त्व कहे गये हैं। जो हेतुरूपा प्रकृति है, वह प्रधान है और उससे होनेवाले बन्धनको ही विनियोग कहा जाता है। प्रकृतिमें लीन रहनेवाली जो शक्ति है, उसे

वेदोंमें ब्रह्मयोनि और कारणरूप कहा गया है। अद्वितीय, परमेष्ठी, परात्पर, सत्यरूप महेश्वर उसके पुरुष हैं । १३-१५॥

वे ही अद्वितीय देव ब्रह्मा, योगी, परमात्मा, महीयान्, व्योमव्यापी, वेदोंद्वारा ज्ञात होने योग्य, पुराण, पुरुष अद्वितीय रुद्र, मृत्यु, अव्यक्त, एक बीज और विश्वरूप हैं॥१६॥

उन्हें ही कोई एक और कोई अनेक कहते हैं। दूसरे कुछ लोग उन्हें ही अद्वितीय आत्मा कहते हैं। वेदज्ञ लोग उन्हें अणुसे अणुतर और महान्से भी महत्तर महादेव कहते हैं। हृदयरूप गुहामें स्थित, परात्पर, पुराणपुरुष, विश्वरूप, हिरण्मय और बुद्धिमानों की परमगति प्रभुको जो इस प्रकार जानता है, वह बुद्धिमान् पुरुष बुद्धिको पार कर जाता है अर्थात् परमपद प्राप्त करता है॥ १७-१८॥