कूर्म महा पुराण
41 अध्याय
सूतजी बोले-इस प्रकार ये महादेव कालात्मा ऐश्वर्यमय विग्रहवाले देवाधिदेव पितामह (सूर्य) काल का नियमन करते हैं। विप्रो! सभी लोकोंको प्रकाशित करनेवाली उनकी जो रश्मियाँ हैं, उनमें भी ग्रहों की योनिरूप सात रश्मियाँ अत्यन्त श्रेष्ठ हैं ॥१-२॥
सुषुम्न, हरिकेश, विश्वकर्मा, विश्वव्यचा, संयद्वसु, अर्वावसु तथा स्वराड्-ये सात रश्मियाँ कही गयी हैं। सुषुम्न नामक सूर्यको रश्मि चन्द्रमाकी चाँदनीको पुष्ट करती है। यह सुषुम्न रश्मि तिरछे रूपसे ऊपरको जानेवाली कही गयी है। हरिकेश नामक जो रश्मि कही गयी है, वह नक्षत्रोंका पोषण करनेवाली है। विश्वकर्मा नामक रश्मि सदा बुध (ग्रह)-का पोषण करती है। विश्वव्यचा नामकी जो रश्मि है, वह नित्य शुक्र (ग्रह)-का पोषण करती है। संयद्वसु नामसे प्रसिद्ध रश्मि मंगलका पोषण करती है और प्रभु सूर्यकी अर्वावसु नामक रश्मि बृहस्पतिका पोषण करती है तथा सातवीं सुराट् (स्वराड्) नामक रश्मि शनैश्चरका पोषण करती है।३-७॥
इस प्रकार सूर्यके प्रभावसे सभी नक्षत्र एवं तारे नित्य बढ़ते हैं तथा वृद्धि प्राप्तकर नित्य दूसरों को आप्यायित करते हैं। धुलोक एवं पृथ्वीसे सम्बद्ध समस्त तेज-समूह और निशा-सम्बन्धी तम-अन्धकारका नित्य आदान अर्थात् ग्रहण करनेके कारण प्रभु (सूर्य)-को आदित्य कहा जाता है। हजारों नेत्रवाले वे अपनी हजारों नाडियों (किरणों)-द्वारा चारों ओरके नदियों, समुद्रों, कूपों, स्थावर तथा जङ्गम और नहरों आदिके जलका ग्रहण करते हैं। उनकी हजारों रश्मियाँ शीत, वर्षा एवं उष्णता की सृष्टि करनेवाली हैं और उनमें चार सौ विचित्र मूर्तिस्वरूपा रश्मियाँ वर्षा करती हैं वन्दना, याज्या, केतना और भूतना-ये अमृता नामवाली सभी रश्मियाँ वर्षा करनेवाली हैं॥८-१२॥
नाडीस्वरूपिणी तीन सौ रश्मियाँ हिमकी सृष्टि करती हैं। मेषी, पौषी तथा ह्लादिनी नामकी रश्मियाँ हिमकी सृष्टि करनेवाली हैं। ये सभी रश्मियाँ पीत वर्णकी और चन्द्रा नामवाली हैं। शुक्रा, ककुभ् और विश्वभृत् नामक सभी रश्मियोंका नाम शुक्रा है। ये तीनों प्रकारकी रश्मियाँ धूपकी सृष्टि करनेवाली हैं॥ १३-१४॥
उनके द्वारा वे (सूर्य) समान-रूपसे मनुष्यों, पितरों तथा देवताओंका पोषण करते हैं। वे (इन किरणों के माध्यमसे) मनुष्योंको औषधके द्वारा, पितरोंको स्वधा के द्वारा और देवताओंको अमृतके द्वारा इस प्रकार तीनोंको तीन पदार्थोद्वारा संतृप्त करते हैं ॥१५॥
वे (सूर्य) वसन्त एवं ग्रीष्म ऋतुमें तीन सौ किरणों से तपते हैं। और वर्षा ऋतुमें चार सौ रश्मियोंके द्वारा वर्षा करते हैं तथा हेमन्त एवं शिशिर ऋतुमें तीन सौ रश्मियोंसे हिम प्रदान करते हैं। माघमासमें सूर्यका नाम वरुण होता है, फाल्गुनमें वे पूषा कहलाते हैं। सूर्य चैत्र-मास में अंश, वैशाखमें धाता, ज्येष्ठा-मूल अर्थात् ज्येष्ठ-मास में इन्द्र, आषाढ़में सविता, श्रावणमें विवस्वान् तथा भाद्रपदमासमें भग कहे जाते हैं। (ये ही) सूर्य आश्विन में पर्जन्य, कार्तिकमें त्वष्टा, मार्गशीर्षमें मित्र और पौष में सनातन विष्णु कहलाते हैं॥१६-१९॥
वरुण (नामक सूर्य)-की पाँच हजार रश्मियाँ सूर्यका कार्य सम्पादित करती हैं। इसी प्रकार पूषा छ: हजार, अंश देव सात हजार, धाता आठ हजार, शतक्रतु इन्द्र नौ हजार, विवस्वान् दस हजार और भग ग्यारह हजार रश्मियोंसे पालन करते हैं। मित्र नामक सूर्य सात हजार और त्वष्टा आठ हजार रश्मियोंसे तपते हैं। अर्यमा दस हजार रश्मियोंसे पालन करते हैं और पर्जन्य नौ हजार रश्मियोंसे ताप प्रदान करते हैं। विश्वकी सृष्टि करनेवाले विष्णु (नामक सूर्य) छः हजार रश्मियों से तपते हैं॥ २०-२२॥
प्रभु सूर्य वसन्त ऋतुमें कपिल (भूरे) वर्ण के, ग्रीष्ममें स्वर्णके समान, वर्षा में श्वेत, शरमें पाण्डुर (सफेद-मिश्रित पीले) रंगके, हेमन्तमें ताँबे के समान वर्णवाले और शिशिरमें सूर्य लोहित (लाल) वर्णके होते हैं। सूर्य ओषधियोंमें बलका आधान करते हैं, पितरों को स्वधा और देवताओंको अमरत्व-इस प्रकार तीनों को तीन पदार्थ प्रदान करते हैं ॥ २३-२४॥
हे द्विजो! अन्य आठ ग्रहोंको सूर्यसे अधिष्ठित जानना चाहिये। चन्द्रमा, चन्द्रमाका पुत्र बुध, शुक्र, बृहस्पति, मंगल, शनि, राहु तथा केतु नामक आठवाँ
ग्रह है। वातरश्मियोंके द्वारा ध्रुवमें आबद्ध वे सभी ग्रह (अपनी कक्षामें) भ्रमण करते हुए यथास्थान सूर्य की परिक्रमा करते हैं। द्विजो! वायुचक्रसे प्रेरित (ग्रहगण) अलातचक्रके समान भ्रमण करते हैं। चूँकि वायु उनका वहन करती है, इसलिये उसे 'प्रवह' कहा जाता है। सोमका रथ तीन चक्रोंवाला है। उसके वाम और दक्षिण भागमें कुन्द पुष्पके समान वर्णवाले दस अश्व जुते हैं, इसी रथसे निशाकर चन्द्रमा सूर्यके समान (अपनी) कक्षामें स्थित होकर नक्षत्रोंके मध्य परिभ्रमण करता है। हे विप्रेन्द्रो! चन्द्रमाकी रश्मियोंकी क्रमशः ह्रास और
वृद्धि होती रहती है। दिनके क्रमानुसार शुक्लपक्ष में चन्द्रमाके परभागमें स्थित सूर्य सोम (चन्द्र)-को निरन्तर आपूरित करता है॥ २५-३०॥
हे विप्रो! देवताओंद्वारा (अमृत) पान किये जाने के कारण क्षीण हुए चन्द्रमाको सूर्य सुषुम्न नामक एक रश्मि (किरण)-से नित्य आप्यायित करते हैं। सूर्यके तेज से चन्द्रमाका यह (क्षीण) शरीर पुष्ट होता है, अतएव दिनके क्रमानुसार पूर्णिमाको वह चन्द्रमा सम्पूर्ण रूपसे दिखायी देता है। हे विप्रो! देवता उस अमृतस्वरूप सम्पूर्ण सोमका आधे महीनेतक पान करते हैं, क्योंकि वे (देवता) अमृतका भोजन करनेवाले होते हैं। तदनन्तर पंद्रहवें भागके किंचित् कलात्मक भाग शेष बचनेपर अपराह्नमें पितृगण उस अन्तिम भागका सेवन करते हैं। पितृगण चन्द्रमाकी अवशिष्ट अमृतस्वरूपिणी अमृतमयी तथा पवित्र सुधा नामक कलाका दो लव (कालविशेष)-तक पान करते हैं।।३१-३५॥
अमावस्याके दिन (चन्द्रमाकी) किरणोंसे निकलनेवाले स्वधा नामक अमृतका पान करनेसे पितर महीने भर के लिये तृप्ति प्राप्त कर स्वस्थ हो जाते हैं। देवताओंके द्वारा (चन्द्रमाके) अमृतका पान किये जानेपर सोम का विनाश नहीं होता। श्रेष्ठ जनो! इस प्रकार सूर्यके कारण चन्द्रमा के क्षय एवं वृद्धिका क्रम चलता है। सोमके पुत्र (बुध)-के रथमें वायुके समान वेगवाले जलसे उत्पन्न आठ घोड़े जुते रहते हैं। वह बुध उसी रथसे सर्वत्र गमन करता है।३६-३८॥
शुक्रका रथ भूमिसे उत्पन्न दस घोड़ोंसे और मंगल का स्वर्णमय अत्यन्त सुन्दर रथ आठ घोड़ोंसे युक्त रहता है। बृहस्पतिका भी आठ घोड़ोंवाला रथ स्वर्ण से निर्मित है। शनिका लोहेसे बना हुआ रथ तमोमय है और आठ घोड़ोंवाला है। सूर्यके शत्रु राहु और केतु के रथ छ:-छः अश्वोंसे युक्त हैं ।। ३९-४०॥
इस प्रकार महाग्रहोंके नौ रथोंका वर्णन किया गया। ये सभी महाभाग (ग्रह) वायुकी रश्मियोंके द्वारा ध्रुव में आबद्ध हैं। सभी ग्रह, नक्षत्र और तारागण भी ध्रुव में पूर्णतः निबद्ध हैं । वायुकी रश्मियोंद्वारा परिचालित होकर ये सभी परिभ्रमण करते रहते हैं॥ ४१-४२॥
Summary of chapter 39 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Sūta concludes the Prayāga Māhātmya by recounting how ancient monarchs, Maharshis, and Devas cleansed themselves of all subtle karmic impurities by bathing at the sacred confluence. The chapter declares that residing at Prayāga with a pure mind and unshakeable faith grants ultimate Moksha, freeing the soul from the endless wheel of Saṁsāra.