10 अध्याय

श्रीकूर्मने कहा-महेश्वर देवके अपने निवास-स्थान पर चले जानेके बाद पितामह (ब्रह्मा), (भगवान् विष्णुकी) नाभिसे उत्पन्न उसी विशाल सुन्दर कमलपर रहने लगे॥१॥

एक लम्बा समय व्यतीत हो जानेपर वहाँ अतुलित शक्तिवाले मधु तथा कैटभ नामक दो असुर आये, जो परस्पर भाई थे। देवोंके भी देव शार्ङ्गधारी भगवान् विष्णुके कानसे उत्पन्न तथा विशाल पर्वतके समान शरीरवाले और महान् क्रोधसे आविष्ट उन दोनों (मधु-कैटभ) को आया हुआ देखकर अजन्मा, विभु (ब्रह्मा) ने नारायणसे कहा-ये दोनों असुर तीनों लोकोंके लिये कण्टक हैं, आप इन्हें मारें ॥२-४॥

उनके इस वचनको सुनकर प्रभु नारायण हरिने उन दोनों का वध करनेके लिये (जिष्णु तथा विष्णु नामक) दो पुरुषों को आज्ञा दी॥५॥

हे ब्राह्मणो! उनकी आज्ञासे उन (विष्णु तथा जिष्णु)-से उन दोनों (मधु-कैटभ) असुरोंका महान् युद्ध हुआ। विष्णुने कैटभको जीता और जिष्णुने मधु को जीता। तदनन्तर स्नेह से आविष्ट मनवाले हरि ने कमल के आसनपर आसीन तथा जगन्नाथ पितामहसे मधुर वचन कहा-॥६-७॥

प्रभो! मेरे कहनेसे आप अब इस कमलसे नीचे उतरें। तेजोमय, बहुत भारी आपको ढोनेमें मैं असमर्थ हूँ॥८॥

तब विश्वात्मा (ब्रह्मा) नीचे उतरे और चक्र धारणकरनेवाले विष्णुकी देहमें प्रविष्ट होकर वैष्णवी निद्राकोप्राप्त हो गये। इस प्रकार विष्णुसे उनकी एकात्मता होगयी॥९॥

तब हजारों सिर तथा हजारों नेत्रवाले और शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले वे नारायण नामवाले ब्रह्मा जलमें सो गये। उन्होंने बहुत समयतक परमात्मा के अनादि, अनन्त, आत्मस्वरूप, ब्रह्मसंज्ञक अद्वैत आनन्द का अनुभव किया। तदनन्तर प्रभातकाल होनेपर योगात्मा देव चतुर्मुख होकर और वैष्णव भावका आश्रय ग्रहणकर उसी प्रकारकी (वैष्णवी) सृष्टि करने लगे। १०-१२॥

उन देवने सर्वप्रथम पूर्वजोंके भी पूर्वज सनन्दन, सनक, ऋभु, सनत्कुमार तथा सनातनको उत्पन्न किया। (सुख-दुःख आदि) द्वन्द्व एवं मोह (आसक्ति)-से सर्वथा शून्य एवं परम वैराग्यभाव में स्थित इन सनक आदि ऋषियों ने परम तत्त्व को जानकर सृष्टि कार्य में अपनी बुद्धि नहीं लगायी। उन (सनकादि)-के इस प्रकार के लोक-सृष्टिसे सर्वथा निरपेक्ष भाव को देखकर पितामह (ब्रह्मा) परमेष्ठी (परमात्मा-जनार्दन)की माया से मोहित हो गये। तब जगन्मूर्ति, पुराणपुरुष, जनार्दनने (नाभि) कमलसे उत्पन्न अपने पुत्र (ब्रह्मा) का मोह नष्ट करनेके लिये उनसे कहा- ॥ १३-१६॥

विष्णु बोले-कहीं आप शूलपाणि सनातन देव को भूल तो नहीं गये? उन शंकरने अपनेको आपके पुत्र-रूपमें होनेकी बात कही थी॥१७॥

गोविन्दसे चेतना प्राप्तकर पद्मयोनि पितामह प्रजा की सृष्टि करनेकी इच्छासे परम दुश्चर तप करने लगे। उनके इस प्रकार (दीर्घकालतक) तप करनेपर (भी) किसी भी प्रकारकी सृष्टि नहीं हुई। बहुत समय बीत जानेपर उन्हें दुःखसे क्रोध उत्पन्न हुआ॥१८-१९॥

क्रोधाविष्ट उनके (ब्रह्मा के) नेत्रों से आँसू की बूंदें गिरी। तब उन आँसुओंकी बूंदोंसे भूत-प्रेत उत्पन्न हुए। आँसुओंसे उत्पन्न उन सब (भूत-प्रेतों)-को देखकर क्रोधाविष्ट प्रजापति भगवान् ब्रह्माने अपनी ही निन्दा की और अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया॥ २०-२१॥

तदनन्तर प्रभुके मुखसे हजारों सूर्यके समान देदीप्य-मान तथा प्रलयकालीन अग्निके सदृश प्राणमय रुद्र प्रकट हुए॥ २२॥

देवोंके भी देव स्वयं शिव उच्च स्वरमें घोर रुदन करने लगे। तब रुदन करते हुए उनसे ब्रह्माने 'मत रोओ'- '-इस प्रकारसे कहा। तुम रुदन करनेके कारण 'रुद्र' इस नामसे संसारमें प्रसिद्धि प्राप्त करोगे॥ २३ ॥

लोकपितामहने (उन्हें रुद्रके अतिरिक्त) अन्य सात नाम, (आठ) पत्नियाँ, शाश्वत (दीर्घायु) पुत्र और आठ स्थानों* (मूर्तियों)-को प्रदान किया॥ २४॥

भव, शर्व, ईशान, पशुपति, भीम, उग्र तथा महादेव- ये सात नाम हैं। सूर्य, जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु, आकाश, दीक्षित ब्राह्मण तथा चन्द्र-ये (रुद्रकी) आठ मूर्तियाँ हैं ॥ २५-२६॥

जो इन आठ स्थानों (मूर्तिरूपों)-में रुद्रका ध्यान करते हैं और उन्हें प्रणाम करते हैं, उन्हें अष्टमूर्ति रूप देव (भगवान् शिव अपना) परम पद देते हैं ॥ २७ ॥

सुवर्चला, उमा, विकेशी, शिवा, स्वाहा, दिशाएँ, दीक्षा तथा रोहिणी-ये ही (रुद्रकी आठ) पलियाँ हैं। शनैश्चर, शुक्र, लोहिताङ्ग (मंगल), मनोजव (कामदेव), स्कन्द, सर्ग, संतान तथा बुध-ये (आठ उनके) पुत्र कहे गये हैं ॥ २८-२९॥

इस प्रकारके देवाधिदेव भगवान् महेश्वरने प्रजाधर्म (सृष्टिकार्य) एवं काम (वासना)-का परित्यागकर वैराग्यका आश्रय ग्रहण किया। उस शाश्वत, परम अमृतरूपी अक्षर ब्रह्मका आस्वादनकर और आत्मामें आत्मतत्त्व का आधानकर वे ईश्वरभावमें स्थित हो गये॥३०-३१॥

ब्रह्मा के द्वारा 'प्रजा की सृष्टि करो' इस प्रकार का आदेश प्राप्त कर नीललोहित शिवने मनसे अपने ही समान रुद्रों की सृष्टि की॥३२॥

प्रभुने सैकड़ों करोड़ जटाजूट धारण करनेवाले, भयरहित, नीलकण्ठ, पिनाकपाणि, हाथमें त्रिशूल धारण किये, ऋष्टिघ्न, महान् आनन्दस्वरूप, तीन नेत्रयुक्त, जरा-मरणसे रहित, विशाल वृषभोंको वाहनरूप में स्वीकार करनेवाले सर्वज्ञ तथा वीतराग (रुद्रों)को उत्पन्न किया।३३-३४॥

गुरु (ब्रह्मा)-ने जरा-मरणसे रहित, नीललोहित एवं निर्मल उन अनेक रुद्रोंको देखकर हर (शिव)से कहा॥३५॥

हे देव! मृत्युसे रहित इस प्रकारकी सृष्टि मत करो। भूतेश! जन्म एवं मृत्युवाली दूसरी प्रकार को सृष्टि करो॥ ३६॥

तदनन्तर कामपर शासन करनेवाले जटाजूटधारी भगवान् (शिव)-ने उनसे कहा-मेरे पास उस प्रकार की (जन्म-मृत्युसे युक्त) सृष्टि नहीं है। (ऐसी) अशुभ प्रजाओं को आप ही उत्पन्न करें। तबसे उन देवने अशुभ प्रजाओंकी सृष्टि नहीं की। (और) अपने आत्मज उन रुद्रों के साथ वे निवृत्तात्मा (क्रियारहित)-के रूप में स्थित हो गये। इसी कारण देवोंमें देव उन शूलधारी (शंकर)-का स्थाणुत्व हुआ (अर्थात् वे 'स्थाणु" इस नाम से प्रसिद्ध हो गये) ॥ ३७-३८॥

भगवान् शंकरमें ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, तप, सत्य, क्षमा, धृति, स्रष्टत्व, आत्मज्ञान तथा अधिष्ठातृत्व-ये दस अव्यय (शाश्वत) गुण सदा प्रतिष्ठित रहते हैं। ये पिनाक धारण करनेवाले शंकर ही साक्षात् परमेश्वर हैं ॥ ३९-४०॥

तदनन्तर प्रीतिसे विकसित नेत्रवाले भगवान् ब्रह्मा ने तीन नेत्रोंवाले देव (शंकर)-को मानस पुत्रोंके साथ देखा। ब्रह्माने अपनी ज्ञान-दृष्टिसे ईश्वर-सम्बन्धी परात्पर भावको जानकर जगत्के एकमात्र स्वामी (भगवान् शंकर)-की अपने मस्तकपर हाथोंकी अंजलि बाँधकर स्तुति की। ४१-४२॥

ब्रह्माने कहा-महादेव! आपको नमस्कार है। परमेश्वर! आपको नमस्कार है। शिवको नमस्कार है। ब्रह्मरूपी देवको नमस्कार है। महेश! आपको नमस्कार है। शान्तिके मूलहेतु! आपको नमस्कार है। प्रधान पुरुषेश! आपको नमस्कार है तथा योगाधिपति आपको नमस्कार है। काल, रुद्र, महाग्रास तथा शूलीको नमस्कार है। हाथमें पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। तीन नेत्रवालेको बार-बार नमस्कार है। त्रिमूर्तिस्वरूप आपको नमस्कार है। ब्रह्मा के उत्पत्तिकर्ता आपके लिये नमस्कार है। ब्रह्मविद्या के अधिपति और ब्रह्मविद्या प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है॥४३-४६॥

वेदों के रहस्य रूप को नमस्कार है। काल के भी काल आपको नमस्कार है। वेदान्तसारके भी सारको नमस्कार है। वेदात्ममूर्तिको नमस्कार है। शुद्ध-बुद्ध स्वरूप को नमस्कार है। योगियों के गुरुको नमस्कार है। शोकों से रहित विविध भूतों से घिरे हुए आपको नमस्कार है। ब्रह्मण्य देव को नमस्कार है। ब्रह्माधिपति के लिये नमस्कार है। त्रिलोचन परमेष्ठी देवको नमस्कार है ॥ ४७-४९ ॥

दिगम्बर! आपको नमस्कार है। मुण्ड (की माला) एवं दण्ड धारण करनेवालेको नमस्कार है। अनादि तथा मलरहित (शुद्धरूप), ज्ञानगम्य आपको नमस्कार है। तारक एवं तीर्थरूप तथा योगविभूतियोंके मूल कारणको नमस्कार है। धर्म (धर्माचरण)-के द्वारा प्राप्य, योगगम्य आपको नमस्कार है। निष्प्रपञ्चको नमस्कार है। निराभास! आपको नमस्कार है। विश्वरूप ब्रह्म परमात्माको नमस्कार है॥५०-५२॥

जगन्मय! आपके द्वारा ही यह सम्पूर्ण (जगत्) रचा गया है, आपमें ही यह सम्पूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है और आप ही प्रधानादि समस्त विश्वका संहार करते हैं। आप ईश्वर, महादेव, परब्रह्म, महेश्वर, परमेष्ठी, शिव, शान्त, पुरुष, निष्कल तथा हर हैं। आप अक्षर, परम ज्योति हैं, आप काल तथा परमेश्वर हैं और आप ही प्रधान पुरुष, प्रकृति तथा अनन्त हैं ।। ५३-५५ ।।

भूमि, जल, वायु, अग्नि, आकाश एवं अहंकार- ये जिसके रूप हैं, उन ब्रह्मसंज्ञक आपको नमस्कार करता हूँ। धुलोक जिनका मस्तक है, पृथ्वी पैर है, दिशाएँ जिनकी भुजाएँ हैं और आकाश जिनका उदर है, उन विराट् पुरुषको मेरा प्रणाम है। जो अपने प्रकाशसे समस्त दिशाओंको प्रकाशित करते हुए विश्व को अपेक्षित उष्णता प्रदान करते हैं, उन नित्य ब्रह्म तेजोमय सूर्य रूप को नमस्कार है। जो अपने रौद्र तेजोमय शरीर से (देवताओंको) हव्य तथा पितरोंको कव्य पहुँचाते हैं, उन अग्निस्वरूप (देव)-को नमस्कार है। जो अपने तेजसे सम्पूर्ण जगत्को नित्य संतृप्त करते हैं और देवतासमूहके द्वारा जिनका पान किया जाता है, उन सोमरूप चन्द्रदेव को नमस्कार है॥५६-६०॥

जो सम्पूर्ण प्राणियों का भरण-पोषण करती है और जो (सभी प्राणियोंके) भीतर सदा विचरण करती है, ऐसी वायुरूपात्मक माहेश्वरीशक्ति आपको नमस्कार है॥६१॥

जो प्राणियोंके अपने-अपने कर्मोंके अनुसार इस सम्पूर्ण (जगत्)-की सृष्टि करते हैं, उन अपनी आत्मा में प्रतिष्ठित चतुर्मुखात्मक (ब्रह्मा)-को नमस्कार है। जो अपने आत्मामें प्रतिष्ठित अनुभूतिरूप योगसे (प्रेरित) मायाद्वारा सम्पूर्ण विश्व को आवृतकर शेष (शेषनाग)की शय्यापर शयन करते हैं, उन विश्वात्मा को नमस्कार है। जो चौदह भुवनोंवाले ब्रह्माण्ड को नित्य अपने सिर पर धारण किये रहते हैं और जो सभी के आश्रय हैं, उन शेषात्माको नमस्कार है॥६२-६४॥

जो महाप्रलयकाल में दिव्य एवं एकमात्र साक्षी रूप परमानन्द का आस्वादन करते हुए नृत्य करते हैं, उन अनन्त महिमावाले रुद्रात्मा को नमस्कार है। जो ईश्वर सभी प्राणियों के भीतर नियन्ताके रूप में प्रतिष्ठित रहते हैं, उन सर्वसाक्षी देव और उनके शरीररूप (देव)को मैं नमस्कार करता हूँ। निद्रारहित, श्वासको जीतनेवाले, संतुष्ट तथा समदर्शी (योगीजन समाधिमें) जिस ज्योति या प्रकाशका दर्शन करते हैं, उन योगात्माको नमस्कार है। जिस (विद्या)-के द्वारा पुण्यात्मा योगीजन अत्यन्त कठिनता से पार की जा सकनेवाली मायाको सरलता से पार कर लेते हैं, उस विद्यास्वरूप (देव)-को नमस्कार है। जिसके प्रकाशसे यह (विश्व) प्रकाशित होता है, मैं (उस) अन्धकारसे सर्वथा रहित अर्थात् प्रकाश स्वरूप और अद्वितीय परम तत्त्व-स्वरूप (तद्रूप परम-तत्त्व मात्र ही जिनका स्वरूप है, उन) परमेश्वरकी शरण ग्रहण करता हूँ। मैं नित्यानन्दस्वरूप, निराधार, निष्कल परमात्मा, परमेश्वर आप परम शिवकी शरण ग्रहण करता हूँ॥६५-७०॥

इस प्रकार महादेवकी स्तुतिकर ब्रह्मा उनकी भावनासे भावित होकर सनातन ब्रह्मको सम्बोधित करते हुए विनयपूर्वक हाथ जोड़े हुए खड़े हो गये ॥७१॥

तदनन्तर महादेव हरने उन्हें सर्वश्रेष्ठ दिव्य योग (ज्ञान), ऐश्वर्य, ब्रह्मकी सद्भावना (ब्रह्मविषयक उत्तम भाव) तथा वैराग्य प्रदान किया। शरणागतों का कष्ट हरनेवाले उन (शंकर) देवने स्वयं अपने मनोरम एवं कल्याणकारी हाथोंके द्वारा उनका (ब्रह्माका) स्पर्श किया और उनपर अनुग्रह करके वे बोले-॥७२-७३॥

ब्रह्मन् ! जो आपने 'मेरा पुत्र बनें' इस प्रकार से मुझसे प्रार्थना की थी, मैंने उसे (रुद्ररूपमें उत्पन्न होकर) पूर्ण कर दिया। (अब आप) विविध प्रकार के जगत्की सृष्टि करें। ब्रह्मन् ! मैं ही निष्कल परमेश्वर सृष्टि, रक्षा एवं प्रलय-इन तीन गुणोंसे भावित होकर ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव-इन नामोंसे तीन रूपोंमें विभक्त हूँ। आप मेरे ज्येष्ठ पुत्र हैं और सृष्टिकी रचनाके लिये मेरे ही दाहिने अङ्गसे आप बनाये गये हैं। मेरे ही बायें अङ्गसे पुरुषोत्तम विष्णु उत्पन्न हैं। उन्हीं देवोंमें आदिदेव शम्भुके हृदयप्रदेशसे मैं ही रुद्ररूपमें प्रादुर्भूत हूँ और उन्हींकी अपर मूर्ति हूँ। हे ब्रह्मन्! ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव (क्रमशः) सृष्टि, स्थिति तथा संहारके हेतु हैं। एक होते हुए भी वे शंकर अपनी इच्छासे अपने को (तीन रूपोंमें) विभक्तकर स्थित रहते हैं।७४-७८॥

इसी प्रकार अन्य भी जो रूप हैं, वे सब मेरी मायाद्वारा ही निर्मित हैं। स्वरूपतः महादेव स्वच्छ, रूपरहित एवं अद्वितीय हैं ॥ ७९ ॥

वे देव इन त्रिमूर्तियों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश)-से उत्कृष्ट एवं श्रेष्ठ शरीरवाले हैं। तीन नेत्रोंवाली वह माहेश्वरी मूर्ति योगियोंको सदा शान्ति प्रदान करनेवाली है। ८० ॥

पितामह! मुझे सनातन ऐश्वर्य, विज्ञान, तेज एवं योगसे समन्वित उनकी वही परा मूर्ति समझो। वही मैं कालरूप होकर तमोगुणका आश्रय लेकर समस्त विश्वको ग्रस्त कर लेता हूँ, कोई दूसरा तमद्वारा मुझे अभिभूत नहीं कर सकता। निष्पाप कमलोद्भव! जब-जब मुझ सनातनका तुम ध्यान करोगे, तब-तब तुम मेरी समीपता प्राप्त करोगे ॥ ८१-८३ ॥

इतना कहकर गुरु (पिता) ब्रह्माकी वन्दना करके वे हर (महेश्वर) मानस पुत्रोंके साथ क्षणभरमें ही अन्तर्धान हो गये। ८४॥

नारायण नामवाले उन भगवान्ने योगका अवलम्बन कर प्रजापतिने जैसी सृष्टि पूर्वमें की थी, वैसी ही विविध प्रकारके जगत्की सृष्टि की। योगविद्यासे उन्होंने मरीचि, भृगु, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठको उत्पन्न किया। पुराणोंके अनुसार यह निश्चित है कि ये नौ ब्रह्माण कहलाते हैं। ये सभी ब्रह्मा के समान हैं, साधक हैं और ब्रह्मवादी हैं ॥ ८५-८७॥

जैसा पहले बताया गया था तदनुसार संकल्प, धर्म, सनातन युगधर्म तथा सभी स्थानाभिमानी (देवताओं)का वर्णन तुम्हें सुनाया गया॥ ८८॥