कूर्म महा पुराण
16 अध्याय
श्रीकूर्मने कहा-प्राचीन कालमें अन्धकके निगृहीत हो जानेपर महात्मा प्रह्लादका विरोचन नामका पुत्र राजा बना। उस महान् असुरने देवेन्द्रसहित देवताओं को जीतकर धर्मपूर्वक चराचर त्रिलोकीका बहुत वर्षों तक पालन किया। उसके इस प्रकार रहते हुए एक बार कभी विष्णुसे प्रेरित होकर महामुनि भगवान् सनत्कुमार उसके नगरमें आये। सिंहासनपर बैठे हुए उस महान् असुरने ब्रह्माजीके पुत्र (सनत्कुमार)-को देखकर (आसनसे) उठकर सिरसे उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर यह वाक्य कहा- ॥१-४॥
आज मैं धन्य हुआ, कृतार्थ हुआ जो ये ब्रह्मज्ञानी, पुरातन योगीश्वर भगवान् स्वयं यहाँ आ गये हैं। हे ब्रह्मन् ! देवस्वरूप पितामह ब्रह्माजीके पुत्र! आप किस प्रयोजनसे यहाँ आये हैं, मुझे बतलायें। मैं आपका कौन-सा कार्य करूँ॥५-६॥
वे भगवान् देव धर्मात्मा महासुर (विरोचन)-से बोले-मैं आपको ही देखने आया हूँ, आप भाग्यशाली हैं। दैत्यश्रेष्ठ! दैत्योंके लिये यह (धार्मिक) नीति अत्यन्त दुर्लभ है। निश्चय ही तीनों लोकोंमें तुम्हारे समान कोई दूसरा धार्मिक नहीं है। ऐसा कहे जानेपर असुरराज (विरोचन)-ने उन महामुनिसे पुनः कहा-ब्रह्मज्ञानियों में सर्वश्रेष्ठ! आप मुझे धर्मों में जो श्रेष्ठ धर्म हो, उसे बतलायें। उन भगवान् योगीने महात्मा दैत्येन्द्र को आत्मज्ञानरूपी और सब प्रकारसे अत्यन्त रहस्यमय श्रेष्ठ धर्म बतलाया ॥७-१०॥
उन्होंने (महात्मा विरोचनने) परम ज्ञान प्राप्तकर उन्हें (सनत्कुमारको) गुरुदक्षिणा प्रदान की तथा राज्य अपने पुत्र (बलि)-को सौंपकर वे योगाभ्यासमें निरत हो गये॥११॥
उनका वह बलि नामक महान् असुर पुत्र बुद्धिमान्, ब्राह्मणभक्त तथा अत्यन्त धार्मिक था। महान् अभ्युदयकी प्राप्तिके लिये उसने इन्द्रको भी जीत लिया था। सभी देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रने उसके साथ महान् युद्ध करते हुए पराजित होकर अच्युत विष्णुदेव की शरण ग्रहण की॥१२-१३॥
इसी बीच अत्यन्त दु:खी होकर देवताओं की माता तपोराशि, परम तपोरूप देवी अदितिने दैत्येन्द्रोंके वध के लिये 'स्वयं भगवान् ही मेरे पुत्र हों' इस संकल्प को लेकर अत्यन्त महान् कठोर तप किया। अपने हृदयरूपी कमलकलिका में निष्कल, परम पद, अनादि, अनन्त, आनन्दस्वरूप, व्योममय, अद्वितीय वासुदेवका ध्यान करती हुई वे शरणागतवत्सल अव्यक्त, हरि विष्णु की शरणमें गयीं। प्रसन्न होकर शङ्ख-चक्र तथा गदा धारण करनेवाले योगात्मा हरि भगवान् विष्णु देवमाता (अदिति)के समक्ष प्रकट हो गये। विष्णुको सामने देखकर भक्तिपरायणा अदितिने अपनेको कृतार्थ माना और वे
केशवको स्तुतिसे प्रसन्न करने लगीं ॥ १४-१८॥
अदितिने कहा-समस्त दुःखसमूहों के नाश करने के लिये एकमात्र कारणरूप आपकी जय हो। अनन्त माहात्म्य-सम्पन्न तथा योगाभियुक्त! (योगमें प्रतिक्षण निरत) आपकी जय हो। आदि, मध्य और अन्तसे रहित विज्ञानमूर्ते! आपकी जय हो। अशेषकल्प (जिनमें किसी भी प्रकारके विषयका विराम नहीं है) तथा विशुद्ध आनन्दस्वरूप! आपकी जय हो। कालरूप विष्णु! आपको नमस्कार है। नरसिंहरूपधारी शेष! आपको नमस्कार है। संहार करनेवाले कालरुद्र को नमस्कार है। वासुदेव! आपको बार-बार नमस्कार है। विश्वरूपी मायाका विधान करनेवाले! आपको नमस्कार है। योगद्वारा जानने योग्य सत्यरूप! आपको नमस्कार है। धर्म एवं ज्ञाननिष्ठ! आपको नमस्कार है। हे वराहरूप! आपको बार-बार नमस्कार है। हजारों सूर्य और चन्द्रमाकी आभाके समान प्रकाशयुक्त मूर्तिवाले! आपको नमस्कार है। वेदोंमें प्रतिपादित विशिष्ट ज्ञान और धर्मद्वारा प्राप्त होनेवाले! आपको नमस्कार है। देवदेवादिदेव आदिदेव! आपको नमस्कार है। प्रभो! आप विश्व के योनिरूप हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। १९-२२ ॥
सत्यनिष्ठ शम्भो! आपको नमस्कार है। कारणरूप! विश्वरूप! आपको नमस्कार है। योगपीठके मध्य में विराजमान रहनेवाले! आपको नमस्कार है। हे एकरूप शिव! आपको बार-बार नमस्कार है।॥ २३ ॥
देवमाता (अदिति)-के द्वारा इस प्रकार प्रसन्न किये जानेपर जगन्मय उन भगवान् कृष्ण-(विष्णु)ने किंचित् हँसते हुए वर माँगनेके लिये कहा॥ २४ ॥
सिर से भूमि में प्रणाम करते हुए तथा श्रेष्ठ वर माँगते हुए उसने (अदितिने) कहा-मैं देवताओंके कल्याण के लिये आपको ही पुत्ररूप में प्राप्त करनेका वर माँगती हूँ। शरणागतवत्सल अप्रमेय भगवान् ‘ऐसा ही हो' इतना कहकर तथा वरों को प्रदान कर वहीं पर अन्तर्धान हो गये ॥ २५-२६॥
तदनन्तर बहुत समय बीतनेके पश्चात् देवताओं की माता (अदिति)-ने साक्षात् नारायण भगवान् जनार्दन को गर्भ में धारण किया। देवमाताके उदरमें हृषीकेश के प्रविष्ट होते ही विरोचनपुत्र बलिके नगर में भयंकर उत्पात होने लगे। सभी उपद्रवोंको देखकर भय से विह्वल हुआ दैत्यराज (बलि) वृद्ध पितामह असुर प्रह्लादको प्रणामकर कहने लगा-॥२७-२९॥
बलिने कहा-महाप्राज्ञ पितामह! हमारे नगरमें इस समय ये उत्पात क्यों हो रहे हैं, इनका कारण क्या है? हमें क्या करना चाहिये? उसकी बात सुनकर महासुर (प्रह्लाद)-ने देरतक ध्यान किया और फिर हृषीकेश को नमस्कार करके यह वचन कहा-॥३०-३१॥
प्रह्लाद बोले-यज्ञोंद्वारा जिन विष्णुका यजन किया जाता है और यह सम्पूर्ण विश्व जिनका (स्वरूप)है, देवताओंकी माता (अदिति)-ने उन्हें ही असुरों के विनाश के लिये (गर्भ में) धारण किया है। समस्त विश्व जिनसे अभिन्न है और जो समस्त विश्वसे भिन्न भी है, उन वासुदेवने देवताओंकी माताके शरीरमें प्रवेश किया है। देवता भी जिनके स्वरूपको यथार्थतः नहीं जानते वे विष्णु ही इस समय अपनी इच्छासे अदितिके देह में प्रविष्ट हुए हैं ॥३२-३४॥
जिनसे सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं और जहाँ नाशको प्राप्त होते हैं वे महायोगी पुराणपुरुष हरि अवतीर्ण हुए हैं ॥३५॥
जिनमें नाम, जाति आदिकी परिकल्पना नहीं होती, सत्तामात्रसे व्याप्त रहनेवाले आत्मरूप वे ही विष्णु अपने अंशरूपसे प्रकट हो रहे हैं। जगत्की मातृरूपा और उसके (जगत्के) धर्मको धारण करनेवाली, भगवती लक्ष्मी जिनकी मायारूपी शक्ति हैं, वे जनार्दन ही अवतीर्ण हुए हैं। जिनकी तामसी मूर्ति शंकर हैं और राजसी मूर्ति ब्रह्मा हैं वे सत्त्वगुणको धारण करनेवाले विष्णु ही अपने एक अंशसे प्रकट हो रहे हैं ॥ ३६-३८॥
गोविन्दको इस प्रकार समझकर भक्तिसे विनम्र-चित्त हो उन्हींको शरणमें जाओ, इससे तुम शान्ति प्राप्त करोगे। तब प्रह्लादके वचनसे विरोचनपुत्र बलि हरि की शरण ग्रहण करता हुआ धर्मपूर्वक विश्वका पालन करने लगा॥३९-४०॥
समय आनेपर कश्यपसे स्वयं देवमाता अदिति ने देवताओं के हर्षको बढ़ानेवाले उन महाविष्णुको जन्म दिया। वे (भगवान् विष्णु) चार भुजावाले, विशाल नेत्रवाले, श्रीवत्ससे सुशोभित वक्षःस्थलवाले, नीले मेघ के समान, शोभासे व्याप्त एवं प्रकाशमान थे। सभी देवता, सिद्ध, साध्य, चारण तथा प्रधान इन्द्र, उपेन्द्र और ऋषिगणोंसे आवृत ब्रह्मा उनके समीपमें गये। उपनयन (यज्ञोपवीत-संस्कार) हो जानेके बाद भगवान् हरि ने तीनों लोकोंको प्रदर्शित करते हुए भरद्वाजसे वेदों और सदाचारका अध्ययन किया ॥ ४१-४४॥
इस प्रकार वे प्रभु लौकिक (लोक-कल्याणकारी)मार्ग दिखाते हैं। वे जैसा प्रमाण उपस्थित करते हैं, संसार उसीका अनुवर्तन करता है। तदनन्तर समयानुसार विरोचनके पुत्र बुद्धिमान् बलिने यज्ञोंके द्वारा सर्वव्यापी यज्ञेश्वर विष्णुको स्वयं अर्चना की। उसने (दक्षिणारूप में) बहुत-सा धन देकर ब्राह्मणोंकी पूजा की। उस महात्मा के यज्ञस्थलमें ब्रह्मर्षि आये। (यज्ञ हो रहा है ऐसा) जानकर भरद्वाजसे प्रेरणा प्राप्तकर भगवान् विष्णु वामनरूप धारणकर यज्ञदेशमें आये ।। ४५-४८॥
शरीरपर कृष्णमृगका चर्म तथा उपवीत (यज्ञोपवीत-जनेऊ) धारण किये, पलाशके दण्डसे सुशोभित, जटा धारण किये तथा भस्मसे मण्डित वे ब्राह्मण वेदमन्त्रों का उच्चारण करते हुए असुरराज बलिके समीप आये। उन भिक्षुक (वेशधारी) हरिने बलिसे अपने तीन पगोंद्वारा नापी गयी भूमिकी याचना की॥ ४९-५०॥
बलिने भावपूर्वक विष्णुके दोनों चरणोंको धोकर स्वर्णनिर्मित भृङ्गार (टोटीदार पात्र) लेकर उन्हें आचमन कराया और 'मैं आपको आपके ही तीन पगवाली (भूमि) देता हूँ, इससे अव्यय आकृतिवाले देव हरि प्रसन्न हों' ऐसा संकल्पकर उन देवके कराग्रपल्लव पर सुशीतल जल गिराया। शरणमें आये हुए उस दैत्यराज को आसक्तिरहित बनानेकी इच्छासे उन आदिदेवने पृथ्वी, अन्तरिक्ष और धुलोकमें पाद-विक्षेप किया। तीनों लोकों को आक्रान्त कर ईश्वरका चरण प्रजापतिके लोक से ब्रह्मलोकमें पहुँचा। उस लोकमें निवास करनेवाले जो सिद्धजन थे, उन्होंने हजारों आदित्यके समान (प्रकाशमान) उस चरणको प्रणाम किया ॥५१-५४॥
तदनन्तर अनादि भगवान् पितामहने वहाँ उपस्थित होकर विष्णुको प्रसन्न किया। उस ब्रह्माण्डके ऊपरी कपालको भेदकर पुनः वह चरण दिव्य आवरणों में चला गया। उस अण्डका भेदन होनेसे पुण्य करनेवालों द्वारा सेवित वह शीतल महाजल नीचे गिरा। तभी से आकाश में स्थित वह नदियोंमें श्रेष्ठ नदी प्रवर्तित हुई जिसे ब्रह्मा ने 'गङ्गा' नामसे अभिहित किया॥५५-५६॥
ईश्वर का वह चरण महान्, प्रधान, प्रकृति, स्वबीज- स्वरूप अद्वितीय पुरुष ब्रह्मपर्यन्त पहुँचकर स्थित हो गया। उस अव्यय पदका दर्शनकर विभिन्न स्थानों के | देवता स्तुति करने लगे। उन संसाररूपी शरीरवाले पुरुष विष्णुको देखकर महान् बलिने उन अद्वितीय अव्यय नारायणको अपने भक्तिपूरित चित्तसे प्रणाम किया, जिन्हें सभी देवता प्रणाम करते रहते हैं॥५७-५८॥
आदिकर्ता भगवान् वासुदेवने पुनः वामनरूप धारण कर उस (बलि)-से कहा- -दैत्याधिपते! इस समय भक्तिपूर्वक आपके द्वारा दिये गये ये तीनों लोक अब मेरे ही हैं ॥५९॥
अमित पराक्रमी! मैं अपने-आपको तुम्हें प्रदान करता हूँ। प्रह्लादके पुत्रके भी पुत्र अर्थात् बलिके द्वारा भलीभाँति दिया हुआ तीनों लोक ग्रहणकर संसार के अन्तरात्मा शङ्खपाणि (भगवान् विष्णु)-ने दैत्यसे पुनः कहा-(अब आप) पातालमूलमें प्रवेश करें। आप वहाँ नित्य रहते हुए देवताओंको भी प्राप्त न होनेवाले भोगोंका उपभोगकर भक्तियोगद्वारा मेरा निरन्तर ध्यान करते रहें। कल्पान्त होनेपर पुनः मुझमें ही (आप) प्रवेश करेंगे॥६०-६२॥
उस दैत्यश्रेष्ठसे इस प्रकार कहकर सत्यपराक्रम तथा विशाल डगोंवाले विष्णुने तीनों लोक इन्द्रको दे दिये। सिद्ध, देवता, ऋषि, किन्नर, ब्रह्मा, इन्द्र, भगवान् रुद्र, आदित्य तथा मरुद्गण (उन) महायोगीकी स्तुति करने लगे॥६३-६४॥
ऐसा अद्भुत कार्य करके वामन-रूप धारण करनेवाले विष्णु सभीके देखते-ही-देखते वहाँ अन्तर्धान हो गये। वह विष्णुपरायण श्रीसम्पन्न दैत्यश्रेष्ठ (बलि) भी विष्णु से प्रेरित होकर प्रह्लाद एवं अन्य श्रेष्ठ असुरोंके साथ पातालमें चला गया ॥ ६५-६६॥
उसने प्रह्लादसे विष्णुका माहात्म्य, श्रेष्ठतम भक्तियोग तथा पूजनका विधान पूछा। तब उनके द्वारा बताये जानेपर उसने वैसा ही किया। तदनन्तर भक्तिपूर्वक कर्मयोगका आचरण कर वह शरणागतोंके आश्रयस्थल, हाथोंमें चक्र, तलवार तथा शंख धारण करनेवाले, कमलके समान नेत्रवाले, अप्रमेय ईश्वरकी शरणमें गया ॥६७-६८॥
ब्राह्मणो! इस प्रकार यह (भगवान्) वामन के पराक्रमको मैंने बतलाया। ये पुरुषोत्तम सदा देवताओं के कार्योंको करते रहते हैं॥६९॥
Summary of chapter 16 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Following the re-establishment of cosmic harmony, Daksha Prajāpati begot sixty daughters through his wife Asiknī. He gave ten daughters to Dharma, thirteen to Maharshi Kashyapa, twenty-seven to Chandra, and others to Bhṛgu, Angiras, and Krisāshva. Through Kashyapa's thirteen wives—Aditi, Diti, Danu, Kālā, Danāyu, Sinhikā, Krodhā, Vinatā, Kadrū, Muni, Krodhavaśā, Surabhi, and Arishṭā—the entire cosmic population manifested. Aditi bore the twelve Ādityas including Vāmana and Indra; Diti gave birth to the powerful Daityas Hiranyāksha and Hiranyakashipu; Danu produced the Danavas; Vinatā bore Garuḍa and Aruṇa; Kadrū produced the thousand Nāgas; Surabhi gave birth to cattle and rudras; and Arishṭā produced Gandharvas, populating all realms of creation.