कूर्म महा पुराण
2 अध्याय
ईश्वरने कहा-द्विजो! देवता लोग प्रयत्न करनेपर भी जिसे नहीं जान पाते हैं, मेरा यह विज्ञान अत्यन्त गुह्य है, सनातन है एवं बतलाने योग्य (भी) नहीं है। इस ज्ञानका आश्रय ग्रहणकर श्रेष्ठ द्विजगणोंने ब्रह्मभाव को प्राप्त किया है। (इस ज्ञानके कारण) पूर्वकालमें भी ब्रह्मवादियोंको पुनः संसारमें आना नहीं पड़ा (अर्थात् इस ज्ञानसे ब्रह्मभाव अवश्य प्राप्त होता है और ब्रह्मभाव प्राप्त करनेके अनन्तर पुनः संसारमें आगमन नहीं होता)। यह ज्ञान गुह्यसे भी गुह्यतम है, इस साक्षात् ज्ञानको प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिये। आप भक्तिसम्पन्न ब्रह्मवादियोंको आज मैं यह ज्ञान बतलाऊँगा ॥ १-३॥
जो आत्मा अद्वितीय, स्वस्थ, शान्त, सूक्ष्म, सनातन, सभीका अन्तरतम साक्षात् चिन्मात्र और तमोगुणसे परे है, वही (आत्मा) अन्तर्यामी है, पुरुष है, वही प्राण है, वही महेश्वर है, वही काल तथा अग्नि है और वही अव्यक्त है-ऐसा श्रुतिका कथन है॥ ४-५ ॥
इसीसे संसार उत्पन्न होता है और इसीमें विलीन हो जाता है। वह मायाका नियामक मायासे आबद्ध होकर अपनी इच्छासे मायाको अङ्गीकार कर विविध शरीरोंको उत्पन्न करता है। यह प्रभु आत्मा न तो गतिशील है और न गतिप्रेरक है। न यह पृथ्वी है, न जल है, न तेज है, न वायु है और न आकाश ही है॥६-७॥
यह न प्राण है, न मन है, न अव्यक्त है, न शब्द है, न स्पर्श है, न रूप, न रस और न गन्ध ही है। न अभिमानी* है, न वाणी ही है। द्विजोत्तमो! यह न हाथ, न पैर, न पायु (शौचेन्द्रिय) और न उपस्थ (मूत्रेन्द्रिय), न कर्ता, न भोक्ता तथा प्रकृति-पुरुष भी नहीं है। माया भी नहीं है, प्राण भी नहीं है, अपितु परमार्थतः चैतन्यमात्र है॥८-९॥
जिस प्रकार प्रकाश और अन्धकारका कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता, उसी प्रकार (सांसारिक) प्रपञ्च और परमात्माका भी कोई ऐक्य (अभेद्य आदि) सम्बन्ध नहीं हो सकता ॥ १०॥
जिस प्रकार संसारमें धूप और छाया एक-दूसरेसे विलक्षण हैं, वैसे ही पुरुष तथा प्रपञ्च भी तत्त्वतः एक-दूसरेसे भिन्न हैं। यदि आत्मा स्वभावसे मलिन, अस्वस्थ तथा विकारयुक्त होता तो उसकी मुक्ति सैकड़ों जन्मोंमें भी नहीं होती। योगयुक्त मुनिजन परमार्थतः अपने विकाररहित, दुःखशून्य, आनन्दस्वरूप, अव्यय आत्माका दर्शन करते हैं। ११-१३ ॥
मैं कर्ता हूँ, सुखी, दु:खी, कृश एवं स्थूल हूँ इस प्रकारकी जो बुद्धि है, वह मनुष्यों के द्वारा अहंकार के कारण ही अपनी आत्मामें आरोपित है। वेदके विद्वान् लोग (आत्माको) साक्षी, प्रकृतिसे परे, भोक्ता, अक्षर, शुद्ध तथा सर्वत्र सम रूपसे व्याप्त बतलाते हैं। अतएव यह संसार सभी प्राणियोंके अज्ञानके कारण ही है। अज्ञानसे अन्यथा (विपरीत) ज्ञान होता है अर्थात् अज्ञानका नाश ज्ञानसे ही होता है और यह प्रकृतिसंगत (प्राणियोंके मूल स्वभावके सर्वथा अनुकूल शाश्वत शान्तिरूप) होता है ॥ १४–१६॥
अहंकारसे उत्पन्न अविवेकके कारण स्वयं ज्योतिरूप, नित्य प्रकाशयुक्त सर्वव्यापी परम पुरुष अपनेको 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है। ब्रह्मवादी ऋषिगण प्रधान, प्रकृति और कारणको समझकर सत् एवं असत्-स्वरूप, अव्यक्त नित्यतत्त्वका साक्षात्कार करते हैं। कूटस्थ एवं निरञ्जन होते हुए भी यह आत्मा उस (प्रधान, प्रकृति आदि)-से संगत होकर स्वात्मस्वरूप अक्षर ब्रह्मका यथार्थरूपसे ज्ञान नहीं कर पाता ।। १७–१९॥
अनात्मतत्त्वमें आत्मविषयक विज्ञानसे ही दुःख होता है तथा इसी प्रकारकी भ्रान्तिके कारण ही राग, द्वेष आदि सभी दोष उत्पन्न होते हैं। इसके (भ्रान्त पुरुषके) कर्ममें ही दोष होता है, इसी कारण पाप-पुण्यकी स्थिति बनती है और उन कर्मोके अनुसार ही सभी प्रकारके देहकी उत्पत्ति होती है। यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, कूटस्थ और दोषोंसे रहित है। यह अद्वितीय आत्मा मायारूप शक्तिके कारण भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है, स्वभावत: इसमें भेद नहीं है ।। २०-२२॥
इसी कारण मुनिजन आत्माको परमार्थतः अद्वैत ही कहते हैं। व्यक्त (महत्तत्त्व, अहंतत्त्व आदि)-के स्वभावसे जो भेद दिखलायी पड़ता है और यह भेद मूलतः माया (प्रकृति)-के कारण ही है तथा यह आत्मा (पुरुष)-के आश्रित होकर ही सब कुछ करती है। जैसे धुएँके सम्पर्क से आकाश मलिन नहीं होता, वैसे ही अन्तःकरणसे उत्पन्न होनेवाले भावोंसे आत्मा लिप्त नहीं होता। जैसे अद्वितीय शुद्ध स्फटिक अपनी आभासे प्रकाशित होता है, वैसे ही
उपाधियोंसे रहित निर्मल आत्मा (अपने ही प्रकाशसे) प्रकाशित होता है। विद्वान् लोग इस संसारको ज्ञानस्वरूप ही कहते हैं, परंतु दूसरे कुत्सित दृष्टि रखनेवाले अज्ञानी लोग इसे अर्थस्वरूप (विषयस्वरूप) मानते हैं ॥ २३-२६॥
भ्रान्त दृष्टिवाले पुरुषोंके द्वारा स्वभाव कूटस्थ, निर्गुण, सर्वव्यापी और चैतन्य आत्मा अर्थरूपसे ही देखा जाता है। जिस प्रकार शुद्ध स्फटिक गुञ्जा आदि उपाधि के कारण लोगोंको लाल वर्णका-सा दिखलायी पड़ता है, वैसे ही परम पुरुष भी (मायाके द्वारा नाम-
रूपात्मक उपाधियुक्त प्रतीत होनेके कारण अनेक रूपोंमें दिखलायी पड़ता) है। इस कारण मोक्षके अभिलाषियों को अक्षर, शुद्ध, नित्य, सर्वव्यापी तथा अव्यय उस आत्माका श्रवण, मनन तथा उपासना करनी चाहिये। (जिससे माया (अज्ञान)-की निवृत्ति हो तथा शुद्ध आत्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त हो) योगीके मनमें जब सर्वत्र व्याप्त रहनेवाला चैतन्य सदा प्रकाशित होता है, तब वह योगी बिना किसी व्यवधानके आत्मभाव प्राप्त कर लेता है॥ २७-३०॥
(योगी) जब सभी प्राणियोंको अपनी आत्मामें अच्छी प्रकार स्थित देख लेता है और सभी प्राणियोंमें अपने को स्थित देखता है, तब उसे ब्रह्मभावकी प्राप्ति हो जाती है। जब (योगी) समाधिकी अवस्थामें किसी भी प्राणीको (अपने से भिन्न) नहीं देखता (अर्थात् समस्त प्रपञ्चमें आत्मदर्शन करता है), तब वह उस परतत्त्वसे एकात्मभाव प्राप्त कर लेता है और अद्वितीय हो जाता है। उसके हृदय में स्थित सभी कामनाएँ जब समाप्त हो जाती हैं तब वह पण्डित अमृतस्वरूप होकर (परम) कल्याण प्राप्त कर लेता है।(योगी) जब प्राणियोंके पार्थक्यको एक तत्त्वमें स्थित देखता है और उसी (तत्त्व)-से उनका विस्तार होना समझता है, तब उसे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। जब वह परमार्थतः (सर्वत्र) केवल अद्वितीय आत्माको ही देखता है और सम्पूर्ण जगत्को मायामात्र समझता है, तब वह मुक्त हो जाता है॥ ३१-३५॥
जब योगीको जन्म, जरा, दुःख और समस्त व्याधियों के एकमात्र औषध अद्वितीय ब्रह्मका ज्ञान हो जाता है, तब वह शिवरूप हो जाता है। जिस प्रकार संसारमें नद एवं नदियाँ सागरके साथ एकरूपताको प्राप्त करती हैं, उसी प्रकार यह आत्मा (जीवात्मा) निष्कल अक्षर (ब्रह्म)-के साथ एकत्व प्राप्त करता है॥ ३६-३७॥
इसलिये विज्ञानका ही अस्तित्व है, प्रपञ्च और संसरणशील संसारका अस्तित्व नहीं है। विज्ञान अज्ञानसे आवृत रहता है, इसीसे संसार (जीव) मोहमें पड़ता है। ज्ञान निर्मल, सूक्ष्म,
निर्विकल्पक और अव्यय है, अज्ञानके अतिरिक्त जो कुछ है, वह विज्ञान है-ऐसा मेरा है। यह आप लोगों को सांख्य नामक परमोत्तम ज्ञान बतलाया। यह सम्पूर्ण वेदान्त का सार है। इसमें चित्तकी एकाग्रता ही योग है॥ ३८-४० ॥
योगसे ज्ञान उत्पन्न होता है और ज्ञानसे योग प्रवर्तित (स्थिर) होता है। योग तथा ज्ञानसम्पन्न (पुरुष)-के लिये कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता। योगी जिसे प्राप्त करते हैं, सांख्यवेत्ताओंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। जो सांख्य और योगको एक ही समझता है, वह तत्त्वज्ञानी होता है ॥ ४१-४२॥
विप्रो! ऐश्वर्य (आठ प्रकारकी सिद्धियों एवं अन्य वैभव आदि)-में आसक्तचित्त अन्य योगीजन उसीमें डूबे रहते हैं, अतएव उन्हें आत्मतत्त्व प्राप्त नहीं होता-ऐसा श्रुतिवचन है। जो सर्वव्यापी, दिव्य ऐश्वर्यरूप, अचल और महत् (सर्वश्रेष्ठ) है, उसे ज्ञान और योगसम्पन्न पुरुष देहान्त होनेपर प्राप्त करते हैं। सम्पूर्ण वेदोंमें सर्वात्मा, सर्वतोमुख के रूपमें प्रतिपादित, अव्यक्त, मायावी (मायाका अधिष्ठाता) तथा परमेश्वरस्वरूप मैं ही यह आत्मा हूँ॥ ४३-४५॥
मैं अन्तर्यामी, सनातन, सर्वकाम, सर्वरस, सर्वगन्ध, अजर, अमर और सभी ओर हाथ-पैरवाला हूँ। हाथ और पैरके बिना भी मैं गति करने एवं ग्रहण करनेवाला हूँ। (सभी प्राणियोंके) हृदयमें स्थित हूँ। बिना नेत्रोंके भी देखता हूँ और बिना कानोंके भी मैं सुनता हूँ। मैं इस समस्त प्रपञ्चको जानता हूँ, परंतु मुझे कोई नहीं जानता। तत्त्वदर्शी लोग मुझे अद्वितीय महान् पुरुष कहते हैं। सूक्ष्मदर्शी ऋषि गुणरहित और विशुद्धरूप आत्माके हेतुस्वरूप उस श्रेष्ठ ऐश्वर्य (सर्वोत्कृष्ट ज्ञान)-का दर्शन (साक्षात्कार) करते हैं। ब्रह्मवादियो! मेरी मायासे मोहित होनेके कारण देवता भी जिस (तत्त्व)-को नहीं जानते उसे मैं कहता हूँ, आप लोग ध्यान लगाकर सुनें-॥ ४६-५०॥
मायातीत मैं स्वभावतः सबका अनुशास्ता नहीं हूँ, तथापि इस जगत्को मैं प्रेरित करता हूँ, विद्वान् लोग इसका कारण जानते हैं (वह कारण अहैतुकी कृपा ही है।)। मेरा जो अत्यन्त गुह्यतम तथा सर्वव्यापी देह है, तत्त्वदर्शी योगीजन उसमें प्रविष्ट होते हैं और मेरे अविनाशी
सायुज्य (नामक मोक्ष)-को प्राप्त करते हैं। मेरी विश्वरूपिणी माया उनके वशमें रहती है। वे मेरे साथ (मेरा सायुज्य प्राप्तकर) परम शुद्धि और निर्वाणको प्राप्त करते हैं। मेरी कृपासे सैकड़ों-करोड़ों कल्पोंमें भी उनका पुनर्जन्म नहीं होता। योगीन्द्रो! यह वेदोंका अनुशासन है॥५१-५४॥
ब्रह्मवादियोंको चाहिये कि वे मेरे द्वारा कहे गये इस सांख्य-योग-समन्वित विज्ञानको (अपने) पुत्र*, शिष्य एवं योगियोंके अतिरिक्त और किसी दूसरेको प्रदान न करें॥ ५५॥
Summary of chapter 51 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Sūta celebrates the supreme glory of Purushottama Nārāyaṇa across all cosmic epochs. In every Manvantara, Bhagavān Vishṇu manifests as divine Avatāras to protect virtuous devotees, uphold Vedic Dharma, and annihilate demoniac forces, demonstrating His unceasing cosmic protection.