कूर्म महा पुराण
32 अध्याय
सूतजी बोले-वहाँ कपर्दीश (कपर्दीश्वर) के समीप में बहुत वर्षोंतक निवास कर भगवान् प्रभु (वेदव्यास) पुनः मध्यमेश्वर (लिङ्ग)-का दर्शन करने गये। वहाँ ऋषि-समूहोंसे सेवित स्वच्छ जलवाली पवित्र मन्दाकिनी नामक नदीका दर्शन कर मुनि (व्यास) प्रसन्न हो गये॥ १-२॥
उसे देखकर पवित्र आत्मभाववाले तथा स्नान के विधानको जाननेवाले उन द्वैपायन प्रभुने मुनियों के साथ स्नान किया। विधिपूर्वक देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण किया और नाना प्रकारके पुष्पों द्वारा लोक के आदि कारण भवकी पूजा की। प्रमुख शिष्यों के साथ सत्यवती के पुत्र व्यासने (उस क्षेत्रमें) प्रवेशकर त्रिशूलधारी ईशान मध्यमेश्वरका पूजन किया। तदनन्तर सारे शरीरमें भस्म धारण किये हुए शान्त पाशुपत लोग अर्थात् पशुपति के भक्तगण पाशुपत ईश्वर मध्यमेश्वर रुद्रका दर्शन करने आये ॥३-६॥
उनका मन ओंकारके जपमें लगा था, वे सभी वेदों के अध्ययनमें तत्पर थे। वे शुक्ल यज्ञोपवीत धारण किये थे, कोई जटा रखाये थे और कोई मुण्डित थे। कुछ कौपीन वस्त्र धारण किये थे, तो दूसरे वस्त्ररहित थे। वे ब्रह्मचर्यपरायण, शान्त और वेदान्तके ज्ञानमें तत्पर थे। विप्रो! शिष्योंसे घिरे हुए द्वैपायन मुनिको देखकर यथोक्त विधिसे उनका पूजनकर उन्होंने (पाशुपत भक्तोंने) यह वचन कहा-॥७-९॥
महामुने! आप कौन हैं? शिष्योंके साथ कहाँ से आये हैं। तब पैल आदि व्यास-शिष्योंने उन ब्रह्मभाव को प्राप्त ऋषियोंसे कहा-ये सत्यवतीके पुत्र कृष्णद्वैपायन व्यास मुनि हैं। ये स्वयं हृषीकेश हैं, जिन्होंने वेदों का विभाजन किया। पिनाकको धारण करनेवाले साक्षात् प्रभु महादेव ही अपने अंशांशसे इनके शुक नामक पुत्र हुए। वे सभी भावोंसे, परम भक्तिके द्वारा साक्षात् महादेव शंकरके शरणागत हुए हैं और जिन्हें ईश्वर सम्बन्धी परम ज्ञान उपलब्ध है॥१०-१३॥
तब वे सभी पशुपतिके भक्त प्रसन्न हो गये, उन्हें रोमाञ्च हो आया। एकाग्रमनसे उन्होंने सत्यवतीके पुत्र व्यासको प्रणाम किया और कहा-भगवन् ! देवदेव की कृपासे जो परमेष्ठीका श्रेष्ठ माहेश्वर विज्ञान है, वह आपको ज्ञात है। अतः आप हमें वह श्रेष्ठ अव्यक्त, गोपनीय रहस्य बतलायें, ताकि आपके मुखसे उसे सुनकर हम शीघ्र ही उन देवका दर्शन कर सकें॥१४-१६॥
तदनन्तर सुमन्तु आदि उन प्रमुख शिष्योंको विदाकर योगविदोंमें श्रेष्ठ व्यासने उन योगियोंको श्रेष्ठ ज्ञान बतलाया। विप्रो! उसी क्षण एक निर्मल उत्तम ज्योति प्रकट हुई और क्षणभरमें ही वे पाशुपत भक्तगण उसी में लीन हो गये और अन्तर्धान हो गये॥१७-१८॥
तदनन्तर पैल आदि प्रमुख शिष्योंको बुलाकर श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी भगवान् (व्यास)-ने मध्यमेशका माहात्म्य उन्हें बतलाया। स्वयं भगवान् महेश्वर देव देवी के साथ तथा रुद्रगणोंसे घिरे नित्य इस स्थानपर रमण करते हैं॥१९-२०॥
यहीं पर पूर्वकाल में देवकी के पुत्र विश्वात्मा हृषीकेश कृष्ण हरि पाशुपतोंसे आवृत रहते हुए, समस्त शरीर में भस्म धारणकर रुद्र-तत्त्वके अनुसंधानमें तत्पर हुए थे तथा पाशुपत व्रत धारणकर शम्भुकी आराधना करते हुए एक वर्षतक निवास किये थे। उनके (व्यास के) ब्रह्मचर्य-परायण बहुतसे विज्ञ शिष्योंने उनके वचन से ज्ञान प्राप्तकर महेश्वरका दर्शन किया। वर प्रदान करनेवाले नीललोहित देव साक्षात् भगवान् 'महादेवने' उन कृष्णको उत्तम वर प्रदान किया। जगन्मय! जो मेरे भक्त विधिपूर्वक आप गोविन्दकी अर्चना करेंगे, उन्हें ईश्वर-सम्बन्धी परम ज्ञान प्राप्त होगा ॥ २१-२५॥
निस्संदेह मेरी कृपासे आप मेरे भक्त द्विजातियों के प्रणम्य, आराध्य और ध्येय होंगे। जो यहाँ स्नान कर पिनाकी रुद्र देवेश्वरका दर्शन करेंगे, उनके ब्रह्महत्या आदि सभी पाप शीघ्र ही नष्ट हो जायेंगे। जो पापकर्मपरायण भी मनुष्य यहाँ प्राणोंका त्याग करेंगे, वे परम स्थानको प्राप्त करेंगे, इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिये ॥ २६-२८॥
विप्रो! वे निश्चय ही धन्य हैं जो मन्दाकिनी में स्नानकर ईश्वर महादेव मध्यमेश्वरकी पूजा करते हैं। ब्राह्मणो! यहाँपर एक बार भी किया गया स्नान, दान, तप, श्राद्ध तथा पिण्डदान सात पीढ़ियोंतक कुल को पवित्र कर देता है॥ २९-३०॥
सूर्यके राहुसे ग्रस्त किये जानेपर अर्थात् ग्रहणकाल में संनिहती (कुरुक्षेत्र तीर्थ)-में स्नान करनेसे जो फल मनुष्य को प्राप्त होता है, उससे दस गुना अधिक फल यहाँ मन्दाकिनी में स्नान से प्राप्त होता है। ऐसा कहकर महायोगी प्रभु (व्यास)-ने महेश्वर की पूजा करते हुए मध्यमेश्वर के समीप में ही बहुत समयतक निवास किया ॥३१-३२॥
सूतजी बोले-तदनन्तर जैमिनि आदि प्रमुख शिष्यों से आवृत भगवान् व्यास सभी गुह्य तीर्थों और देवमन्दिरोंमें गये। द्विजश्रेष्ठो! वे परम तीर्थ प्रयाग, प्रयागसे भी अधिक शुभ तीर्थ विश्वरूप, श्रेष्ठ तालतीर्थ, आकाश नामक महातीर्थ, श्रेष्ठ आर्षभ तीर्थ, स्वर्नील नामक महातीर्थ, श्रेष्ठ गौरीतीर्थ, प्राजापत्य तीर्थ, स्वर्गद्वार, जम्बुकेश्वर, धर्म (धर्मारण्य) नामवाले उत्तम तीर्थ, गया तीर्थ, महातीर्थ, महानदीतीर्थ, परम नारायण तीर्थ, श्रेष्ठ वायु तीर्थ, परम गुह्य ज्ञानतीर्थ, श्रेष्ठ वाराह तीर्थ, महान् पवित्र यमतीर्थ, शुभ संवर्तक तीर्थ, अग्नितीर्थ, उत्तम कलशेश्वर, नागतीर्थ, सोमतीर्थ, सूर्यतीर्थ, महागुह्य पर्वत नामक तीर्थ, अनुत्तम मणिकर्ण, तीर्थश्रेष्ठ घटोत्कच तीर्थ, श्रीतीर्थ, पितामह तीर्थ, गङ्गातीर्थ, देवेश तीर्थ, उत्तम ययातितीर्थ, कपिल तीर्थ, सोमेश तीर्थ तथा अनुत्तम ब्रह्मतीर्थमें गये॥१-९॥
प्राचीन कालमें जब ब्रह्मा यहाँ (ब्रह्मतीर्थमें) लिङ्ग लाकर स्नान करने चले गये, तब विष्णुने उस ईश्वर के लिङ्गको यहाँ स्थापित कर दिया। जब स्नान करके ब्रह्मा आये तो उन्होंने विष्णुसे पूछा-मेरे द्वारा लाये गये इस लिङ्गको आपने क्यों स्थापित कर दिया। इसपर विष्णु ने उनसे कहा-मेरी रुद्रमें आपसे भी अधिक दृढ़ भक्ति है, इसलिये मैंने लिङ्गको यहाँ प्रतिष्ठित कर दिया, यह आपके नामसे ही प्रसिद्ध होगा ॥१०-१२॥
द्विजोत्तमो! (व्यासजी पुनः आगे कहे जानेवाले तीर्थोंमें गये) भूतेश्वर तीर्थ, धर्मसमुद्भव तीर्थ, परम गन्धर्वतीर्थ, उत्तम वाह्नयतीर्थ, दौर्वासिक तीर्थ, व्योमतीर्थ, चन्द्रतीर्थ, पवित्र चित्राङ्गदेश्वरतीर्थ, पवित्र विद्याधरेश्वर तीर्थ, केदारतीर्थ, उग्र नामक तीर्थ, अनुत्तम कालञ्जर तीर्थ, सारस्वत तीर्थ, प्रभासतीर्थ, भद्रकर्णहृद नामक शुभ तीर्थ, लौकिक नामक महातीर्थ, महालयतीर्थ,
हिरण्यगर्भ तीर्थ, गोप्रेक्ष्य तीर्थ, वृषध्वजतीर्थ, उपशान्त तीर्थ, शिवतीर्थ, अनुत्तम व्याघेश्वरतीर्थ, त्रिलोचनतीर्थ, महातीर्थ, लोलार्क तीर्थ, उत्तर नामक तीर्थ, ब्रह्महत्या विनाशक कपालमोचन तीर्थ, महापवित्र शुक्रेश्वर तीर्थ और उत्तम आनन्दपुर तीर्थ आदि मुख्य-मुख्य तीर्थोंका वर्णन किया गया है, तीर्थोंकी संख्याका विस्तार नहीं बताया जा सकता। पराशरके पुत्र महामुनि (व्यास) इन सभी तीर्थोंमें स्नानकर पिनाकी (भगवान् शंकर)-की पूजाकर, वहाँ-वहाँ उपवासकर
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देवताओं तथा पितरोंका तर्पणकर और उन्हें पिण्ड-दान कर पुनः वहीं गये, जहाँ विश्वेश्वर शिव स्थित हैं ॥१३-२१॥
शिष्योंके साथ धर्मात्मा महामुनिने स्नानकर उस परम (विश्वेश्वर) लिङ्गकी पूजा की और शिष्यों से कहा-अब आप अपने-अपने स्थानोंको जा सकते हैं।
द्विजो! महात्मा (व्यास)-को प्रणाम कर वे पैल आदि (शिष्य) चले गये और उन व्यासजीने नियमित-रूप से वाराणसी में वास किया। वे शान्त, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा एवं ब्रह्मचर्य-परायण होकर तीनों संध्याओंमें स्नान करते थे तथा भिक्षाद्वारा प्राप्त आहार करते हुए पिनाकी की आराधनामें लगे रहते थे॥ २२-२४॥
द्विजोत्तमो! वहाँ रहते हुए एक दिन अमित तेजस्वी व्यासजीको भ्रमण करते रहनेपर भी भिक्षा नहीं प्राप्त हुई। तब उनका शरीर क्रोधाविष्ट हो गया, (उन्होंने विचार किया कि) यहाँ रहनेवाले मनुष्योंके लिये ऐसे विघ्न की सृष्टि करूँ, जिससे उनकी सिद्धि नष्ट हो जाय, पर तत्क्षण ही शंकरकी अर्धाङ्गिनी साक्षात् महादेवी (पार्वती) मानुष-वेष धारणकर प्रसन्न-मुद्रा में प्रकट हो गयीं। (और बोलीं-) ॥ २५-२७॥
हे महाबुद्धिमान् व्यास! आप शाप न दें। आप मुझसे भिक्षा ग्रहण करें। ऐसा कहकर पार्वतीने (उन्हें) भिक्षा दीं ॥ २८॥
महादेवीने कहा-मुने! आप क्रोधी तथा कृतघ्न हैं, अत: आपको सदा इस क्षेत्रमें नहीं रहना चाहिये। ऐसा कहे जानेपर व्यासजीने ध्यानद्वारा 'ये श्रेष्ठ पार्वती हैं'-ऐसा समझकर प्रणाम किया और श्रेष्ठ स्तुतियोंसे स्तुति कर उनसे कहा-हे शंकरवल्लभे! चतुर्दशी तथा अष्टमीको यहाँ (वाराणसीमें) प्रवेश करने दें। 'ऐसा ही हो' ऐसी आज्ञा देकर देवी अन्तर्धान हो गयीं ॥ २९-३१।।
इस प्रकार महायोगी भगवान् व्यासजी क्षेत्र (वाराणसी)-के सभी गुणों (विशेषताओं)-को समझते हुए उस (वाराणसी)-के पार्श्वभागमें रहने लगे। इस प्रकार व्यासजीको स्थित हुआ जानकर विद्वान् लोग (उस) क्षेत्रका सेवन करते हैं। अतः मनुष्यको सभी प्रयत्न कर वाराणसी में निवास करना चाहिये ॥३२-३३ ॥
सूतजी बोले-जो अविमुक्त (क्षेत्र वाराणसी) का माहात्म्य पढ़ता है, सुनता है अथवा शान्त द्विजों को सुनाता है, वह भी परम गतिको प्राप्त करता है। द्विजो! जो स्नान करनेके अनन्तर श्राद्धमें, देव कार्य में, रात अथवा दिनमें, नदियों के किनारों पर अथवा देव मन्दिरों में मनको एकाग्र कर दम्भ तथा मात्सर्यसे रहित होकर नमस्कारपूर्वक ईश (शिव)-का जप करता है, उसे परमगति प्राप्त होती है॥३४-३६॥
Summary of chapter 32 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Sūta elaborates on the sacred Tīrthas within Vārāṇasī, including Dashāshvamedha, Māṇikarṇikā, and Harishchandra Ghāṭs. The chapter describes how bathing in the holy Gangā at Māṇikarṇikā purifies sins accumulated across thousands of past lifetimes. Mahādeva Himself declares that no place in all the three worlds equals Kāśī in conferral of instantaneous Jñāna and Mukti, making it the supreme sanctuary for ascetics, householders, and seekers of ultimate truth.