कूर्म महा पुराण
11 अध्याय
ईश्वरने कहा-इसके अनन्तर उस परम दुर्लभ योगको कहता हूँ, जिससे सूर्यके समान ईश्वररूप आत्माका दर्शन होता है अर्थात् सूर्यका जैसे प्रत्यक्ष हो रहा है, वैसे ही ईश्वरका प्रत्यक्ष होता है॥१॥
योगरूपी अग्नि शीघ्र ही सम्पूर्ण पापपञ्जरको भस्म कर देता है और (उसके बाद) साक्षात् मुक्तिरूप सिद्धि प्रदान करनेवाला प्रसन्न (निर्मल) ज्ञान उत्पन्न हो जाता है। योगसे ज्ञान उत्पन्न होता है और ज्ञानसे योग प्रवर्तित होता है। योग तथा ज्ञानसे सम्पन्न व्यक्तिपर महेश्वर प्रसन्न होते हैं। जो नित्य एक समय, दो समय या तीनों समय मेरे योगका साधन करते हैं, उन्हें महेश्वर समझना चाहिये॥२-४॥
योग दो प्रकारका समझना चाहिये, पहला अभावयोग है और दूसरा सभी योगोंमें उत्तमोत्तम महायोग कहलाता है। जिसमें सभी आभासोंसे रहित शून्यमय (निर्विकल्पक) स्वरूपका चिन्तन होता है और जिसके द्वारा आत्माका साक्षात्कार होता है, वह अभावयोग कहा गया है। जिसमें नित्यानन्दस्वरूप निरञ्जन आत्माका दर्शन होता है और मेरे साथ एकता होती है, वह परमेश्वररूप महायोग कहा गया है॥५-७॥
अन्य जिन योगियोंके योगोंका ग्रन्थों में विस्तार हुआ है, वे सभी ब्रह्मयोगकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। जिस योगमें मुक्त पुरुष विश्वको साक्षात् ईश्वरके रूपमें देखते हैं, वह सभी योगों में श्रेष्ठ योग माना जाता है। जो सैकड़ों, हजारों अन्य प्रकारके मनको संयमित करनेवाले ईश्वरबहिष्कृत (वेदबाह्य) योगी हैं, वे मुझ अद्वितीयका दर्शन नहीं करते॥८-१०॥
मुनिश्रेष्ठो! अन्य वृत्तियोंका निरोधकर मेरेमें एकचित्तता ही योग है और इस योगके जो आठ साधन मैंने आप लोगोंको बताये हैं वे ये हैं-प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, धारणा, समाधि, यम, नियम तथा आसन* ॥११-१२॥
अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह-संक्षेपमें इन्हें यम कहा गया है। ये मनुष्योंके चित्तकी शुद्धि करनेवाले हैं। मन, वाणी तथा कर्मसे सभी प्राणियोंको सर्वदा किसी भी प्रकार का क्लेश प्रदान न करना-इसे श्रेष्ठ ऋषियोंने अहिंसा कहा है। अहिंसासे श्रेष्ठ (कोई) धर्म नहीं है और अहिंसा से बढ़कर कोई सुख नहीं है। वेदविहित हिंसाको अहिंसा ही कहा गया है। सत्यके द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है, सत्यमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है। द्विजातियों के द्वारा यथार्थ कथनके आचारको सत्य कहा गया है। चोरीसे अथवा बलपूर्वक दूसरेके द्रव्यका अपहरण करना स्तेय है, उसका (स्तेयका) आचरण न करना अस्तेय है, यह धर्मका साधन है। मन, वाणी तथा कर्मद्वारा सभी अवस्थाओंमें सर्वदा सर्वत्र मैथुनका त्याग करना ब्रह्मचर्य कहलाता है॥१३-१८॥
आपत्तिकालमें भी इच्छापूर्वक द्रव्योंका ग्रहण न करना 'अपरिग्रह' कहा गया है। प्रयत्नपूर्वक उस अपरिग्रहका पालन करना चाहिये। तप, स्वाध्याय, संतोष, शौच तथा ईश्वरका पूजन-संक्षेपमें नियम बतलाये गये हैं, ये योगसिद्धि प्रदान करनेवाले हैं। तपस्वियोंने पराक आदि उपवासों तथा कृच्छ्चान्द्रायणादि (व्रतों)-के द्वारा शरीरके शोषणको उत्तम तप कहा है॥१९-२१॥
विद्वान् लोगोंने वेदान्तशास्त्र, शतरुद्रिय और प्रणव आदिके जपको पुरुषोंके लिये सत्त्वकी शुद्धि करनेवाला 'स्वाध्याय' कहा है। स्वाध्यायके तीन भेद हैं-वाचिक, उपांशु और मानस । वेदार्थ जाननेवालोंने इन तीनोंमें उत्तरोत्तर का वैशिष्टय कहा है अर्थात् वाचिक स्वाध्यायसे उपांशु स्वाध्याय श्रेष्ठ और उपांशु स्वाध्यायसे मानस स्वाध्याय श्रेष्ठ है। दूसरे सुननेवालेको स्पष्टरूपसे शब्दका ज्ञान उत्पन्न करानेवाला स्वाध्याय 'वाचिक' कहलाता है। (अर्थात् वह स्वाध्याय वाचिक है जो दूसरोंको स्पष्ट सुनायी पड़े।) अब उपांशु का लक्षण बतलाया जाता है ॥ २२-२४॥
ओठोंमें केवल स्पन्दन होनेके कारण दूसरेको शब्दका बोध न करानेवाला स्वाध्याय 'उपांशु' कहा गया है। यह वाचिक जपसे हजार गुना श्रेष्ठ है। (अर्थात् वही स्वाध्याय उपांशु है जिसमें ओठोंमें मात्र स्पन्दन हो, शब्दोंका उच्चारण न हो।) स्पन्दनरहित अक्षर एवं उस पदकी संगतिके अनुसार सभी शब्दोंके चिन्तनको विद्वान् मानस जप कहते हैं (अर्थात् मानस जप (स्वाध्याय) वही है जिसमें स्वाध्यायके शब्दोंपर केवल मन केन्द्रित हो बाकी सर्वथा व्यापारशून्य हो)। पुरुषको जो यदृच्छापूर्वक मिल जाता है, उसे ही पर्याप्त समझने वाली बुद्धिको ऋषिलोग नित्य सुख लक्षणवाला संतोष कहते हैं ॥ २५-२७॥
द्विजश्रेष्ठो! बाह्य और आभ्यन्तर-भेदसे शौच दो प्रकार का कहा गया है। मिट्टी और जलसे होनेवाला शौच बाह्य शौच और मनकी शुद्धि आभ्यन्तर शौच है। मन, वाणी तथा कर्मद्वारा स्तुति, स्मरण तथा पूजा करते हुए शिव में अचल भक्ति रखना-यह ईश्वरका पूजन है। नियमों के साथ यमोंको बतलाया गया, अब प्राणायामके विषय में सुनो-अपनी देहसे उत्पन्न वायुको प्राण कहते हैं और उस वायुका निरोध करना आयाम है। उत्तम, मध्यम तथा अधमके भेदसे यह तीन प्रकारका कहा गया है। वही सगर्भ और अगर्भ-भेदसे दो प्रकारका है। द्वादश मात्रा (अर्थात् प्रणवका बारह बार जप करनेतक) के कालको मन्द प्राणायाम, चौबीस मात्रा (-के प्राणनिरोध) को मध्यम और छत्तीस मात्रातकके कालतक प्राणनिरोध को उत्तम प्राणायाम कहा जाता है॥ २८-३२॥
मन्द, मध्यम तथा मुख्य अर्थात् उत्तम नाम के प्राणायामोंमें क्रमसे प्रस्वेद (पसीना) कम्पन तथा उत्थान होता है। इनसे तत्त्व-प्राप्तिमें क्रमश: आनन्दातिशयकी अनुभूति होती है। विद्वान् जपयुक्त प्राणायामको सगर्भ और जप-रहितको अगर्भ कहते हैं। योगियोंके प्राणायामका यही लक्षण कहा गया है। प्राणधारणपूर्वक व्याहृति (भूः, भुवः स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्), प्रणव और शीर्षमन्त्रसहित गायत्रीका तीन बार जप (सगर्भ) प्राणायाम कहा जाता है। मनको संयत करनेवाले योगियोंने सभी शास्त्रोंमें रेचक, पूरक और कुम्भक प्राणायामका वर्णन किया है॥३३-३६॥
वायुके सतत बाहर निकालनेको रेचक और उसके रोकनेको पूरक तथा बादकी सम अवस्थाकी जो स्थिति है, उसे कुम्भक कहा गया है। श्रेष्ठ मुनियो! सज्जनोंने स्वभावतः विषयोंमें विचरण करनेवाली इन्द्रियोंके निग्रहको प्रत्याहार कहा है। हृदयकमल, नाभिदेश, मूर्धा तथा पर्वतशिखर आदि स्थानोंमें चित्तके बन्धनको धारणा कहा जाता है। किसी देश (स्थान)-विशेषका अवलम्बनकर उसमें बुद्धिकी जो एकतान वृत्ति बनी रहती है और दूसरी वृत्तियोंसे कोई भी सम्बन्ध नहीं रहता है, उसे विद्वानोंने ध्यान कहा है। किसी देश या अन्य आलम्बनसे रहित चित्तकी एकाकारता समाधि है। इसमें ध्येयमात्रका भान होता है। यह योगका उत्तम साधन है। बारह प्राणायामपर्यन्त धारणा, बारह धारणापर्यन्त ध्यान और
बारह ध्यानपर्यन्त समाधि कही जाती है॥ ३७-४२ ।।
स्वस्तिकासन, पद्मासन तथा अर्धासन-भेदसे आसन (तीन प्रकारका) कहा गया है। सभी साधनोंमें यह साधन उत्तम है। विप्रेन्द्रो! अपने दोनों ऊरुओंके ऊपर दोनों पादतलोंको रखकर बैठनेको उत्तम पद्म नामक आसन कहा गया है। श्रेष्ठ मुनियो! एक पैरको दूसरे जाँघके ऊपर रखकर बैठनेको अर्धासन कहा जाता है। यह योगका उत्तम साधन है। दोनों पैरोंको जानुओं एवं ऊरुओंके भीतर करके बैठनेको श्रेष्ठ स्वस्तिक नामक आसन कहा जाता है॥ ४३-४६॥
विपरीत देश (स्थान) और विपरीत कालमें योगतत्त्व का दर्शन भी नहीं होता। अग्निके समीप, जलमें, सूखे पत्तोंके ढेरके मध्य, जन्तुओंसे भरे स्थानमें, श्मशानमें, पुराने गोष्ठमें, चौराहेमें, कोलाहल और भययुक्त स्थानमें, चैत्यके समीप, दीमकोंसे पूर्ण स्थान, अशुभ स्थान, दुर्जनोंसे व्याप्त और मच्छर आदिसे भरे स्थान तथा देह-सम्बन्धी कष्ट और मनकी अस्वस्थता की दशामें योग-साधन नहीं करना चाहिये। अच्छी प्रकार रक्षित, शुभ स्थान, पर्वतकी गुफा, नदीके किनारे, पुण्यदेश, देवमन्दिर, घर, शुभ, रमणीय, जनशून्य, जन्तुओंसे रहित स्थानोंमें योगीको सतत अपनेको मेरे परायण रखते हुए योग-साधना करनी चाहिये। योगीको चाहिये कि वह शिष्योंसहित श्रेष्ठ योगियों, विनायक, गुरु तथा मुझे प्रणाम करके समाहित- होकर योग- -साधना करे॥ ४७-५२॥
स्वस्तिक, पद्म अथवा अर्धासन बाँधकर नासिका के अग्रभागमें कुछ-कुछ खुली हुई आँखोंसे दृष्टिको स्थिर करके निर्भय तथा शान्त होकर मायामय संसार (-के चिन्तन)-का परित्यागकर अपने आत्मामें स्थित परमेश्वर देवका चिन्तन करना चाहिये॥५३-५४॥
शिखाके अग्रभागमें बारह अंगुलके प्रदेशमें धर्मस्वरूप कन्दसे प्रादुर्भूत, ज्ञानरूप नालवाले, ऐश्वर्यरूप आठ दलोंवाले, वैराग्यरूपी कर्णिकासे युक्त अत्यन्त श्वेत एवं सुन्दर कमलकी कल्पना करे और उस कमलकी कर्णिकामें हिरण्मय श्रेष्ठ कोशका ध्यान करे। उस (कोश)-में विशुद्ध अविनाशी साक्षात् परम ज्योतिका ध्यान करे, जिसे सर्वशक्तिसम्पन्न, दिव्य, अव्यय, ओंकारसे वाच्य, अव्यक्त और प्रकाशकी किरण- मालाओंसे व्याप्त कहा गया है। उस ज्योतिमें अपने आत्माकी अभेदभावना कर आकाशके मध्यमें स्थित परम कारणस्वरूप परमेश्वरका ध्यान करे और परमेश्वररूप एवं सर्वव्यापी होकर किसी भी अन्य वस्तुका चिन्तन न करे॥५५-५९॥
यह अत्यन्त गुह्य ध्यान है। अब दूसरा ध्यान कहा जाता है। अपने हृदयदेशमें पूर्वमें कहे गये उत्तम कमलका चिन्तनकर उस कमलमें अग्निके समान तेजस्वी, कर्तारूप, पचीसवें तत्त्व पुरुषात्मक परमात्मरूप आत्माका चिन्तन करना चाहिये। उस परमात्माके भीतर परम आकाश (अवकाश) है (क्योंकि परमेश्वर विभु विराट् हैं)। ओंकारसे बोधित सनातन तत्त्व अच्युत शिव कहलाता है॥६०-६२ ॥
उसके भीतर अव्यक्त, प्रकृतिमें लीन, उत्तम परम ज्योति, परम तत्त्व, आत्माधार, निरञ्जन, नित्य, एकरूप महेश्वरका तन्मय होकर ध्यान करना चाहिये। अथवा प्रणवके द्वारा पुनः सभी तत्त्वोंका शोधनकर विशुद्ध परमपदरूप मुझमें अपने आत्माको स्थापित करे और उसी ज्ञानरूपी जलसे अपनी देहको आप्लावित करके मुझमें चित्त आसक्त करे तथा मेरे परायण होकर अग्निहोत्रका भस्म ग्रहण करे और 'अग्नि०' इत्यादि मन्त्रके द्वारा भस्मसे अपने सम्पूर्ण शरीरको उपलिप्त कर अपने आत्मामें परम ज्योतिस्वरूप ईशानका चिन्तन करे॥६३-६६॥
जीवको बन्धनरूप पाशसे मुक्त करनेके लिये यह पाशुपत नामक योग कहा गया है। यह सम्पूर्ण वेदान्तका सार है और श्रुतिमें इस योगकी अवस्थाको सभी आश्रमोंकी अवस्थासे अतीत अवस्था (उत्कृष्ट अवस्था) बतलाया गया है। इसे अत्यन्त गुह्य और द्विजातियों, भक्तों एवं ब्रह्मचारियोंके लिये मेरा सायुज्य प्रदान करनेवाला कहा गया है। ब्रह्मचर्य, अहिंसा, क्षमा, शौच, तप, दम, संतोष, सत्य तथा आस्तिकता-ये सभी (इस पाशुपत) व्रतके विशेष अङ्ग हैं। इनमें से एक (अङ्ग) के भी न होनेसे इस (योग)-का व्रत लुप्त हो जाता है। इसलिये इन आत्मगुणों (ब्रह्मचर्य, अहिंसा आदि नौ व्रतके अङ्गों)-से युक्त साधक ही मेरा (पाशुपत) व्रत धारण कर सकता है॥६७-७०॥
राग, भय और क्रोधसे रहित, मत्परायण और मेरे आश्रित अनेक लोग इस (पाशुपत) योगके द्वारा मेरा भाव प्राप्तकर पवित्र हो गये हैं। जो जिस प्रकार मेरे पास आते हैं, मैं भी उसी प्रकार उन्हें स्वीकार करता हूँ। इसलिये ज्ञानयोगके द्वारा मुझ परमेश्वरकी आराधना करनी चाहिये। अथवा भक्तियोग, परम वैराग्य एवं ज्ञानयुक्त चित्तके द्वारा पवित्रतापूर्वक सदा मेरा पूजन करना चाहिये। सभी कर्मोंका परित्यागकर, भिक्षाका अन्न ग्रहण करते हुए अन्य कुछ भी संग्रह न करते हुए (साधना करनेवाला) साधक मेरा सायुज्य (नामक मोक्ष) प्राप्त करता है। यह मैंने गुह्य बात बतलायी ॥७१-७४॥
जो सभी प्राणियोंसे द्वेष न करनेवाला, मित्रता करनेवाला, करुणायुक्त, ममतारहित और अहंकारसे रहित है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है। जो संतुष्ट रहनेवाला, निरन्तर योग-साधना करनेवाला, संयमित- चित्त, दृढ़निश्चयी और मुझमें मन तथा बुद्धि अर्पण करनेवाला है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है। जिससे किसी भी प्राणीको उद्वेग प्राप्त नहीं होता और किसी भी प्राणीसे जो उद्विग्न नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष और भयसे होनेवाले उद्वेगोंसे रहित है, वह मुझे प्रिय है॥७५-७७॥
जो किसी भी प्रकारकी अपेक्षा न रखनेवाला, पवित्र, कुशल (वेदशास्त्र-निषिद्धके त्यागमें सावधान) पक्षपातसे (शत्रु-मित्रभावसे) रहित, दुःखसे आक्रान्त होनेपर भी व्यथाका अनुभव न करनेवाला और सभी प्रकारके आरम्भोंका परित्याग करनेवाला है, वह भक्तियुक्त पुरुष मेरा प्रिय है। जो निन्दा एवं स्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस किसी भी पदार्थसे संतुष्ट रहनेवाला, गृहसे (गृहासक्तिसे) रहित है, वह स्थिर बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझे प्राप्त करता है। मुझमें परायण रहनेवाला सभी कर्मोको सदा करते हुए भी मेरी कृपासे शाश्वत परमपद प्राप्त करता है॥७८-८०॥
चित्तसे सभी कर्मोंको मुझमें अर्पितकर मत्परायण होते हुए आशा एवं ममताकी आसक्तिसे रहित होकर एकमात्र मेरी ही शरण ग्रहण करना चाहिये। कर्मफलकी आसक्तिका सर्वथा परित्यागकर नित्य संतृप्त और (अन्य) आश्रयरहित (एकमात्र परमेश्वरको ही आश्रय समझनेवाला) व्यक्ति कर्मों में प्रवृत्त होते हुए भी उन कर्मोंके द्वारा बन्धनमें नहीं पड़ता। आशारहित, संयमित चित्तवाला, सब प्रकारके परिग्रहों (संचयों)-का परित्याग- कर केवल शरीर (रक्षा)-के निमित्त कर्म करते हुए भी (व्यक्ति) उस पद (मोक्ष)-को प्राप्त कर लेता है॥८१-८३॥
अनायास जो उपलब्ध हो उसीमें संतुष्ट रहनेवाले और सभी प्रकारके सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे रहित रहनेवाले पुरुषके द्वारा केवल मेरी प्रसन्नताके लिये किये गये कर्म संसार (रूपी बन्धन)-का विनाश करनेवाले हैं। मुझमें मन लगानेवाला, मुझे नमस्कार करनेवाला, मेरा
पूजन करनेवाला और मुझे ही अपना परम अयन (आश्रय) समझनेवाला (योगी) मुझ योगके ईश परमेश्वरको जानकर मुझे प्राप्त कर लेता है। मुझमें बुद्धि रखनेवाले (साधक) सतत परस्पर मेरा बोध कराते हुए और नित्य मेरा वर्णन करते हुए मेरा सायुज्य प्राप्त करते हैं। इस प्रकार नित्य योगयुक्त पुरुषके माया (अज्ञान) से उत्पन्न तथा उनसे भी उत्पन्न कर्मरूप समस्त
अन्धकारका प्रकाशमान ज्ञानरूपी दीपकके द्वारा मैं नाश कर देता हूँ॥८४-८७॥
मुझमें बुद्धि लगानेवाले जो मनुष्य सतत मेरी पूजा करते हैं, उन नित्य योगयुक्त पुरुषोंके योग- क्षेमका मैं निर्वाह करता हूँ और जो दूसरे लोग अभिलषित विषयोंके उपभोगके लिये ही भिन्न-भिन्न देवताओंका पूजन करते हैं, उनका अन्त विषयभोगतक ही समझना चाहिये, क्योंकि देवताके अनुसार ही फल भी होता है। जो दूसरे देवोंके भक्त हैं, वे यदि मेरी भावनासे युक्त होकर (दूसरे)देवताओंकी पूजा करते हैं अर्थात् दूसरे देवोंमें मेरी ही भावना करते हैं तो वे भी (मुझमें) भावना करनेके कारण मुक्त हो जाते हैं। अतएव समस्त अनीश्वर देवताओंका परित्यागकर जो मुझ ईशका ही आश्रय ग्रहण करता है, वह परमपदको प्राप्त करता है॥८८-९१॥
पुत्र (स्त्री, गृह) आदिमें आसक्तिका परित्यागकर और शोकरहित होकर तथा अपरिग्रही होकर विरक्त पुरुषको मृत्युपर्यन्त (शिव-) लिङ्गमें परमेश्वरकी आराधना करनी चाहिये। जो सम्पूर्ण भोगोंका परित्यागकर सर्वदा लिङ्गका पूजन करते रहते हैं, उन्हें मैं एक जन्ममें ही परम ऐश्वर-पद (मोक्ष) प्रदान करता हूँ। परम आनन्दस्वरूप, अद्वितीय, सद्रूप, निरञ्जन, ज्ञानात्मक और सर्वत्र व्याप्त (शिव-) लिङ्ग योगियोंके हृदय- प्रदेशमें अवस्थित रहता है॥ ९२-९४॥
नियमपूर्वक भक्ति करनेवाले दूसरे लोग विधि- पूर्वक जहाँ-कहीं भी (शिवलिङ्गकी) भावना करते हुए उस महेश्वर-लिङ्गकी अर्चना करते हैं। जलमें, अग्निके मध्यमें, आकाशमें, सूर्यमें, रत्न आदिमें अथवा अन्यत्र कहीं भी ईशकी भावना करके लिङ्गरूप ईश्वरकी आराधना करनी चाहिये। यह सब कुछ लिङ्गमय है और सब कुछ लिङ्गमें प्रतिष्ठित है, अतएव जहाँ-कहीं भी लिङ्गरूपमें शाश्वत ईशका अर्चन करना चाहिये ॥ ९५-९७॥
क्रियाशीलोंका (लिङ्ग) अग्निमें, मनीषियोंका जल, आकाश और सूर्यमें, अज्ञानियोंका काष्ठ आदिमें और योगियोंका लिङ्ग हृदयमें स्थित रहता है। यदि (ब्रह्म) विज्ञान उत्पन्न न हुआ हो तो विरक्त होकर (द्विजको) अत्यन्त प्रीतिसे ब्रह्मके प्रणवरूपी शरीरका यावज्जीवन जप करते हुए रहना चाहिये। अथवा एकाकी एवं संयत-चित्तवाले द्विजको मरणपर्यन्त शतरुद्रियका जप करना चाहिये, इससे उसे परम पद प्राप्त होता है। अथवा विप्रको चाहिये कि मरणपर्यन्त समाहितचित्त होकर वाराणसीमें निवास करे। वह भी ईश्वर (शंकर)- के अनुग्रहसे उत्कृष्ट परमपदको प्राप्त करता है। वहाँ (वाराणसीमें) सभी प्राणियोंको उनके प्राण निकलते समय (भगवान् शंकर) उस परम ज्ञानको प्रदान करते हैं, जिससे वे (पुनर्जन्मके) बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं॥९८-१०२॥
सम्पूर्ण वर्णाश्रम-विधिका पालन करते हुए मेरे परायण रहनेवाला अपने उसी जन्ममें (जिस जन्म में वर्णाश्रम-धर्मका पालन कर रहा है) ज्ञान प्राप्तकर शिवपदको प्राप्त करता है। द्विजो! नीच अथवा पापयोनिवाले भी जो प्राणी वहाँ (वाराणसीमें) निवास करते हैं, वे सभी ईश्वर (शंकर)-के अनुग्रहसे संसारको पार कर लेते हैं, किंतु जो पापाक्रान्त चित्तवाले हैं, उन्हें बहुत विघ्न होते हैं। इसलिये द्विजो! मुक्ति प्राप्त करनेके लिये निरन्तर धर्मका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। यह वेदोंका रहस्य है, इसे जिस किसीको नहीं देना चाहिये। धार्मिक तथा ब्रह्मचारी भक्तको ही प्रदान करना चाहिये ॥ १०३-१०६ ॥
व्यासजी बोले-इस प्रकार उत्तम आत्मयोग का वर्णन करके भगवान् (शंकर)-ने वहीं बैठे हुए प्रसन्नचित्त नारायणसे कहा-॥१०७॥
मैंने ब्रह्मवादियोंके कल्याणार्थ इस ज्ञानको कहा है। आप इस कल्याणकारी ज्ञानको शान्तचित्त शिष्योंको प्रदान करें। अजन्मा भगवान् (शंकर)-ने ऐसा कहनेके उपरान्त श्रेष्ठ योगियोंसे कहा-द्विजोत्तमो! सभी द्विजाति भक्तोंके कल्याणके लिये आप लोग भी मेरे कहनेसे सभी भक्त शिष्योंको मेरे ज्ञानका विधिपूर्वक उपदेश करें॥१०८-११०॥
जो ये नारायण हैं, वह मैं ईश्वर ही हूँ। इसमें संदेह नहीं है। जो (हम दोनोंमें) कोई भेद नहीं देखता, उसीको यह परम (ज्ञान) देना चाहिये। नारायण नामवाली तथा शान्त अक्षर-संज्ञक मेरी यह परम मूर्ति सभी प्राणियोंके हृदयमें स्थित है। लोकमें जो भेददृष्टिवाले लोग इसके विपरीत समझते हैं, वे मेरा दर्शन नहीं करते हैं और बार-बार (संसारमें) जन्म लेते हैं। जो इन अव्यक्त विष्णु अथवा मुझ देव महेश्वरको एकीभावसे देखते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इसलिये अनादिनिधन (आदि और अन्तसे रहित) आत्मरूप अव्यय विष्णु मुझे ही समझो और फिर वैसे ही पूजा भी करो॥ १११-११५ ॥
जो लोग इन (विष्णु)-को दूसरा देवता मानकर मुझे दूसरा देवता समझकर देखते हैं, वे घोर नरकोंमें जाते हैं, मैं उनमें स्थित नहीं रहता हूँ। मूर्ख हो, पण्डित हो, ब्राह्मण हो अथवा चाण्डाल हो, मेरे आश्रित रहनेवाले (प्रत्येक)-को मैं मुक्त कर देता हूँ, किंतु जो नारायणकी निन्दा करनेवाला है, उसे मैं मुक्त नहीं करता। इसीलिये मेरे भक्त मुझमें प्रीति उत्पन्न करनेके लिये इन महायोगी पुरुषोत्तमकी अर्चना अवश्य करें और इन्हें नमस्कार अवश्य करें। ११६-११८ ॥
ऐसा कहकर पिनाक धारण करनेवाले भगवान् शंकर वासुदेवका आलिंगन करके उन सभीके देखते-देखते अन्तर्हित हो गये। भगवान् नारायणने भी अपने पारमार्थिक विग्रहका त्यागकर उत्तम तपस्वीका वेष धारण किया और सभी योगियोंसे कहा-॥ ११९-१२०॥
आप लोगोंने परमेष्ठी (महेश्वर)-की कृपासे संसार (बन्धन)-को नष्ट करनेवाला उन्हीं साक्षात् महेशका निर्मल ज्ञान प्राप्त किया है। इसलिये मुनीश्वरो! विगतज्वर होकर आप सभी जायँ और धार्मिक शिष्योंमें परमेष्ठीके ज्ञानको प्रवर्तित करें॥ १२१-१२२ ।।
इस ईश्वर-सम्बन्धी विशिष्ट ज्ञानको विशेष रूपसे शान्त भक्त, धार्मिक तथा अग्निहोत्री ब्राह्मणको देना चाहिये। ऐसा कहकर योगियोंमें परम श्रेष्ठ वे महायोगी विश्वात्मा नारायण स्वयं अन्तर्हित हो गये ॥ १२३-१२४ ॥
वे (मुनिगण) भी देवोंके आदिदेवेश्वर महेश्वरको और भूतादि (समस्त प्रपञ्चके मूलकारण) नारायणको नमस्कार कर अपने स्थानोंकी ओर चले गये। महामुनि भगवान् सनत्कुमारने संवर्तको ईश्वरीय ज्ञान (शिवज्ञानका उपदेश) प्रदान किया। उन्होंने भी (वह ज्ञान) सत्यव्रतको दिया। योगीन्द्र सनन्दनने महर्षि पुलहको और प्रजापति पुलहने गौतमको ईश्वरीय ज्ञान प्रदान किया। अङ्गिराने वेदोंके ज्ञाता भरद्वाजको और कपिलने जैगीषव्य तथा पञ्चशिखको (वह ज्ञान) दिया। सभी तत्त्वोंके द्रष्टा मेरे पिता पराशरने भी वह परम ज्ञान सनकसे प्राप्त किया और उनसे वाल्मीकिने प्राप्त किया। प्राचीन कालमें अर्धनारीश्वर भगवान् शंकरके अंशसे उत्पन्न महायोगी वामदेवजीने मुझसे कहा, जो साक्षात् पिनाकधारी रुद्रस्वरूप हैं॥१२५-१३०॥
देवकीके पुत्र हरि भगवान् नारायणने भी स्वयं साक्षात् अर्जुनको यह उत्तम ज्ञान प्रदान किया। जब मैंने वामदेव रुद्रसे इस श्रेष्ठ ज्ञानको प्राप्त किया, तभीसे मेरी गिरिशमें विशेष भक्ति हो गयी। मैंने शरणागतोंके रक्षक, शरण (प्राणिमात्रके आश्रय), भूतोंके ईश, गिरिश, स्थाणु, देवाधिदेव त्रिशूली रुद्रकी विशेषरूपसे शरण ग्रहण की है। पत्नी तथा पुत्रोंके साथ आप सब लोग भी उन गोवृषवाहन', कल्याणकारी भगवान् शम्भुकी शरणमें जायें। उनकी कृपासे कर्मयोगके द्वारा व्यवहार करें और विभूतिभूषण गोपति (इन्द्रियोंके पति) महादेव शंकरकी पूजा करें॥ १३१-१३५॥
ऐसा कहे जानेपर उन शौनक आदि (महर्षियों) ने पुनः शाश्वत स्थाणु सनातन महेश्वर एवं सत्यवती के पुत्र व्यासको प्रणाम किया और प्रसन्नमन होकर वे सभी लोकोंके महेश्वर, साक्षात् हषीकेश, प्रभु कृष्णद्वैपायन (व्यास)-से कहने लगे- ॥ १३६-१३७॥
(भगवन् !) आपकी ही कृपासे शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले गोवृषध्वज (भगवान् शंकर)-की वह अविचल भक्ति हमें प्राप्त हो गयी है, जो देवताओंको भी दुर्लभ है। मुनिश्रेष्ठ! आप श्रेष्ठ कर्मयोग हमें बतलायें, जिसके द्वारा मोक्षार्थी लोग इन भगवान् ईशकी आराधना करते
हैं । आप (वेदव्यास)-की संनिधिमें ही श्रीसूतजी भगवान् (महेश्वर)-के वचनोंको सुन लें, जो वचन समस्त लोकोंके रक्षक हैं और जिनमें समस्त धर्मोंका संग्रह हुआ है। अत: इनका वर्णन करें। इसके अतिरिक्त आप वह भी बतायें, जो पूर्वकालमें अमृतमन्थनके समय इन्द्रके द्वारा तथा मुनियोंके द्वारा पूछे जानेपर कूर्मरूपी देवाधिदेव श्रीविष्णुने कहा था (आप उसी कर्मयोगका वर्णन करें)॥ १३८-१४१ ॥
इस प्रकार मुनियोंने जो कहा उसे सुनकर सत्यवती के पुत्र कृष्णद्वैपायन व्यासजीने समाहित होकर (मुनियोंको) सनातन कर्मयोग बतलाया॥१४२॥
श्रीसनत्कुमार आदि प्रमुख मुनियों एवं भगवान् कृत्तिवासा (शंकर)-के मध्य सम्पन्न इस संवादको जो नित्य पढ़ता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। अथवा जो ब्रह्मचर्यपरायण विशुद्ध द्विजोंको इस (संवाद) को सुनाता है, या जो इस संवादके अर्थका अनुसंधान करता है, वह परमगतिको प्राप्त करता है। जो दृढ़व्रती भक्ति-सम्पन्न होकर इस (संवाद)-को नित्य सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होते हुए ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ १४३-१४५ ॥
इसलिये विद्वानोंको सभी प्रयत्नोंके द्वारा नित्य इसका पठन, श्रवण एवं विशेषरूपसे ब्राह्मणोंको इसका सदा मनन करना चाहिये॥ १४६ ॥
Summary of chapter 60 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Śiva elaborates on His divine omnipresence, listing His supreme manifestations among all categories of creation, such as Vishṇu among Ādityas, Shankara among Rudras, Meru among mountains, and the Veda among scriptures. He explains the nature of twenty-four Tattvas comprising the material universe, defining all bound Jīvas as Pashus trapped in the strong ropes of Avidyā, Karma, and Māyā. Bhagavān reveals that He alone is the eternal Pashupati who breaks these sturdy cosmic ropes for devotees who surrender to Him with pure hearts, conferring eternal Mukti.