37 अध्याय

मार्कण्डेयने कहा-(राजन् युधिष्ठिर!) सूर्यकी तीनों लोकोंमें विख्यात पुत्री महाभागा देवी यमुना नदी यहाँपर मिली हैं। जिस मार्गसे गङ्गा प्रवाहित हुई हैं, उस मार्गसे यमुना भी गयी हैं। सहस्रों योजन दूरपर भी (यमुना) नाम लेनेसे पापोंको नष्ट कर देनेवाली है। युधिष्ठिर! इस यमुनामें स्नान करने तथा इसका जल पीनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त होकर अपने सात पीढ़ियोंके कुलोंको पवित्र कर देता है। जो यहाँ प्राणोंका परित्याग करता है, वह परम गतिको प्राप्त करता है। यमुनाके दक्षिणी तटपर अग्नितीर्थ नामका एक विख्यात तीर्थ है। । यमुनाके पश्चिमी भागमें धर्मराजका 'अनरक'२ नामक तीर्थ कहा गया है। यहाँ स्नान करनेवाले स्वर्ग जाते हैं और जो यहाँ मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता ॥१-४॥

यहाँ (अनरक तीर्थमें) कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको स्नान करके पवित्रतापूर्वक जो धर्मराजका तर्पण करता है, वह निस्संदेह महापापोंसे मुक्त हो जाता है। मनीषी लोगों का यह कहना है कि प्रयागमें दस हजार (प्रधान) तीर्थ और तीस करोड़ दूसरे (अप्रधान) तीर्थ स्थित हैं ॥ ५-६॥

वायुने कहा है कि धुलोक, भूलोक और अन्तरिक्ष में साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं और जाह्नवी उन सभी तीर्थों से युक्त कही गयी है। जहाँ महाभागा गङ्गा होती हैं, वही (पवित्र) देश है और वही तपोवन होता है। गङ्गा के तटपर स्थित उस स्थानको सिद्धिक्षेत्र समझना चाहिये। जहाँ देवीके साथ महादेव महेश्वरदेव वटेश्वर* स्थित हैं, वह स्थान नित्य तीर्थ है और वह तपोवन है। इस सत्य को द्विजातियों, साधुओं, मित्रों, अपने पुत्र तथा अनुगामी शिष्यके कानमें कहना चाहिये॥७-१०॥

यह (प्रयाग) धन्य है, स्वर्गफलप्रद (स्वर्गरूप फलको देनेवाला) है, यह पवित्र, सुख, पुण्य, रमणीय, पावन और उत्तम धर्मयुक्त है। यह महर्षियोंके लिये गोपनीय रहस्य है। सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है। यहाँ द्विज वेदका स्वाध्याय कर निर्मल हो जाता है। जो व्यक्ति नित्य पवित्रतापूर्वक इस पुण्यप्रद तीर्थका वर्णन सुनता है, वह जन्मान्तरकी बातोंको स्मरण करनेवाला हो जाता है और स्वर्गलोकमें आनन्द प्राप्त करता है। शिष्ट मार्गका अनुसरण करनेवाले सज्जन पुरुष ऐसे तीर्थों में जाते हैं। कुरुके वंशधर (युधिष्ठिर)! तीर्थों में स्नान करो। इस विषयमें विपरीत बुद्धिवाले मत होओ॥११-१४॥

ऐसा कहकर उन भगवान् मार्कण्डेय महामुनि ने (युधिष्ठिर के द्वारा) पूछे जानेपर पृथ्वीमें जो कोई भी तीर्थ थे उन्हें बतलाया और पृथ्वी तथा समुद्र आदि की स्थिति एवं नक्षत्रोंकी स्थितिका सम्पूर्ण वर्णन कर वे मुनि चले गये॥ १५-१६॥

प्रात:काल उठकर जो इस (प्रयाग-माहात्म्य) का पाठ करता है अथवा इसे सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर रुद्रलोकमें जाता है॥१७॥