उत्तरार्थ - 1 अध्याय

ऋषियोंने कहा-(सूतजी!) आपने स्वायम्भुव मन्वन्तरकी सृष्टि तदुपरान्त इस ब्रह्माण्डका विस्तार और (अन्य विभिन्न) मन्वन्तरोंके विषयमें भलीभाँति बतलाया तथा उन (मन्वन्तरों)-में धर्मपरायण ज्ञानयोगी वर्णधर्मके अनुयायियोंके नित्य आराध्य ईश्वरोंके ईश्वर देवका भी वर्णन आपने किया। इसीके साथ ही आपने सम्पूर्ण संसारके दु:खोंको नष्ट करनेवाले एकमात्र ब्रह्मविषयक उस उत्तम ज्ञानका भी वर्णन किया, जिसके द्वारा हम उस

परम तत्त्वको देख सकते हैं। प्रभो! आपने साक्षात् नारायण कृष्णद्वैपायन (व्यासजी)-से सम्पूर्ण तत्त्वज्ञान प्राप्त किया है, इसलिये हम आपसे पुनः पूछते हैं॥१-४॥

मुनियोंके उस वाक्यको सुनकर पौराणिक सूतजीने प्रभु कृष्ण-द्वैपायनका स्मरणकर कहना प्रारम्भ किया। इसी बीच कृष्ण-द्वैपायन व्यास स्वयं वहाँ पहुँच गये जहाँ श्रेष्ठ मुनिजन यज्ञ कर रहे थे। कृष्ण मेघके समान द्युतिवाले तथा कमलपत्रके समान नेत्रवाले उन वेदके विद्वान् व्यासजीको देखकर श्रेष्ठ द्विजोंने उन्हें प्रणाम किया॥५-७॥

रोमहर्षण सूतजीने भी उन्हें देखकर भूमिपर गिरकर दण्डवत् प्रणाम किया और गुरुकी प्रदक्षिणाकर हाथ जोड़ते हुए उनके पार्श्वभागमें खड़े हो गये। महामुनि (व्यास)-के द्वारा आरोग्यके विषयमें प्रश्न पूछे जानेपर उसका यथोचित उत्तर देकर शौनक आदि महामुनियों ने व्यासजीको आश्वस्त किया तथा उनके योग्य आसन उन्हें प्रदान किया॥८-९॥

तदनन्तर पराशरजीके पुत्र प्रभु (व्यास)-ने उनसे पूछा-क्या आप लोगोंके तप, स्वाध्याय तथा श्रवण किये गये वेदादिकी हानि तो नहीं हो रही है? तब उन सूतने अपने गुरु महामुनि (व्यास)-को प्रणामकर कहा-आप ब्रह्मविषयक ज्ञान मुनियोंको बतलायें। ये मुनि शान्त, तपस्वी तथा धर्मपरायण हैं। इन्हें सुननेको इच्छा है, आप (कृपया) यथार्थरूपसे ब्रह्मविषयक सर्वोच्च ज्ञानका उपदेश करें। मोक्ष प्रदान करनेवाले जिस दिव्य ज्ञानको आपने मुझे तथा पूर्वकालमें कूर्मरूप धारणकर विष्णुने मुनियोंको बतलाया था (इस समय आप उसी ज्ञानका उपदेश दें)। सूतके वचन सुनकर सत्यवतीके पुत्र मुनि (व्यास)-ने रुद्रको मस्तकद्वारा प्रणामकर सुखदायक वचन कहा-॥१०-१४॥

व्यासजी बोले-प्राचीन कालमें सनत्कुमार आदि प्रमुख योगीश्वरोंद्वारा पूछनेपर स्वयं प्रभु महादेवने जो कहा था, उसीको मैं कहता हूँ। सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, अंगिरा, रुद्रसहित परम धर्मज्ञ भृगु, कणाद, कपिल, योगी महामुनि वामदेव, शुक्र तथा भगवान् वसिष्ठ- -इन सभी संयमित चित्तवाले मुनियोंने संशयान्वित होनेपर परस्पर परामर्श करके पवित्र बदरिकाश्रममें घोर तप किया। तब उन लोगोंने आदि और अन्तसे रहित धर्मपुत्र महायोगी पवित्र नारायण नामक ऋषिका नरके साथ दर्शन किया। उन भक्तिसम्पन्न योगियोंने वेदोंमें वर्णित विविध स्तोत्रोंद्वारा स्तुति करके उन श्रेष्ठ योगीको प्रणाम किया सर्वज्ञ भगवान् (नारायण)- ने उनके अभीष्टको जानकर पुनः गम्भीर वाणीमें उनसे पूछा कि आपलोग किस प्रयोजनसे तपस्या कर रहे हैं? ॥ १५-२१॥

प्रसन्न मनवाले ऋषियोंने जिनका शुभ आगमन अभीष्ट-सिद्धिकी निश्चित सूचना देता है (ऐसे) उन विश्वात्मा, सनातन साक्षात् नारायणदेवसे कहा- ॥ २२॥

(भगवन्!) हम सभी ब्रह्मवादी संशयमें पड़ गये हैं। आप पुरुषोत्तम हैं, हम एकमात्र आपकी शरणमें आये हैं। आप उस परम तत्त्वको जाननेवाले हैं, सर्वज्ञ, भगवान्, ऋषि तथा स्वयं साक्षात् नारायण अव्यक्त पुराणपुरुष हैं। परमेश्वर! आपको छोड़कर अन्य कोई दूसरा जाननेवाला नहीं है, हमें सुननेकी इच्छा है, आप सम्पूर्ण संशयको दूर करनेमें समर्थ हैं। इस सम्पूर्ण (कार्यरूप जगत्)-का कारण क्या है? कौन नित्य गतिशील रहता है? आत्मा कौन है? मुक्ति क्या है और संसार (-की रचना)-का क्या प्रयोजन है? इस संसारका चलानेवाला शासक कौन हैं? अथवा सबका द्रष्टा कौन है ? परात्पर ब्रह्म क्या है? यह सब आप हमें बतलायें ॥ २३-२७॥

ऐसा कहे जानेपर मुनियोंने तपस्वी-रूपका परित्याग किये हुए, अपने तेजद्वारा प्रतिष्ठित, प्रकाशमण्डलसे मण्डित, वक्षःस्थलमें श्रीवत्स धारण किये हुए, तप्त स्वर्णके समान आभावाले और हाथोंमें शंख, चक्र, गदा तथा शाङ्ग नामका धनुष धारण किये हुए लक्ष्मीसहित विमल एवं धुतिमान् पुरुषोत्तम देवका दर्शन किया। उस समय उन्हींके तेजके कारण नर (ऋषि) नहीं दिखलायी पड़े॥ २८-३०॥

उसी समय चन्द्रमासे अंकित मस्तकवाले महादेव महेश्वर रुद्र प्रसन्नतापूर्वक प्रकट हुए। चन्द्रभूषण जगन्नाथ त्रिलोचनका दर्शनकर प्रसन्न मनवाले वे सभी (मुनि) भक्तिपूर्वक उन परमेश्वरकी स्तुति करने लगे-॥३१-३२॥

ईश्वरकी जय हो। भूतपति महादेव शिवकी जय हो। सभी मुनियोंके स्वामी तथा तपस्याद्वारा भलीभाँति प्रपूजित होनेवाले आपकी जय हो। सहस्रमूर्ति! विश्वात्मन् ! संसाररूपी यन्त्रके प्रवर्तक और संसारके जन्म, रक्षा और संहारके कारण हे अनन्त ! आपकी जय हो। हजारों चरणवाले, ईशान, शम्भु, योगीन्द्रोंद्वारा वन्दित अम्बिकापति! आपकी जय हो। परमेश्वरदेव! आपको नमस्कार है।। ३३-३५ ॥

इस प्रकार स्तुति किये जानेपर भक्तवत्सल भगवान् त्र्यम्बक ईशने हृषीकेशका आलिंगनकर गम्भीर वाणी में कहा-हे अच्युत! पुण्डरीकाक्ष! ये ब्रह्मवादी मुनीन्द्र किस कारणसे इस स्थानपर आये हैं अथवा मुझे क्या करना है ? भगवान्के वाक्यको सुनकर देवाधिदेव जनार्दनदेवने कृपा करनेके लिये उद्यत सामने स्थित महादेवसे कहा-देव! ये सभी मुनिगण तपस्वी और निष्पाप हैं, ये लोग भलीभाँति तत्त्वदर्शनकी इच्छासे मेरी शरणमें आये हैं। हे भगवन् ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरे समीप इन भावनामय मुनियोंको वह दिव्य ज्ञान प्रदान करें। ३६-४० ॥

शिव! केवल आप ही अपने-आपको जानते हैं दूसरा कोई आपको जाननेवाला नहीं है। अतः आप स्वयं इन मुनीन्द्रोंको अपना स्वरूप दिखलायें। ऐसा कहकर हृषीकेशने योगसिद्धियोंको दिखाते हुए वृषभध्वज की ओर देखकर श्रेष्ठ मुनियोंसे कहा-(हे मुनिगणो!) त्रिशूल धारण करनेवाले शंकर महेशके दर्शनसे आपलोग अपने-आपको कृतार्थ समझें। आपलोग यथार्थरूपसे ज्ञान प्राप्त करने योग्य हैं, सामने प्रत्यक्ष स्थित विश्वेशसे (उस तत्त्वज्ञानके विषयमें) पूछे। मेरी संनिधिमें ये यथार्थरूपसे वर्णन करने में समर्थ हैं। विष्णुका (यह) वचन सुनकर तथा वृषभध्वजको प्रणामकर सनत्कुमार आदि (ऋषियों)-ने महेश्वरसे पूछा- ॥ ४१-४५ ॥

इसी बीच आकाशसे ईश्वरके योग्य एक अचिन्त्य दिव्य निर्मल आसन प्रकट हुआ। विश्वकर्ता वे योगात्मा (महेश्वर) विष्णुसहित उस आसनपर बैठ गये। अपने तेजसे विश्वको पूरित करते हुए महेश्वर देव वहाँ सुशोभित हो रहे थे। उन ब्रह्मवादियोंने उन प्रकाशमान देवाधिदेव शंकरका उस निर्मल आसनपर सुशोभित होते हुए दर्शन किया। योगमें स्थित लोग अपनी आत्मामें जिन आत्मस्वरूप ईश्वरका दर्शन करते हैं, उन्हीं अनन्य तेजस्वी शान्तस्वरूप शिवको उन ब्रह्मवादियोंने देखा, जिनसे समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिनमें यह सब विलीन हो जाता है, उन प्राणियोंके ईशको ब्रह्मवादियोंने आसनपर विराजमान देखा। जिनके भीतर यह सम्पूर्ण संसार है और यह जगत् जिनसे अभिन्न है, उन परमेश्वरको वासुदेवके साथ आसनपर विराजमान देखा ॥ ४६-५१॥

मुनियोंके पूछनेपर परमेश्वर (महेश्वर) भगवान् पुण्डरीकाक्ष (विष्णु)-की ओर देखकर अपने श्रेष्ठ योगका वर्णन करने लगे। शान्त मनवाले अनघ मुनियो! आप सभी लोग सुनें-मैं ईश्वरद्वारा कहे गये ज्ञानका वर्णन यथोचितरूपसे कर रहा हूँ॥५२-५३॥