11 अध्याय

श्रीकूर्मने कहा-इस प्रकार मरीचि आदि की सृष्टि करके देवोंके देव पितामह (ब्रह्मा अपने) मानस पुत्रोंके साथ परम तप करने लगे॥१॥

इस प्रकार तप करते हुए उनके मुखसे कालाग्नि के समान अति भयंकर, हाथमें त्रिशूल धारण किये, कठिनतासे देखे जाने योग्य, अर्धनारीश्वरका शरीर धारण किये हुए, त्रिलोचन ईशान रुद्र प्रकट हुए। 'अपना विभाग करो' ऐसा कहकर ब्रह्मा भयसे अन्तर्धान हो गये ।। २-३॥

(ब्रह्माके द्वारा) ऐसा कहे जानेपर उन्होंने स्त्री तथा पुरुषरूपसे दो भाग कर दिये। पुनः पुरुष भाग को दस और एक-इस प्रकार ग्यारह भागोंमें बाँट दिया। ये ग्यारह रुद्र त्रिभुवनेश्वर कहलाते हैं। ब्राह्मणो! कपाली-ईश आदि ये सभी एकादश रुद्र देवताओं के कार्यमें नियोजित हैं॥४-५॥

उन प्रभु देवने सौम्य और रौद्र, शान्त और अशान्त तथा श्वेत और कृष्णरूपोंसे स्त्रीभागको भी अनेक रूपोंमें विभक्त किया। हे विप्रो! ये ही विभूतियाँ शक्तियों के रूपमें लक्ष्मी आदि नामोंसे संसारमें विख्यात हैं। शंकर की शक्ति ईशा इन्हींके द्वारा विश्वमें व्याप्त है॥६-७॥

पुनः ईशानी (ईशा) अपनेको विभु शंकरसे विभक्तकर महादेव के निर्देशसे वे पितामहके पास गयीं। भगवान् ब्रह्माने इनसे कहा-'दक्षकी पुत्री बनो।' ये भी उनके आदेशसे दक्ष प्रजापतिके यहाँ उत्पन्न हुईं (इन्हींका नाम सती है ॥८-९॥

(दक्ष ने) ब्रह्मा की आज्ञा से इन सतीदेवी को रुद्र को प्रदान कर दिया। त्रिशूलधारी रुद्रने भी दक्ष से अपनी ही शक्ति को ग्रहण किया॥१०॥

कालान्तरमें (यज्ञमें अपने आराध्य शिवका भाग न देखकर) दक्ष प्रजापतिकी निन्दा कर (तथा अपने शरीर का परित्याग कर) वे परमेश्वरी सती पुनः हिमवान्से मेनाकी पुत्री (पार्वती) बनीं। पर्वतश्रेष्ठ हिमवान्ने भी पार्वती को सभी देवताओं, तीनों लोकों तथा स्वयं अपने भी कल्याण के लिये रुद्रको समर्पित कर दिया ।। ११-१२॥

ये ही शंकरके आधे शरीरमें स्थित रहनेवाली माहेश्वरी देवी शिवा, सती तथा हैमवतीके रूप में देवताओं एवं असुरोंद्वारा पूजित हैं। इन्द्रसहित सभी देवता, मुनि, शंकर अथवा स्वयं हरि इनके अतुल प्रभावको जानते हैं ॥१३-१४॥

हे विप्रो! इस प्रकार मैंने आप लोगोंसे अमित तेजस्वी शंकरके पुत्रत्व (पुत्र होनेका) और परमेष्ठी ब्रह्मा के पद्मयोनित्व (पद्मयोनि होने)-का वर्णन किया॥१५॥

सूत बोले-कूर्मरूप धारण किये हुए विष्णुके इस कथनको सुनकर मुनियोंने पुनः हरि (कूर्मरूपधारी विष्णु)को प्रणाम करते हुए उनसे इस प्रकार पूछा- ॥१६॥

ऋषियोंने कहा-(भगवन्!) शंकरके आधे शरीररूपसे प्रतिष्ठित शिवा, सती तथा हैमवती (इत्यादि नामवाली) ये देवी भगवती कौन हैं? हम सभी पूछनेवालों को आप यथार्थरूपमें बतलायें। उन मुनियोंके इस वचन को सुनकर पुरुषोंमें उत्तम महायोगी (विष्णु)-ने अपने परम पद का ध्यान करके उन्हें बताया-॥१७-१८॥

श्रीकूर्म बोले-प्राचीन कालमें अत्यन्त रमणीय मेरु गिरिके पृष्ठपर (बैठकर) पितामह (ब्रह्मा)-ने यह रहस्यपूर्ण ज्ञान कहा था। यह विशेषरूपसे गोपनीय है। सांख्यशास्त्रके तत्त्वज्ञोंके लिये यह परम सांख्य (तत्त्वज्ञान) एवं उत्तम ब्रह्मज्ञान है। यह संसार-सागरमें निमग्न प्राणियोंकी मुक्तिका एकमात्र साधन है॥ १९-२० ॥

 (महेश्वरकी) जो ज्ञानरूप, उत्कृष्ट इच्छारूप, व्योम नामवाली तथा पराकाष्ठारूप (अन्तिम प्राप्तव्य) वह माहेश्वरी शक्ति है, ये वही हैमवती कही जाती हैं। (ये हैमवती शक्ति) कल्याण करनेवाली, सर्वत्र व्याप्त, अनन्त, गुणातीत, नितान्त भेदशून्य, अद्वितीय तथा अनेक रूपोंमें स्थित रहनेवाली, ज्ञानरूप, परम इच्छारूप ॥२१-२२॥

अनन्य तथा उन (शिव)-के तेजसे निष्कल तत्त्व में प्रतिष्ठित रहनेवाली, सूर्यकी प्रभाके सदृश स्वच्छ तथा उनके आश्रित एवं स्वभावतः प्रवृत्त होनेवाली हैं। वह एक ही माहेश्वरी शक्ति अनेक उपाधियों (नाम-रूपों)के संयोगसे उत्तम तथा निम्न रूपसे उन (शिव)के समीप क्रीडा करती रहती हैं। वे ही यह सम्पूर्ण (सृष्टि इत्यादि का) कार्य करती हैं। यह जगत् उन्हींका कार्य है। ईश्वरका न कोई कार्य है और न कोई करण (साधन) ही होता है-ऐसा विद्वानोंका मत है ॥ २३-२५॥

हे श्रेष्ठ मुनियो! उन देवीकी अधिष्ठान (आश्रय) भेद से अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित चार शक्तियाँ हैं, उन्हें आप सुनें ॥२६॥

उन शक्तियोंको शान्ति, विद्या, प्रतिष्ठा तथा निवृत्ति-इस प्रकारसे कहा गया है और इसीलिये (अर्थात् इन चारों शक्तियोंसे सम्पन्न होनेके कारण) परमेश्वर देव को भी चतुर्दूहात्मक' कहा जाता है। इस पराशक्तिके द्वारा | देव (महेश्वर) स्वात्मानन्दका उपभोग करते हैं। चारों ही वेदोंमें चतुर्मूर्ति महेश्वर वर्णित हैं ॥ २७-२८॥

उन रुद्र परमात्माके सम्बन्धसे इस अनन्ता (शक्ति)का महान् अतुलनीय ऐश्वर्य सिद्ध है। वे ही ये सर्वेश्वरी देवी सभी प्राणियोंको प्रवर्तित करती हैं। भगवान् काल, हरि, प्राण तथा महेश्वर कहे जाते हैं । २९-३०॥

उनमें ही यह सम्पूर्ण जगत् ओतप्रोत है। वेदवादियों (वैदिकों)-के द्वारा वे ही काल, अग्नि, हर तथा रुद्र-रूपमें गाये जाते हैं। काल सभी प्राणियोंकी सृष्टि करता है, काल ही प्रजाओंका संहार करता है। सभी काल के वशीभूत हैं और काल किसीके वशमें नहीं है। (वह काल ही) प्रधान, पुरुष, तत्त्व, महान्, आत्मा तथा अहंकार है। योगी कालमें ही अन्य सभी तत्त्व समाविष्ट हैं ॥३१-३३ ॥

सम्पूर्ण जगत्को उनकी (ईशकी) संतान और उनकी शक्तिको माया कहा गया है। मायावी पुरुषोत्तम ईश उस (माया)-के द्वारा ही इस (जगत्)-को भ्रमित (मोहित) करते हैं। वही यह सर्वाकारा, सनातनी मायात्मिका शक्ति महेशके विश्वरूपत्वको सदा प्रकाशित करती रहती है।३४-३५॥

उन देवके द्वारा निर्मित ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति तथा प्राणशक्ति-ये तीन अन्य मुख्य शक्तियाँ हैं। विप्रेन्द्रो! अनन्त मायाके द्वारा ही सभी शक्तियोंसे युक्त शक्तिमानोंका निर्माण हुआ है, किंतु वह (माया) अनादि है। सभी शक्तियोंकी आत्मरूप वह माया बड़ी कठिनतासे निवारण करने योग्य और बड़े ही कष्टसे पार करने योग्य है। सभी शक्तियोंके स्वामी मायावी प्रभु स्वयं काल हैं और काल को भी उत्पन्न करनेवाले हैं॥३६-३८॥

काल ही सब कुछ (उत्पन्न) करता है और काल ही (सबका) संहार करता है। विश्वकी स्थापना काल करता है और कालके ही अधीन यह सारा जगत् है ॥ ३९ ॥

देवाधिदेव, परमेष्ठी, अनन्त और अखिल (विश्व स्वामी कालात्मा प्रभु शम्भु का सांनि प्राप्तकर वही माया शक्ति, प्रधान, पुरुष एवं माया नामकी शक्तिका रूप धारण करती है। वह शक्ति अद्वितीय सर्वत्र व्याप्त, अन्त-रहित, केवल, भेदशून्य और कल्याणकारिणी है। ४०-४१ ।।

शक्ति एक है और शिव भी एक हैं। शिव शक्तिमान् कहे जाते हैं। अन्य सभी शक्तियाँ तथा शक्तिमान् (इसी) शक्ति से उत्पन्न हैं। शक्ति और शक्तिमान्में भेद कहा जाता है, किंतु तत्त्व का चिन्तन करनेवाले योगीजन (उनमें) परमार्थतः अभेद का ही दर्शन करते हैं। जितनी भी शक्तियाँ हैं वे गिरिजादेवी और जितने भी शक्तिमान् हैं वे शंकर हैं। ब्रह्मवादियोंके द्वारा पुराणमें इनके विषयमें विशेष (रूपसे) कहा जाता है।॥ ४२-४४॥

महेश्वरकी पतिव्रता देवी विश्वेश्वरीको भोग्या और नीललोहित जटाधारी भगवान् (शंकर)-को भोक्ता कहा गया है। कामदेवका अन्त करनेवाले, विश्व केस्वामी देव शंकरको मनन करनेवाला मन्ता और ईशानीको मति एवं विचारद्वारा मानने योग्य (मन्तव्या)कहा गया है। ४५-४६ ॥

ब्राह्मणो! तत्त्वद्रष्टा मुनियोंके द्वारा सभी वेदों में यही कहा गया है कि यह सम्पूर्ण विश्व शक्ति एवं शक्तिमान्से प्रादुर्भूत है। इस प्रकार ब्रह्मवादियोंके द्वारा समस्त वेदान्त एवं वेदों में निश्चित किये गये देवीके दिव्य एवं उत्तम माहात्म्यका यह वर्णन किया गया॥४७-४८॥

महादेवीका जो सर्वव्यापक, सूक्ष्म, कूटस्थ, अचल तथा ध्रुव परम पद है, उसका योगी साक्षात्कार करते हैं ॥४९॥

महादेवीका जो आनन्दमय, अविनाशी, ब्रह्मरूप, अद्वितीय एवं भेदरहित परम पद है, योगी उसका दर्शन करते हैं। देवीका वह परम पद परसे भी परतर, तत्त्वरूप, सनातन, कल्याणकारी, अच्युत तथा अनन्त प्रकृतिमें लीन है। देवीका वह परम पद शुभ निरञ्जन, शुद्ध, निर्गुण, द्वैतरहित और आत्मज्ञानका विषय है। परम आनन्द चाहनेवालोंके लिये वे ही धात्री तथा विधात्री हैं। वे ईश्वरके आश्रयसे संसारके सारे पापों का विनाश करती हैं। इसलिये मोक्षकी इच्छा करनेवालों को चाहिये कि वे सभी भावोंकी आत्मस्वरूपा शिवात्मिका परमेश्वरी पार्वतीका आश्रय ग्रहण करें॥५०-५४॥

अत्यन्त कठोर तप करनेके अनन्तर शर्वाणी (शंकर-प्रिया)को पुत्रीरूपमें प्राप्तकर (हिमवान् अपनी) भार्या के साथ परमेश्वरी पार्वतीकी शरणमें गये। अपनी इच्छा से उत्पन्न उस श्रेष्ठ मुखवालीको देखकर हिमवान्की पत्नी मेनाने गिरिराज हिमालयसे इस प्रकार कहा- ॥ ५५-५६॥

मेना बोली-राजन्! कमलके समान मुखवाली इस बालिकाको देखो। (यह) हम दोनोंकी तपस्या (-के प्रभाव)-से सभी प्राणियोंके कल्याणके लिये उत्पन्न हुई है॥५७॥

तरुण सूर्यके समान (देदीप्यमान), जटायुक्त, चतुर्मुख, तीन नेत्रोंवाली, उत्कृष्ट इच्छास्वरूप, आठ हाथों और विशाल नेत्रोंवाली, चन्द्रमाकी कलाओंके आभूषण धारण की हुई, गुणातीत एवं गुणयुक्त तथा सत्-असत्के भावोंसे रहित साक्षात् देवीको पुत्रीरूपमें देखकर हिमवान्ने भूमिपर मस्तक लगाकर प्रणाम किया और उनके तेज से अत्यन्त विह्वल तथा भयभीत होते हुए हाथ जोड़कर उन परमेश्वरीसे कहा- ॥५८-६०॥

हिमवान् बोले-विशाल नेत्रोंवाली तथा चन्द्रमाकी कलाओं से सुशोभित देवि! आप कौन हैं ? वत्से! मैं आपको नहीं जानता हूँ। मुझ पूछनेवालेको आप यथार्थरूपसे बतलायें॥६१॥

योगियों को अभय प्रदान करनेवाली उस परमेश्वरीने गिरिराज (हिमालय)-का वचन सुनकर महाशैलसे कहा- ॥६२॥

देवी बोलीं-मोक्षकी इच्छा करनेवाले (मोक्षार्थी) जिस अनन्य, अविनाशी तथा अद्वितीय (शक्ति)का दर्शन करते हैं, परमेश्वरके आश्रयमें रहनेवाली वही परम शक्ति मुझे समझो॥६३॥

मैं ही सभी पदार्थों की आत्मा, सभीके अंदर रहनेवाली, कल्याणकारिणी, सनातन ऐश्वर्य तथा विज्ञान की मूर्ति और सभीको प्रवृत्त करनेवाली हूँ। मैं अनन्त और अनन्त महिमावाली तथा संसारसागरसे पार उतारनेवाली हूँ। मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि प्रदान करती हूँ, मेरे ऐश्वर्यमय रूपको देखो ॥६४-६५॥

इतना कहकर तथा हिमवान्को स्वयं विशिष्ट ज्ञान प्रदान कर (देवीने) अपना वह परमेश्वरमय दिव्य रूप दिखलाया ॥६६॥

(हिमवान्ने) करोड़ों सूर्यके समान (प्रकाशमान) तेज:पुञ्ज, स्थिर, हजारों ज्वालामालाओंसे युक्त, सैकड़ों कालाग्निके समान, भयंकर दाढ़ोंवाला, दुर्धर्ष, जटामण्डलों से मण्डित, हाथमें त्रिशूल और वरमुद्रा धारण किये, भयानक, घोर रूप एवं प्रशान्त, सौम्य मुखवाला, अनन्त आश्चर्योंसे युक्त, चन्द्रकलासे चिह्नित, करोड़ों चन्द्रमाओं की आभावाला मुकुट धारण किये, हाथ में गदा लिये, नूपुरोंसे सुशोभित, दिव्य वस्त्र एवं माला धारण किये, दिव्य सुगन्धित अनुलेपन किये हुए, शङ्ख-चक्रधारी, कमनीय, तीन नेत्रवाले, चर्माम्बरधारी, ब्रह्माण्डके बाहर एवं भीतर (सर्वत्र) स्थित, बाहर तथा भीतर सर्वत्र श्रेष्ठ, सर्वशक्तिमय, शुभ्र, सभी आकारों से युक्त, सनातन, ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु और श्रेष्ठ योगियों द्वारा वन्दित चरणकमलोंवाला, सभी ओर हाथ, पैर, आँख, सिर एवं मुखवाला और सभीको आवृत कर स्थित रहनेवाला (देवीका वह) परमेश्वर-रूप देखा ॥६७-७३॥

देवीके इस प्रकारके उस परम माहेश्वर रूप को देखकर वे (पर्वतोंके) राजा (हिमवान्) भयसे आविष्ट होते हुए भी प्रसन्न मनवाले हो गये। (और) अपनी आत्मामें आत्माको प्रतिष्ठितकर (आत्मनिष्ठ होकर) ओङ्कार का स्मरण करते हुए (वे) परमेश्वरीके एक हजार आठ नामसे उनकी स्तुति करने लगे-॥७४-७५ ॥

हिमवान्ने कहा-(हे देवी! आप) शिवा, उमा, परमा शक्ति, अनन्ता, निष्कला, अमला, शान्ता, माहेश्वरी, नित्या, शाश्वती, परमाक्षरा, अचिन्त्या, केवला, अनन्त्या, शिवात्मिका, परमात्मिका, अनादि, अव्यया, शुद्धा, देवात्मिका, सर्वगा, अचला॥७६-७७॥

विश्वरूपा, महाग, विश्वेशेच्छानुवर्तिनी, महीयसी, ब्रह्मयोनि, महालक्ष्मीसमुद्भवा, महाविमानमध्यस्था, महा निद्रा, आत्महेतुका, सर्वसाधारणी, सूक्ष्मा, अविद्या, पारमार्थिका ॥ ९६-९७॥

अनन्तरूपा, अनन्तस्था, देवी, पुरुषमोहिनी, अनेकाकारसंस्थाना, कालत्रयविवर्जिता, ब्रह्मजन्मा, हरिमूर्ति (हरिकी मूर्ति), ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका, ब्रह्मेशविष्णुजननी, ब्रह्माख्या, ब्रह्मसंश्रया, व्यक्ता, प्रथमजा, ब्राह्मी, महती, ज्ञानरूपिणी, वैराग्यैश्वर्यधर्मात्मिका, ब्रह्ममूर्ति, हृदिस्थिता, अपांयोनि (जलकी योनि) | स्वयम्भूति, मानसी, तत्त्वसम्भवा, ईश्वराणी, शर्वाणी, शंकरार्धशरीरिणी, भवानी, रुद्राणी, महालक्ष्मी, अम्बिका, महेश्वरसमुत्पन्ना, भुक्तिमुक्तिफलप्रदा, सर्वेश्वरी, सर्ववन्द्या, नित्यमुदितमानसा, ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रनमिता, शंकरेच्छानुवर्तिनी, ईश्वरार्धासनगता, महेश्वरपतिव्रता ।। ९८-१०३ ॥

सकृद्विभाविता, सर्वा, समुद्रपरिशोषिणी, पार्वती, हिमवत्पुत्री, परमानन्ददायिनी, गुणाढ्या, योगजा, योग्या, ज्ञानमूर्ति, विकासिनी, सावित्री, कमला, लक्ष्मी, श्री, अनन्तोरसिस्थिता (विष्णुके हृदयमें रहनेवाली), सरोजनिलया, मुद्रा, योगनिद्रा, असुरार्दिनी, सरस्वती, सर्वविद्या, जगज्ज्येष्ठा, सुमङ्गला, वाग्देवी, वरदा, वाच्या, कीर्ति, सर्वार्थसाधिका, योगीश्वरी, ब्रह्मविद्या, महाविद्या, सुशोभना, गुह्यविद्या, आत्मविद्या, धर्मविद्या, आत्मभाविता, स्वाहा, विश्वम्भरा, सिद्धि, स्वधा, मेधा, धृति, श्रुति, नीति, सुनीति, सुकृति, माधवी, नरवाहिनी, अजा, विभावरी, सौम्या, भोगिनी, भोगदायिनी, शोभा, वंशकरी, लोला (चञ्चला), मालिनी, परमेष्ठिनी, त्रैलोक्यसुन्दरी, रम्या, सुन्दरी, कामचारिणी॥१०४-११०॥

महानुभावा, सत्त्वस्था, महामहिषमर्दिनी, पद्ममाला, पापहरा, विचित्रा, मुकुटानना, कान्ता, चित्राम्बरधरा, दिव्याभरणभूषिता, हंसाख्या, व्योमनिलया, जगत्सृष्टि-विवर्धिनी॥१११-११२॥

निर्यन्त्रा, यन्त्रवाहस्था, नन्दिनी, भद्रकालिका, आदित्यवर्णा, कौमारी, मयूरवरवाहिनी, वृषासनगता, गौरी, महाकाली, सुरार्चिता, अदिति, नियता, रौद्री, पद्मगर्भा, विवाहना, विरूपाक्षी, लेलिहाना, महापुरनिवासिनी, महाफला, अनवद्याङ्गी, कामपूरा, विभावरी, विचित्ररत्नमुकुय, प्रणतार्तिप्रभञ्जिनी, कौशिकी, कर्षणी, रात्रि, त्रिदशातिविनाशिनी, बहुरूपा, सुरूपा, विरूपा, रूपवर्जिता, भक्तार्तिशमनी, भव्या, भवभावविनाशिनी ॥ ११३-११७॥

निर्गुणा, नित्यविभवा, निःसारा, निरपत्रपा, यशस्विनी, सामगीति, भवाङ्गनिलयालया, दीक्षा, विद्याधरी, दीप्ता, महेन्द्रविनिपातिनी, सर्वातिशायिनी, विद्या, सर्वसिद्धिप्रदायिनी, सर्वेश्वरप्रिया, ताा, समुद्रान्तरवासिनी, अकलंका, निराधारा, नित्यसिद्धा, निरामया, कामधेनु, बृहद्गर्भा, धीमती, मोहनाशिनी, निःसङ्कल्पा, निरातङ्का, विनया, विनयप्रदा, ज्वालामालासहस्राढ्या, देवदेवी, मनोन्मनी, महाभगवती, दुर्गा, वासुदेवसमुद्भवा, महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी, भक्तिगम्या, परावरा, ज्ञानज्ञेया, जरातीता, वेदान्तविषया, गति, दक्षिणा, दहना, दाह्या, सर्वभूतनमस्कृता, योगमाया, विभावज्ञा, महामाया, महीयसी॥११८-१२४॥

संध्या, सर्वसमुद्भूति, ब्रह्मवृक्षाश्रयानति, बीजाकुर-समुद्भूति, महाशक्ति, महामति, ख्याति, प्रज्ञा, चिति, संवित्, महाभोगीन्द्रशायिनी, विकृति, शांकरी, शास्त्री, गणगन्धर्वसेविता, वैश्वानरी, महाशाला, देवसेना, गुहप्रिया, महारात्रि, शिवानन्दा, शची, दुःस्वप्ननाशिनी, इज्या, पूज्या, जगद्धात्री, दुर्विज्ञेया, सुरूपिणी, गुहाम्बिका, गुणोत्पत्ति, महापीठा, मरुत्सुता, हव्यवाहान्तरागादि, हव्यवाहसमुद्भवा, जगद्योनि, जगन्माता, जन्ममृत्युजरातिगा, बुद्धिमाता, बुद्धिमती, पुरुषान्तरवासिनी, तरस्विनी, समाधिस्था, त्रिनेत्रा, दिविसंस्थिता ॥ १२५-१३०॥

सर्वेन्द्रियमनोमाता, सर्वभूतहृदिस्थिता, संसारतारिणी, विद्या, ब्रह्मवादिमनोलया, ब्रह्माणी, बृहती, ब्राह्मी, ब्रह्मभूता, भवारणि, हिरण्मयी, महारात्रि, संसारपरिवर्तिका, सुमालिनी, सुरूपा, भाविनी, तारिणी, प्रभा, उन्मीलनी, सर्वसहा, सर्वप्रत्ययसाक्षिणी, सुसौम्या, चन्द्रवदना, ताण्डवासक्तमानसा, सत्त्वशुद्धिकरी*, शुद्धि, मलत्रयविनाशिनी, जगत्प्रिया, जगन्मूर्ति, त्रिमूर्ति, अमृताश्रया, निराश्रया, निराहारा, निरङ्कुरवनोद्भवा, चन्द्रहस्ता, विचित्राङ्गी, स्रग्विणी, पद्मधारिणी, परावरविधानज्ञा, महापुरुषपूर्वजा, विद्येश्वरप्रिया, विद्या, विद्युजिह्वा, जितश्रमा, विद्यामयी, सहस्राक्षी, सहस्रवदनात्मजा॥१३१-१३७॥

सहस्ररश्मि, सत्त्वस्था, महेश्वरपदाश्रया, क्षालिनी, सन्मयी, व्याप्ता, तैजसी, पद्मबोधिका, महामायाश्रया, मान्या, महादेवमनोरमा, व्योमलक्ष्मी, सिंहरथा, चेकिताना, अमितप्रभा, वीरेश्वरी, विमानस्था, विशोका, शोकनाशिनी, अनाहता, कुण्डलिनी, नलिनी, पद्मवासिनी, सदानन्दा, सदाकीर्ति, सर्वभूताश्रयस्थिता, वाग्देवता, ब्रह्मकला, कलातीता, कलारणि, ब्रह्मश्री, ब्रह्महृदया, ब्रह्मविष्णुशिवप्रिया, व्योमशक्ति, क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति, परागति, क्षोभिका, बन्धिका, भेद्या, भेदाभेदविवर्जिता, अभिन्ना, अभिन्नसंस्थाना, वंशिनी, वंशहारिणी, गुह्यशक्ति, गुणातीता, सर्वदा, सर्वतोमुखी, भगिनी, भगवत्पत्नी, सकला, कालकारिणी॥१३८-१४४॥

सर्ववित्, सर्वतोभद्रा, गुह्यातीता, गुहारणि, प्रक्रिया, योगमाता, गङ्गा, विश्वेश्वरेश्वरी, कपिला, कापिला, कान्ता, कनकाभा, कलान्तरा, पुण्या, पुष्करिणी, भोक्त्री, पुरंदरपुरस्सरा, पोषणी, परमैश्वर्यभूतिदा, भूतिभूषणा, पञ्चब्रह्मसमुत्पत्ति, परमार्थार्थविग्रहा, धर्मोदया, भानुमती, योगिज्ञेया, मनोजवा, मनोहरा, मनोरक्षा, तापसी, वेदरूपिणी ॥१४५ -१४८॥

वेदशक्ति, वेदमाता, वेदविद्याप्रकाशिनी, योगेश्वरेश्वरी, माता, महाशक्ति, मनोमयी, विश्वावस्था, वियन्मूर्ति, विद्युन्माला, विहायसी, किंनरी, सुरभी, वन्द्या, नन्दिनी, नन्दिवल्लभा, भारती, परमानन्दा, परापरविभेदिका, सर्वप्रहरणोपेता, काम्या, कामेश्वरेश्वरी ॥ १४९-१५१ ॥

अचिन्त्या, अचिन्त्यविभवा, हृल्लेखा, कनकप्रभा, कूष्माण्डी, धनरत्नाढ्या, सुगन्धा, गन्धदायिनी, त्रिविक्रमपदोद्भूता, धनुष्पाणि, शिवोदया, सुदुर्लभा, धनाध्यक्षा, धन्या, पिङ्गललोचना, शान्ति, प्रभावती, दीप्ति, पङ्कजायतलोचना, आद्या, हृत्कमलोद्भूता, गवां माता (गौओंकी माता), रणप्रिया, सत्क्रिया, गिरिजा, शुद्धा, नित्यपुष्टा, निरन्तरा, दुर्गा, कात्यायनी, चण्डी, चर्चिका, शान्तविग्रहा, हिरण्यवर्णा, रजनी, जगद्यन्त्रप्रवर्तिका, मन्दराद्रि- निवासा, शारदा, स्वर्णमालिनी, रत्नमाला, रत्नगर्भा, पृथ्वी, विश्वप्रमाथिनी, पद्मानना, पद्मनिभा, नित्यतुष्टा, अमृतोद्भवा, धुन्वती, दुःप्रकम्प्या, सूर्यमाता, दृषद्वती, महेन्द्रभगिनी, मान्या, वरेण्या, वरदर्पिता ॥ १५२-१५८॥

कल्याणी, कमला, रामा, पञ्चभूता, वरप्रदा, वाच्या, वरेश्वरी, वन्द्या, दुर्जया, दुरतिक्रमा, कालरात्रि, महावेगा, वीरभद्रप्रिया, हिता, भद्रकाली, जगन्माता, भक्तानां भद्र-दायिनी (भक्तोंका कल्याण करनेवाली), कराला, पिङ्गलाकारा, नामभेदा, अमहामदा, यशस्विनी, यशोदा, षडध्वपरिवर्तिका, शङ्खिनी, पद्मिनी, सांख्या, सांख्ययोगप्रवर्तिका, चैत्रा, संवत्सरारूढा, जगत्सम्पूरणीन्द्रजा, शुम्भारि, खेचरी, स्वस्था, कम्बुग्रीवा, कलिप्रिया, खगध्वजा, खगारूढा, पराा, परमालिनी, ऐश्वर्यवर्मनिलया, विरक्ता, गरुडासना, जयन्ती, हृद्गुहा, रम्या, गह्वरेष्ठा, गणाग्रणी, संकल्पसिद्धा, साम्यस्था, सर्वविज्ञानदायिनी, कलिकल्मषहन्त्री, गुह्योपनिषत्, उत्तमा ॥ १५९-१६५॥

निष्ठा, दृष्टि, स्मृति, व्याप्ति, पुष्टि, तुष्टि, क्रियावती, विश्वामरेश्वरेशाना, भुक्ति, मुक्ति, शिवा, अमृता॥१६६॥

लोहिता, सर्पमाला, भीषणी, वनमालिनी अनन्तशयना, अनन्या, नरनारायणोद्भवा, नृसिंही, दैत्यमथनी, शङ्खचक्रगदाधरा, संकर्षणसमुत्पत्ति, अम्बिकापदसंश्रया, महाज्वाला, महामूर्ति, सुमूर्ति, सर्वकामधुक्, सुप्रभा, सुस्तना, गौरी, धर्मकामार्थमोक्षदा, भ्रूमध्यनिलया, पूर्वा, पुराणपुरुषारणि, महाविभूतिदा, मध्या, सरोजनयना, समा, अष्टादशभुजा, अनाद्या, नीलोत्पलदलप्रभा, सर्वशक्त्यासनारूढा, धर्माधर्मार्थवर्जिता, वैराग्यज्ञाननिरता, निरालोका, निरिन्द्रिया, विचित्रगहनाधारा, शाश्वतस्थानवासिनी, स्थानेश्वरी, निरानन्दा, त्रिशूलवरधारिणी, अशेषदेवतामूर्ति, देवता, वरदेवता, गणाम्बिका, गिरेः पुत्री (गिरिपुत्री), निशुम्भविनिपातिनी ॥ १६७–१७३ ॥

अवर्णा, वर्णरहिता, निवर्णा, बीजसम्भवा, अनन्तवर्णा, अनन्यस्था, शंकरी, शान्तमानसा, अगोत्रा, गोमती, गोत्री, गुह्यरूपा, गुणोत्तरा, गौः (गौ), गी:, गव्यप्रिया, गौणी, गणेश्वरनमस्कृता, सत्यमात्रा, सत्यसंधा, त्रिसंध्या,  संधिवर्जिता, सर्ववादाश्रया, संख्या, सांख्ययोगसमुद्भवा, असंख्येया, अप्रमेयाख्या, शून्या, शुद्धकुलोद्भवा, बिन्दुनादसमुत्पत्ति, शम्भुवामा, शशिप्रभा, विसङ्गा, भेदरहिता, मनोज्ञा, मधुसूदनी, महाश्रीः (महाश्री) श्रीसमुत्पत्ति, तमःपारेप्रतिष्ठिता, त्रितत्त्वमाता, त्रिविधा, सुसूक्ष्मपदसंश्रया, शान्त्यतीता, मलातीता, निर्विकारा, निराश्रया, शिवाख्या, चित्तनिलया, शिवज्ञानस्वरूपिणी, दैत्यदानवनिर्मात्री, काश्यपी, कालकल्पिका॥१७४-१८० ॥

शास्त्रयोनि, क्रियामूर्ति, चतुर्वर्गप्रदर्शिका, नारायणी, नरोद्भूति, कौमुदी, लिंगधारिणी, कामुकी, ललिता, भावा, परापरविभूतिदा, परान्तजातमहिमा, बडवा, वामलोचना, सुभद्रा, देवकी, सीता, वेदवेदाङ्गपारगा, मनस्विनी, मन्युमाता, महामन्युसमुद्भवा, अमृत्यु, अमृता, स्वाहा, पुरुहूता, पुरुष्टुता, अशोच्या, भिन्नविषया, हिरण्यरजतप्रिया॥१८१-१८४॥

हिरण्या, राजती, हैमी, हेमाभरणभूषिता, विभ्राजमाना, दुर्जेया, ज्योतिष्टोमफलप्रदा, महानिद्रासमुद्भूति, अनिद्रा, सत्यदेवता, दीर्घा, ककुद्मिनी, हृद्या, शान्तिदा, शान्तिवर्धिनी, लक्ष्म्यादिशक्तिजननी, शक्तिचक्रप्रवर्तिका, त्रिशक्ति-जननी, जन्या, षडूमिपरिवर्जिता, सुधामा, कर्मकरणी, युगान्तदहनात्मिका, संकर्षणी, जगद्धात्री, कामयोनि, किरीटिनी, ऐन्द्री, त्रैलोक्यनमिता, वैष्णवी, परमेश्वरी, प्रद्युम्नदयिता, दान्ता, युग्मदृष्टि, त्रिलोचना ॥ १८५-१८९ ॥

मदोत्कटा, हंसगति, प्रचण्डा, चण्डविक्रमा, वृषावेशा, वियन्माता, विन्ध्यपर्वतवासिनी, हिमवन्मेरुनिलया, कैलासगिरिवासिनी, चाणूरहन्तृतनया, नीतिज्ञा, कामरूपिणी, वेदविद्याव्रतस्नाता, धर्मशीला, अनिलाशना, वीरभद्र-प्रिया, वीरा, महाकालसमुद्भवा, विद्याधरप्रिया, सिद्धा, विद्याधरनिराकृति, आप्यायनी, हरन्ती, पावनी, पोषणी, खिला, मातृका, मन्मथोद्भूता, वारिजा, वाहनप्रिया, करीषिणी, सुधावाणी, वीणावादनतत्परा, सेविता, सेविका, सेव्या, सिनीवाली, गरुत्मती, अरुन्धती, हिरण्याक्षी, मृगाङ्का, मानदायिनी, वसुप्रदा, वसुमती, वसोर्धारा, वसुंधरा, धाराधरा, वरारोहा, वरावरसहस्रदा ॥ १९०-१९६॥

श्रीफला, श्रीमती, श्रीशा, श्रीनिवासा, शिवप्रिया, श्रीधरा, श्रीकरी, कल्या, श्रीधरार्धशरीरिणी, अनन्तदृष्टि, अक्षुद्रा, धात्रीशा, धनदप्रिया, दैत्यसंघानां निहन्त्री (दैत्यसंघनिहन्त्री), सिंहिका, सिंहवाहना, सुषेणा, चन्द्रनिलया, सुकीर्ति, छिन्नसंशया, रसज्ञा, रसदा, रामा, लेलिहाना, अमृतस्रवा, नित्योदिता, स्वयंज्योति, उत्सुका, मृतजीवनी, वज्रदण्डा, वज्रजिह्वा, वैदेही, वज्रविग्रहा, मङ्गल्या, मङ्गला, माला, मलिना, मलहारिणी, गान्धर्वी, गारुडी, चान्द्री, कम्बलाश्वतरप्रिया ॥ १९७-२०१॥

सौदामिनी, जनानन्दा, भृकुटीकुटिलानना, कर्णिकारकरा, कक्ष्या, कंसप्राणापहारिणी, युगंधरा, युगावर्ता, त्रिसंध्या, हर्षवर्धिनी, प्रत्यक्षदेवता, दिव्या, दिव्यगन्धा, दिवापरा ॥२०२-२०३॥

शक्रासनगता, शाक्री, साध्वी, नारी, शवासना, इष्टा, विशिष्टा, शिष्टेष्टा, शिष्टाशिष्टप्रपूजिता, शत-रूपा, शतावर्ता, विनता, सुरभि, सुरा, सुरेन्द्रमाता, सुद्युम्ना, सुषुम्ना, सूर्यसंस्थिता, समीक्ष्या, सत्प्रतिष्ठा, निवृत्ति, ज्ञानपारगा, धर्मशास्त्रार्थकुशला, धर्मज्ञा, धर्मवाहना ॥ २०४-२०६॥

धर्माधर्मविनिर्मात्री, धार्मिकाणां शिवप्रदा (धार्मिकोंका कल्याण करनेवाली), धर्मशक्ति, धर्ममयी, विधर्मा, विश्वधर्मिणी, धर्मान्तरा, धर्ममेघा, धर्मपूर्वा, धनावहा, धर्मोपदेष्ट्री, धर्मात्मा, धर्मगम्या, धराधरा, कापाली, शाकला, मूर्ति, कला, कलितविग्रहा, सर्वशक्तिविनिर्मुक्ता, सर्वशक्त्याश्रयाश्रया, सर्वा, सर्वेश्वरी, सूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा, ज्ञानरूपिणी, प्रधानपुरुषेशेशा, महादेवैकसाक्षिणी, सदाशिवा, वियन्मूर्ति, विश्वमूर्ति तथा अमूर्तिका-(के नामसे प्रसिद्ध) हैं ॥ २०७-२१०॥

इस प्रकार हजार नामोंसे (देवीकी) स्तुति करके वे भयभीत हिमवान् पर्वत पुनः प्रणाम कर हाथ जोड़ते हुए इस प्रकार बोले-॥२११॥

हे परमेश्वरि! यह जो आपका घोर ऐश्वर (विराट्)रूप है, उसे देखकर मैं इस समय भयभीत हो गया हूँ, आप अपना दूसरा (सौम्य) रूप मुझे दिखायें। उस

(हिमवान्) पर्वतके द्वारा ऐसा कहे जानेपर उन देवी पार्वतीने अपने उस विराट रूपको समेटकर दूसरा (सौम्य) रूप उन्हें दिखलाया ॥ २१२-२१३ ॥

 (देवीका वह रूप) नीले कमलदलके समान (नीलवर्णवाला), नीलकमलके समान सुगन्धियुक्त, दो नेत्र एवं दो भुजावाला, सौम्य, नीले अलकोंसे विभूषित, रक्तकमलके समान चरणतलवाला, सुन्दर लाल पल्लवके समान हाथवाला, श्रीयुक्त (वह रूप) विशाल एवं प्रशस्त ललाटपर लगे तिलकसे प्रफुल्लित (था)। (उसके) सभी अङ्ग अत्यन्त कोमल, सुन्दर तथा भूषणोंसे आभूषित थे। (उन देवीने) स्वर्णनिर्मित विशाल मालाको अपने वक्षःस्थलपर धारण कर रखा था। सुन्दर बिम्बफल के समान (रक्त) ओठ मन्द मधुर मुसकानयुक्त था। (चरणोंमें धारण किये) नूपुरोंसे ध्वनि निकल रही थी। (देवीका वह रूप) प्रसन्न मुखवाला तथा दिव्य एवं अनन्त महिमामें प्रतिष्ठित था॥२१४-२१७॥

पर्वतश्रेष्ठ हिमवान् देवीके इस प्रकारके (सौम्य)स्वरूप को देखकर भयका परित्यागकर प्रसन्न-मन होकर परमेश्वरी से कहने लगे- ॥ २१८॥

हिमवान् बोले-मेरा जन्म लेना आज सफल हो गया, आज मेरा तप सफल हो गया, जो मुझे अव्यक्तस्वरूपा आप प्रसन्न होकर दृष्टिगोचर हुई हैं। देवि! आपके द्वारा सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि हुई है, आपमें प्रधानादि प्रतिष्ठित हैं और आपमें ही (वह सब ) लीन भी हो जाता है। आप ही परम गति भी हैं। शिवके आश्रयमें रहनेवाली देवि! कुछ लोग आपको ही प्रकृति तथा प्रकृतिसे परे कहते हैं और दूसरे परमार्थको जाननेवाले आपको शिवा कहते हैं। आपमें प्रधान, पुरुष, ब्रह्मा तथा ईश्वर (प्रतिष्ठित हैं)। | (आपसे) अविद्या, नियति, माया और सैकड़ों कला आदिकी उत्पत्ति हुई है ॥ २१९-२२२ ॥

आप ही वह परमा शक्ति, अनन्ता और परमेष्ठिनी हैं। आप सभी भेदोंसे विनिर्मुक्त और सभी भेदोंके आश्रय एवं स्वयं प्रतिष्ठित हैं। हे योगेश्वरी! आपमें ही अधिष्ठित होकर महादेव महेश्वर प्रधान आदि सम्पूर्ण जगत्की रचना करते हैं और फिर (उसका) संहार करते हैं। आपके ही संयोगसे महादेव स्वात्मानन्द का उपभोग करते हैं। आप ही परमानन्द (रूपा) और आप ही आनन्द प्रदान करनेवाली हैं। आप अक्षर, परमव्योम, महान् ज्योति, निरञ्जन, कल्याणरूप, सर्वगत, सूक्ष्म एवं सनातन परम ब्रह्म हैं। देवि! आप सभी देवताओं में इन्द्र (रूप) और ब्रह्मज्ञानियोंमें ब्रह्मा (रूप) हैं। (आप) बलवानोंमें वायु (रूप) तथा योगियोंमें कुमारक (सनत्कुमार) हैं ॥ २२३-२२७॥

आप ऋषियोंमें वसिष्ठ, वेदविदोंमें व्यास हैं। सांख्यशास्त्रके जाननेवालोंमें कपिलदेव तथा रुद्रोंमें शंकर हैं। आप आदित्योंमें उपेन्द्र (विष्णु) तथा वसुओं में पावक हैं । वेदोंमें आप सामवेद तथा छन्दोंमें गायत्री छन्द हैं। विद्याओंमें अध्यात्मविद्या तथा गतियोंमें परम गति हैं। आप सभी शक्तियोंमें माया और संहार करनेवालों में काल (रूप) हैं। आप सभी गुह्योंमें ओंकार और वर्गों में

द्विजोत्तम हैं। आश्रमोंमें गृहस्थाश्रम तथा ईश्वरोंमें महेश्वर हैं ॥ २२८-२३१॥

पुरुषोंमें जो (उत्तम) पुरुष है और जो सभी प्राणियों के हृदयमें रहनेवाला है, वह एकमात्र आप ही हैं। देवि! आप सभी उपनिषदोंमें गुह्योपनिषत् कही जाती हैं। कल्पोंमें आप ईशानकल्प हैं और युगों में सत्ययुग हैं। सभी भ्रमण करनेवालों (ग्रह-नक्षत्रों आदि)-में आदित्य (सूर्य) तथा वाणियोंमें सरस्वती | देवी हैं। सुन्दर रूपवालोंमें आप लक्ष्मी और मायावियों में विष्णु हैं। आप पतिव्रताओंमें अरुन्धती तथा पक्षियों में गरुड हैं। आप सूक्तोंमें पुरुषसूक्त, सामगानोंमें ज्येष्ठ साम हैं। जपने योग्य मन्त्रों में सावित्री मन्त्र और यजुर्वेदके मन्त्रोंमें शतरुद्रिय आप ही हैं ॥ २३२-२३५ ॥

आप पर्वतोंमें महामेरु और सर्पोमें अनन्त (नाग) हैं। सभीमें आप परब्रह्म हैं, सब कुछ आपमें ही व्याप्त है। मैं आपके तमोगुणसे परे रहनेवाले उस सत्यरूप को नमस्कार करता हूँ जो समस्त कलाओंसे रहित, अगोचर, निर्मल, अद्वितीय, आदि, मध्य तथा अन्तरहित, अनन्त और आदिस्वरूप हैं। वेदान्तरूपी विज्ञानके अर्थ का निश्चय करनेवाले, जगत्के उत्पादक प्रणव नामवाले जिस अद्वितीय आनन्दका साक्षात्कार करते हैं, मैं उसी रूपकी शरण ग्रहण करता हूँ। (मैं) समस्त प्राणियों के भीतर रहनेवाले, प्रधान और पुरुषके संयोग तथा वियोगके कारण, उत्पत्ति एवं विनाशसे रहित तथा तेजोमय उस प्राण नामवाले रूपको प्रणाम करता हूँ॥ २३६-२३९॥

 (मैं) आदि तथा अन्तसे रहित, संसारके आत्मारूप, अनेक रूपोंमें स्थित, प्रकृतिसे परे रहनेवाले, कूटस्थ एवं अव्यक्त शरीर धारण करनेवाले पुरुष नामक आपके रूपको नमस्कार करता हूँ। मैं सभी के आश्रयरूप, सम्पूर्ण संसारका विधान करनेवाले, सर्वत्र व्याप्त, जन्म और मरणसे रहित, सूक्ष्म, विचित्र, त्रिगुणात्मक, प्रधानस्वरूप तथा अलुप्त भेदवाले आपके रूपको प्रणाम करता हूँ। देवि! आपका जो आद्य, महान्, पुरुषात्मक रूप है, जो प्रकृतिमें अवस्थित | है, त्रिगुणात्मक मूल बीजरूप है तथा ऐश्वर्य, विज्ञान और विराग-धर्मोंसे समन्वित है, मैं उसे नमस्कार करता हूँ। २४०-२४२॥

चौदह लोकात्मक, जलमें अवस्थित, विचित्र भेदवाले, परम पुरुषको ही अपना स्वामी स्वीकार करनेवाले, अनन्त प्राणियोंके निवासस्थान, उस जगदण्ड (ब्रह्माण्ड)-संज्ञक आपके रूपको मैं नमस्कार करता हूँ। (मैं) समग्र वेदरूप, अद्वितीय, आदि, अपने तेजसे. सम्पूर्ण संसारको व्याप्त करनेवाले, तीनों कालोंके कारण तथा सूर्यमण्डलमें प्रतिष्ठित परमेष्ठी नामवाले रूप को नमस्कार करता हूँ। जो हजारों सिरवाले हैं, अनन्त शक्ति-सम्पन्न हैं, हजारों हाथवाले हैं तथा जल के मध्यमें शयन करनेवाले हैं, मैं उन 'नारायण' नाम से प्रसिद्ध पुराणपुरुषके रूपको प्रणाम करता हूँ। (देवि!) आपका जो रूप भयंकर दाढ़वाला, देवताओंद्वारा सब प्रकारसे वन्दनीय, प्रलयकालीन अग्निके समान रूपवाला और सम्पूर्ण प्राणियोंके विनाशके लिये कारण रूप है, मैं उस काल नामवाले रूपको नमस्कार करता हूँ॥ २४३-२४६ ॥

(देवि!) मैं आपके शेष नामवाले उस रूप को प्रणाम करता हूँ, जो हजारों फणोंसे सुशोभित है, प्रधान-प्रधान नागराजोंसे पूजित है, जनार्दन नामसे शरीर धारण किये हुए है तथा प्रगाढ़ निद्रामें है। जिसका ऐश्वर्य अव्याहत (अबाधित) है, जिसके नेत्र विषम हैं, (जो तीन नेत्रोंसे युक्त है), जो ब्रह्मके अमृतरूपी आनन्द-रसको जाननेवाला है, अद्वितीय है, प्रलयकालमें स्थित रहनेवाला है और जो धुलोकमें नृत्य करता रहता है (देवि!) मैं आपके उस रुद्र नामवाले रूपको प्रणाम करता हूँ। देवि! (मैं) शोकसे सर्वथा शून्य, निर्मल, पवित्र, देवताओं तथा असुरोंसे पूजित चरणकमलवाले आपके अत्यन्त कोमल, विशाल एवं उज्ज्वल इस रूपको नमस्कार करता हूँ, बार-बार नमस्कार करता हूँ। महादेवि! आपको नमस्कार है, परमेश्वरि! आपको नमस्कार है। भगवती ईशानीको नमस्कार है, कल्याणरूपिणी आपको बार-बार नमस्कार है॥२४७-२५०॥

मैं आपसे व्याप्त हूँ, आप मेरे आधार हैं और आप ही मेरी गति हैं। परमेश्वरि ! मैं आपकी ही शरण ग्रहण करता हूँ, आप (मुझपर) प्रसन्न हों। मेरे समान संसारमें देवता या दानव कोई भी नहीं है, क्योंकि (मेरे) तपके कारण आप जगन्माता ही मेरी पुत्रीके रूपमें उत्पन्न हुई हैं ।। २५१-२५२॥

देवि! ये पितरोंकी कन्या मेना सम्पूर्ण संसार की नातास्वरूप आपकी माता हैं, अहो! पुण्यके गौरव का क्या कहना? अमरेशानि! आप मेनाके साथ मेरी सर्वदा क्षा करें। मैं आपके चरणकमलोंमें नमस्कार करता हूँ और आप कल्याणकारिणीकी शरणमें हूँ॥ २५३-२५४ ॥

अहो! महादेवीके (मेरे घर) आ जानेसे मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य हुआ। महादेवि! शंकरि! आप मुझे आज्ञा दें कि मैं क्या करूँ? ऐसा वचन कहकर वह गिरिराज हिमालय गिरिजाको देखते हुए एवं हाथ जोड़ते हुए उनके पास खड़े हो गये। जगत्की अरणि (मूल कारण)-रूप उस देवीने उनका (हिमवान्का) वचन सुनकर अपने पति पशुपति (शंकर) का स्मरणकर मधुर-मधुर मुसकराते हुए पिता (हिमवान्)से कहा- ॥ २५५-२५७॥

देवी बोलीं-गिरिश्रेष्ठ! ब्रह्मवादियोंद्वारा सेवित केवल ईश्वर को ज्ञात इस परम गुह्य उपदेश को सुनो। मेरे जिस सर्वशक्तिसम्पन्न, अनन्त, परम प्रेरक, अद्भुत एवं ऐश्वर्यसम्पन्न रूपको तुमने देखा है, शान्त एवं एकाग्रमन होकर, दम्भ और अहंकार का सर्वथा परित्यागकर, अत्यन्त निष्ठा रखकर, तत्परायण हो उसी (रूप)-की शरण ग्रहण करो। तात! अनन्य भक्तिपूर्वक मेरे श्रेष्ठ भावका आश्रय ग्रहणकर, सभी यज्ञ, तप, दान (आदि साधनों)-के द्वारा सदा उसी (रूप)-की अर्चना करो। मेरे उपदेशको मानकर मन से उसी (रूप)-को देखो, उसीका ध्यान करो और उसी का जप करो। अनघ! मैं तुम्हारे संसार ( (भवबन्धन) को विनष्ट कर दूंगी ॥ २५८-२६२ ॥

ऐश्वर-योगमें स्थित अपने भक्तोंका मैं इस संसार- सागर से शीघ्र ही उद्धार कर देती हूँ। गिरिश्रेष्ठ! मैं ध्यान, कर्मयोग, भक्ति तथा ज्ञानके द्वारा ही तुम्हारे लिये प्राप्य हूँ, दूसरे करोड़ों कर्मोंके द्वारा मुझे प्राप्त नहीं किया जा सकता। श्रुति तथा स्मृति-शास्त्रोंमें जो सम्यक् वर्णाश्रमकर्म (धर्म) बतलाया गया है, मुक्ति-प्राप्ति के लिये अध्यात्मज्ञानयुक्त उस (कर्म)-का निरन्तर आचरण करो। धर्मसे भक्ति उत्पन्न होती है और भक्तिसे परम (तत्त्व) प्राप्त होता है। श्रुति एवं स्मृतिद्वारा प्रतिपादित यज्ञादि कर्मको धर्म कहा गया है॥ २६३-२६६ ।।

धर्म किसी अन्यसे उत्पन्न नहीं होता, वेदसे ही धर्म निर्गत है। इसलिये धर्मार्थी एवं मुमुक्षुको चाहिये कि मेरे स्वरूपभूत वेदका आश्रय ग्रहण करे। मेरी ही यह 'वेद' नामवाली पुरातन परा शक्ति ऋक्, यजुष् तथा सामवेद के रूपमें सृष्टिके आदिमें प्रवर्तित होती है ॥ २६७-२६८॥

उन्हीं वेदोंकी रक्षाके लिये भगवान् ब्रह्माने ब्राह्मणादि को उत्पन्न कर अपने-अपने कर्मोंमें लगाया। ब्रह्माद्वारा बनाये गये उस (वेदविहित वर्णाश्रम) धर्मका जो पालन नहीं करते हैं, उनके लिये (ब्रह्माने) नीचे के लोकों में स्थित तामिस्त्र आदि नरकोंको बनाया है। धर्मका विधान करनेवाले अथवा धर्मको बतलानेवाले वेदको छोड़कर और अन्य कोई शास्त्र नहीं हैं। जो (वेदाभ्यासके अतिरिक्त) अन्यत्र मन लगाते हैं, द्विजातियोंके द्वारा वे सम्भाषण करने योग्य नहीं हैं। इस संसारमें श्रुति एवं स्मृति के विरुद्ध जो विविध शास्त्र देखे जाते हैं, निश्चय ही उनमें निष्ठा (विश्वास) रखना तमोगुणी (निष्ठा) है। जो कुत्सित शास्त्रोंके प्रभावको बतलाकर मनुष्योंको मोहित करते हैं, इस संसारमें उन लोगोंको मोहित करनेके लिये मैंने (ऐसे) शास्त्रोंको बनाया है ॥ २६९-२७४ ।।

वेद के अर्थको जाननेवाले श्रेष्ठ विद्वानों के द्वारा जिस कर्म को वेदसम्मत कहा गया है वही (कर्म) करणीय है और जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक उस कर्मको करते हैं, वे मुझे प्रिय हैं। प्राचीन कालमें विराट् (पुरुष) स्वायम्भुव | मनुने सभी वर्णोंपर अनुग्रह करनेके लिये मेरी ही आज्ञासे (भृगु आदि) मुनियोंसे धर्म (मनुस्मृति) कहा था। उनके मुखसे श्रेष्ठ धर्मका श्रवणकर अन्य मुनियों ने भी धर्मकी प्रतिष्ठाके लिये अन्य धर्मशास्त्रों (स्मृतियों) की रचना की। प्रलयकालमें उनके (धर्मशास्त्रोंके) अन्तर्हित हो जानेपर प्रत्येक युगमें वे महर्षिगण ब्रह्माके कहने पर पुनः उन शास्त्रोंकी रचना करते हैं ॥२७५-२७८ ॥

राजन्! ब्रह्माके आदेशसे व्यासजीने अठारह (महा-) पुराणोंको कहा है। उन (पुराणों)-में धर्म प्रतिष्ठित है। अन्य उपपुराण उन व्यासजीके शिष्योंद्वारा कहे गये हैं। यहाँ प्रत्येक युगमें इन सभी शास्त्रोंका कर्ता ही धर्मशास्त्रका ज्ञाता होता है। सत्तम! चार वेदोंसहित शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिषशास्त्र, न्यायविद्या, मीमांसा तथा उपबृंहण (इतिहास और पुराण)- ॥ २७९-२८१॥

इस प्रकार ये चौदह विद्यास्थान कहे गये हैं। इनके अतिरिक्त अन्यत्र धर्म विद्यमान नहीं है ॥ २८२॥

इस प्रकार मनु, व्यास आदि पितामह ब्रह्माके द्वारा निर्दिष्ट श्रेष्ठ धर्मको मेरे ही आदेश से प्रलयकाल पर्यन्त स्थापित करते । ब्रह्माकी आयु पूर्ण हो जानेपर प्रलय-काल उपस्थित होनेपर वे सभी पुण्यात्मा (व्यासादि) ब्रह्माके साथ ही परम पदमें प्रवेश करते हैं ॥ २८३-२८४॥

इसलिये धर्मके (परिज्ञानके) लिये सभी प्रकार के प्रयत्नसे वेदका आश्रय ग्रहण करना चाहिये, (इससे) धर्मसहित ज्ञान और परम ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है॥ २८५॥

जो सभी प्रकारकी आसक्तियोंका परित्याग कर अनन्यभावसे मेरी शरण ग्रहण कर लेते हैं, ईश्वर-सम्बन्धी योगमें स्थित होकर भक्तिपूर्वक सदा मेरी उपासना करते हैं, सभी प्राणियोंपर दया करते हैं, शान्त, जितेन्द्रिय, मात्सर्यरहित, मानरहित, बुद्धिमान् तपस्वी तथा व्रतपरायण हैं, मुझमें जिनका चित्त और प्राण लगा हुआ है, मेरे तत्त्व-वर्णनमें ही जो लगे हुए हैं ऐसे संन्यासी, गृहस्थ, वानप्रस्थ अथवा ब्रह्मचारी जो कोई भी हों, उन नित्य भक्तिमें लगे हुए भक्तोंके माया-तत्त्व से उत्पन्न सम्पूर्ण अन्धकारका ज्ञानरूपी दीपक के द्वारा मैं अविलम्ब ही विनाश कर देती हूँ। अद्वितीय ज्ञानके द्वारा जिनके अन्धकारका भलीभाँति विनाश हो गया है ऐसे ही मत्परायण (भक्त) सदा आनन्दित रहते हैं और संसार में बार-बार जन्म नहीं लेते ॥ २८६-२९० ॥

इसलिये सब प्रकारसे मेरे भक्त और मेरे परायण रहते हुए (तुम) मेनाके साथ सर्वत्र मेरी ही अर्चना करो। यदि तुम मेरे ऐश्वर्यसम्पन्न अव्यय-स्वरूप का ध्यान करनेमें असमर्थ हो तो मेरे आदिकाल स्वरूप कलात्मक रूपकी शरण ग्रहण करो। तात! मेरा जो-जो भी रूप आपके मनको अभीष्ट हो, उसीमें निष्ठा रखो और उसीके परायण होकर उसकी ही आराधना में संलग्न रहो॥ २९१-२९३ ॥

मेरा जो कलारहित, चिन्मात्र, अद्वितीय, कल्याणकारी, सभी उपाधियोंसे सर्वथा मुक्त, अनन्त, अमर एवं परमरूप है, वह परमपद एकमात्र ज्ञानके द्वारा बड़े ही कष्ट से प्राप्त किया जाता है। ज्ञानका साक्षात्कार करनेवाले लोग मुझमें ही प्रवेश करते हैं ॥ २९४-२९५ ।।

उसीमें (मेरे दिव्य रूपमें) बुद्धि रखनेवाले, उसी में अपने को लगानेवाले, उसीमें निष्ठा रखनेवाले तथा उसीके परायण और ज्ञानके द्वारा जिनके समस्त पाप विनष्ट हो गये हैं, वे सभी आवागमनके चक्रमें नहीं पड़ते अर्थात् मोक्षको प्राप्त करते हैं। राजेन्द्र ! मेरी शरण ग्रहण किये बिना परम निर्वाण,निर्मल पद प्राप्त नहीं होता, इसलिये मेरी शरण ग्रहण करो। महाराज! द्वैत या अद्वैत अथवा दोनों ही रूपोंसे मेरी उपासना कर तुम्हें उस पदकी प्राप्ति हो जायगी ॥ २९६-२९८॥

हे राजेन्द्र! बिना मेरा आश्रय लिये स्वभावसे ही निर्मल, उस शिवतत्त्वको जाना नहीं जा सकता, अतः मेरी शरण ग्रहण करो। इसलिये तुम नित्य, अक्षर स्वरूप एवं रूपरहित ईश्वर (तत्त्व)-की प्रयत्नपूर्वक आराधना करो। इससे (तुम) बन्धनसे मुक्त हो जाओगे। मन, वाणी तथा कर्मसे बड़े ही भावसे सर्वत्र शिवकी आराधना करो, इससे (तुम) उस पदको प्राप्त करोगे। मेरी मायासे मोहित (प्राणी) उस अनादि, अनन्त, अजन्मा, कल्याणकारी, परम महेश्वर, सभी प्राणियों के अन्तरमें निवास करनेवाले, सभीके आधार, निरञ्जन, नित्य आनन्दस्वरूप, निराभास, निर्गुण, अन्धकारसे परे, अद्वैत, अचल, कलारहित, निष्प्रपञ्च, स्वसंवेद्य, अज्ञेय तथा परमाकाशमें स्थित ब्रह्मसंज्ञक तत्त्वको नहीं जान पाते ॥ २९९-३०४॥

मेरी मायाद्वारा नित्य सूक्ष्म तमोगुणसे घिरे हुए प्राणी (इस) घोर संसारसागरमें बार-बार जन्म लेते हैं। राजन्! जन्मरूपी बन्धनकी निवृत्तिके लिये अनन्य भक्ति एवं सम्यक् ज्ञानके द्वारा उस ब्रह्मका अन्वेषण करना चाहिये। (राजन् ! जो) अहंकार, मात्सर्य, काम, क्रोध, संग्रह की प्रवृत्ति तथा अधर्माचरणमें रुचिका सर्वथा परित्याग कर अनासक्तभावमें स्थित रहते हैं और सभी प्राणियों में अपनेको एवं सभी प्राणियोंको अपनी अन्तरात्मामें स्थित देखते हैं, वे आत्माद्वारा अन्तरात्माका साक्षात्कार कर ब्रह्म को प्राप्त करनेके योग्य बन जाते हैं। सभी प्राणियों को अभय प्रदान करनेवाले तथा प्रसन्न मनवाले ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, अनन्यगामिनी परम ईश्वरभक्ति को प्राप्त कर लेते हैं। वे उस ऐश्वर्ययुक्त निष्कल ब्रह्मतत्त्व का साक्षात् करते हैं और समस्त संसारसे अनासक्त होते हुए एकमात्र ब्रह्ममें ही प्रतिष्ठित हो जाते हैं। ३०५-३१०॥

ये अद्वितीय, अपनी आत्माके आश्रय महेश्वर परमशिव ही अनन्त तथा अव्यय पर ब्रह्मकी प्रतिष्ठा-रूप हैं। राजन्! ज्ञानयोग, कर्मयोग अथवा भक्तियोगके द्वारा समस्त संसारसे मुक्ति प्राप्त करनेके लिये निरन्तर ईश्वर का आश्रय ग्रहण करो। पर्वतराज हिमालय! मैंने यह गुह्य उपदेश तुम्हें प्रदान किया है, इस सम्पूर्ण उपदेशपर विचारकर तुम जैसा चाहो वैसा करो॥३११-३१३।।

महादेव शंकर की निन्दा करनेवाले अपने पिता दक्ष की आलोचना कर देवताओंके द्वारा प्रार्थना करनेपर मैं परमेश्वरसे प्रादुर्भूत हुई हूँ। तुम्हारी आराधनाके कारण धर्मकी स्थापना करनेके लिये तुम्हें ही पिताके रूप में आश्रय बनाकर मैं मेनाकी देहसे उत्पन्न हुई हूँ। आप परमात्मा ब्रह्मदेवके निर्देशसे स्वयंवरके समय मुझे रुद्र को प्रदान करेंगे। राजन्! तात! उस सम्बन्धके कारण इन्द्रसहित सभी देवता आपको नमस्कार करेंगे तथा भगवान् शंकर भी आपसे प्रसन्न होंगे। इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नों के द्वारा मुझे ही ईश्वरकी विषयस्वरूपा (ईश्वरका सर्वस्व) समझो और शरण ग्रहण करने योग्य भगवान् शंकर की पूजाकर उनकी शरणमें जाओ॥३१४-३१८॥

भगवान् महादेवकी देवी (शंकरपत्नी)-के द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वे पर्वतराज हिमालय विनयपूर्वक प्रणामकर हाथ जोड़ते हुए पुनः महेश्वरीसे कहने लगे-महेशानि! आप मुझे परम माहेश्वर योगको विस्तारसे बतलाइये और ज्ञान तथा साधनोंसहित आत्मयोग को भी विस्तारपूर्वक बतलायें ।।३१९-३२०॥

(इसपर) भगवती पार्वतीने उन्हें वह परम ज्ञान, श्रेष्ठ आत्मयोग और उसकी प्राप्तिके साधनोंको भी विस्तारपूर्वक भलीभाँति बतलाया। जगजननीके मुखकमल से परम ज्ञान सुनकर वे लोकपूजित पर्वतराज हिमालय पुनः योगमें आसक्त हो गये। (कालान्तरमें हिमालय ने) ब्रह्माजीके आदेशसे देवताओं की संनिधिमें (अपने) सौभाग्यकी अभिवृद्धि समझते हुए साध्वी पार्वती को महेश्वरके लिये प्रदान किया॥ ३२१-३२३ ॥

जो व्यक्ति भगवान् शिवके सांनिध्यमें उनके भाव से भावित होकर पवित्रतापूर्वक देवीके माहात्म्य का वर्णन करनेवाले इस अध्यायका पाठ करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और दिव्य योग से समन्वित होकर ब्रह्मलोकको पारकर देवीके स्थान को प्राप्त करता है ।। ३२४-३२५॥

जो एकाग्रमन से ब्राह्मणों के समीप में देवी के इस (सहस्रनाम) स्तोत्रका पाठ करता है, वह सभी पापों से विमुक्त हो जाता है ॥ ३२६ ।।

देवी का जो एक सहस्र आठ नामवाला स्तोत्र बतलाया गया है, उसे जानकर सूर्यमण्डलमें स्थित परमेश्वरीकी भावना करते हुए गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा भक्तियोगपूर्वक उनकी अर्चना द्विजको करनी चाहिये और देवीके परम माहेश्वर श्रेष्ठ भावका अनन्य-मन से मरणपर्यन्त स्मरण करते हुए इस उपदिष्ट एक हजार आठ नामोंका नित्य जप करना चाहिये। ऐसा करने से द्विज अन्त-समयमें (देवीकी) स्मृति प्राप्तकर परब्रह्म को प्राप्त करता है॥३२७-३२९ ।।

अथवा वह विप्र ब्राह्मणोंके पवित्र कुलमें उत्पन्न होता है और पूर्वजन्मके संस्कारोंके प्रभावसे वह ब्रह्मविद्या को प्राप्त करता है। परमेश्वर-सम्बन्धी उस परम दिव्य योगको प्राप्तकर वह शान्त तथा सर्वत्र व्याप्त होते हुए शिवसायुज्यको प्राप्त करता है। (जो व्यक्ति प्रातः, मध्याह्न तथा सायं-) तीनों समय देवीके प्रत्येक नामसे हवन करता है, वह पूतना आदिद्वारा उत्पन्न (अरिष्ट) दोषों तथा ग्रहोंके दोषोंसे मुक्त हो जाता है॥ ३३०–३३२॥

अथवा लक्ष्मीप्राप्तिकी इच्छा करनेवाला द्विज विधिपूर्वक देवीकी पूजाकर और उनके पार्श्वभाग (समीप)-में तीन नेत्रवाले भगवान् शंकरकी पूजा करता है तथा एक वर्षतक आलस्यरहित होकर प्रतिदिन निरन्तर (देवीके सहस्रनामका) जप करता है, वह महादेव भगवान् शंकरकी कृपासे महालक्ष्मीको प्राप्त करता है। ३३३-३३४॥

इसलिये द्विजातियोंको सभी प्रकारके प्रयत्नोंके द्वारा सभी पापोंसे छुटकारा प्राप्त करनेके लिये देवीके सहस्र नाम का जप करना चाहिये। विप्रो! मैंने प्रसङ्गवश देवीका उत्तम माहात्म्य आप लोगोंसे कहा। अब इसके बाद आपलोग भृगु आदि महर्षियों की प्रजासृष्टि को सुनें ॥ ३३५-३३६ ॥