31 अध्याय

सूतजी बोले-मुनियोंसे इस प्रकार कहकर बुद्धिमान् (व्यासजी) देवाधिदेव त्रिशूली (भगवान् शंकर)के कपर्दीश्वर नामक अव्यय लिङ्गका दर्शन करने गये। ब्राह्मणो! वहाँ पिशाचमोचन तीर्थमें स्नानकर विधिपूर्वक पितरोंका तर्पणकर उन्होंने त्रिशूल धारण करनेवाले शंकरकी पूजा की॥ १-२॥

वहाँ गुरुदेव (व्यास)-के साथ उन मुनियोंने एक आश्चर्य देखा। उन्होंने इसे क्षेत्रका माहात्म्य समझा और गिरिश हर को प्रणाम किया। कोई भयंकर रूपवाला व्याघ्र एक मृगीका भक्षण करनेके लिये वहाँ श्रेष्ठ कपर्दीश्वरके समीपमें आया। भयभीत मनवाली वह मृगी वहाँ प्रदक्षिणा करते-करते दौड़ती हुई अत्यन्त व्याकुल हो जाने से व्याघ्रके वशीभूत हो गयी॥३-५॥

अपने तीक्ष्ण नखोंसे उसे विदीर्णकर वह महान् बलशाली व्याघ्र उन मुनियोंको देखकर दूसरे जनशून्य स्थानकी ओर चला गया। कपर्दीशके समक्ष ही मृत्युको प्राप्त वह बाल-अवस्थावाली मृगी आकाश में चमकते हुए सूर्यके समान प्रभावाली, महाज्वालारूपा, तीन नेत्रोंवाली, नीलकण्ठवाली, चन्द्रमासे सुशोभित मस्तकवाली और वृषभपर आरूढ़ तथा शिवके समान ही पुरुषोंसे समन्वित दिखलायी पड़ी। उसके मस्तक पर आकाशचारी (गन्धर्व आदि) फूलोंकी वर्षा कर रहे थे। तदनन्तर वह स्वयं गणेश्वर होकर तत्क्षण ही अदृश्य हो गयी। जैमिनि आदि प्रमुख द्विजोंने ऐसा महान् आश्चर्य देखकर अच्युतस्वरूप गुरु (व्यास)से कपर्दीश्वरका माहात्म्य पूछा ॥६-१० ॥

उन भगवान् व्यासने (कपर्दीश्वर) देवके समीप में बैठकर वृषभध्वजको प्रणाम करके कपर्दीश का माहात्म्य उन्हें बतलाया। यह देवका वही श्रेष्ठ कपर्दीश्वर

नामक लिङ्ग है, जिसका स्मरणमात्र करनेसे ही स्मरण करनेवालेका अशेष पापसमूह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥११-१२॥

वाराणसीमें निवास करनेवाले लोगों के काम, क्रोध आदि दोष और सभी विघ्न कपर्दीश्वरका पूजन करने से विनष्ट हो जाते हैं। इसलिये श्रेष्ठ कपर्दीश्वरका सदा ही दर्शन करना चाहिये, प्रयत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये और वैदिक स्तोत्रोंसे उनकी स्तुति करनी चाहिये। शान्त चित्तवाले योगियों को यहाँ नियमित ध्यान करते हुए छ: महीनेमें ही उत्कृष्ट योगसिद्धि प्राप्त हो जाती है, इसमें कोई संशय नहीं है॥१३-१५॥

यहाँ समीपमें स्थित पिशाचमोचन कुण्डमें स्नानकर इस लिङ्गका पूजन करनेसे ब्रह्महत्या आदि सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। ब्राह्मणो! प्राचीन कालमें शंकुकर्ण नाम से प्रसिद्ध कठोर व्रतवाले तपस्वीने इस क्षेत्र में शंकरको पूजा की थी। वह रात-दिन प्रणव एवं ब्रह्मस्वरूप रुद्रका जप करता था। निष्ठापूर्वक दीक्षा ग्रहण कर वह योगात्मा पुष्प, धूप आदिसे तथा स्तोत्र, नमस्कार एवं प्रदक्षिणाके द्वारा (पूजा करता हुआ) वहाँ रहने लगा। किसी दिन उसने भूखसे व्याकुल अस्थि एवं चर्मसे व्याप्त शरीरवाले और बार-बार साँस ले रहे एक आते हुए प्रेत को देखा। उसे देखकर उस श्रेष्ठ मुनिने अत्यन्त कृपासे युक्त होकर उससे कहा-आप कौन हैं? कहाँ से इस देशमें आये हैं ?॥१६-२०॥

क्षुधासे पीड़ित पिशाचने उससे कहा-पूर्वजन्ममें मैं धनधान्यसे सम्पन्न, पुत्र-पौत्रादिकोंसे युक्त, परिवार के भरण-पोषणमें उत्सुक रहनेवाला एक ब्राह्मण था, किंतु मैंने न तो कभी देवताओंकी पूजा की न गायों की और न तो अतिथियोंकी, मैंने कभी छोटे-से भी छोटा पुण्य नहीं किया। एक बारकी बात है कि वाराणसी में मैंने वृषभवाहन भगवान् विश्वेश्वरदेवका दर्शन किया, स्पर्श किया और उन्हें नमस्कार किया। तदनन्तर बहुत थोड़े ही समयके बाद मेरी मृत्यु हो गयी। हे मुने! (इसी पुण्यके कारण) मुझे यमके भयानक मुखको तो नहीं देखना पड़ा, पर इस प्रकारकी पिशाचयोनि प्राप्तकर भूख और प्याससे व्याकुल मैं वाराणसीमें ही भटक रहा हूँ। इस समय मुझे हित और अहितका कुछ भी ज्ञान नहीं है। प्रभो! मेरे उद्धारका यदि कोई उपाय आप देखते हों तो उसे करें, आपको नमस्कार है, मैं आपकी शरण में आया हूँ॥ २१-२६॥

ऐसा कहे जानेपर शंकुकर्णने पिशाचसे कहा-तुम्हारे समान इस संसारमें श्रेष्ठ पुण्य कर्म करनेवाला और कोई नहीं है, जो कि तुमने पूर्वकालमें विश्वेश्वर भगवान् शिवका दर्शन किया, उनका स्पर्श किया और वन्दना की, फिर संसारमें तुम्हारे समान और कौन हो सकता है? उस कर्मके परिणामस्वरूप ही तुम इस स्थानपर पहुँचे हो। अब तुम एकाग्रमन होकर इस कुण्ड में शीघ्र ही स्नान करो। जिससे इस कुत्सित (पिशाचकी) योनि से तुम शीघ्र ही छुटकारा प्राप्त कर सको॥ २७-२९॥

दयालु मुनिके ऐसा कहनेपर उस पिशाचने देवश्रेष्ठ त्रिलोचन, अनुशास्ता भगवान् कपर्दीश्वर का स्मरण कर मनको एकाग्र करते हुए (कुण्डमें) स्नान किया ॥३०॥

तदनन्तर स्नान किया हुआ वह मुनिके समीप ही मृत्युको प्राप्त हो गया और पुनः सूर्यके समान प्रकाशित विमानमें स्थित हो वह दिव्य आभूषणों को धारण किये तथा चन्द्रमाके चिह्नसे सुशोभित सुन्दर मस्तकसे युक्त (पुरुषके रूपमें) दिखायी पड़ा। वह आकाशमें स्थित रहनेवाले रुद्रों, अप्रमेय योगियों तथा बालखिल्य आदि ऋषियोंसे चारों ओरसे आवृत होते हुए उसी प्रकार सुशोभित हो रहा था, जिस प्रकार सभी देवताओंके भी देवता सूर्यदेवता उदयकाल में दिखलायी पड़ते हैं ॥ ३१-३२॥

आकाशमें सिद्ध तथा देवताओंके समूह (उसकी) स्तुति कर रहे थे। दिव्य सुन्दर अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं और गन्धर्व, विद्याधर तथा किंनर आदि जल से स्निग्ध पुष्पोंकी वृष्टि कर रहे थे॥ ३३ ॥

मुनियोंके समूहोंसे स्तुति किये जाते हुए उसने भगवान्की कृपासे ज्ञान प्राप्त किया और वह उस त्रयीमय श्रेष्ठ मण्डलमें प्रविष्ट हो गया जहाँ रुद्र प्रकाशित होते हैं। पिशाचयोनिको प्राप्त उस (पुरुष) को मुक्त हुआ देखकर वह मुनि अत्यन्त प्रसन्न-मन से महेशका ध्यानकर और कवि अद्वितीय रुद्राग्नि को प्रणामकर उन जटाधारी (शिव) की स्तुति करने लगे-॥३४-३५॥

शंकुकर्णने कहा-मैं परात्पर, अद्वितीय, सबके रक्षक, पुराणपुरुष, योगेश्वर, नियामक, आदित्य, अग्नि रूप एवं कपिल (वृषभ)-पर अधिष्ठित आप कपर्दी की शरण ग्रहण करता हूँ॥ ३६॥

मैं हृदयमें संनिविष्ट, हिरण्मय, योगी, आदि एवं अन्तरूप, धुलोकमें स्थित, महामुनि, पवित्र और ब्रह्मस्वरूप आप ब्रह्मपार रुद्रकी शरणमें जाता हूँ। मैं हजारों चरण, नेत्र और सिरोंसे युक्त, हजारों बाहुवाले, अन्धकारसे परे रहनेवाले, हिरण्यगर्भ के अधिपति और तीन नेत्रवाले आप ज्ञानातीत शम्भु को प्रणाम करता हूँ। जिनसे संसारकी उत्पत्ति तथा विनाश होता है और जिन शिवने इस सम्पूर्ण (विश्व) को आवृत कर रखा है, उन्हीं ज्ञानातीत भगवान् ईशको प्रणाम कर मैं उनकी नित्य शरण ग्रहण करता हूँ। मैं अलिङ्ग-(निराकार) और आलोकरहित रूप वाले, स्वयं प्रभावान्, चित्-शक्ति के स्वामी, अद्वितीय रुद्ररूप, ज्ञानसे अतीत आप परमेश्वरको नमस्कार करता हूँ, क्योंकि आपसे भिन्न अन्य कुछ है ही नहीं॥३७-४०॥

सबीज योग (सविकल्पक समाधि)-का त्याग करनेवाले परमार्थभूत योगिजन निर्विकल्पक समाधि लगाकर आपके जिस रूपका दर्शन करते हैं, मैं आपके उसी ज्ञानातीत स्वरूपको नित्य प्रणाम करता हूँ। जिनमें न तो किसी नाम (तथा रूप) आदि विशेष (गुणों)-की कोई कल्पना है और जिनका न कोई स्वरूप दिखलायी पड़ता है, प्रणामपूर्वक उन ब्रह्मपार स्वयम्भूको शरणमें मैं जाता हूँ। वैदिक सिद्धान्तोंके अनुगामी आपके जिस स्वरूपको विदेह, ब्रह्मविज्ञानमय, अभेदरूप (अद्वितीय)-इन अनेक प्रकारोंसे जानते हैं, आपके उस ब्रह्मपार स्वरूप को मैं नित्य प्रणाम करता हूँ। जिसके प्रधान (प्रकृति) और पुराण पुरुष विवर्त (परिणाम) हैं तथा देवता जिसे प्रणाम करते हैं, उस ज्योतिमें संनिविष्ट ज्योतिर्मय आपके बृहत् काल-स्वरूपको मैं नमस्कार करता हूँ। मैं सनातन गुहेशकी* शरणमें जाता हूँ। मैं स्थाणु, गिरिश पुरारिके शरणागत हूँ, मैं चन्द्रमौलि हर, शिव की शरण ग्रहण करता हूँ। मैं पिनाक धारण करनेवाले आपकी शरणमें जाता हूँ॥ ४१-४५ ॥

इस प्रकार भगवान् कपर्दीकी स्तुति कर श्रेष्ठ ओंकार का उच्चारण करता हुआ वह शंकुकर्ण दण्डवत् भूमिपर गिर पड़ा। उसी क्षण ज्ञान और आनन्दस्वरूप, अद्वितीय, करोड़ों प्रलयकालीन अग्निके समान, शिवात्मक श्रेष्ठ लिङ्ग प्रादुर्भूत हुआ। तब मुक्त आत्मावाला, तादात्म्यस्वरूपवाला, सर्वव्यापी, विशुद्ध हुआ वह शंकुकर्ण निर्मल लिङ्गमें विलीन हो गया। यह एक अद्भुत-सी बात हुई ।। ४६-४८॥

यह मैंने आप लोगोंको कपर्दीका रहस्य एवं माहात्म्य बतलाया। इसे कोई नहीं जानता। विद्वान् भी इस विषयमें अज्ञानसे मोहित हो जाते हैं। जो भक्त पापका नाश करनेवाली इस कथाको नित्य सुनता है, वह पापसे विमुक्त शुद्धात्मा होकर रुद्रकी समीपता को प्राप्त कर लेता है-॥ ४९-५०॥

और जो मनुष्य नित्य प्रातः एवं मध्याह्नकाल में शुद्धतापूर्वक इस ब्रह्मपार नामक महान् स्तवका पाठ करेगा, वह परम योगको प्राप्त कर लेगा ॥५१॥

'मैं यहीं नित्य निवास करूँगा, देवदेव कपर्दी का दर्शन करूँगा और त्रिशूल धारण करनेवाले देवकी निरन्तर पूजा करता रहूँगा।' ऐसा कहकर शिष्योंके साथ युक्तात्मा महामुनि व्यासने कपर्दीकी पूजा करते हुए वहीं निवास किया॥५२-५३॥