15 अध्याय

व्यासजीने कहा-द्विजो! द्विजोत्तमको चाहिये कि वह एक वेद, दो वेद (तीन) वेद अथवा वेदों का अध्ययन कर और वेदके अर्थका ज्ञान प्राप्तकर स्नान (संस्कार-विशेष- समावर्तन) करे। गुरुको दक्षिणा निवेदित कर उनकी आज्ञासे स्नान (समावर्तन) करे। व्रत (ब्रह्मचर्यव्रत) पूर्णकर उसके फलस्वरूप शक्ति- सम्पन्न युक्तात्मा द्विज स्नान (समावर्तन)-का अधिकारी

होता है॥१-२॥

 (स्नातकको) बाँसकी छड़ी, कौपीन, धोती तथा उत्तरीय वस्त्र (चद्दर), दो यज्ञोपवीत, जलपूर्ण कमण्डलु, छाता, सुन्दर स्वच्छ पगड़ी, खड़ाऊँ, जूता, दो स्वर्णकुण्डल और वेद (कुशमुष्टि) धारण करना चाहिये तथा केश और नखोंको कटवाकर स्वच्छ रहना चाहिये ॥३-४॥

(स्नातकको) नित्य स्वाध्याय करना चाहिये। केशकलापसे बाहर माला नहीं धारण करनी चाहिये। सोनेकी मालाको छोड़कर ब्राह्मणको रक्तवर्णकी माला धारण नहीं करनी चाहिये ॥५॥

उसे नित्य सफेद एवं स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिये तथा सुगन्धित द्रव्य-इत्र आदि धारणकर सदा सुगन्धयुक्त एवं सुवेशसे प्रियदर्शन होना चाहिये। धन रहनेपर पुराना और मैला वस्त्र धारण नहीं करना चाहिये। उद्वेगजनक अधिक लाल और दूसरोंद्वारा प्रयोग किया हुआ वस्त्र, कमण्डलु, जूता, माला तथा खड़ाऊँ नहीं धारण करना चाहिये। इसी प्रकार उसे (स्नातकको) दूसरे द्वारा (प्रयुक्त) यज्ञोपवीत, अलङ्कार, कुश और कृष्णमृगचर्मको धारण नहीं करना चाहिये। अपसव्य नहीं रहना चाहिये, उसे विकृत (कटे-फटे) वस्त्रोंको धारण नहीं करना चाहिये॥६-८॥

अपने समान (कुलके अनुरूप) शुभ, अच्छे रूप और लक्षणोंसे सम्पन्न, योनि-सम्बन्धी दोषोंसे रहित पत्नीको विधिपूर्वक ग्रहण करना चाहिये। ब्राह्मण (द्विज)- को अपनी माताके गोत्रमें जो उत्पन्न न हो तथा जो अपने आर्ष गोत्रमें उत्पन्न न हो, ऐसी शील और सदाचारसे

सम्पन्न भार्याको ग्रहण करना चाहिये ॥९-१०॥

पुत्रके उत्पन्न होनेतक ऋतुकालमें अपनी स्त्रीसे सहवास करना चाहिये, किंतु निषिद्ध दिनोंका प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये। षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी, चतुर्दशी, पूर्णिमाको और इसी प्रकार जन्मदिनसे तीन दिनपर्यन्त सदा ब्रह्मचर्य धारण करना चाहिये ॥ ११-१२ ॥

आवसथ्य (संस्कार-विशेषसे संस्कृत स्मार्त अग्नि) नामक अग्निकी स्थापना कर उसमें प्रतिदिन हवन करना चाहिये और नित्य पवित्र व्रतोंका पालन करना चाहिये। वेदमें बतलाये गये अपने कर्मोंको नित्य आलस्यरहित होकर करना चाहिये। इन्हें न करनेपर (स्नातक) शीघ्र

ही अत्यन्त भयंकर नरकोंमें गिरता है॥१३-१४॥

प्रयत्नपूर्वक वेदोंका अभ्यास करे। (पञ्च) महायज्ञोंका परित्याग न करे। अपने गृह्यसूत्रोंमें प्रतिपादित कर्मोको करे और संध्योपासन कर्म करे ॥ १५ ॥

अपने समान अथवा श्रेष्ठ व्यक्तिसे मित्रता करे। ईश्वरकी आराधना करे। देवताओंकी भी पूजा करे और अपनी भार्याका भलीभाँति पोषण करे। विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि (अपने द्वारा अनुष्ठित) धर्मका वर्णन न करे और न अपने द्वारा किये गये पापको ही छिपाये। आत्मकल्याणका प्रयत्न करे और सदैव सभी प्राणियोंपर दया करे। अपनी अवस्था, कर्म, सम्पत्ति, ज्ञान और कुलके अनुसार सदा वेष धारण करे तथा संयत-वाणी और बुद्धिसे यथोचित आचरण करते हुए लौकिक व्यवहारका निर्वाह करे। वेदों तथा धर्मशास्त्रोंमें जो कहा गया हो और जो सत्पुरुषोंसे भलीभाँति अनुष्ठित हो, उसी सदाचारका पालन करना चाहिये। इसके अतिरिक्त कभी भी दूसरे आचारका पालन नहीं करना चाहिये॥१६-१९॥

यदि शास्त्रोंसे अपने मार्गका निर्धारण करनेमें किसी कारण असामर्थ्य हो तो (शास्त्रोक्त) जिस मार्गसे माता-पिता गये हों और पितामह आदिने जिस मार्ग का अवलम्बन किया हो, उसी मार्गका स्वयं भी अनुसरण करना चाहिये। यही सज्जनोंका मार्ग है। इस मार्गका अवलम्बन करनेवालेका पतन नहीं होता ॥२०॥

नित्य स्वाध्यायपरायण रहे, नित्य यज्ञोपवीत धारण किये रहे। सत्य बोलनेवाला एवं क्रोधपर विजय प्राप्त करनेवाला, ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। नित्य स्नान और संध्या करनेवाला, ब्रह्मयज्ञ (स्वाध्याय)-परायण रहनेवाला, असूयारहित, मृदु तथा जितेन्द्रिय गृहस्थ परलोकमें अभ्युदय प्राप्त करता है। राग, भय और क्रोधसे रहित, लोभ एवं मोहसे शून्य, गायत्रीके जपमें तत्पर रहनेवाला और श्राद्ध करनेवाला गृहस्थ मुक्त हो जाता है। माता, पिता, गौ और ब्राह्मणके हित करनेमें निरत रहनेवाला, जितेन्द्रिय, यजन करनेवाला तथा देवताओंका भक्त ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। निरन्तर (धर्म, अर्थ एवं कामरूप) त्रिवर्गका पालन और देवताओंका पूजन करना चाहिये तथा प्रयत्नपूर्वक नित्य देवताओंको नमस्कार करना चाहिये ॥ २१-२५॥

अपनी सम्पत्तिका (शास्त्रानुसार यथायोग्य) सदा विभाग करनेवाला', क्षमावान्, दयायुक्त व्यक्ति ही गृहस्थ कहलाता है। केवल गृहमें रहनेसे कोई गृहस्थ नहीं कहलाता। क्षमा, दया, विशिष्ट ज्ञान (लौकिक एवं शास्त्रीय ज्ञान), सत्य, दम, शम और अध्यात्मज्ञानमें निरत होना-यह ब्राह्मणका लक्षण है। यथाशक्ति (विहित) कर्मोको करते हुए निन्दित कर्मोंका परित्याग

करना चाहिये ॥ २६-२८॥

विशेषरूपसे श्रेष्ठ द्विजको इस सम्बन्धमें प्रमाद नहीं करना चाहिये। मोहरूपी कल्मषको धोकर और श्रेष्ठ योगको प्राप्तकर गृहस्थ बन्धनसे मुक्त हो जाता है। इसमें संशय नहीं करना चाहिये। दूसरेके क्रोधसे उत्पन्न अपनी निन्दा, अनादर, दोषारोपण, हिंसा, बन्धन और ताड़नस्वरूप दोषोंको सहना ही क्षमा है॥ २९-३०॥

सौहार्दवश अपने दुःखके समान ही दूसरोंके दुःखमें उनके प्रति करुणाभावको मुनियोंने 'दया' इस नामसे कहा है। यह धर्मका साक्षात् साधन है। चौदहरे विद्याओंको यथार्थरूपसे धारण करनेको ही विज्ञान समझना चाहिये। इससे धर्मकी वृद्धि होती है। विधिपूर्वक विद्याको ग्रहण कर लेने और उसके अर्थको भलीभाँति जान लेनेपर भी यदि (कोई व्यक्ति) धर्म-कार्योंसे निवृत्त (विरत) रहता है, उन्हें नहीं करता तो उसका वह (अध्ययन) विज्ञान नहीं कहलाता है ॥ ३१-३३ ॥

सत्यके आचरणसे लोकोंपर विजय प्राप्त होती है, सत्य ही वह (सर्वोच्च) परमपद है। जो जैसा है उसका उसी रूपमें कथन ही मनीषियोंने सत्य कहा है। शरीरका उपरम (शरीरकी चेष्टाओंका नियन्त्रण अर्थात् इन्द्रियोंका निग्रह) दम है और शम (मनका नियन्त्रण) प्रज्ञा (प्रकृष्ट ज्ञान)-के विशद अवभाससे उत्पन्न होता है। अध्यात्म (आत्म-सम्बन्धी) ज्ञानको ही अविनश्वर तत्त्व समझना चाहिये जहाँ पहुँचनेपर शोक नहीं होता॥३४-३५॥

जिस विद्याके द्वारा वे परात्पर देवाधिदेव साक्षात् भगवान् महादेव जाने जाते हैं, उसे ही ज्ञान कहा गया है। उनमें निष्ठा रखनेवाला, उनके परायण रहनेवाला, कभी भी क्रोध न करनेवाला, पवित्र, (पञ्च) महायज्ञोंको करनेवाला विद्वान् विप्र उस श्रेष्ठ तत्त्वको प्राप्त करता है। धर्मके आयतन इस शरीरका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये। बिना देहके मनुष्य उस परात्पर रुद्रको नहीं जान सकता। नियत (संयत) द्विजको नित्य धर्म, अर्थ एवं कामकी साधनामें लगे रहना चाहिये। धर्मसे रहित काम अथवा अर्थका मनसे भी स्मरण नहीं करना चाहिये। धर्मके पालनमें कष्ट पाते हुए भी (उसका परित्यागकर) अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये। धर्मदेवता ही सभी प्राणियोंके भगवान् और गति हैं। (इसलिये) प्राणियोंका प्रिय करनेवाला बनना चाहिये। दूसरोंसे द्रोह करनेकी बुद्धिवाला नहीं होना चाहिये। वेदकी तथा देवताओंकी निन्दा नहीं करनी चाहिये और (जो इनकी निन्दा करता है) उसके साथ रहना (भी) नहीं चाहिये ॥ ३६-४१॥

जो विप्र पवित्रतापूर्वक नित्य इस धर्माध्याय का अध्ययन, अध्यापन अथवा उपदेश करता है, वह ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ४२ ॥