10 अध्याय

ईश्वरने कहा-अलिङ्ग (चिह्नरहित), अद्वितीय, अव्यक्त, लिङ्गको ब्रह्म कहा गया है। वह स्वयं प्रकाशरूप परम तत्त्व परम व्योममें अवस्थित है। जो निर्गुण, विशुद्ध विज्ञानरूप, अक्षर और अव्यक्त कारण-रूप है, उस परमपदका विद्वान् लोग साक्षात्कार करते हैं। जिसे वेद में तल्लिङ्ग अर्थात् हेतुरूप कहा गया है, उस परम ब्रह्मका शान्तसंकल्पवाले, तत्परायण और नित्य उनके भावसे भावित लोग साक्षात्कार करते हैं ॥१-३॥

मुनिश्रेष्ठो! अन्य किसी प्रकार मेरा दर्शन नहीं हो सकता। ऐसा कोई भी ज्ञान नहीं है, जिससे उस परम तत्त्वको जाना जा सके। इस परम ज्ञानको केवल विद्वान् ही जानते हैं। इसके अतिरिक्त सभी कुछ अज्ञानस्वरूप है, जिससे यह मायामय जगत् (उत्पन्न) है॥ ४-५॥

जो निर्मल, सूक्ष्म, निर्विकल्प तथा अव्यय ज्ञान है, वही मेरा आत्मरूप है-ऐसा विद्वानोंका कहना है। जो उसे (उस परम तत्त्वको) अनेक रूपसे देखते हैं, वे भी परम निष्ठा (भक्ति)-का आश्रय ग्रहणकर अद्वितीय अविनाशी तत्त्वका ज्ञान प्राप्तकर उसी परम तत्त्वको देखते हैं॥६-७॥

और जो दूसरे लोग पुनः एक या अनेक रूपोंमें परम तत्त्वरूप ईश्वरका भक्तिद्वारा साक्षात्कार करते हैं, उन्हें तदात्मक अर्थात् उस ब्रह्मका स्वरूप ही जानना चाहिये॥८॥

वे वस्तुतः नित्यानन्दस्वरूप, निर्विकल्प तथा सत्यस्वरूप साक्षात् परमेश्वरको अपनी आत्मामें देखते हैं यह वस्तुस्थिति है। अपने अव्यक्त परम आत्मामें अवस्थित शान्त (योगीजन), श्रेष्ठ परम तत्त्वके परमानन्द- स्वरूप, सर्वव्यापी तदात्मक तत्त्वकी उपासना करते हैं। यही परम मुक्ति है, विद्वान् इसे मेरा उत्तम सायुज्य (नामक मोक्ष), निर्वाण ब्रह्मके साथ ऐक्य और कैवल्यरूपसे जानते हैं। ये परम शिव आदि, मध्य और अन्तसे रहित अद्वितीय तत्त्व हैं। ये ही महादेव हैं, ईश्वर हैं, इसलिये इन्हें जाननेसे मुक्ति मिल जाती है॥९-१२॥

वहाँ (परम तत्त्व परमेश्वरमें) न सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा, न नक्षत्र, न अग्नि और न ही विद्युत् । उसीके प्रकाशसे सम्पूर्ण (विश्व) प्रकाशित होता है। वह नित्य प्रकाश अचल एवं सद्पसे प्रकाशित होता है। जो परम बृहत् विशुद्ध तत्त्व निर्विकल्प ज्ञानस्वरूप और नित्य उदित हुआ ज्ञानसे ही प्रकाशित होता है, उसीमें ब्रह्मज्ञानी लोग जिस नित्य अचल तत्त्वका दर्शन करते हैं, वही ईश हैं। १३-१४ ॥

सभी वेद पुरुषको नित्य आनन्दरूप, अमृतरूप और विशुद्ध सत्यस्वरूप कहते हैं। वेदार्थका निश्चय किये हुए लोग 'ॐ' इस प्रणवके द्वारा उस नियामक का ध्यान करते हैं। परम आकाशके मध्यमें एकमात्र अद्वितीय देव शिव ही प्रकाशित होते हैं; वहाँ न भूमि है, न जल है, न मन है और न अग्नि ही है। इसी प्रकार प्राण, वायु, आकाश, बुद्धि तथा अन्य कोई चेतन-तत्त्व वहाँ नहीं है॥ १५-१६ ॥

यह मैंने सभी वेदोंमें निहित परम रहस्यमय ज्ञानरूपी अमृतका वर्णन किया। किसी निर्जन प्रदेश में निरन्तर प्रयत्नपूर्वक साधना करनेवाला योगी ही इस ज्ञानको जानता है॥१७॥