29 अध्याय

ऋषियोंने कहा-(सूतजी!) महाबुद्धिमान् कृष्ण-द्वैपायन (व्यास) मुनिने दिव्य वाराणसीपुरीमें पहुंचकर क्या किया? इस विषयको सुननेके लिये हम लोगों को कौतूहल है॥१॥

सूतजी बोले-दिव्य वाराणसीमें पहुँचकर महा-मुनि ने गङ्गामें आचमनकर (स्नानकर) विश्वेश्वर देव शिवका पूजन किया। उन मुनि (व्यासजी)-को आया देखकर वहाँ निवास करनेवाले मुनियोंने मुनिश्रेष्ठ व्यासकी पूजा की। उन सभीने महादेवसे सम्बद्ध पापोंका नाश करनेवाली पुण्यदायिनी कथा तथा सनातन मोक्ष धर्मों को विनयपूर्वक पूछा। सर्वज्ञ उन भगवान् (व्यास) ऋषिने भी देवाधिदेव (शिव)-का माहात्म्य तथा वेदमें निर्दिष्ट धर्मोंका वर्णन किया। उन मुनियों के मध्य व्यासके शिष्य महामुनि जैमिनिने व्यासजी से सनातन गूढ अर्थ पूछा ॥२-६॥

जैमिनिने कहा-भगवन् ! एक संशयको आप यथार्थ रूप से दूर करें, क्योंकि आप परम ऋषि को कुछ भी अविदित नहीं है। कुछ लोग ध्यान की प्रशंसा करते हैं, कुछ दूसरे धर्मकी ही प्रशंसा करते हैं। अन्य लोग सांख्य तथा योगको, कुछ महर्षि तपको, कोई ब्रह्मचर्य को और दूसरे महर्षि मौन धारणको, कुछ अहिंसा एवं सत्यको तथा कुछ विद्वान् संन्यासको श्रेष्ठ बताते हैं। कुछ लोग दयाकी प्रशंसा करते हैं तो कुछ दान तथा अध्ययनकी। इसी प्रकार कुछ तीर्थयात्राको तथा दूसरे लोग इन्द्रियनिग्रहको महत्त्व देते हैं। मुनिश्रेष्ठ! इनमें से बतलायें कि कौन सर्वाधिक श्रेष्ठ है अथवा अन्य भी यदि कोई गुह्य साधन हो तो उसे आप बतलायें ।।७-११॥

जैमिनि की बात सुनकर वे कृष्ण द्वैपायन मुनि वृषभध्वज (शंकर)-को प्रणाम करते हुए गम्भीर वाणीमें बोले- ॥१२॥

भगवान् (व्यास)-ने कहा-महाभाग्यशाली मुने! आप धन्य हैं, धन्य हैं। आपने जो पूछा है, मैं उस गुह्यतमसे भी गुह्य (तत्त्व)-को कहता हूँ, अन्य सभी महर्षि भी सुनें-॥१३॥

अज्ञानी लोग जिससे द्वेष करते हैं और सूक्ष्मदर्शी जिसका सेवन करते हैं, वह गूढ सनातन ज्ञान प्राचीन कालमें ईश्वर (शंकर)-के द्वारा कहा गया है। जो श्रद्धारहित हो, परमेष्ठी (शंकर)-का भक्त न हो और वेदसे द्वेष रखता हो, ऐसे व्यक्तिको सभी ज्ञानोंमें उत्तम इस शुभ ज्ञानको नहीं प्रदान करना चाहिये। प्राचीन कालमें मेरु-शिखरपर भगवान् शंकरके साथ एक ही आसनपर स्थित देवी पार्वतीने त्रिपुरारि देव, ईशान महादेवसे पूछा- ॥ १४–१६ ॥

देवीने कहा-देवाधिदेव महादेव! आप भक्तों के कष्टको दूर करनेवाले । पुरुष किस प्रकार शीघ्र ही आप देवका दर्शन कर सकता है? कामदेवका विनाश करनेवाले शंकर! लोकमें सांख्ययोग, ध्यान, वैदिक कर्मयोग और अन्य भी अनेक अधिक परिश्रमसाध्य (उपाय) बतलाये गये हैं। (उनमें) जो ब्रह्मा आदि द्वारा सेवित उपाय या अत्यन्त गुह्य एवं गूढ ज्ञान हो, उसे आप हम सभी भक्तोंके कल्याणके लिये बतलायें, जिससे भ्रान्तचित्तवालों अथवा कर्मयोगी मनुष्यों एवं समस्त देहधारियोंको सूक्ष्म भगवान्का दर्शन हो सके। १७–२०॥

ईश्वर बोले-परम ऋषियों ने जिस विज्ञान को कहा है, अज्ञानियोंने जिस ज्ञानका विरोध किया है और जो अकथनीय है, उसे मैं तत्त्वतः तुमसे कहता हूँ। पुरी वाराणसी मेरा परम गुह्यतम क्षेत्र है। यह सभी प्राणियों को संसार सागर से पार उतारनेवाली है। महादेवि! यहाँ मेरे व्रतको धारण करनेवाले भक्त तथा श्रेष्ठ नियमका आश्रय ग्रहण करनेवाले महात्मा निवास करते हैं। यह मेरा अविमुक्त (काशीक्षेत्र) सभी तीर्थोंमें उत्तम, सभी स्थानों में श्रेष्ठ और सभी ज्ञानोंमें उत्तम ज्ञानरूप है ॥ २१-२४॥

इस दिव्य भूमिमें महाश्मशानरूपी* काशीमें अन्य अनेक पवित्र स्थान, तीर्थ तथा मन्दिर प्रतिष्ठित हैं। मेरा गृहस्वरूप (यह वाराणसी क्षेत्र) भूलोकसे सम्बद्ध नहीं है, अपितु अन्तरिक्षमें (अवस्थित) है, अयोगियोंको इसके दर्शन नहीं होते। जो योगी हैं वे ध्यानमें इसका दर्शन करते हैं। सुन्दरी! यह महाश्मशानके नामसे विख्यात है और इसे अविमुक्त (क्षेत्र) भी कहा जाता है। मैं कालरूप होकर यहाँ इस संसारका संहार करता हूँ। २५-२७ ।।

देवि! सभी गुह्य स्थानोंमें यह मेरा सर्वाधिक प्रिय स्थान है। मेरे भक्त यहाँ आते ही मुझमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। यहाँ किया हुआ दान, जप, होम, यज्ञ, तप, कर्म, ध्यान, अध्ययन और ज्ञानार्जन-सब कुछ अक्षय हो जाता है। अविमुक्त क्षेत्रमें प्रविष्ट होनेवालेका हजारों जन्मान्तरोंमें किया हुआ जो पूर्वसंचित पाप है, वह सब नष्ट हो जाता है॥ २८-३०॥

वरानने! अविमुक्त (वाराणसी) क्षेत्रमें कालवश मृत्युको प्राप्त-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, स्त्री, म्लेच्छ, अन्य संकीर्ण पाप योनिवाले सभी मानव प्राणी, कीड़े, चींटी तथा जो भी अन्य मृग-पक्षी आदि हैं-ये सभी सिरपर अर्धचन्द्र धारण करनेवाले, त्रिनेत्र तथा महावृषभ (नन्दी)- को वाहन बनानेवाले (शिव-स्वरूप) मानव बनकर मेरे कल्याणमय पुरमें उत्पन्न होते हैं। अविमुक्त क्षेत्रमें मरा हुआ कोई पापी नरक में नहीं जाता है, ईश्वर (शंकर)-से कृपा-प्राप्त वे सभी परम गति प्राप्त करते हैं। मोक्षको अत्यन्त दुर्लभ और संसार को अत्यन्त भीषण समझकर पत्थरद्वारा पैरोंको तोड़कर मनुष्य को वाराणसी में निवास करना चाहिये॥ ३१-३५॥

परमेश्वरी! तपस्याद्वारा पवित्र हुए प्राणीके लिये भी जहाँ-कहीं मरनेपर संसारसे मुक्त करनेवाली गति दुर्लभ होती है। शैलपुत्री! मेरे अनुग्रहसे (वह गति) यहाँ प्राप्त हो जाती है। मेरी मायासे विमोहित अज्ञानी लोग इस तत्त्वको नहीं समझते हैं। अज्ञानसे आवृत मूढ़ लोग अविमुक्त क्षेत्रका सेवन नहीं करते, वे मल-मूत्र और रजोवीर्य (-से युक्त नरक)-के बीच बार-बार निवास करते हैं। सैकड़ों विघ्नोंसे आहत होने पर भी जो विद्वान् (वाराणसीमें) निवास करते हैं, वे उस परम स्थानको प्राप्त करते हैं, जहाँ जानेपर शोक नहीं करना पड़ता ॥ ३६-३९॥

 (वे) जन्म, मृत्यु और जरारहित होकर शिवके श्रेष्ठ निवासस्थानको प्राप्त करते हैं। पुनः मरणको न प्राप्त करनेवाले मोक्षार्थियोंकी वह सद्गति होती है, जिसे प्राप्तकर पण्डित लोग (स्वयंको) कृतकृत्य मानते हैं। अविमुक्त क्षेत्रमें जो उत्कृष्ट गति प्राप्त होती है, वह न दानोंसे, न विविध तपोंसे, न यज्ञोंसे और न विद्याद्वारा ही प्राप्त की जा सकती है॥४०-४१॥

विद्वानोंका यह कहना है कि अनेक (ब्राह्मणादि) वर्णवाले मनुष्यों, वर्णरहित चण्डालादिकों, घृणित व्यक्तियों तथा जो पापों तथा विशिष्ट पापों (महापापों)-से युक्त देहवाले हैं, उनके लिये अविमुक्त क्षेत्र (वाराणसी का सेवन ही) परम ओषधि है। अविमुक्त (क्षेत्र) परम ज्ञान है। अविमुक्त (क्षेत्र) परम पद है। अविमुक्त (क्षेत्र) परम तत्त्व है और अविमुक्त (क्षेत्र) परम कल्याण है। नैष्ठिकी दीक्षा ग्रहण कर जो अविमुक्त (क्षेत्र)-में निवास करते हैं, उन्हें मैं श्रेष्ठ ज्ञान और अन्तमें परम पद प्रदान करता हूँ॥ ४२-४४॥

प्रयाग, पुण्यदायी नैमिषारण्य, महालय श्रीशैल, केदार, भद्रकर्ण, गया, पुष्कर, कुरुक्षेत्र, रुद्रकोटि, नर्मदा, आम्रातकेश्वर, शालिग्राम, कुब्जाम्र, श्रेष्ठ कोकामुख, प्रभास, विजयेशान, गोकर्ण तथा भद्रकर्ण-ये सभी पवित्र तीर्थ तीनों लोकों में विख्यात हैं, किंतु जिस प्रकार वाराणसीमें मरे हुए व्यक्तियोंको परम मोक्ष प्राप्त होता है, वैसा अन्यत्र प्राप्त नहीं होता। वाराणसीमें प्रविष्ट त्रिपथगामिनी (स्वर्ग, पाताल एवं भूलोक इस प्रकार तीन पथोंमें प्रवाहित होनेवाली) गङ्गा सैकड़ों जन्मोंमें किये हुए पापोंको नष्ट करनेमें अपना विशिष्ट स्थान रखती है ॥ ४५-४८॥

गङ्गा, श्राद्ध, दान, तप, जप तथा व्रत वाराणसी में सभी सुलभ हैं, परंतु अन्यत्र दुर्लभ हैं। वाराणसी में स्थित मनुष्य ऐसा ज्ञान अत्यल्प परिश्रमसे प्राप्त कर लेता है, जिसके सहारे वायुभक्षी होकर नित्य हवन करता है, यज्ञ करता है, दान देता है तथा देवताओंकी पूजा करता है। मनुष्य पापी हो, शठ हो अथवा अधार्मिक हो, तब भी वाराणसीमें पहुंचकर अपने संसर्गमें रहनेवाले सबको पवित्र कर देता है। वाराणसीमें जो महादेवकी स्तुति करते हैं, अर्चना करते हैं, उन्हें सभी पापोंसे मुक्त (शंकरके) गणेश्वर समझना चाहिये॥ ४९-५२॥

दूसरे स्थानमें योग, ज्ञान, संन्यास अथवा अन्य उपायों से हजारों जन्मोंमें वह परमपद-मोक्ष प्राप्त होता है, किंतु देवदेवेश शंकर के जो भक्त वाराणसीमें निवास करते हैं, वे एक ही जन्ममें परमपद-मोक्षको प्राप्त कर लेते हैं। जहाँ एक ही जन्ममें योग, ज्ञान अथवा मुक्ति मिल जाती है, उस अविमुक्त (वाराणसी) क्षेत्रमें पहुंचकर फिर किसी दूसरे तपोवनमें नहीं जाना चाहिये ॥५३-५५॥

चूँकि मैं वाराणसी क्षेत्र कभी नहीं छोड़ता, इसलिये वह अविमुक्त (क्षेत्र) कहलाता है, यही गुह्योंमें अत्यन्त गुह्य (ज्ञान) है। इसे जानकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। हे सुभ्र (सुन्दर भौंहोंवाली)! ज्ञान* (ब्रह्मज्ञान) और अज्ञान (ब्रह्मज्ञानका साधनरूप ज्ञान)-में निरत तथा परमानन्दकी इच्छा करनेवालोंकी जो गति बतलायी गयी है, वह अविमुक्त (क्षेत्र)-में मरनेवालोंको प्राप्त होती है। अविमुक्तरूप देह (विराट्)-में जिन क्षेत्रों का | वर्णन हुआ है, उन सभी क्षेत्रोंमें वाराणसीपुरी अधिक शुभ है॥५६-५८॥

यह अविमुक्त क्षेत्र ऐसा है, जहाँ साक्षात् महादेव ईश्वर देहान्त होनेके समय तारक ब्रह्मका उपदेश देते हैं। देवि! जो वह परतर तत्त्व 'अविमुक्त' नामसे कहा जाता है, वह वाराणसीमें एक जन्ममें ही प्राप्त हो जाता है। (विराट्के) भौंहोंके मध्य, नाभिके मध्य, हृदयमें, मूर्धा में तथा आदित्यमें जिस प्रकार अविमुक्त स्थित है, उसी प्रकार वाराणसीमें अविमुक्त क्षेत्र प्रतिष्ठित है॥५९-६१ ॥

वरुणा और असीके मध्य वाराणसीपुरी है। वहाँ अविमुक्त नामक नित्य तत्त्व स्थित है। जहाँ नारायण देव और महादेव दिवेश्वर (सुरलोकके अधिपति) स्थित हैं, उस वाराणसीसे श्रेष्ठ स्थान न कोई हुआ है और न कोई होगा। वहाँ गन्धर्वो, यक्षों, नागों तथा राक्षसोंसहित सभी देवता मुझ देवाधिदेव पितामह की सतत उपासना करते हैं। ६२-६४॥

जो महापापी हैं और उनसे भी जो अधिक पाप करनेवाले (अतिपातकी) हैं, वे वाराणसी पहुंचकर परम गतिको प्राप्त करते हैं। इसलिये मोक्षार्थी को मरणपर्यन्त वाराणसीमें निश्चितरूपसे निवास करना चाहिये। वाराणसीमें महादेवसे ज्ञान प्राप्तकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। किंतु पापसे आक्रान्त चित्तवालोंको विघ्न होते हैं। इसलिये शरीर, मन और वाणीसे पाप नहीं करना चाहिये। सुव्रतो! (उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाले) यह वेदों और पुराणोंका रहस्य है। अविमुक्तसे सम्बद्ध ज्ञानको कोई तत्त्वतः जानता नहीं है ॥ ६५-६८॥

महादेवने देवताओं, ऋषियों तथा परमेष्ठियोंके समक्ष देवी पार्वतीसे सभी पापोंको विनष्ट करनेवाले इस ज्ञानको कहा था ॥६९॥

जिस प्रकार देवताओंमें पुरुषोत्तम नारायण श्रेष्ठ हैं, जिस प्रकार ईश्वरोंमें गिरिश (महादेव) श्रेष्ठ हैं, वैसे ही सभी स्थानोंमें यह (अविमुक्त क्षेत्र) श्रेष्ठ है। जिन्होंने पूर्वजन्ममें रुद्रकी उपासना की है, वे ही परम अविमुक्त क्षेत्र नामक शिवके निवास स्थान को प्राप्त करते हैं। कलिके दोषोंके कारण जिनकी बुद्धि उपहत हो गयी है, वह परमेष्ठीके उस स्थानको जान नहीं सकते ॥७०-७२ ।।

जो सर्वदा कालरूप शिवका और इस पुरी (वाराणसी) का स्मरण करते रहते हैं, उनका इस लोक और अन्य लोकका पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। यहाँ निवास करनेवाले जो पाप करते हैं, कालस्वरूप देव शिव उन सबको नष्ट कर देते हैं।७३-७४॥

मोक्षकी इच्छासे इस स्थानका सेवन करनेके लिये जो यहाँ आते हैं, उन्हें मृत्युके अनन्तर पुन: भवसागर में जन्म नहीं लेना पड़ता। इसीलिये चाहे योगी हो, अयोगी हो अथवा पापी हो या श्रेष्ठ पुण्यकर्मा हो, जैसा भी हो, उसे सभी प्रयत्नोंसे वाराणसीमें ही निवास करना चाहिये। वेद के वचनसे, माता-पिताके कहनेसे अथवा गुरुके वचनसे भी अविमुक्त क्षेत्र-वाराणसीमें आने के विचारका परित्याग नहीं करना चाहिये ।।७५-७७॥

सूतजी बोले-ऐसा कहकर वेदविदोंमें श्रेष्ठ भगवान् व्यास प्रधान शिष्योंके साथ वाराणसीमें विचरण करने लगे॥ ७८॥