4 अध्याय

सूतजीने कहा-आश्रमोंके सम्बन्धमें पूरे विधि-विधान को सुनकर प्रसन्न मनवाले ऋषियोंने भगवान् हृषीकेश को नमस्कार करके पुनः इस प्रकारका वचन कहा-॥१॥

मुनिजन बोले-(भगवन् !) आपने श्रेष्ठ चारों आश्रमों के विषयमें सब कुछ बतलाया, अब इस समय हमें यह सुननेकी इच्छा है कि इस जगत्की सृष्टि कैसे होती है। हे पुरुषोत्तम! यह सब (संसार) कहाँ से उत्पन्न हुआ, किसमें विलीन होगा और इन सबका नियामक कौन है? यह सब आप बतलायें। ऋषियोंका वचन सुनकर कूर्मरूप धारण करनेवाले तथा सभी भूत-प्राणियों के उत्पत्ति और विनाशके स्थान भगवान् नारायण गम्भीर वाणी में बोले-॥२-४॥

श्रीकूर्मने कहा-सर्वत्र (चारों ओर) मुखवाले महेश्वर (प्रकृतिसे) पर, अव्यक्त, चतुर्दूह, सनातन, अनन्त, अप्रमेय तथा (समस्त जगत्के) नियन्ता हैं । तत्त्वचिन्तक जिसे प्रधान और प्रकृति कहते हैं और जो सत्-असत्-रूप हैं, वही अव्यक्त नित्य कारण है॥५-६॥

गन्ध, वर्ण और रससे हीन, शब्द-स्पर्शसे रहित, अजर, ध्रुव, अक्षय्य (कभी नाश न होनेवाला), नित्य ॥७॥

अपनी आत्मा में स्थित संसार का बीजरूप, महाभूत, सनातन, परब्रह्म, सभी प्राणियोंकी मूर्तिरूप, आत्मा से अधिष्ठित, महत्तत्त्व, अनादि, अनन्त, अजन्मा, सूक्ष्म, त्रिगुण, उत्पत्ति और प्रलय का स्थान, शाश्वत तथा अविज्ञेय ब्रह्म ही आदिमें विद्यमान था।।८-९॥

उस समय गुणोंकी साम्यावस्था रूप उस पुरुष के आत्मस्वरूप में स्थित होने पर जब तक विश्व की सृष्टि नहीं हो जाती, प्राकृत प्रलय (-का समय) जानना चाहिये। यह ब्रह्माकी रात्रि कही गयी है और सृष्टिको ब्रह्मा का दिन कहा गया है, (वास्तव में) उसका न दिन होता है और न रात होती है॥१०-११॥

आदिसे रहित वह जगत्का आदि कारण, सर्वभूतमय, अव्यक्त, अन्तर्यामी परात्पर ईश्वर रात्रि व्यतीत होने पर जाग्रत् हुआ। परमेश्वर महेश्वरने प्रकृति एवं पुरुष में शीघ ही प्रविष्ट होकर परम योगके द्वारा (उनमें) क्षोभ (गति) उत्पन्न किया ॥१२-१३॥

जैसे वसन्त ऋतुकी वायु अथवा मद पुरुष एवं स्त्रियोंको (क्षुब्ध करता है) वैसे ही वह योग विग्रह (योगबल से विविध शरीर-धारण में समर्थ ईश्वर) प्रकृति एवं पुरुषमें अनुप्रविष्ट होकर क्षोभका कारण बनता है। हे ब्राह्मणो! वही परमेश्वर क्षोभ उत्पन्न करनेवाला है एवं स्वयं क्षुब्ध होनेवाला है, वह प्रलय एवं सृष्टि करने के कारण प्रधान भी कहलाता है। प्रधान पुरातनपुरुष के क्षुब्ध होनेसे प्रधान (प्रकृति) पुरुषात्मक महद् बीज का आविर्भाव हुआ ॥१४-१६॥

इसी कारण से (वह महद्वीज) महान् आत्मा, मति, प्रबुद्धि, ख्याति, ईश्वर, प्रज्ञा, धृति, स्मृति तथा संवित् कहलाता है ॥१७॥

महत्तत्त्व से समस्त प्राणियों की सृष्टि का आदि कारण-वैकारिक, तैजस तथा तामस-यह तीन प्रकार का अहंकार उत्पन्न हुआ॥ १८॥

वह अहंकार अभिमान, कर्ता, मन्ता, आत्मा, पुद्गल तथा जीव (नामों)-से कहा गया है। उसी अहंकार से सभी प्रवृत्तियाँ होती हैं। अहंकार से पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश), पाँच तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध), सभी इन्द्रियाँ तथा उन इन्द्रियों के अधिष्ठातृ देवता उत्पन्न हुए। यह सम्पूर्ण जगत् उससे ही उत्पन्न हुआ है ॥ १९-२०॥

इस 'रस' अव्यक्तसे उत्पन्न मनको प्रथम विकार माना गया है। इस कारण यह कर्ता एवं भूतादिकों को देखनेवाला है। वैकारिक अहंकारसे वैकारिक सृष्टि उत्पन्न हुई। इन्द्रियाँ तैजस हैं और (उन इन्द्रियोंके अधिष्ठाता) दस देवता वैकारिक हैं ॥ २१-२२ ।।

उनमें (ग्यारहवाँ) इन्द्रिय मन अपने गुणके कारण उभयात्मक है। यह भूततन्मात्राओंकी सृष्टि है। भूतादिकों से ही प्रजा उत्पन्न हुई। विकारप्राप्त भूतोंने शब्दतन्मात्रा को उत्पन्न किया। उस (शब्द तन्मात्रा)-से शब्द लक्षण-वाले तथा अवकाशस्वरूप आकाशकी उत्पत्ति हुई। वैकारिक आकाशने स्पर्श तन्मात्राको उत्पन्न किया। उससे वायु उत्पन्न हुआ और वायुका गुण स्पर्श कहा गया है॥२३-२५॥

विकारप्राप्त वायुने रूप तन्मात्राको उत्पन्न किया, वायुसे तेज उत्पन्न हुआ और इसका 'रूप' गुण कहा जाता है। विकारको प्राप्त हुए तेजने भी रस तन्मात्रा की सृष्टि की और उससे फिर जलकी उत्पत्ति हुई, वह जल गुणका आधार है। विकारको प्राप्त हो रहे जलने गन्ध तन्मात्राको उत्पन्न किया, उससे संघात (पृथ्वीतत्त्व) उत्पन्न हुआ और उसका गुण 'गन्ध' माना गया है॥ २६-२८॥

आकाशकी शब्द नामक तन्मात्रा है, उसने स्पर्श नामक तन्मात्राको आवृत किया है, इसलिये वायु शब्द तथा स्पर्श-इन दो गुणोंवाला है। उसी प्रकार रूप (नामक) गुण, शब्द एवं स्पर्श दो गुणोंसे आविष्ट है, अतः तेज या अग्नि-शब्द, स्पर्श तथा रूप-इन तीन गुणोंवाला है। शब्द, स्पर्श तथा रूप एवं रस तन्मात्रा में प्रविष्ट हुए, इसलिये रसात्मक जल-तत्त्वको चार गुणों (शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस)-से युक्त समझना चाहिये। शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस-ये चार गुण गन्ध तन्मात्रा में प्रविष्ट हुए, इसलिये पञ्च स्थूल महाभूतसे युक्त पृथ्वी तत्त्व पाँच गुणोंवाला कहा गया है॥ २९-३२॥

इसी कारण ये शान्त, घोर, मूढ तथा विशेष कहलाते हैं। ये परस्पर एक-दूसरे में प्रविष्ट होनेके कारण आपस में एक दूसरेको धारण किये रहते हैं॥ ३३॥

ये सातों महात्मा (महत्, अहंकार आदि तत्त्व) एक-दूसरे के आश्रित होनेके कारण बिना सम्पूर्ण रूप से मिले सृष्टि करनेमें समर्थ नहीं हो सके॥ ३४॥

पुरुष से अधिष्ठित और अव्यक्तसे अनुगृहीत होनेके कारण महत्तत्त्वसे लेकर विशेष (पञ्चभूत)-पर्यन्त वे सभी (तत्त्व) अण्डको उत्पन्न करते हैं॥ ३४-३५॥

विशेषों (महाभूतों)-से एक बार में ही जलके बुल-बुले के समान तथा जलमें स्थित वह बृहत् अण्ड उत्पन्न हुआ। उसी (बृहत् अण्ड)-में परमेष्ठीके (सृष्टिस्वरूप) कार्यका करण सिद्ध (निष्पन्न) हुआ। प्राकृत अण्ड में क्षेत्रज्ञ आविर्भूत हुआ जो ब्रह्मा नामसे कहलाया। वे प्रथम शरीर धारण करनेवाले हैं। वे पुरुष कहलाते हैं और समस्त प्राणियोंके आदिकर्ता वे ब्रह्मा सर्वप्रथम उत्पन्न हुए। प्रधान से परमें स्थित उस पुरुष को हंस, हिरण्यगर्भ, कपिल, छन्दोमूर्ति तथा सनातन कहा जाता है॥ ३६-३९॥

उस परमात्माका गर्भवेष्टन था मेरु, पर्वत थे गर्भ के आवरणरूप चर्म-जरायु तथा गर्भोदक थे सभी समुद्र। उस अण्डमें देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंसहित सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ तथा ग्रहों, नक्षत्रोंसहित वायु, सूर्य एवं चन्द्रमा भी उत्पन्न हुए ॥ ४०-४१ ॥

अण्ड (ब्रह्माण्ड) बाहरकी ओर अपनेसे दस गुने अधिक जलसे घिरा हुआ है और जल बाहर से अपनेसे दस गुने अधिक तेजसे आवृत है। तेज बाहरसे अपनेसे दस गुने अधिक वायुसे आवृत है। इसी प्रकार वायु आकाशसे आवृत है और आकाश भूतादि अर्थात् अहंकारसे घिरा हुआ है। जैसे अहंकार महत्तत्त्वसे आवृत है, वैसे ही महत्तत्त्व अव्यक्त से आवृत है। ये लोक सर्वतत्त्वाभिमानी महान् स्वरूपवाले हैं। ४२-४४॥

उन (लोकों)-में उन्हींके आत्मरूप ऐश्वर्यसम्पन्न तथा योगधर्मा (योगधर्मसे युक्त) पुरुष निवास करते हैं और अन्य भी जो तत्त्वचिन्तक हैं, वे भी निवास करते हैं। (वे सभी पुरुष) सर्वज्ञ, शान्त रजोगुणवाले अर्थात् सत्त्वसम्पन्न तथा नित्य ही अत्यन्त प्रसन्न मनवाले हैं। ब्रह्माण्ड इन्हीं प्राकृत सात आवरणोंसे आवृत है॥ ४५-४६॥

ब्राह्मणो! (इस विषयमें) केवल इतना ही कहा जा सकता है कि 'यह माया बहुत ही गहन है'। बीजरूपसे मैंने जिसका वर्णन किया वह सब प्रधान अर्थात् प्रकृतिका कार्य (व्यापार) है। यह (प्रकृति या माया अन्य और कोई नहीं) प्रजापतिकी (ही) परा मूर्ति है-ऐसा वेदोंका अभिमत है॥ ४७ ॥

सात लोकोंके तलसे युक्त यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उन परमेष्ठी देवका दूसरा शरीर है। वेदोंके अर्थ को ठीक-ठीक जाननेवाले बतलाते हैं कि सोनेके समान वर्णवाले पीत अण्डसे प्रादुर्भूत हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्मा भगवान्के तीसरे रूप (शरीर) हैं ॥ ४८-४९॥

उन्हीं धीमान्का जो रजोगुणयुक्त अन्य रूप है, वे ही चतुर्मुख भगवान् ब्रह्मा हैं तथा संसारकी सृष्टि करते हैं। स्वयं विश्वेश्वर विश्वतोमुख विश्वात्मा भगवान् विष्णु सत्त्वगुणका आश्रय ग्रहणकर उत्पन्न हुए सम्पूर्ण (संसार)-का पालन-पोषण करते हैं। अन्तकालमें स्वयं परमेश्वर सर्वात्मा रुद्रदेव तमोगुणका समाश्रयणकर संसार का संहार करते हैं। ५०-५२॥

एक होनेपर भी वे निर्गुण-निरञ्जन महादेव सृष्टि, पालन और संहाररूपी तीन गुणोंके कारण तीन रूपों में स्थित हैं। वे कभी एक, कभी दो, कभी तीन तथा कभी अनन्त रूप धारण कर लेते हैं। वे योगेश्वर (परमात्मा) अपनी लीलासे अनेक आकार, क्रिया, रूप तथा नामवाले शरीरोंका निर्माण करते हैं और फिर संहार कर डालते हैं ॥५३-५४॥

भक्तोंके कल्याणके लिये ही वे पुनः संहार करते हैं। अपनेको तीन रूपोंमें विभक्तकर तीनों कालोंमें प्रवृत्त होते हैं। इस प्रकार (वे) विशेष रूपसे सृष्टि, संहार और पालनका कार्य करते हैं ॥ ५५ ॥

चूँकि वे (स्वयं ही) प्रजाकी सृष्टि करते हैं, उसका पालन करते हैं और (स्वयं उसका) पुनः संहार करते हैं, इसलिये तीनों कालोंमें (सत्त्व, रज तथा तमरूप) त्रिगुणात्मक होनेसे वे (परमात्मा) एक (अद्वैत) कहलाते हैं। प्रारम्भमें वे सनातन हिरण्यगर्भ प्रादुर्भूत हुए। आदि में उत्पन्न होनेसे वे आदिदेव तथा अजन्मा होने से अज कहलाते हैं ।।५६-५७॥

वे समस्त प्रजाओंका पालन करते हैं, इसलिये 'प्रजापति' इस नामसे कहे जाते हैं और देवताओंमें सबसे बड़े देव हैं, इसलिये 'महादेव' कहलाते हैं। ५८ ॥

बृहत् होनेसे वे ब्रह्मा तथा परम (श्रेष्ठ) होनेके कारण परमेश्वर कहे जाते हैं। सबको अपने वशमें रखनेवाले, परंतु स्वयं किसीके वशमें न रहने के कारण वे ईश्वर (नामसे) परिभाषित किये जाते हैं। उनकी सर्वत्र गति होनेके कारण वे ऋषि और (प्रलयकालमें) सब कुछ हरण करनेके कारण हरि कहलाते हैं। किसीके द्वारा उत्पन्न न होने तथा सर्वप्रथम होनेके कारण 'स्वयम्भू' इस नाम से कहे जाते हैं। सभी मनुष्यों के वे अयन (आश्रय-स्थान) हैं, इसलिये नारायण कहे जाते हैं, संसारका संहार करनेसे हर तथा सर्वत्र व्यापक होनेसे विष्णु कहलाते हैं ॥५९-६१॥

(वे) सब कुछ जाननेके कारण भगवान् तथा रक्षा-कार्य करनेसे ॐ कहलाते हैं। सभी का विशिष्ट ज्ञान होनेसे सर्वज्ञ तथा सभीके आत्मस्वरूप होनेके कारण वे सर्व कहे जाते हैं। वे मलशून्य हैं, इसलिये शिव और सर्वत्र व्याप्त होनेसे विभु तथा सभी प्रकारके कष्टोंका निवारण करनेसे 'तारक' कहलाते हैं। ६२-६३॥

और अधिक कहनेसे क्या लाभ! यह सारा जगत् ब्रह्ममय ही है और वे परमेश्वर अनेक रूपोंमें विभक्त होकर अनेक क्रीड़ाएँ (लीलाएँ) करते रहते हैं ॥ ६४॥

हे ब्राह्मणो! मैंने संक्षेपमें इस अबुद्धिपूर्वक हुए प्राकृत सर्ग (प्राकृत सृष्टि)-का वर्णन किया है। अब आप लोग ब्रह्माकी सृष्टिके सम्बन्धमें सुनें ॥६५॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चौथा अध्याय समाप्त हुआ॥४॥