कूर्म महा पुराण
5 अध्याय
व्यासजी बोले-इतना कहकर योगियोंके परमेश्वर भगवान् (शिव) परम ऐश्वर्यमय भाव प्रदर्शित करते हुए नृत्य करने लगे। उन मुनियोंने परम तेजोनिधि ईशान महादेवको विष्णुके साथ नृत्य करते हुए स्वच्छ आकाशमें देखा। योगके तत्त्वको जाननेवाले संयतचित्त योगी ही जिन्हें जान पाते हैं, उन सभी प्राणियोंके ईशको आकाशमें मुनियोंने देखा। यह (सम्पूर्ण जगत्) जिनकी मायासे निर्मित है और जिनके द्वारा यह जगत् प्रेरित होता है, उन साक्षात् विश्वेशको विप्रोंने नृत्य करते हुए देखा। जिनके चरण-कमलका स्मरण करके पुरुष अज्ञानसे उत्पन्न भयसे छुटकारा पा लेता है, उन्हीं भूतेशको मुनियोंने नृत्य करते हुए देखा ॥१-५॥
निद्रारहित, श्वासजयी, शान्त और भक्तिपरायण लोग जिनके ज्योतिर्मय स्वरूपका दर्शन करते हैं, (विप्रजनोंको) वे ही योगी दिखलायी पड़े। जो भक्तवत्सल (देव) प्रसन्न होनेपर शीघ्र ही अज्ञानसे मुक्त कर देते हैं, उन्हीं मुक्त करनेवाले परम रुद्रको (उन्होंने) आकाशमें देखा। (ब्राह्मणोंने) हजारों सिरवाले, हजारों चरणोंकी आकृतिसे युक्त, हजारों बाहुवाले, जटायुक्त, अर्धचन्द्रको मस्तकपर धारण करनेवाले, व्याघ्रके चर्म को वस्त्ररूपमें धारण करनेवाले, महान् भुजामें त्रिशूल धारण करनेवाले, हाथमें दण्ड धारण किये, वेदत्रयीरूप तीन नेत्रवाले, सूर्य, चन्द्रमा और अग्निरूप नेत्रधारी, अपने तेजसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको आवृतकर स्थित हुए, भयंकर दाढ़ोंवाले, दुर्धर्ष, करोड़ों सूर्योंके समान आभावाले, अण्डके अंदर स्थित और अण्डके बाहर स्थित, परम (सर्वोत्कृष्ट), बाहर-भीतर सर्वत्र व्याप्त, अग्निज्वाला उत्पन्न करनेवाले और सम्पूर्ण जगत्को जलानेवाले विश्वकर्मा (समस्त कर्मोंके अधिष्ठाता) देवको नृत्य करते हुए देखा ॥६-११॥
ब्रह्मवादी मुनियोंने महादेव, महायोगस्वरूप, देवों के भी देव, पशुपति ईशान, ज्योतियोंके भी अविनश्वर ज्योतिःस्वरूप, पिनाकी, विशालाक्ष, भव-रोगियोंके औषध, कालात्मा, कालके भी काल, देवाधिदेव, महेश्वर, उमापति, विरूपाक्ष, परम योगानन्दमय, ज्ञान-वैराग्यके निधान, सनातन ज्ञानयोग, शाश्वत ऐश्वर्य एवं विभवरूप, धर्मके आधार, दुरासद (दुष्प्राप्य), महेन्द्र तथा उपेन्द्र (विष्णु)-द्वारा नमस्कृत, महर्षिगणोंद्वारा वन्दित, सभी शक्तियोंके आधार, महायोगेश्वरोंके भी ईश्वर, योगियोंके परम ब्रह्म, योगियोंके योगद्वारा वन्दित, योगियोंके हृदयमें स्थित, योगमायासे समावृत, जगत्के योनिरूप तथा अनामय नारायणको क्षणमात्रमें ईश्वर अर्थात् शंकरके साथ एकाकार होते हुए देखा॥१२-१७॥
रुद्रके उस ऐश्वर्यमय नारायणात्मक रूपको देखकर ब्रह्मवादी संतोंने अपने-आपको कृतार्थ माना। सनत्कुमार, सनक, भृगु, सनातन, सनन्दन, रुद्र, अंगिरा, वामदेव, शुक्र, महर्षि अत्रि, कपिल तथा मरीचि-इन ऋषियोंने पद्मनाभ विष्णुको वामभागमें विराजित किये हुए उन जगत्के नियामक रुद्रका दर्शन किया और हृदयमें स्थित उनका ध्यान करके सिरसे विनयपूर्वक प्रणामकर पुनः अपने मस्तकपर अञ्जलि बाँधकर प्रणाम किया॥१८-२०॥
ओंकारका उच्चारण करनेके उपरान्त अपने शरीर के भीतर (हृदयरूपी) गुहामें निहित उन देवका दर्शन करके आनन्दसे परिपूर्ण विस्तृत आत्मावाले वे (मुनिगण) वैदिक मन्त्रोंके द्वारा (उन देवकी) स्तुति करने लगे॥ २१ ॥
मुनियोंने कहा-आप एकमात्र ईश्वर, पुराणपुरुष, प्राणेश्वर, अनन्त योगरूप, हृदयमें संनिविष्ट, प्रचेता, पवित्र एवं ब्रह्ममय रुद्रको हम सभी प्रणाम करते हैं। इन्द्रियोंका दमन करनेवाले तथा शान्त मुनिगण ध्यान के द्वारा अपने ही शरीरमें अचल, निर्मल, स्वर्णके समान वर्णवाले, ब्रह्मयोनि, उत्कृष्टसे भी अत्यन्त उत्कृष्ट (प्राणिमात्रके हृदयमें विद्यमान) आप कविका दर्शन करते हैं। संसारकी सृष्टि आपसे ही हुई है। आप सभीके आत्मरूप और परम अणुरूप हैं। महापुरुष आपको ही सब कुछ और सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म तथा महान्से भी महान् कहते हैं॥२२-२४॥
जगत्के अन्तरात्मा-स्वरूप हिरण्यगर्भ पुराणपुरुष आपसे उत्पन्न हुए हैं। आपद्वारा उत्पन्न किये गये उस (पुराणपुरुष)-ने उत्पन्न होते ही यथाविधि सम्पूर्ण संसारकी सृष्टि की। आपसे ही सभी वेद उत्पन्न हुए हैं और अन्तमें आपमें ही वे स्थिति पाते हैं। हम अपने हृदयमें स्थित जगत्के कारणरूप आपको नृत्य करते हुए देख रहे हैं। आपके द्वारा ही इस ब्रह्मचक्रको चलाया जाता है, आप मायावी और जगत्के एकमात्र स्वामी हैं। हम दिव्य नृत्य करनेवाले आप योगात्मा चित्पतिकी शरणमें आये हैं, आपको हम नमस्कार करते हैं। परम आकाशके मध्यमें नृत्य कर रहे आपका हम दर्शन करते हैं और आपकी महिमाका स्मरण करते हैं। अनेक रूपोंमें स्थित सर्वात्मा ब्रह्मानन्द का हम बार-बार अनुभव कर रहे हैं ॥२५-२८॥
आपका वाचक ओङ्कार मुक्तिका बीज है, आप अक्षर तथा प्रकृतिमें गूढरूपसे स्थित हैं। इसीलिये संतजन आपको सत्यस्वरूप और आपके प्रकाशको स्वयं प्रकाशित बताते हैं। सभी वेद सतत आपकी स्तुति करते हैं। दोषरहित ऋषिगण आपको नमस्कार करते हैं तथा शान्त-चित्त, सत्यसंध ब्रह्मनिष्ठ यतिजन आप सर्वश्रेष्ठमें प्रवेश करते हैं ॥ २९-३० ॥
बहुत शाखाओंवाला एक अनन्त वेद आपके अद्वितीय एवं एकरूपका बोध कराता है। जो लोग जानने योग्य आपकी शरण ग्रहण करते हैं, उन्हीं को शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है, अन्य किसीको नहीं। आप ईश, अनादि, तेजोराशि, ब्रह्मा, विश्वरूप, परमेष्ठी और वरिष्ठ हैं। नित्य मुक्त और स्वयं ज्योतिरूप अचल (योगी) स्वात्मानन्दका अनुभव कर (आपमें) प्रविष्ट होते हैं। ३१-३२॥
आप अद्वितीय रुद्र ही इस विश्वकी सृष्टि करते हैं। विश्वरूप आप सबका पालन करते हैं और यह (विश्व) अन्तमें आपमें ही विलीन हो जाता है। हम आपको नमस्कार करते हैं और आपके शरणागत हैं॥३३॥
मुनियोंने पहलेके समान स्थित भूतभव्येश भव और नारायणदेवको देखकर आश्चर्यचकित होकर यह वाक्य कहा-॥४३॥
भगवन्! भूतभव्येश! गोवृषाङ्कितशासन! सनातन ! आपके परम रूपका दर्शन कर हमलोग संतुष्टचित्त हो गये हैं। आपकी कृपासे हम सभीको निर्मल, परात्पर, परमेश्वरस्वरूप आपकी अव्यभिचारिणी भक्ति उत्पन हुई है। शंकर! इस समय हमलोग आप परमेष्ठी के उस माहात्म्यको एवं जो नित्य यथार्थस्वरूप है (उसे) पुनः सुनना चाहते हैं ॥ ४४-४६ ॥
योगसिद्धियोंको प्रदान करनेवाले उन्होंने (महेश्वरने) उन योगियोंका वचन सुनकर तथा विष्णुकी ओर देखकर गम्भीर वाणीमें कहा-॥४७॥
Summary of chapter 54 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
In the sacred hermitage of Badarīkāshrama, the holy Mahārshis, including Sanatkumāra, Sanaka, Sanandana, Angiras, Bhṛgu, Kaṇāda, Kapila, Gārgya, Vāmadeva, Shukra, and Vashishṭha, gather to perform intense Tapas and inquire into the ultimate cause of Saṁsāra, the nature of Jīva, and the path to absolute Mukti. Demonstrating divine grace, Bhagavān Nārāyaṇa reveals Himself alongside Bhagavān Mahādeva Śiva, who manifests in His glorious three-eyed form adorned with the crescent moon and matted locks. Recognizing Mahādeva as the Supreme Soul, Purushottama Nārāyaṇa embraces Him and requests Him to impart the supreme, secret knowledge of Ishvaragītā to the assembled ascetics. Seated upon a radiant celestial throne that manifests in the sky, Bhagavān Mahādeva, flanked by Bhagavān Nārāyaṇa, begins His divine discourse to enlighten the seekers on the imperishable truth of Parabrahma.