कूर्म महा पुराण
24 अध्याय
व्यासजीने कहा-सदैव सायं और प्रातः अग्निहोत्र करना चाहिये। पक्षके अन्तमें अमावास्या और पौर्णमासी को हवन (दर्शेष्टि एवं पौर्णमासेष्टि) करना चाहिये। द्विजको फसल कट जानेपर नवशस्येष्टि, ऋतुकी समाप्ति पर (किया जानेवाला) यज्ञ एवं अयनके अन्तमें अर्थात् छ:-छ: महीनेपर संवत्सरके अन्तमें सौमिक याग करना चाहिये। दीर्घ आयुकी इच्छा करनेवाले अग्निहोत्री द्विजको नवशस्येष्टि किये बिना नया अन्न नहीं खाना चाहिये। नवीन अन्नका अग्निमें हवन किये बिना नवान्न खानेका इच्छुक व्यक्ति अपने प्राणोंको ही खाना चाहता है। प्रत्येक पर्वोमें नित्य ही सावित्रीहोम, शान्ति-होम करना चाहिये तथा अष्टकाओं और वष्टकाओंमें नियमसे नित्य पितरोंकी अर्चना करनी चाहिये॥१-५॥
गृहस्थाश्रममें निवास करनेवाले तीनों वर्गों (द्विजाति)- का यह नियमित श्रेष्ठ धर्म है, अन्य धर्म अपधर्म कहलाता है। नास्तिकता अथवा आलस्यके कारण जो अग्नियोंका आधान एवं यज्ञसे यजन नहीं करना चाहता, वह बहुतसे नरकोंमें जाता है ॥६-७॥
विप्रो! (अग्न्याधान आदि कृत्य न करनेवाला) वह दुर्मति तामिस्र, अन्धतामिस्र, महारौरव, रौरव, कुम्भीपाक, वैतरणी, असिपत्रवन तथा अन्य घोर नरकों को प्राप्तकर बादमें अन्त्यजोंके कुल तथा शूद्रयोनि में जन्म लेता है। अतः विशेषरूपसे विशुद्धात्मा ब्राह्मणों को सभी प्रकारके प्रयत्नोंद्वारा अग्निका आधानकर परमेश्वर का यजन-पूजन करना चाहिये। द्विजोंके लिये अग्निहोत्रसे
श्रेष्ठ कोई अन्य धर्म नहीं है। इसलिये अग्निहोत्र के द्वारा नित्य शाश्वत (पुरुष)-की आराधना करनी चाहिये। जो अग्निका आधानकर फिर आलस्यवश
यज्ञद्वारा देवताकी आराधना नहीं करना चाहता, वह व्यक्ति मूढ़ होता है, उससे बात नहीं करनी चाहिये। अधिक क्या, वह मनुष्य नास्तिक होता है ॥८-१२॥
जिसके पास सेवकोंके पोषणहेतु तीन वर्षतक के लिये पर्याप्त अथवा उससे भी अधिक (भोजन) सामग्री विद्यमान हो, वह सोमपानका अधिकारी होता है। सभी यज्ञोंमें सोमयाग सबसे श्रेष्ठ है। सोमद्वारा सोमलोकमें स्थित महेश्वरदेवकी आराधना करनी चाहिये। महेश्वरकी आराधनाके लिये सोमयागसे बड़ा अथवा उसके समान कोई यज्ञ नहीं है। इसलिये सोमके द्वारा श्रेष्ठ देवकी आराधना करनी चाहिये ॥ १३-१५॥
ब्राह्मणोंकी मुक्तिके लिये साक्षात् पितामहने आरम्भमें ही शुभ धर्म बतलाया है, वह श्रौत तथा स्मार्त नामसे दो प्रकारका है। तीन (आहवनीय, दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि) अग्नियोंके सम्बन्धसे श्रौतधर्म होता है। स्मार्तधर्मको मैंने पूर्वमें बता दिया है। श्रौतधर्म अधिक श्रेयस्कर है, इसलिये श्रौतधर्मका पालन करना चाहिये। कहे गये ये दोनों धर्म वेदसे ही निकले हुए हैं। श्रुति तथा स्मृतिके अभावमें शिष्टाचार ही तीसरा धर्म होता* है॥१६-१८॥
परिबृंहण (रामायण, महाभारत एवं पुराणादि ग्रन्थ) सहित वेदोंका धर्मपूर्वक ज्ञान प्राप्त करनेवाले और (दया, अहिंसा, सत्य आदि आठ) आत्मिक गुणोंसे सम्पन्न ब्राह्मण सदैव शिष्ट कहे गये हैं। इनके (शिष्टजनोंके) अन्त:करणद्वारा जो समर्थित होता है, विद्वानोंद्वारा उसे ही धर्म कहा गया है। अन्य लोगोंके अभिमतको धर्म नहीं कहा जाता, यही निश्चित सिद्धान्त है॥१९-२०॥
पुराण तथा धर्मशास्त्र वेदोंके उपबृंहण (विस्तार) हैं। एकसे ब्रह्मका विशेष ज्ञान होता है और दूसरेसे धर्मका ज्ञान होता है। धर्मकी जिज्ञासा करनेवालोंके लिये धर्मशास्त्र श्रेष्ठ प्रमाण कहा गया है और ब्रह्मज्ञानके लिये पुराण उत्कृष्ट प्रमाण है। वेदसे अतिरिक्त अन्य किसीसे धर्मका तथा वैदिक ब्रह्मविद्याका ज्ञान नहीं होता, इसलिये द्विजातियोंको धर्मशास्त्र तथा पुराणपर
श्रद्धा रखनी चाहिये ॥२१-२३॥
Summary of chapter 73 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Maharshi Vyāsa initiates the comprehensive exposition on ancestral rites (Śrāddha), detailing the specific lunar days (Tithis), Nakshatras, weekdays, and solar transitions auspicious for ancestor worship. He glorifies holy pilgrimage sites such as Gayā, Vārāṇasī, Prayāga, and Kurukshetra, where offerings made to Pitṛs yield inexhaustible merit. Vyāsa lists permissible food offerings, including sesame seeds, wild grains, and milk preparations, which grant deep satisfaction to ancestor spirits.